कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 नोट्स: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय class 10 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 10 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 1 |
| Chapter Name | यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय नोट्स |
| Medium | Hindi |
क्या आप Class 10 History chapter 1 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से europe me rashtravad ka uday notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे 1830 के दशक के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास, ग्यूसेप मैज़िनी, आदि के विचार, पोलैंड, हंगरी, इटली, जर्मनी में आंदोलनों आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
राष्ट्र :-
अर्न्स्ट रेनन के अनुसार राष्ट्र भाषा, धर्म या नस्ल से नहीं बल्कि साझा इतिहास, वर्तमान की इच्छा और भविष्य के संकल्प से बनता है।
रेनन के अनुसार राष्ट्र क्या है?
एक राष्ट्र लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु होता है।
🔹 राष्ट्र बनने के लिए आवश्यक बातें :-
🔸 समान गौरवशाली अतीत :- शौर्य और वीरता से युक्त साझा इतिहास, महान व्यक्तियों की स्मृतियाँ और राष्ट्रीय गौरव—यही वह सामाजिक पूँजी है जिस पर राष्ट्रीय विचार आधारित होता है।
🔸 वर्तमान में साझा इच्छा और संकल्प :- अतीत में समान गौरव के साथ-साथ वर्तमान में एक जैसी इच्छा और संकल्प का होना, साथ मिलकर महान कार्य करना तथा भविष्य में भी ऐसे कार्य करते रहने की चाह—ये सभी एक जनसमूह के लिए आवश्यक शर्तें हैं।
🔸 बड़ी एकता :- रेनन के अनुसार राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता है। उसका अस्तित्व एक प्रकार का रोज़ होने वाला जनमत-संग्रह है। इसमें प्रांत नहीं, बल्कि उसके निवासी महत्वपूर्ण होते हैं; और यदि किसी से सलाह ली जानी चाहिए तो वह निवासी ही होते हैं।
👉 इन्हीं सबको मिलाकर राष्ट्र बनता है।
राष्ट्रवाद :-
राष्ट्रवाद वह भावना है जिसमें लोग अपने देश को एक राष्ट्र के रूप में पहचानते हैं। इसमें एक समान संस्कृति, भाषा, इतिहास और परंपराएँ लोगों को जोड़ती हैं। राष्ट्रवाद के अंतर्गत लोग अपने देश की एकता, स्वतंत्रता और उसके लिए किए गए बलिदानों को महत्व देते हैं।
निरंकुशवाद :-
निरंकुशवाद ऐसी शासन व्यवस्था को कहते हैं जिसमें शासक की सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता। इतिहास में ऐसी राजशाही सरकारें निरंकुश कहलाती थीं जिनकी सत्ता अत्यंत केंद्रीकृत होती थी और जो सैन्य बल पर आधारित तथा दमनकारी होती थीं।
कल्पनादर्श (युटोपिया) :-
कल्पनादर्श (युटोपिया) एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना है जो इतना पूर्ण और उत्तम माना जाता है कि उसका वास्तविक रूप में साकार होना लगभग असंभव होता है।
जनमत-संग्रह :-
जनमत-संग्रह एक प्रकार का प्रत्यक्ष मतदान होता है, जिसके माध्यम से किसी क्षेत्र के सभी लोगों से किसी प्रस्ताव या निर्णय को स्वीकार या अस्वीकार करने के बारे में उनकी राय पूछी जाती है।
रूढ़िवाद :-
ऐसा राजनीतिक दर्शन जो पंरपरा, स्थापित संस्थानों और रिवाजों पर जोर देता है और तेज बदलावों की बजाय क्रमिक और धीरे-धीरे विकास को प्राथमिकता देता है।
नारीवाद :-
स्त्री-पुरुष की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और हितों का बोध नारीवाद कहलाता हैं।
विचारधारा :-
विचारधारा एक विशेष प्रकार की सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि को व्यक्त करने वाले विचारों का समूह होती है।
नृजातीय :-
एक साझा नस्ली, जनजातीय या सांस्कृतिक उद्गम अथवा पृष्ठभूमि जिसे कोई समुदाय अपनी पहचान मानता है, नृजातीय कहलाता हैं।
रूपक :-
जब किसी अमूर्त विचार (जैसे लालच, ईर्ष्या, स्वतंत्रता या मुक्ति) को किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के माध्यम से व्यक्त किया जाता है, तो उसे रूपक कहते हैं। एक रूपकात्मक कहानी के दो अर्थ होते हैं—एक शाब्दिक और दूसरा प्रतीकात्मक।
राष्ट्रवाद के उदय के कारण :-
- फ्रांसीसी क्रांति (1789)
- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचार
- निरंकुश राजशाही और विदेशी शासन का विरोध
- समान भाषा, संस्कृति और इतिहास की भावना
- साझा संघर्ष, बलिदान और वीरता की स्मृतियाँ
- आर्थिक एकीकरण और व्यापार का विकास
- मध्यम वर्ग का उदय
- लोकतांत्रिक अधिकारों और जनभागीदारी की मांग
- साहित्य, कला और प्रतीकों की भूमिका
- राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्र राष्ट्र की इच्छा
👉 इन सभी कारणों से लोगों में राष्ट्रीय चेतना विकसित हुई और राष्ट्रवाद का उदय हुआ।
यूरोप में राष्ट्रवाद का क्रमिक विकास :-
फ्रांसीसी क्रांति 1789 ⇒ नेपोलियन का शासन व नागरिक संहिता 1804 ⇒ वियना की संधि 1815 ⇒ गुप्त संगठन और राष्ट्रवादी आंदोलन ⇒ उदारवादियों की क्रांति 1848 ⇒ इटली का एकीकरण 1859–1871 ⇒ जर्मनी का एकीकरण 1866–1871
फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्रवाद का उदय (1789) :-
यह घोषणा की गई कि राष्ट्र का निर्माण जनता करेगी और वही उसकी नियति तय करेगी।
राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के साथ हुई। क्रांति से पहले फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र था। क्रांति के बाद प्रभुसत्ता राजा से निकलकर नागरिकों के हाथों में आ गई।
यह घोषणा की गई कि: राष्ट्र का निर्माण जनता करेगी और वही उसकी नियति तय करेगी।
फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा सामूहिक पहचान बनाने के लिए उठाए गए कदम :-
- नए विचार :- पितृभूमि (la patrie) और नागरिक (le citoyen) जैसे विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त थे।
- नया झंडा :- एक नया फ्रांसीसी झंडा-तिरंगा (the tricolour) चुना गया जिसने पहले के राजध्वज की जगह ले ली।
- नेशनल एसेंबली :- इस्टेट जेनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदल कर नेशनल एसेंबली कर दिया गया।
- राष्ट्रीय भावनाएँ :- नयी स्तुतियाँ रची गई, शपथें ली गई, शहीदों का गुणगान हुआ और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ।
- समान कानून :- एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई जिसने अपने भू-भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून बनाए।
- व्यापार में सुधार :- आंतरिक आयात-नियांत शुल्क समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एकसमान व्यवस्था लागू की गई।
- भाषा :- क्षेत्रीय बोलियों को कम करके ‘फ्रेंच’ को राष्ट्र की साझा भाषा बनाया गया।
फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्रवाद की प्रमुख विशेषताएँ :-
- संविधान आधारित शासन
- समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व जैसे विचार
- नया फ्रांसीसी तिरंगा झंडा
- नेशनल असेंबली का गठन
- आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त एवं माप-तौल की एक समान व्यवस्था
- फ्रेंच को राष्ट्र की साझा भाषा बनाया गया।
फ्रांसीसी क्रांति का यूरोप पर प्रभाव :-
- फ्रांसीसी क्रांतिकारियों का लक्ष्य था — यूरोप के लोगों को निरंकुश शासकों से मुक्त कराना।
- यूरोप के अन्य देशों में शिक्षित मध्यवर्ग और छात्रों ने जैकोबिन क्लब बनाए।
- फ्रांसीसी सेनाएँ 1790 के दशक में हॉलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, इटली आदि में पहुँचीं और राष्ट्रवाद के विचार फैलाए।
नेपोलियन का योगदान (1804 के बाद) :-
नेपोलियन ने फ्रांस में लोकतंत्र को नष्ट कर राजतंत्र वापस लाया, लेकिन उसने प्रशासनिक क्षेत्र को बहुत आधुनिक और कुशल बनाया।
नेपोलियन की संहिता (1804) :-
जिसे आमतौर पर नेपोलियन की संहिता के नाम से जाना जाता है वह नागरिक संहिता 1804 को लागू की गई।
🔹 1804 की नागरिक संहिता की विशेषताएं :-
- इस संहिता ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकारों को समाप्त किया।
- कानून के सामने समानता एवं संपत्ति को अधिकार को सुरक्षित किया गया।
- प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया ।
- सामंती व्यवस्था को समाप्त किया गया ।
- किसानों को भू-दासत्व और बेगार से मुक्ति मिली।
- शहरों में कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया ।
- यातायात और संचार-व्यवस्थाओं को सुधारा गया।
फ्रांसीसी शासन के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया (जीते हुए क्षेत्रों में) :-
जब फ्रांसीसी सेनाएँ दूसरे देशों (हॉलैंड, इटली, स्विट्जरलैंड) में पहुँचीं, तो शुरू में लोगों ने उनका स्वागत किया, लेकिन जल्द ही यह उत्साह विरोध में बदल गया।
🔹 विरोध के कारण :-
- नई प्रशासनिक व्यवस्था राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं ला पाई।
- बढ़े हुए कर, सेंसरशिप और फ्रांसीसी सेना में जबरन भर्ती से लोग नाराज हुए।
- नुकसान, फायदों से ज्यादा लगने लगे।
18वीं सदी के मध्य का यूरोप :-
अगर आप मध्य अठारहवीं सदी के यूरोप के नक्शे को देखें तो उसमें वैसे ‘राष्ट्र-राज्य’ नहीं मिलेंगे जैसे कि आज हैं।
🔸 राजनीतिक विभाजन :- जिन्हें आज हम जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड के रूप में जानते हैं वे तब राजशाहियों, डचियों और कैंटनों में बँटे हुए थे, जिनके शासकों के स्वायत्त क्षेत्र थे।
🔹 पूर्वी और मध्य यूरोप की स्थिति :-
- पूर्वी और मध्य यूरोप निरंकुश राजतंत्रों के अधीन थे।
- इन इलाकों में विभिन्न प्रकार के लोग रहते थे, जो स्वयं को एक सामूहिक पहचान का हिस्सा नहीं मानते थे।
- अकसर वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे और विभिन्न जातीय समूहों के सदस्य थे।
- इन तरह-तरह के समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व, केवल सम्राट के प्रति सबकी निष्ठा थी।
19वीं सदी से पहले यूरोप का सामाजिक ढाँचा :-
यूरोप में समाज मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों में बँटा हुआ था, लेकिन औद्योगीकरण ने एक तीसरे ‘मध्य वर्ग’ को जन्म दिया।
- 1. कुलीन वर्ग
- 2. कृषक वर्ग
- 3. नए मध्य वर्ग
1. कुलीन वर्ग – प्रभुत्वशाली वर्ग :-
- सामाजिक और राजनीतिक रूप से जमीन का मालिक कुलीन वर्ग यूरोपीय महाद्वीप का सबसे प्रभुत्वशाली वर्ग था।
- वे ग्रामीण इलाकों में जायदाद और शहरी-हवेलियों के मालिक थे।
- राजनीतिक कार्यों के लिए तथा उच्च वर्गों के बीच वे फ्रेंच भाषा का प्रयोग करते थे।
- उनके परिवार अकसर वैवाहिक बंधनों से आपस में जुड़े होते थे।
- यह शक्तिशाली कुलीन वर्ग संख्या के लिहाज से एक छोटा समूह था।
2. कृषक वर्ग – बहुसंख्यक वर्ग :-
- जनसंख्या के अधिकांश लोग कृषक थे।
- पश्चिम यूरोप :- यहाँ ज्यादातर जमीन पर छोटे किसान या किराएदार खेती करते थे।
- पूर्वी और मध्य यूरोप :- यहाँ भूमि विशाल जागीरों में बँटी थी जिस पर भूदास खेती करते थे।
3. नए मध्य वर्ग का उदय :-
- पश्चिमी और मध्य यूरोप में औद्योगीकरण के कारण एक नया वर्ग पैदा हुआ।
- उत्पत्ति :- इंग्लैंड में औद्योगीकरण 18वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ, जबकि फ्रांस और जर्मनी में यह 19वीं सदी में आया।
- संरचना :- इस वर्ग में उद्योगपति, व्यापारी, डॉक्टर, शिक्षक और अन्य पेशेवर (सेवा क्षेत्र के लोग) शामिल थे।
- विचारधारा :- यह वर्ग ‘शिक्षित और उदारवादी’ था।
राष्ट्रवाद और मध्य वर्ग का संबंध :-
मध्य वर्ग के लोग यह मानते थे कि किसी को भी जन्म के आधार पर विशेष अधिकार नहीं मिलने चाहिए। जब कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद शिक्षित और उदारवादी मध्य वर्गों के बीच ही राष्ट्रीय एकता के विचार लोकप्रिय हुए।
👉 यही वर्ग बाद में राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा समर्थक बना।
उदारवाद और राष्ट्रवाद (19वीं सदी का यूरोप) :-
🔹 उदारवाद का अर्थ :-
उदारवाद यानी liberalism शब्द लातिन भाषा के मूल liber पर आधारित है जिसका अर्थ है ‘आजाद’।
🔹 मध्य वर्ग के लिए उदारवाद का अर्थ :-
उन्नीसवीं सदी के नए मध्य वर्गों के लिए उदारवाद का अर्थ था व्यक्ति की स्वतंत्रता और क़ानून के समक्ष समानता। इसके दो प्रमुख रूप थे—
🔸 1. राजनीतिक उदारवाद :-
- प्रत्येक व्यक्ति को निजी स्वतंत्रता प्राप्त हो।
- क़ानून के सामने सभी नागरिक समान हों।
- शासन जनता की सहमति से बना हो (चुनाव द्वारा)।
- पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग को जन्म से मिलने वाले विशेषाधिकार समाप्त हों।
- देश का शासन संविधान और संसदीय प्रतिनिधि सरकार के माध्यम से चले।
🔸 2. आर्थिक उदारवाद :-
- व्यापारिक बाधाओं को समाप्त किया जाए।
- बाज़ार की स्वतंत्रता हो।
- वस्तुओं और पूँजी के आवागमन पर राज्य के नियंत्रण का विरोध किया जाए।
जर्मन भाषी क्षेत्रों की समस्या (उदाहरण) आर्थिक एकीकरण की ज़रूरत: :-
नेपोलियन ने 39 राज्यों का एक महासंघ बनाया था, लेकिन हर राज्य की अपनी मुद्रा और नाप-तौल प्रणाली थी। एक व्यापारी को हैम्बर्ग से न्यूरेम्बर्ग जाने में 11 सीमा-शुल्क नाकों से गुजरना पड़ता था और हर जगह 5% टैक्स देना पड़ता था।
🔸 नाप-तौल की समस्या :- शुल्क अकसर वस्तुओं का वज़न या आकार के अनुसार लगाए जाते थे। चूँकि हर क्षेत्र की अपनी नाप-तौल व्यवस्था थी अतः हिसाब लगाने में समय लगता था।
🔸 उदाहरण :- ‘एले’ (कपड़ा नापने की इकाई) की लंबाई अलग-अलग शहरों में भिन्न थी:
- फ्रैंकफर्ट: 54.7 cm
- मेंज: 55.1 cm
- न्यूरेम्बर्ग: 65.6 cm
- फ्रीबर्ग: 53.5 cm
समाधान: (ज़ॉलवेराइन) 1834 :-
व्यापारियों की इन समस्याओं को दूर करने के लिए 1834 में प्रशा की पहल पर एक शुल्क संघ बनाया गया, जिसे ‘ज़ॉलवेराइन’ कहा जाता है।
🔹 इसकी मुख्य विशेषताएँ :-
- इस संघ ने शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया।
- मुद्राओं की संख्या दो कर दी जो उससे पहले तीस से ऊपर थी।
- इसके अलावा रेलवे के जाल ने गतिशीलता बढ़ाई और आर्थिक हितों को राष्ट्रीय एकीकरण का सहायक बनाया।
- उस समय पनप रही व्यापक राष्ट्रवादी भावनाओं को आर्थिक राष्ट्रवाद की लहर ने मज़बूत बनाया।
1815 के उपरांत यूरोप में रूढ़िवाद :-
1815 में नेपोलियन की हार के बाद यूरोपीय सरकारें रूढ़िवाद की भावना से प्रेरित थीं।
🔸 रूढ़िवाद की विचारधारा :- रूढ़िवादी मानते थे कि राज्य और समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ; जैसे-राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार को बनाए रखना चाहिए।
🔸 रूढ़िवाद और आधुनिकीकरण :- वे क्रांति से पहले के पुराने युग में पूरी तरह लौटना नहीं चाहते थे। उन्होंने नेपोलियन के सुधारों से यह सीखा कि एक आधुनिक सेना, कुशल नौकरशाही और गतिशील अर्थव्यवस्था राजतंत्र को और भी मजबूत बना सकती है।
वियना कांग्रेस (1815) :-
1815 में, ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियों जिन्होंने मिलकर नेपोलियन को हराया था के प्रतिनिधि यूरोप के लिए एक समझौता तैयार करने के लिए वियना में मिले। इस सम्मेलन की मेज़बानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की।
उद्देश्य :- उन सभी बदलावों को खत्म करना जो नेपोलियाई युद्धों के दौरान हुए थे और पुराने राजतंत्रों को बहाल करना।
वियना संधि के (मुख्य निर्णय) :-
- फ्रांस में बूर्बो वंश को फिर से सत्ता सौंप दी गई।
- फ्रांस ने उन इलाक़ों को खो दिया जिन पर क़ब्ज़ा उसने नेपोलियन के अधीन किया गया था।
- फ्रांस की सीमाओं पर नियंत्रण :- भविष्य में फ्रांस अपना विस्तार न कर सके, इसके लिए उसकी सीमाओं पर नए राज्य बना दिए गए:
- उत्तर में में नीदरलैंड्स का राज्य स्थापित किया, जिसमें बेल्जियम शामिल था।
- और दक्षिण में पीडमॉण्ट में जेनोआ जोड़ दिया गया।
- प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमाओं पर महत्त्वपूर्ण नए इलाक़े दिए गए जबकि ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का नियंत्रण सौंपा गया।
- जर्मन महासंघ :- नेपोलियन ने 39 राज्यों का जो जर्मन महासंघ स्थापित किया था, उसे बरक़रार रखा गया।
- पूर्व में रूस को पोलैंड का एक हिस्सा दिया गया जबकि प्रशा को सैक्सनी का एक हिस्सा प्रदान किया गया।
1815 की वियना संधि के निर्णयों के उद्देश्य (मुख्य लक्ष्य) :-
- इस सबका मुख्य उद्देश्य उन राजतंत्रों की बहाली था जिन्हें नेपोलियन ने बर्खास्त कर दिया था।
- साथ ही यूरोप में एक नयी रूढ़िवादी व्यवस्था कायम करने का लक्ष्य भी था।
1815 के बाद की रूढ़िवादी शासन व्यवस्थाएँ :-
- 1815 में स्थापित रूढ़िवादी शासन व्यवस्थाएँ निरंकुश थीं।
- वे अपने खिलाफ किसी भी तरह की असहमति या आलोचना बर्दाश्त नहीं करती थीं।
- सेंसरशिप :- अखबारों, किताबों, नाटकों और गीतों पर कड़े सेंसरशिप नियम लागू किए गए ताकि स्वतंत्रता और क्रांति के विचार न फैल सकें।
क्रांतिकारी और गुप्त संगठनों का उदय (1815 के बाद) :-
1815 के बाद रूढ़िवादी सरकारों के दमन से बचने के लिए अनेक उदारवादी-राष्ट्रवादी ‘भूमिगत’ हो गए।
🔹 क्रांतिकारी होने का अर्थ :-
उस समय क्रांतिकारी होने का मतलब तीन मुख्य बातें थीं:
- वियना कांग्रेस के बाद स्थापित की गई पुरानी राजा-शाही व्यवस्था को चुनौती देना।
- आजादी और मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध होना।
- क्रांतिकारियों का मानना था कि राष्ट्र-राज्यों का निर्माण आजादी की लड़ाई का सबसे जरूरी हिस्सा है।
ज्युसेपी मेत्सिनी :-
मेत्सिनी इटली के एक महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने इटली के एकीकरण की नींव रखी।
- जन्म: 1805 में जेनोआ में।
- शुरुआत: वह कार्बोनारी नामक एक गुप्त संगठन के सदस्य बने।
- बहिष्कार: 24 साल की उम्र में लिगुरिया में क्रांति की कोशिश करने के कारण उन्हें देश से निकाल (बहिष्कृत) दिया गया।
🔹 ज्युसेपी मेत्सिनी द्वारा स्थापित संगठन :-
मेत्सिनी ने युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए दो प्रमुख भूमिगत संगठनों की स्थापना की:
- यंग इटली (1831): मार्सेई में स्थापित।
- यंग यूरोप (1834): बर्न में स्थापित।
- इसमें पोलैंड, फ्रांस, इटली और जर्मन राज्यों के समान विचारों वाले युवा सदस्य थे।
🔹 ज्युसेपी मेत्सिनी के विचार :-
- मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई थी।
- उसके अनुसार इटली छोटे-छोटे राज्यों में बँटा नहीं रह सकता, उसे एकीकृत गणतंत्र बनना चाहिए।
- इटली का एकीकरण उसकी मुक्ति का आधार हो सकता था।
🔹 ज्युसेपी मेत्सिनी का प्रभाव :-
- उसके विचारों से प्रेरित होकर जर्मनी, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड और पोलैंड में गुप्त संगठन बने।
- राजतंत्र का विरोध और प्रजातांत्रिक गणतंत्र के सपने ने रूढ़िवादियों को चुनौती दी।
🔸 रूढ़िवादियों की प्रतिक्रिया :- ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन’ बताया।
क्रांतियों का युग: 1830–1848 :-
जैसे-जैसे रूढ़िवादी सरकारों ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की, उदारवाद और राष्ट्रवाद ने विद्रोह का रूप ले लिया।
🔹 क्रांतियों का नेतृत्व किसने किया?
इन क्रांतियों का नेतृत्व उदारवादी-राष्ट्रवादियों ने किया जो शिक्षित मध्यवर्गीय विशिष्ट लोग थे। इनमें प्रोफ़ेसर, स्कूली-अध्यापक, क्लर्क और वाणिज्य व्यापार में लगे मध्यवर्गों के लोग शामिल थे।
1. फ्रांस की जुलाई क्रांति (1830) :-
पहली बड़ी क्रांति जुलाई 1830 के हुई जहां उदारवादी क्रांतिकारियों ने बूर्बो राजाओं को सत्ता से हटा दिया (जिन्हें 1815 में बहाल किया गया था)।
उनकी जगह फ्रांस में एक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया गया जिसका अध्यक्ष लुई फिलिप था।
🔸 जुलाई क्रांति का प्रभाव :- जुलाई क्रांति से ब्रसेल्स में भी विद्रोह भड़क गया जिसके फलस्वरूप यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ द नीदरलैंड्स से अलग हो गया।
2. यूनान का स्वतंत्रता संग्राम :-
एक घटना जिसने पूरे यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार किया, वह थी, यूनान का स्वंतत्रता संग्राम।
🔸 इतिहास :- पंद्रहवीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था।
🔸 संघर्ष की शुरुआत :- आजादी के लिए संघर्ष 1821 में शुरू हुआ।
🔸 यूरोप का समर्थन :-
- यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियों के साथ पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला जो प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे।
- कवियों और कलाकारों ने यूनान को “यूरोपीय सभ्यता की पालना” बताकर जनमत जुटाया।
🔸 लॉर्ड बायरन का योगदान :- अंग्रेज कवि लॉर्ड बायरन ने धन इकट्ठा किया और बाद में युद्ध में लड़ने भी गए जहाँ 1824 में बुखार से उनकी मृत्यु हो गई।
🔸 परिणाम :- 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी।
यूरोप में भूख, कठिनाइयाँ और जन-विद्रोह (1830-1848) :-
1830 का दशक यूरोप के लिए आर्थिक मंदी और भारी संकट का समय था। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- जनसंख्या विस्फोट: 19वीं सदी के पहले भाग में यूरोप की आबादी तेज़ी से बढ़ी।
- बेरोज़गारी: नौकरियाँ कम, नौकरी चाहने वाले ज्यादा।
- शहरीकरण: गाँवों के लोग शहरों की झुग्गी बस्तियों में आकर रहने लगे।
- प्रतिस्पर्धा: यूरोप के छोटे उत्पादकों को इंग्लैंड से आए सस्ते मशीनी कपड़े से कड़ी टक्कर मिली।
- कृषि संकट: जहाँ कुलीन वर्ग सत्ता में था, किसान सामंती शुल्कों और कर्ज के बोझ तले दबे थे।
- महंगाई और अकाल: फसलों के खराब होने और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ने से गाँवों और शहरों में व्यापक गरीबी फैल गई।
1848 की फ्रांसीसी क्रांति (फरवरी क्रांति) :-
1848 में पेरिस के हालात बेकाबू हो गए।
- कारण :- भोजन की कमी, बेरोज़गारी, आर्थिक संकट।
- परिणाम :- खाने-पीने की कमी और व्यापक बेरोज़गारी से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह अवरोध लगाए गए और लुई फ़िलिप को भागने पर मजबूर किया गया।
- गणतंत्र की स्थापना :- राष्ट्रीय सभा ने फ्रांस को एक गणतंत्र घोषित किया।
- 21 वर्ष से ऊपर के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार (वोट देने का अधिकार) मिला।
- रोजगार उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय कारखाने स्थापित किए गए।
सिलेसिया में बुनकरों का विद्रोह (1845) :-
1848 की बड़ी क्रांति से पहले 1845 में सिलेसिया के बुनकरों ने अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई थी:
- कारण :- ठेकेदार बुनकरों को कच्चा माल देकर निर्मित कपड़ा लेते थे परंतु दाम बहुत कम थे।
- घटना :- 4 जून को दोपहर 2 बजे बुनकरों की एक भीड़ अपने घरों से निकली और दो क़तारों में चलते हुए ठेकेदार की कोठी पहुँची।
- माँग :- वे ज़्यादा मज़दूरी की माँग कर रहे थे।
- प्रतिक्रिया :- उनके साथ घृणा का व्यवहार किया गया तो कभी धमकियाँ दी गईं।
- कार्यवाही :- इसके बाद यह भीड़ घर में जबरदस्ती घुस गई और खिड़कियाँ, फर्नीचर तोड़े, कपड़े के गोदाम लूटे।
- परिणाम :- ठेकेदार परिवार सहित भाग गया, 24 घंटे बाद सेना के साथ लौटा। इसके बाद जो टकराव हुआ उसमें ग्यारह बुनकरों को गोली मार दी गई।
फ्रैंकफर्ट संसद :-
18 मई 1848 को, 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजे-धजे जुलूस में जा कर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई।
🔸 उद्देश्य :- एक एकीकृत जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान बनाना।
🔸 प्रस्ताव :- उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान तैयार किया, जिसकी अध्यक्षता एक ऐसे राजा को करनी थी जो संसद के प्रति जवाबदेह हो।
🔸 असफलता के कारण :-
- राजा का विरोध :- जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने की पेशकश की तो उसने उसे अस्वीकार कर उन राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे।
- सामाजिक आधार का कमजोर होना :- संसद में मध्य वर्ग का दबदबा था। उन्होंने मज़दूरों और कारीगरों की माँगों पर ध्यान नहीं दिया।
🔸 परिणाम :-
- आम जनता का समर्थन खो गया।
- सेना बुलाई गई।
- संसद भंग कर दी गई।
राष्ट्रवाद के उदय में महिलाओं का योगदान :-
- उदारवादी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी, फिर भी उन्हें बराबरी का हक नहीं मिला:
- महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन बनाए, अखबार निकाले और प्रदर्शनों में भाग लिया।
- फ्रैंकफर्ट संसद के दौरान उन्हें मताधिकार (Vote) नहीं दिया गया।
- फ्रैंकफर्ट संसद में केवल दर्शक दीर्घा में खड़े होने की अनुमति थी।
1848 के बाद का परिणाम :-
हालाँकि 1848 की क्रांति को दबा दिया गया, लेकिन राजाओं को यह समझ आ गया कि अब पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह से थोपना मुमकिन नहीं है। क्रांति को रोकने के लिए उन्होंने कुछ रियायतें देनी शुरू कीं:
- मध्य और पूर्वी यूरोप में वे बदलाव शुरू हुए जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले हो चुके थे।
- हैब्सबर्ग साम्राज्य और रूस में भूदासत्व और बंधुआ मज़दूरी को समाप्त कर दिया गया।
- हैब्सबर्ग शासकों ने हंगरी के लोगों को अधिक स्वतंत्रता दी।
जर्मनी का एकीकरण :-
🔹 1848 के बाद राष्ट्रवाद में बदलाव :-
- राष्ट्रवाद जनतंत्र और क्रांति से अलग होने लगा।
- रूढ़िवादी शक्तियों ने राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल अपनी सत्ता बढ़ाने के लिए किया।
🔹 जर्मनी के एकीकरण की पृष्ठभूमि :-
- 1848 में फ्रैंकफर्ट संसद ने एकीकृत जर्मनी का प्रयास किया, लेकिन राजशाही, सेना और बड़े भूस्वामियों ने इसे दबा दिया।
- इसके बाद प्रशा ने एकीकरण का नेतृत्व संभाला।
🔹 ऑटो वॉन बिस्मार्क की भूमिका :-
- प्रशा के प्रमुख मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क को जर्मन एकीकरण का जनक माना जाता है।
- उन्होंने ‘रक्त और लोहे’ की नीति अपनाई और प्रशा की सेना तथा नौकरशाही का सहारा लिया।
एकीकरण के तीन युद्ध (1864–1871) :-
सात वर्षों (1864-1871) के भीतर प्रशा ने तीन महत्वपूर्ण युद्ध लड़े और तीनों में जीत हासिल की:
- डेनमार्क के साथ
- ऑस्ट्रिया के साथ
- फ्रांस के साथ
इन जीत के साथ ही जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई।
🔹 जर्मन साम्राज्य की घोषणा (1871) :-
- तारीख: 18 जनवरी 1871 की सुबह।
- स्थान: वर्साय के महल का शीशमहल।
- घोषणा: प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट (काइजर) घोषित किया गया।
- उपस्थिति: जर्मन राज्यों के राजकुमार, सेना के प्रतिनिधि और ऑटो वॉन बिस्मार्क।
🔹 नए जर्मन साम्राज्य की विशेषताएँ :-
नए राज्य ने जर्मनी की मुद्रा, बैंकिंग और क़ानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर काफी जोर दिया और प्रशा द्वारा उठाए क़दम और उसकी कार्रवाइयाँ बाक़ी जर्मनी के लिए अकसर एक मॉडल बना।
जर्मनी का एकीकरण की प्रक्रिया (in short) :-
- 1848 में मध्यवर्गीय जर्मनों ने निर्वाचित संसद द्वारा राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया।
- इस उदारवादी आंदोलन को राजशाही और सेना ने दबा दिया।
- प्रशा के बड़े भू-स्वामियों ने भी राजतंत्र का समर्थन किया।
- इसके बाद प्रशा ने एकीकरण का नेतृत्व संभाला।
- प्रशा के प्रधानमंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क ने सेना और नौकरशाही की मदद से एकीकरण किया।
- सात वर्षों में ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ्रांस से तीन युद्ध हुए, जिनमें प्रशा विजयी रहा।
- जनवरी 1871 में वर्साय के शीशमहल में विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।
इटली का एकीकरण :-
इटली का राजनीतिक विखंडन बहुत पुराना था। इटली कई वंशानुगत राज्यों में बँटा हुआ था। कुछ भाग बहु-राष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य के अधीन थे।
🔹 19वीं सदी में इटली की स्थिति :-
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली 7 राज्यों में विभाजित था:
- केवल सार्डिनिया-पीडमॉण्ट में एक इतालवी राजघराने का शासन था।
- उत्तर इटली: ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन था।
- मध्य इटली: पोप का शासन था।
- दक्षिण इटली: स्पेनी बूर्बो राजाओं के अधीन था।
इतालवी भाषा ने भी साझा रूप हासिल नहीं किया था और अभी तक उसके विविध क्षेत्रीय और स्थानीय रूप मौजूद थे।
इटली एकीकरण की प्रक्रिया :-
- 1830 के दशक में ज्युसेपे मेत्सिनी ने एकीकृत गणराज्य का विचार रखा और यंग इटली संगठन बनाया।
- 1831 और 1848 की क्रांतियों की असफलता के बाद एकीकरण का नेतृत्व सार्डिनिया-पीडमॉण्ट ने संभाला।
- राजा विक्टर इमेनुएल द्वितीय और उसके प्रधानमंत्री कावूर ने कूटनीति के ज़रिये एकीकरण को आगे बढ़ाया।
- 1859 में फ्रांस की सहायता से ऑस्ट्रिया को हराया गया।
- ज्युसेपे गैरीबॉल्डी के नेतृत्व में स्वयंसेवकों ने दक्षिण इटली को मुक्त कराया।
- 1861 में इटली का राजनीतिक एकीकरण पूरा हुआ और विक्टर इमेनुएल द्वितीय को राजा घोषित किया गया।
सामान्य जनता की स्थिति :- हालांकि आम जनता, विशेषकर दक्षिण इटली के किसान, राष्ट्रवादी विचारों से अभी भी अनजान थे।
ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण :-
ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण किसी अचानक हुई क्रांति से नहीं, बल्कि एक लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से हुआ।
18वीं सदी से पहले की स्थिति :-
- 18वीं सदी से पहले कोई एकीकृत ब्रिटिश राष्ट्र नहीं था।
- अठारहवीं सदी से पहले ब्रिटेन में कोई एकीकृत राष्ट्र नहीं था; लोग अंग्रेज़, स्कॉट, वेल्श और आयरिश जैसी नृजातीय पहचान रखते थे।
- इन सबकी अपनी अलग सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपराएँ थीं।
🔹 इंग्लैंड का वर्चस्व और विस्तार :-
जैसे-जैसे इंग्लैंड की धन-दौलत और सत्ता बढ़ी, उसने अन्य समूहों पर अपना प्रभाव जमाना शुरू किया।
1688 की क्रांति :- एक लंबे टकराव और संघर्ष के बाद आंग्ल संसद ने 1688 में राजतंत्र से ताक़त छीन ली थी। इस संसद के माध्यम से एक राष्ट्र-राज्य का निर्माण हुआ जिसके केंद्र में इंग्लैंड था।
स्कॉटलैंड का विलय (Act of Union, 1707) :-
इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच ऐक्ट ऑफ़ यूनियन (1707) से ‘यूनाइटेड किंग्डम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ का गठन हुआ।
- परिणाम: इससे इंग्लैंड, व्यवहार में स्कॉटलैंड पर अपना प्रभुत्व जमा पाया।
- स्कॉटलैंड पर दमन :-
- एक साझा ब्रितानी पहचान के नाम पर स्कॉटलैंड की संस्कृति और संस्थाओं को दबाया गया।
- स्कॉटिश हाइलैंड्स के निवासी जिन कैथलिक कुलों के विद्रोहों को निर्ममता से कुचला गया।
- प्रतिबंध: स्कॉटिश हाइलैंड्स के लोगों को अपनी गेलिक भाषा बोलने या अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहनने की मनाही थी।
- निष्कर्ष: उनमें से बहुत सारे लोगों को अपना वतन छोड़ने पर मजबूर किया गया।
आयरलैंड का विलय (1801) :-
- आयरलैंड कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट समूहों में बँटा हुआ था।
- अंग्रेजों ने अल्पसंख्यक प्रोटेस्टेंट लोगों की मदद की ताकि वे बहुसंख्यक कैथोलिकों पर राज कर सकें।
- वोल्फ़ टोन :- उन्होंने 1798 में एक विद्रोह किया, जिसे अंग्रेजों ने बेरहमी से कुचल दिया।
- परिणाम :- 1801 में आयरलैंड को जबरदस्ती यूनाइटेड किंग्डम में शामिल कर लिया गया।
विभिन्न प्रतीक चिन्ह और उनका अर्थ :-
फ्रांसीसी क्रांति के समय से ही कुछ प्रतीकों का उपयोग खास विचारों को व्यक्त करने के लिए किया जाता था:
| गुण / प्रतीक | महत्व |
|---|---|
| टूटी हुई बेड़ियाँ | आज़ादी मिलना |
| बाज़-छाप कवच | जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति |
| बलूत पत्तियों का मुकुट | बहादुरी |
| तलवार | मुकाबले की तैयारी |
| तलवार पर लिपटी जैतून की डाली | शांति की चाह |
| काला, लाल और सुनहरा तिरंगा | 1848 में उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा, जिसे जर्मन राज्यों के ड्यूक्स ने प्रतिबंधित घोषित कर दिया |
| उगते सूर्य की किरणें | एक नए युग का सूत्रपात |
राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद :-
उन्नीसवीं सदी के अंत तक राष्ट्रवाद का वह उदारवादी और लोकतांत्रिक स्वरूप नहीं रहा जो शुरुआत में था। अब राष्ट्रवाद संकीर्ण और साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बन गया।
🔹 राष्ट्रवाद का साम्राज्यवाद में बदलना :-
- यूरोपीय शक्तियों ने अपने राजनीतिक प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल किया।
- राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद के इस मेल ने 1914 में यूरोप को प्रथम विश्व युद्ध (महाविपदा) की ओर धकेल दिया।
