Class 10 Science chapter 11 notes in hindi || विद्युत notes

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कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 11 नोट्स: विद्युत class 10 notes

TextbookNcert
ClassClass 10
SubjectScience
ChapterChapter 11
Chapter Nameविद्युत नोट्स
MediumHindi

क्या आप Class 10 Science chapter 11 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से vidyut class 10 in hindi notes download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम विद्युत प्रवाह, ओम का नियम, प्रतिरोधकता, कारक जिन पर किसी चालक का प्रतिरोध निर्भर करता है, प्रतिरोधकों का श्रेणी क्रम संयोजन, विधुत धारा का तापीय प्रभाव आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

 विद्युत :-

विद्युत वह ऊर्जा है जो आवेशों के प्रवाह के कारण उत्पन्न होती है।

विद्युत का महत्त्व :-

  • आधुनिक समाज में विद्युत का बहुत महत्त्व है।
  • इसका उपयोग घर, विद्यालय, अस्पताल, उद्योग, कारखानों आदि में होता है।
  • विद्युत ऊर्जा नियंत्रित करने योग्य और सुविधाजनक ऊर्जा का रूप है।

चालक :-

वे पदार्थ जिनमें से विद्युत धारा आसानी से प्रवाहित होती है, चालक कहलाते हैं। उदाहरण: ताँबा, एल्युमिनियम, लोहा।

विद्युत परिपथ :-

किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं।

विद्युत धारा :-

किसी चालक में विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं।

  • उदाहरण:
    • धातु के तार में इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह
    • टॉर्च में सेल से बल्ब तक आवेश का प्रवाह

🔹 विद्युत धारा का वाहक :-

धातु के तारों में विद्युत धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है। इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित होते हैं।

🔹 विद्युत धारा की दिशा :-

विद्युत धारा को परंपरागत रूप से धनावेशों का प्रवाह माना जाता है। इसलिए धनावेशों के प्रवाह की दिशा को ही विद्युत धारा की दिशा माना जाता है।

किसी विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की दिशा इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की दिशा के विपरीत होती है।

अर्थात्, 👉 विद्युत धारा धन (+) टर्मिनल से ऋण (–) टर्मिनल की ओर बहती है।

🔹 विद्युत धारा का गणितीय सूत्र :- 

I = Q/t

  • जहाँ:
    • I = विद्युत धारा
    • Q = कुल आवेश
    • t = समय

🔹 विद्युत धारा का SI मात्रक :-

विद्युत धारा को जिस SI मात्रक में व्यक्त किया जाता है, उसे ऐम्पियर (A) कहते हैं।

इस मात्रक का नाम आंद्रे-मेरी ऐम्पियर (1775–1836) नामक फ्रांसीसी वैज्ञानिक के नाम पर रखा गया है।

1 ऐम्पियर की परिभाषा :- 

यदि किसी चालक के अनुप्रस्थ काट से प्रति सेकंड 1 कूलॉम आवेश प्रवाहित हो, तो धारा 1 ऐम्पियर कहलाती है। अर्थात 1A = 1C/1s 

🔹 छोटे परिमाण की विद्युत धारा :-

अल्प परिमाण की विद्युत धारा को निम्न मात्रकों में व्यक्त किया जाता है—

  • मिलीऐम्पियर (mA) = 1 mA = 10⁻³ A
  • माइक्रोऐम्पियर (µA) = 1 µA = 10⁻⁶ A

विद्युत धारा मापने वाला यंत्र (ऐमीटर):-

परिपथों की विद्युत धारा मापने के लिए जिस यंत्र का उपयोग करते हैं, उसे ऐमीटर कहते हैं। इसे सदैव जिस परिपथ में विद्युत धारा मापनी होती है, उसके श्रेणीक्रम में संयोजित करते हैं।

आवेश :-

आवेश परमाणु का एक मूल गुण है।  आवेश पदार्थ का वह मूलभूत गुण है जिसके कारण वह विद्युत और चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करता है। 

  • यह दो प्रकार का होता है— धनात्मक (+) और ऋणात्मक (–)। 
  • समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं। 
  • असमान आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

🔹 विद्युत आवेश का SI मात्रक :-

विद्युत आवेश का SI मात्रक कूलॉम (C) है।

  • 1 कूलॉम आवेश ≈ 6 × 10¹⁸ इलेक्ट्रॉनों के कुल आवेश के बराबर होता है।
  • एक इलेक्ट्रॉन का आवेश = 1.6 × 10⁻¹⁹ C

विभवांतर :-

किसी धारावाही विद्युत परिपथ के दो बिंदुओं के बीच एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किया गया कार्य, उन बिंदुओं के बीच का विद्युत विभवांतर कहलाता है।

🔹 विभवांतर का सूत्र :- 

V = W / Q

  • जहाँ:
    • V= विभवांतर 
    • W = किया गया कार्य
    • Q = प्रवाहित आवेश

🔹 विभवांतर का SI मात्रक :- 

विद्युत विभवांतर का SI मात्रक वोल्ट (V) है, जिसे इटली के भौतिकविज्ञानी अलेसान्द्रो वोल्टा के नाम पर रखा गया है।

1 वोल्ट की परिभाषा :- 

यदि 1 कूलॉम आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में 1 जूल कार्य किया जाए, तो उन दो बिंदुओं के बीच विभवांतर 1 वोल्ट होता है। अतः

1 V = 1 J/1 C

वोल्टमीटर :-

विभवांतर की माप एक यंत्र द्वारा की जाती है, जिसे वोल्टमीटर कहते हैं। वोल्टमीटर को सदैव उन बिंदुओं से पार्श्वक्रम संयोजित करते हैं, जिनके बीच विभवांतर मापना होता है।

ओम का नियम :-

किसी विद्युत परिपथ में धातु के तार के दो सिरों के बीच का विभवांतर (V), उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा (I) के समानुपाती होता है, यदि तार का तापमान स्थिर रहे। इसे ओम का नियम कहते हैं।

दूसरे शब्दों में— V ∝ I या V = IR

  • जहाँ—
    • V = विभवांतर
    • I = विद्युत धारा
    • R = प्रतिरोध (एक नियतांक)

प्रतिरोध (R) :-

प्रतिरोध किसी चालक का वह गुण है, जिसके कारण वह अपने में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा (आवेशों के प्रवाह) का विरोध करता है।

🔹 प्रतिरोध का SI मात्रक :- 

प्रतिरोध का SI मात्रक ओम है, इसे ग्रीक भाषा के शब्द Ω से निरूपित करते हैं।

1 ओम की परिभाषा :-

यदि किसी चालक के दोनों सिरों के बीच विभवांतर 1V है तथा उससे 1A विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उस चालक का प्रतिरोध 1 ओम कहलाता है।

1 ओम = 1 वोल्ट / 1 एम्पियर

यह भी देखें ✯ कक्षा 10

परिवर्ती प्रतिरोध :-

स्रोत की वोल्टता में बिना कोई परिवर्तन किए परिपथ की विद्युत धारा को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले अवयव को परिवर्ती प्रतिरोध कहते हैं।

धारा नियंत्रक :-

किसी विद्युत परिपथ में परिपथ के प्रतिरोध को परिवर्तित करने के लिए प्रायः एक युक्ति का उपयोग करते हैं, जिसे धारा नियंत्रक कहते हैं।

चालक का प्रतिरोध किन बातों पर निर्भर करता है?

प्रयोगों से यह पाया गया है कि किसी चालक (धातु के तार) का प्रतिरोध (R) निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है:

🔸 चालक की लंबाई :- चालक का प्रतिरोध उसकी लंबाई के समानुपाती होता है। (लंबाई बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।)

🔸 अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल :- चालक का प्रतिरोध उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। (क्षेत्रफल बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है।)

🔸 तापमान :- चालक का प्रतिरोध तापमान पर निर्भर करता है। सामान्यतः तापमान बढ़ने पर धातु का प्रतिरोध बढ़ जाता है।

🔸 पदार्थ की प्रकृति :- प्रतिरोध इस बात पर भी निर्भर करता है कि तार किस पदार्थ से बना है। अलग-अलग पदार्थों (जैसे कॉपर, एल्युमीनियम) का प्रतिरोध समान लंबाई और मोटाई होने पर भी अलग-अलग होता है।

प्रतिरोधकता (ρ) :-

प्रतिरोधकता किसी पदार्थ का वह आंतरिक गुण है, जो यह बताता है कि वह विद्युत धारा के प्रवाह का कितना विरोध करता है। इसे ρ (रो) से दर्शाया जाता है।

प्रतिरोधकता तार की लंबाई या मोटाई पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह पदार्थ की प्रकृति (जैसे ताँबा, लोहा) तथा तापमान पर निर्भर करती है।

प्रतिरोधकता का SI मात्रक ओम-मीटर (Ω m) है।

धातु और कुचालकों की प्रतिरोधकता :-

🔸 धातुएँ (जैसे ताँबा, एल्युमिनियम) :-

  • इनकी प्रतिरोधकता बहुत कम होती है।
  • प्रतिरोधकता लगभग 10⁻⁸ से 10⁻⁶ Ω m होती है।
  • इसलिए धातुएँ अच्छे चालक होती हैं।

🔸 कुचालक (जैसे रबर, काँच) :-

  • इनकी प्रतिरोधकता बहुत अधिक होती है।
  • प्रतिरोधकता लगभग 10¹² से 10¹⁷ Ω m होती है।
  • इसलिए कुचालक विद्युत धारा को नहीं बहने देते।

मिश्रातुओं का उपयोग :-

मिश्रातुओं की प्रतिरोधकता उनकी अवयवी (शुद्ध) धातुओं की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा, मिश्रातुएँ उच्च ताप पर जल्दी दहन (ऑक्सीकरण) नहीं करतीं।

🔸 इसी कारण मिश्रातुओं का उपयोग :- विद्युत इस्तरी, टोस्टर, हीटर जैसी विद्युत तापन युक्तियों के निर्माण में किया जाता है।

प्रतिरोधकों के संयोजन :-

प्रतिरोधकों को आपस में जोड़ने के लिए मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं:

  1. श्रेणीक्रम संयोजन 
  2. पार्श्वक्रम संयोजन 

1. श्रेणीक्रम संयोजन :- 

जब प्रतिरोधकों को एक के बाद एक, अर्थात् एक सिरे से दूसरे सिरे को जोड़कर एक ही पथ (कतार) में जोड़ा जाता है, तो इसे श्रेणीक्रम संयोजन कहते हैं। 

🔸 उपयोग :- हीटर, इस्तरी, गीजर (जहाँ अधिक प्रतिरोध की आवश्यकता होती है)

🔸 समतुल्य प्रतिरोध :- यदि तीन प्रतिरोधक R₁, R₂, R₃ श्रेणी क्रम में जुड़े हों, तो:  

R = R₁ + R₂ + R₃

श्रेणीक्रम संयोजन की विशेषताएँ :-

  • परिपथ में धारा (I) हर प्रतिरोधक में समान रहती है।
  • कुल विभवांतर (V) अलग-अलग प्रतिरोधकों में बँट जाता है।
  • परिपथ का कुल प्रतिरोध अधिक हो जाता है।
  • यदि एक प्रतिरोधक खराब हो जाए, तो पूरा परिपथ काम करना बंद कर देता है।

2. पार्श्वक्रम संयोजन :-

जब सभी प्रतिरोधकों के सिरों को किन्हीं दो निश्चित बिंदुओं (जैसे X और Y) के बीच एक साथ जोड़ा जाता है, तो इसे पार्श्वक्रम संयोजन कहते हैं।

🔸 उपयोग :- घरों की विद्युत वायरिंग, पंखा, बल्ब, टीवी आदि (ताकि सभी उपकरणों को समान वोल्टता मिले)

🔸 समतुल्य प्रतिरोध :- यदि तीन प्रतिरोधक R₁, R₂, R₃ पार्श्वक्रम में जुड़े हों, तो:

1/R  = 1/R₁ + 1/R₂ + 1/R₃

पार्श्वक्रम संयोजन की विशेषताएँ :-

  • हर प्रतिरोधक के सिरों पर विभवांतर समान रहता है।
  • धारा अलग-अलग प्रतिरोधकों में विभाजित हो जाती है।
  • परिपथ का कुल प्रतिरोध कम हो जाता है।
  • यदि एक प्रतिरोधक खराब हो जाए, तब भी अन्य उपकरण चलते रहते हैं।

श्रेणीक्रम संयोजन की तुलना में पार्यक्रम संयोजन के लाभ :- 

श्रेणीक्रम परिपथ में सभी उपकरणों से समान धारा प्रवाहित होती है, जबकि अलग-अलग उपकरणों को भिन्न धारा चाहिए, इसलिए यह व्यावहारिक नहीं है। श्रेणीक्रम में एक उपकरण खराब होने पर पूरा परिपथ बंद हो जाता है।

पार्श्वक्रम परिपथ में धारा विभाजित हो जाती है और कुल प्रतिरोध कम होता है। पार्श्वक्रम में एक उपकरण खराब होने पर भी बाकी चलते रहते हैं, इसलिए यह अधिक उपयोगी है।

विद्युत धारा का तापीय प्रभाव :-

जब किसी बैटरी या सेल को किसी विद्युत परिपथ से जोड़ा जाता है, तो वह परिपथ को ऊर्जा प्रदान करता है। इस ऊर्जा का कुछ भाग उपयोगी कार्य (जैसे पंखा घुमाना) में खर्च होता है, जबकि शेष भाग ऊष्मा के रूप में निकलता है, जिससे उपकरण का तापमान बढ़ जाता है।

🔸 विशुद्ध प्रतिरोधक परिपथ :- यदि किसी परिपथ में केवल प्रतिरोधक जुड़े हों, तो स्रोत द्वारा प्रदान की गई पूरी ऊर्जा ऊष्मा के रूप में ही निकलती है।

इसी प्रभाव को विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहते हैं।

जूल का तापन नियम :-

🔸 किसी प्रतिरोधक में उत्पन्न ऊष्मा—

  • धारा के वर्ग के समानुपाती होती है → I²
  • प्रतिरोध के समानुपाती होती है → R
  • समय के समानुपाती होती है → t

🔸 इसलिए, H = I² Rt

विद्युत बल्ब :-

  • बल्ब में तंतु को बहुत उच्च ताप तक गर्म किया जाता है ताकि वह प्रकाश दे।
  • तंतु के लिए टंगस्टन (गलनांक ≈ 3380°C) का उपयोग होता है।
  • तंतु को पिघलने से बचाने और आयु बढ़ाने के लिए बल्ब में नाइट्रोजन/आर्गन गैस भरी जाती है।
  • ऊर्जा का अधिकांश भाग ऊष्मा और थोड़ा भाग प्रकाश बनता है।

फ्यूज़ :-

  • फ्यूज़ परिपथ और उपकरणों की सुरक्षा करता है।
  • इसे श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
  • अधिक धारा होने पर फ्यूज़ तार पिघलकर परिपथ तोड़ देता है।
  • फ्यूज़ तार ऐसी धातु/मिश्रातु का होता है जिसका उचित गलनांक हो (जैसे Al, Cu, Fe, Pb)।
  • घरेलू फ्यूज़ के मान: 1A, 2A, 3A, 5A, 10A।

फ्यूज़ का उदाहरण:-

उस विद्युत इस्तरी के परिपथ में जो 1 kW की विद्युत शक्ति उस समय उपभुक्त करती है, जब उसे 220 V पर प्रचालित करते हैं, 1000 W/220 V = 4.54 A की विद्युत धारा प्रवाहित होती है। इस प्रकरण में 5 A अनुमतांक का फ्यूज़ उपयोग किया जाना चाहिए।

विद्युत शक्ति :-

कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। विद्युत के संदर्भ में, किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के उपभुक्त (खर्च) होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं। शक्ति P को इस प्रकार व्यक्त करते हैं । 

🔸 विद्युत शक्ति का सूत्र :- P = VI

🔸 विद्युत शक्ति का मात्रक :- विद्युत शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है।

1 वाट की परिभाषा :-

यदि किसी युक्ति के सिरों के बीच 1 वोल्ट (V) का विभवांतर हो और उसमें 1 ऐम्पियर (A) की विद्युत धारा प्रवाहित हो, तो उस युक्ति द्वारा उपभुक्त शक्ति 1 वाट कहलाती है।

1W = 1V × 1A = 1 V A

विद्युत ऊर्जा का व्यापारिक मात्रक :-

विद्युत ऊर्जा का व्यापारिक मात्रक किलोवाट-घंटा (kWh) है, जिसे सामान्य बोलचाल में “यूनिट” कहते हैं।

‘वाट’ शक्ति का छोटा मात्रक है। अतः वास्तविक व्यवहार में हम इसके काफी बड़े मात्रक (किलोवाट) का उपयोग करते हैं। एक किलोवाट, 1000 वाट के बराबर होता है।

  • 1kW = 1000W
  • चूँकि विद्युत ऊर्जा = शक्ति × समय,
    • इसलिए विद्युत ऊर्जा का मात्रक वाट-घंटा (Wh) होता है।

यदि 1 वाट शक्ति का उपयोग 1 घंटे तक किया जाए, तो उपभुक्त ऊर्जा 1 वाट-घंटा (Wh) होती है।

1 kWh का जूल में मान :-

एक किलोवाट-घंटा (1 kWh) का मान जूल में इस प्रकार होता है—

  • 1 kWh = 1000 वाट × 3600 सेकंड
  • 1 kWh = 3.6 × 10⁶ वाट-सेकंड
  • 1 kWh = 3.6 × 10⁶ जूल (J)
यह भी देखें ✯ कक्षा 10
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