Class 10 Science chapter 13 notes in hindi || हमारा पर्यावरण notes

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कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 13 नोट्स: हमारा पर्यावरण class 10 notes

TextbookNcert
ClassClass 10
SubjectScience
ChapterChapter 13
Chapter Nameहमारा पर्यावरण नोट्स
MediumHindi

क्या आप Class 10 Science chapter 13 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से hamara paryavaran class 10 notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम पारितंत्र, पर्यावरणीय समस्याएं, ओजोन, अपशिष्ट उत्पादन और उनके समाधान आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

पर्यावरण :-

पर्यावरण का अर्थ है हमारे आस-पास का घेरा। हमारे चारों ओर मौजूद जीवित (पौधे, जानवर, मानव) और निर्जीव (वायु, जल, मिट्टी, ताप आदि) चीज़ों का समूह पर्यावरण कहलाता है।

पारितंत्र :-

किसी भी क्षेत्र के सभी सजीव (जीवित) तथा अजीव (निर्जीव) घटक जब आपस में परस्पर क्रिया करते हैं, तो वे मिलकर एक पारितंत्र बनाते हैं। उदाहरण: एक बगीचा, जंगल या तालाब।

🔸 सरल शब्दों में :- किसी क्षेत्र के सभी जैव और अजैव घटकों का परस्पर संबंध ही पारितंत्र कहलाता है।

पारितंत्र के प्रकार :-

पारितंत्र को मुख्य रूप से दो प्रकार में बाँटा गया है—

🔸 1. प्राकृतिक पारितंत्र :- जो पारितंत्र प्रकृति में स्वाभाविक रूप से विद्यमान होते हैं, उन्हें प्राकृतिक पारितंत्र कहते हैं। उदाहरण: जंगल, सागर, झील, नदी आदि।

🔸 2. मानव निर्मित पारितंत्र :- जो पारितंत्र मानव द्वारा बनाए जाते हैं, उन्हें मानव निर्मित पारितंत्र कहते हैं। उदाहरण: खेत, जलाशय, बगीचा, पार्क आदि।

पारितंत्र के घटक :-

पारितंत्र के दो मुख्य घटक अर्थात एक पारितंत्र मुख्य रूप से दो चीजों से मिलकर बनता है:

  1. अजैविक घटक
  2. जैविक घटक

1. अजैविक घटक :-

प्रकृति के वे घटक जिनमें जीवन नहीं होता, लेकिन जो जीवन के अस्तित्व का आधार प्रदान करते हैं, अजैविक घटक कहलाते हैं।

🔸 उदाहरण: वायु, जल, भूमि (मृदा), प्रकाश, तापमान आदि। ये सभी निर्जीव घटक मिलकर अजैविक घटकों का निर्माण करते हैं।

2. जैविक घटक :-

प्रकृति के वे घटक जिनमें जीवन पाया जाता है, जैविक घटक कहलाते हैं।

🔸 उदाहरण: पौधे, पशु–पक्षी, जन्तु, मनुष्य, सूक्ष्मजीव, फफूंदी आदि। ये सभी सजीव घटक मिलकर जैविक घटकों का निर्माण करते हैं।

जीवों का वर्गीकरण :-

जीवन निर्वाह के आधार जीवों को 1.उत्पादक, 2.उपभोक्ता एवं 3.अपघटक वर्गों में बाँटा गया है।

1. उत्पादक :-

सभी हरे पौधों एवं नील-हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है, इसी वर्ग में आते हैं तथा उत्पादक कहलाते हैं।

2. उपभोक्ता :-

सभी जीव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों (हरे पौधों) पर निर्भर करते हैं। ये जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं।

उपभोक्ताओं को मुख्य रूप से निम्न प्रकारों में बाँटा जाता है—

  • शाकाहारी – जो केवल पौधों को खाते हैं। उदाहरण: गाय, हिरण, बकरी, खरगोश
  • मांसाहारी – जो अन्य जानवरों को खाते हैं। उदाहरण: शेर, बाघ, साँप, चील।
  • सर्वाहारी – जो पौधे और जानवर दोनों खाते हैं। उदाहरण: मनुष्य, भालू, कौआ, कुत्ता।
  • परजीवी – जो किसी अन्य जीव के शरीर पर या उसके भीतर रहकर उससे भोजन प्राप्त करते हैं। उदाहरण: जूँ, अमरबेल।

3. अपमार्जक :-

जब कोई पौधा या जीव मर जाता है, तो जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव उसके मृत शरीर को सड़ाने-गलाने का कार्य करते हैं। इन सूक्ष्मजीवों को अपमार्जक कहा जाता है।

🔹 अपमार्जकों का कार्य :-

  • अपमार्जक मृत जीवों में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं।
  • ये पदार्थ मिट्टी में मिल जाते हैं और पौधों द्वारा पुनः उपयोग किए जाते हैं।

यदि अपमार्जक न हों तो क्या होगा?

  • मृत पौधों और जानवरों के अवशेष जमा होते जाएँगे।
  • पर्यावरण में गंदगी और दुर्गंध फैल जाएगी।
  • मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व वापस नहीं मिलेंगे।
  • मृदा की प्राकृतिक पुनःपूर्ति नहीं हो पाएगी।
  • परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि प्रभावित होगी और
  • पूरा पारितंत्र असंतुलित हो जाएगा।

👉 इसलिए अपमार्जक पारितंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

आहार श्रृंखला :-

जब जीवों की एक श्रृंखला बनती है, जिसमें एक जीव दूसरे को भोजन के रूप में खाता है, तो उसे आहार श्रृंखला कहते हैं। उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज़

आहार श्रृंखला में प्रत्येक चरण को पोषी स्तर कहा जाता है।

पोषी स्तरों का वर्गीकरण :-

  • प्रथम पोषी स्तर (उत्पादक) :- स्वपोषी जीव (हरे पौधे) सूर्य की ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। पूरे पारितंत्र के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत।
  • द्वितीय पोषी स्तर (प्राथमिक उपभोक्ता) :- शाकाहारी जीव, जो पौधों पर निर्भर होते हैं। उदाहरण: टिड्डा, हिरण।
  • तृतीय पोषी स्तर (द्वितीय उपभोक्ता) :- छोटे मांसाहारी जीव, जो शाकाहारियों को खाते हैं। उदाहरण: मेंढक, बिल्ली।
  • चतुर्थ पोषी स्तर (तृतीय उपभोक्ता) :- बड़े मांसाहारी जीव, जो खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर होते हैं। उदाहरण: शेर, बाघ, बाज।

पोषी स्तरों में ऊर्जा का स्थानांतरण :-

ऊर्जा हमेशा एक ही दिशा में चलती है (सूर्य → उत्पादक → शाकाहारी → मांसाहारी)। यह कभी वापस नहीं लौटती। यानी शेर से ऊर्जा वापस घास को नहीं मिल सकती।

हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा का 1% भाग (जो पत्तियों पर पड़ता है), अवशोषित करते हैं।

10% नियम-एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में केवल 10% ऊर्जा का स्थानांतरण होता है जबकि 90% ऊर्जा का पर्यावरण में ऊष्मा के रूप में कुछ ऊर्जा पाचन और कुछ कार्य करने में और कुछ वृद्धि और जनन कार्य करने में ह्रास हो जाता है।

🔸 निष्कर्ष :- इसलिए हर अगले पोषी स्तर पर ऊर्जा कम होती जाती है। आहार श्रृंखला सामान्यतः 3 या 4 स्तरों तक ही सीमित रहती है।

यह भी देखें ✯ कक्षा 10

आहार जाल :-

प्रकृति में आमतौर पर प्रत्येक जीव दो अथवा अधिक प्रकार के जीवों द्वारा खाया जाता है, जो स्वयं अनेक प्रकार के जीवों का आहार बनते हैं।

अतः एक सीधी आहार श्रृंखला के बजाय जीवों के मध्य आहार संबंध शाखान्वित होते हैं तथा शाखान्वित श्रृंखलाओं का एक जाल बनाते हैं, जिसे ‘आहार जाल’ कहते हैं।

जैव-आवर्धन :-

आहार श्रृंखला में उपस्थित हानिकारक तथा अजैव-निम्नीकृत रसायनों का प्रत्येक उच्च पोषी स्तर पर क्रमशः अधिक मात्रा में संचित होना जैव-आवर्धन कहलाता है।

🔸 सरल शब्दों मे :- आहार श्रृंखला के प्रत्येक उच्च पोषी स्तर पर हानिकारक रसायनों की बढ़ती हुई मात्रा को जैव-आवर्धन कहते हैं।

🔸 मनुष्य पर प्रभाव :- ऐसे रसायनों की सबसे अधिक मात्रा मानव शरीर में होती है। क्योंकि मानव किसी भी आहार श्रंखला के उच्चतम पोषी स्तर पर होता है।

पर्यावरण की समस्याएँ :-

पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, और मानव की गतिविधियाँ भी पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। इन दोनों के कारण पर्यावरण की गुणवत्ता में धीरे-धीरे गिरावट आती जा रही है, जिससे विभिन्न पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

  • उदाहरण :-
    • ओज़ोन परत का अपक्षय
    • अपशिष्ट निपटान की समस्या

ओज़ोन :-

ओज़ोन (O₃) ऑक्सीजन का ही एक रूप है। ओजोन का एक अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनता है, जिसे हम O₃ लिखते हैं।

ऑक्सीजन और ओज़ोन में अंतर :-

ऑक्सीजन (O₂)ओज़ोन (O₃)
जीवन के लिए आवश्यकपृथ्वी की सतह पर विषैली
श्वसन में सहायकऊपरी वायुमंडल में उपयोगी
हानिरहितनिचले स्तर पर घातक

ओजोन का निर्माण :-

ऊपरी वायुमंडल में सूर्य की UV किरणें ऑक्सीजन अणुओं (O₂) को तोड़कर स्वतंत्र ऑक्सीजन परमाणु (O) बनाती हैं। ये स्वतंत्र परमाणु O₂ से मिलकर ओज़ोन (O₃) बनाते हैं।

  • सरल समीकरण :-
    • O₂ —UV→ O + O
    • O + O₂ → O₃ (ओज़ोन)

ओज़ोन परत :-

ओजोन परत पृथ्वी के चारों ओर एक रक्षात्मक आवरण है। वायुमंडल के ऊपरी स्तर (समताप मंडल) में ओज़ोन परत पाई जाती है। यह सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (UV) किरणों को रोकती है। UV किरणें जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक होती हैं।

ओज़ोन परत का महत्व :-

ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को रोकती है। यदि ये किरणें पृथ्वी तक पहुँच जाएँ, तो:

  • मनुष्यों में त्वचा का कैंसर हो सकता है।
  • आंखों में मोतियाबिंद की समस्या हो सकती है।
  • फसलों और जलीय जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

👉 इसलिए ओज़ोन परत को पृथ्वी की सुरक्षा ढाल कहा जाता है।

ओजोन परत का क्षय :-

1980 से वायुमंडल में ओज़ोन की मात्रा में तीव्रता से गिरावट आने लगी। क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (CFCs) जैसे मानव संश्लेषित रसायनों को इसका मुख्य कारक माना गया है।

इनका उपयोग रेफ्रीजेरेटर (शीतलन) एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है।

👉 CFCs वायुमंडल में जाकर ओज़ोन को नष्ट करते हैं।

ओज़ोन परत के बचाव के प्रयास :-

1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) में सर्वानुमति बनी कि CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए।

अब यह अनिवार्य है कि दुनिया भर की सभी विनिर्माण कंपनियाँ CFC रहित CFC रहित रेफ्रिजरेटर बनाएँ।

कचरा क्या है?

हमारी दैनिक गतिविधियों (खाना बनाना, खरीदारी, सफाई आदि) से निकलने वाले वे पदार्थ जिनका अब उपयोग नहीं किया जाता, कचरा कहलाते हैं। उदाहरण: खाने के छिलके, प्लास्टिक की थैलियाँ, खाली पैकेट, बोतलें।

कचरा प्रबंधन :-

हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों के बाद जो बेकार चीजें बच जाती हैं, उन्हें अपशिष्ट (Waste) कहते हैं। ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:

🔹 1. जैव निम्नीकरणीय पदार्थ :-

वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम (जैसे जीवाणुओं और एंजाइमों) द्वारा सरल पदार्थों में अपघटित हो जाते हैं।

  • कारण: जैसे हमारे शरीर में भोजन पचाने के लिए विशिष्ट एंजाइम होते हैं, वैसे ही प्रकृति में जीवाणु इन पदार्थों को गला देते हैं।
  • उदाहरण: फलों और सब्जियों के छिलके, कागज, सूती कपड़ा, गोबर, आदि।

🔹 2. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ :-

वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रमों से अपघटित नहीं होते। ये लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं।

  • कारण: इन पर प्रकृति के एंजाइमों का कोई असर नहीं होता। इन पर गर्मी और दबाव का प्रभाव तो पड़ता है, लेकिन ये खत्म नहीं होते।
  • उदाहरण: प्लास्टिक, कांच, पॉलीथीन, धातु की चीजें, सिंथेटिक कपड़े।
  • प्रभाव: ये पदार्थ लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं और प्रदूषण फैलाते हैं।

वर्तमान समय में कचरे की समस्या बढ़ने के कारण :-

  • जनसंख्या में वृद्धि होने से कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
  • प्लास्टिक और पॉलीथीन का अत्यधिक उपयोग, जो आसानी से नष्ट नहीं होते।
  • शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण घरेलू और औद्योगिक कचरा बढ़ना।
  • उपयोग करो और फेंको (Use and Throw) संस्कृति का बढ़ना।
  • कचरे का उचित पृथक्करण (गीला–सूखा अलग करना) न होना।
  • पुनर्चक्रण की कमी और जागरूकता का अभाव।
  • इलेक्ट्रॉनिक कचरा जैसे मोबाइल, कंप्यूटर आदि की बढ़ती मात्रा।

इन सबका पर्यावरण पर प्रभाव :-

  • भूमि प्रदूषण
  • जल प्रदूषण
  • वायु प्रदूषण
  • जानवरों की मृत्यु (प्लास्टिक खाने से)
  • नालियों का जाम होना
  • रोगों का फैलाव

कचरा प्रबंधन की विधियाँ :-

  • कचरे का पृथक्करण :- कचरे को गीले कचरे (खाने के अवशेष, सब्ज़ी के छिलके) और सूखे कचरे (काग़ज़, प्लास्टिक, काँच, धातु) में अलग–अलग करना चाहिए।
  • पुनः उपयोग :- वस्तुओं को फेंकने के बजाय दोबारा उपयोग करना। जैसे— बोतलें, डिब्बे, कपड़े आदि।
  • पुनर्चक्रण :- कचरे से नई उपयोगी वस्तुएँ बनाना। जैसे— काग़ज़, प्लास्टिक, काँच और धातु का पुनर्चक्रण।
  • खाद बनाना :- जैविक कचरे (फल–सब्ज़ी के छिलके, पत्तियाँ) से खाद (कम्पोस्ट) बनाना।
  • कचरा जलाना :- कुछ प्रकार के कचरे को नियंत्रित ढंग से जलाकर नष्ट किया जाता है (विशेषकर अस्पतालों का कचरा)।
  • कचरा कम करना :- कम प्लास्टिक का उपयोग, अनावश्यक वस्तुएँ न खरीदना।
यह भी देखें ✯ कक्षा 10
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