Class 10 Science chapter 5 notes in hindi || जैव प्रक्रम notes

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कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 5 नोट्स: जैव प्रक्रम class 10 notes

TextbookNcert
ClassClass 10
SubjectScience
ChapterChapter 5
Chapter Nameजैव प्रक्रम नोट्स
MediumHindi

क्या आप class 10 biology chapter 5 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से jaiv prakram class 10 notes download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम पौधों और जानवरों में पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

जैव प्रक्रम :-

वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से जीवों के शरीर के अनुरक्षण का कार्य करते हैं, जैव प्रक्रम कहलाते हैं।

अनुरक्षण का कार्य :-

यह निरंतर चलने वाला कार्य है, चाहे जीव कोई विशेष कार्य कर रहा हो, सो रहा हो या कक्षा में बैठा हो।

  • उद्देश्य: अनुरक्षण का कार्य शरीर में क्षति और टूट-फूट को रोकना।
  • आवश्यकता: अनुरक्षण कार्य तथा शारीरिक वृद्धि के लिए ऊर्जा ओर कच्ची सामग्री (जैसे प्रोटीन, वसा, खनिज आदि) की आवश्यकता होती है।
  • स्रोत: यह ऊर्जा और कच्ची सामग्री भोजन के रूप में शरीर के बाहर से प्राप्त की जाती है।

पोषण :-

ऊर्जा के स्रोत (भोजन) को शरीर के बाहर से अंदर लेने के प्रक्रम को पोषण कहते हैं।

उपचयन–अपचयन अभिक्रियाएँ :-

शरीर के अंदर भोजन को ऊर्जा में बदलने के लिए रासायनिक अभिक्रियाओं की श्रृंखला होती है। इनमें उपचयन–अपचयन अभिक्रियाएँ प्रमुख हैं। बहुत से जीव इन क्रियाओं के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।

श्वसन :-

शरीर के बाहर से ऑक्सीजन को ग्रहण करना तथा कोशिकीय आवश्यकता के अनुसार खाद्य स्रोत के विघटन में उसका उपयोग श्वसन कहलाता है।

एक-कोशिकीय जीवों में जीवन क्रियाएँ :-

एक-कोशिकीय जीवों की पूरी सतह पर्यावरण के संपर्क में रहती है। इनका भोजन ग्रहण, गैसों का आदान-प्रदान और उत्सर्जन साधारण विसरण द्वारा होता है। किसी विशेष अंग की आवश्यकता नहीं होती।

बहुकोशिकीय जीवों में जीवन क्रियाएँ :-

बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ पर्यावरण के सीधे संपर्क में नहीं होतीं। केवल विसरण से सभी कोशिकाओं की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो सकतीं। इसलिए विशिष्ट ऊतक और अंग विकसित हो जाते हैं।

उत्सर्जन :-

रासायनिक अभिक्रियाओं (ऊर्जा प्राप्ति) के दौरान कुछ ऐसे उपोत्पाद बनते हैं जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। इन हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के प्रक्रम को उत्सर्जन कहते हैं। बहुकोशिकीय जीवों में उत्सर्जन के लिए विशिष्ट ऊतक/अंग होते हैं।

सजीव भोजन कैसे प्राप्त करते हैं? (पोषण की विधियाँ)

सभी जीवों को ऊर्जा और पदार्थ की आवश्यकता होती है, परंतु भोजन प्राप्त करने की उनकी विधियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। भोजन प्राप्त करने की इन विधियों को पोषण की विधियाँ कहते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:

  • क. स्वपोषी पोषण
  • ख. विषमपोषी पोषण

क. स्वपोषी पोषण :-

वे जीव जो अकार्बनिक पदार्थों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और जल से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं। ये जीव सामान्यतः प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं। उदाहरण: सभी हरे पौधे और कुछ जीवाणु।

प्रकाश संश्लेषण क्या है?

वह प्रक्रम जिसमें स्वपोषी जीव (हरे पौधे) सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) से कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) का निर्माण करते हैं, प्रकाश संश्लेषण कहलाता है। निर्मित कार्बोहाइड्रेट पौधों को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

🔸 रासायनिक समीकरण: 6CO₂ + 12H₂O = (सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल) => C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O

प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक अवयव :-

  • क्लोरोफिल: हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) में पाया जाने वाला हरा वर्णक। प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
  • प्रकाश: सूर्य का प्रकाश (ऊर्जा का स्रोत)।
  • कार्बन डाइऑक्साइड: वायु से रंध्रों (स्टोमेटा) द्वारा ग्रहण किया जाता है।
  • जल: मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित।

प्रकाश संश्लेषण की मुख्य घटनाएँ (चरण) :-

  • (i) प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण – क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करना।
  • (ii) प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करना तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन।
  • (iii) कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन।

🔸 नोट (अपवाद): यह आवश्यक नहीं है कि ये चरण तत्काल एक के बाद एक हों। उदाहरण: मरुद्भिद पौधे रात्रि में कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और एक मध्यस्थ उत्पाद बनाते हैं। दिन में क्लोरोफिल ऊर्जा अवशोषित करके अंतिम उत्पाद बनाता है।

रंध्र :-

पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले सूक्ष्म छिद्र, जिनके द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का प्रवेश तथा ऑक्सीजन (O₂) का निष्कासन होता है, रंध्र कहलाते हैं।

🔹 रंध्र के प्रमुख कार्य :-

🔸 गैसों का आदान-प्रदान: प्रकाश संश्लेषण तथा श्वसन के लिए आवश्यक गैसों (CO₂ और O₂) का अधिकांश आदान-प्रदान रंध्रों के माध्यम से होता है।

🔸 वाष्पोत्सर्जन: पौधे के अंदर के अतिरिक्त पानी को जलवाष्प के रूप में बाहर निकालने की प्रक्रिया रंध्रों के माध्यम से ही होती है।

द्वार कोशिकाएँ :-

रंध्र का खुलना और बंद होना द्वार कोशिकाओं द्वारा नियंत्रित होता है।

जब द्वार कोशिकाओं में जल प्रवेश करता है, तब वे फूल जाती हैं और रंध्र का छिद्र खुल जाता है। जब द्वार कोशिकाओं से जल बाहर निकल जाता है, तब वे सिकुड़ जाती हैं और रंध्र का छिद्र बंद हो जाता है।

भोजन का भंडारण :-

  • पौधों में: पौधे अतिरिक्त ग्लूकोज को मंड (स्टार्च) के रूप में संचित करते हैं। यह भविष्य में ऊर्जा की आवश्यकता होने पर प्रयोग किया जाता है।
  • मनुष्यों में: अतिरिक्त ऊर्जा ग्लाइकोजन के रूप में यकृत एवं मांसपेशियों में संचित रहती है।

ख. विषमपोषी पोषण :-

वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं, विषमपोषी कहलाते हैं। ये जीव ऊर्जा के लिए जटिल पदार्थों का उपयोग करते हैं। उदाहरण: जंतु और कवक।

एंजाइम :-

जटिल पदार्थों को सरल बनाने के लिए जीव विशेष जैव-उत्प्रेरक का उपयोग करते हैं, जिन्हें एंजाइम कहते हैं।

विषमपोषी पोषण के प्रकार :-

विषमपोषी पोषण को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है:

🔸 (i) प्राणीसमपोषण: इसमें जीव संपूर्ण भोज्य पदार्थ का अंतर्ग्रहण करते हैं तथा भोजन का पाचन शरीर के अंदर होता है। उदाहरण: अमीबा, मानव।

🔸 (ii) मृतजीवी पोषण: मृतजीवी जीव अपना भोजन मृत जीवों के शरीर एवं सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। उदाहरण: फफूँदी, कवक।

🔸 (iii) परजीवी पोषण: परजीवी जीव अन्य जीवों के शरीर के अंदर या बाहर रहकर, उन्हें तुरंत मारे बिना, उनसे अपना पोषण प्राप्त करते हैं। उदाहरण: जोंक, अमरबेल, जूँ, फीताकृमि।

विषमपोषी जीव अपना पोषण कैसे करते हैं?

भोजन के प्रकार और उसे ग्रहण करने की विधि के अनुसार पाचन तंत्र अलग-अलग जीवों में भिन्न होता है।

🔸 एककोशिकीय जीवों में पोषण :- एककोशिकीय जीवों में पूरा शरीर ही एक कोशिका होता है। भोजन पूरी कोशिकीय सतह से लिया जा सकता है। अलग पाचन तंत्र नहीं होता। जैसे: अमीबा, पैरामीशियम।

🔸 बहुकोशिकीय जीवों में पोषण :- बहुकोशिकीय जीवों में पोषण के लिए विभिन्न विशिष्ट अंग और अंग-तंत्र पाए जाते हैं। भोजन का ग्रहण, पाचन, अवशोषण और बहिष्करण पाचन तंत्र द्वारा किया जाता है। जैसे: मानव

अमीबा में पोषण :-

🔸 भोजन ग्रहण: अमीबा कोशिकीय सतह से अँगुली जैसे अस्थायी प्रवर्ध की मदद से भोजन ग्रहण करता है।

🔸 प्रक्रिया :- यह प्रवर्ध भोजन के कणों को घेर लेते हैं तथा संगलित होकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं। खाद्य रिक्तिका के अंदर जटिल पदार्थों का विघटन सरल पदार्थों में किया जाता है और वे कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाते हैं। बचा हुआ अपच पदार्थ कोशिका की सतह की ओर गति करता है तथा शरीर से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है।

पैरामीशियम में पोषण :-

🔸 भोजन ग्रहण: कोशिका के एक विशिष्ट स्थान से।

पैरामीशियम भी एककोशिकीय जीव है लेकिन इसकी कोशिका का एक निश्चित आकार होता है तथा भोजन एक विशिष्ट स्थान से ही ग्रहण किया जाता है। कोशिका की पूरी सतह पक्ष्याभ से ढकी होती है। इन पक्ष्याभ की निरंतर गति भोजन को उस विशिष्ट प्रवेश स्थान तक पहुँचाती है।

यह भी देखें ✯ कक्षा 10

मानव में पोषण :-

मुँह → ग्रास नली → आमाशय → क्षुद्रांत्र (पित्त + अग्न्याशय रस) → अवशोषण (दीर्घरोम) → बृहदांत्र (जल अवशोषण) → मलत्याग (गुदा)

🔹 1. मुँह :-

  • पाचन की शुरुआत मुँह से होती है।
  • दाँत: भोजन को दाँतों से चबाकर छोटे टुकड़ों में बदला जाता है।
  • लार (सैलिवा): ग्रंथि से निकलने वाला एक रस है, जिसे लालारस या लार कहते हैं। लार ग्रंथियों से स्रावित होती है। जो भोजन को नम व चिकना बनाती है।
  • लार एमिलेस: यह लार में मौजूद एक एंजाइम है जो मंड जटिल अणु को सरल शर्करा में खंडित कर देता है।
  • जिह्वा: भोजन को लार के साथ मिलाती है और आगे धकेलती है।

🔸 क्रमाकुंचक गति :- आहार नली में भोजन की नियमित आगे बढ़ने वाली गति को क्रमाकुंचक गति कहते हैं। यह गति भोजन को आगे बढ़ाती है एवं पाचन को सही ढंग से होने में सहायता करती है यह पूरी आहार नली में होती है।

🔹 2. ग्रास नली :-

मुँह से आमाशय तक भोजन पहुँचाती है। इसमें कोई पाचन नहीं होता। केवल क्रमाकुंचन गति द्वारा भोजन नीचे की ओर धकेला जाता है।

🔹 3. आमाशय में पाचन :-

आमाशय एक बृहत अंग है, जो भोजन के आने पर फैल जाता है। ये पाचन कार्य आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रंथियों के द्वारा संपन्न होते हैं

  • हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl): अम्लीय माध्यम बनाता है, जीवाणुओं को नष्ट करता है।
  • पेप्सिन एंजाइम: प्रोटीन का पाचन करता है।
  • श्लेष्मा: आमाशय की भित्ति को अम्ल से बचाता है।

🔹4. क्षुद्रांत्र में पाचन :-

क्षुद्रांत्र आहारनाल का सबसे लंबा भाग है, अत्यधिक कुंडलित होने के कारण यह संहत स्थान में अवस्थित होती है। क्षुद्रांत्र कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के पूर्ण पाचन का स्थल है। इस कार्य के लिए यह यकृत तथा अग्न्याशय से स्रावण प्राप्त करती है।

🔸 भोजन के प्रकार के अनुसार क्षुद्रांत्र की लंबाई :-

विभिन्न जंतुओं में क्षुद्रांत्र की लंबाई उनके भोजन के प्रकार के अनुसार अलग-अलग होती है।

  • घास खाने वाले शाकाहारी का सेल्युलोज़ पचाने के लिए लंबी क्षुद्रांत्र की आवश्यकता होती है।
  • मांस का पाचन सरल है। अतः बाघ जैसे मांसाहारी की क्षद्रांत्र छोटी होती है।

सहायक ग्रंथियों का कार्य :- चूँकि आमाशय से आया भोजन अम्लीय है, उसे क्षारीय बनाने और पचाने के लिए दो ग्रंथियाँ मदद करती हैं:

  1. यकृत :- पित्त रस स्रावित करता है।
    • कार्य:
      • अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाना
      • वसा की बड़ी गोलिकाओं को छोटी गोलिकाओं में तोड़ता है। इसे इमल्सीकरण कहते हैं।
  2. अग्न्याशय :- अग्न्याशय अग्न्याशयिक रस का स्रावण करता है जिसमें प्रोटीन के पाचन के लिए ट्रिप्सिन एंजाइम होता है तथा इमल्सीकृत वसा का पाचन करने के लिए लाइपेज एंजाइम होता है।

🔸 आंत्र रस :- क्षुद्रांत्र की भित्ति में ग्रंथि होती है, जो आंत्र रस स्रावित करती है। इसमें उपस्थित एंजाइम अंत में प्रोटीन को अमीनो अम्ल, जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में तथा वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देते हैं।

🔹 5. क्षुद्रांत्र में अवशोषण :-

पाचित भोजन को आंत्र की भित्ति अवशोषित कर लेती है।

दीर्घरोम :-

  • क्षुद्रांत्र के आंतरिक स्तर पर अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं। जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं।
  • कार्य: ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। इनमें रक्त वाहिकाओं की प्रचुरता होती है जो पचे हुए भोजन को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाती हैं।
  • उपयोग: यहाँ इसका उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने, नए ऊतकों के निर्माण और पुराने ऊतकों की मरम्मत में होता है।

🔹 6. बृहदांत्र :-

बिना पचा भोजन बृहदांत्र में भेज दिया जाता है, जहाँ भित्ति द्वारा जल का अवशोषण होता है। अपशिष्ट मल के रूप में मलाशय में जमा होता है।

🔹 7. मलत्याग (गुदा) :-

शेष अपशिष्ट गुदा द्वारा बाहर निकाला जाता है। यह क्रिया गुदा अवरोधिनी द्वारा नियंत्रित होती है।

दंतक्षरण :-

दंतक्षरण या दंतक्षय इनैमल तथा डैंटीन के शनैः शनैः मृदुकरण के कारण होता है।

  • शुरुआत: इसका प्रारंभ तब होता है जब जीवाणु मुँह में मौजूद शर्करा पर क्रिया करके अम्ल बनाते हैं।
  • प्रभाव: यह अम्ल इनैमल को विखनिजीकृत या नरम कर देता है।
  • दंतप्लाक :- जीवाणु, भोजन के कणों के साथ मिलकर दाँतों की सतह पर चिपक जाते हैं। इससे दंतप्लाक बनता है। दंतप्लाक दाँत को ढक लेता है।
  • लार की भूमिका: सामान्यतः लार अम्ल को उदासीन करती है, लेकिन प्लाक के कारण लार अम्ल को उदासीन करने के लिए दंत सतह तक नहीं पहुँच पाती है।
  • संक्रमण: इनेमल कमजोर होकर गुहा (कैविटी) बनाता है। अनुपचारित रहने पर जीवाणु दाँत के मज्जा (पल्प) तक पहुँच जाते हैं जिससे दर्द, सूजन, संक्रमण हो सकता है।
  • निवारण: भोजन के बाद नियमित रूप से ब्रश करने से प्लाक हट जाता है, जिससे जीवाणु अम्ल पैदा नहीं कर पाते।

श्वसन :-

पोषण द्वारा प्राप्त भोजन का उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। कोशिकाओं के भीतर भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को श्वसन कहते हैं। सभी जीव ऊर्जा प्राप्त करने के लिए श्वसन करते हैं।

श्वसन के प्रकार :-

श्वसन को ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रकारों में बाँटा जाता है:

🔹 वायवीय श्वसन :-

इसमें ऑक्सीजन की उपस्थिति में भोजन का पूर्ण अपघटन होता है। पायरुवेट का विखंडन ऑक्सीजन का उपयोग करके माइटोकॉन्ड्रिया में होता है।

क्योंकि यह प्रक्रम वायु (ऑक्सीजन) की उपस्थिति में होता है, यह वायवीय श्वसन कहलाता है। वायवीय श्वसन में ऊर्जा का मोचन अवायवीय श्वसन की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। उदाहरण: मानव, पशु

🔹 अवायवीय श्वसन :-

इसमें ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में भोजन का अपूर्ण अपघटन होता है। यह प्रक्रिया किण्वन के समय यीस्ट (खमीर) में पाई जाती है, क्योंकि यह प्रक्रम वायु (ऑक्सीजन) की अनुपस्थिति में होता है, इसे अवायवीय श्वसन कहते हैं।

अवायवीय श्वसन में पायरुवेट का विखंडन ऑक्सीजन के बिना कोशिकाद्रव्य में होता है, जिससे अल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं। इस प्रक्रिया में ऊर्जा कम मात्रा में प्राप्त होती है। उदाहरण: खमीर (Yeast)

वायवीय श्वसन एवं अवायवी श्वसन में अंतर :-

बिंदुवायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
ऑक्सीजनऑक्सीजन की उपस्थिति में होता हैऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है
ग्लूकोज का अपघटनग्लूकोज का पूर्ण उपचयन होता हैग्लूकोज का अपूर्ण उपचयन होता है
अंतिम उत्पादकार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जाएथेनॉल / लैक्टिक अम्ल + CO₂ + ऊर्जा
होने का स्थानकोशिकाद्रव्य तथा माइटोकॉन्ड्रियाकेवल कोशिकाद्रव्य
ऊर्जा उत्पादनअधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है (≈ 38 ATP)कम ऊर्जा उत्पन्न होती है (≈ 2 ATP)
उदाहरणमानव, पशुयीस्ट (खमीर)

ATP: कोशिका की ऊर्जा मुद्रा :-

श्वसन के दौरान जो ऊर्जा मुक्त होती है, उसका उपयोग तत्काल ATP (Adenosine Triphosphate) अणु बनाने में होता है। जब कोशिका को ऊर्जा की जरूरत होती है, तो ATP टूटता है और एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा (आंतरोष्मि क्रियाओं के लिए) देता है।

🔸 कार्य: यह कोशिका की अन्य क्रियाओं के लिए ईंधन की तरह कार्य करता है।

पौधों में श्वसन :-

पौधे गैसों का आदान-प्रदान रंध्रों के द्वारा करते हैं। यह प्रक्रिया विसरण द्वारा होती है। विसरण की दिशा पौधों की आवश्यकता और पर्यावरण पर निर्भर करती है।

  • रात्रि में, जब कोई प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं हो रही है, कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन ही मुख्य आदान-प्रदान क्रिया है।
  • दिन में, श्वसन के दौरान निकली CO, प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त हो जाती है अतः कोई CO, नहीं निकलती है। इस समय ऑक्सीजन का निकलना मुख्य घटना है।

जंतुओं में श्वसन :-

🔹 (i) जलीय जंतु में श्वसन :-

जो जीव जल में रहते हैं, वे जल में विलेय ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं, क्योंकि जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा वायु में ऑक्सीजन की मात्रा की तुलना में बहुत कम है, इसलिए जलीय जीवों की श्वास दर स्थलीय जीवों की अपेक्षा द्रुत होती है।

उदाहरण: मछली

मछली अपने मुँह के द्वारा जल लेती है तथा बलपूर्वक इसे क्लोम तक पहुँचाती है, जहाँ विलेय ऑक्सीजन रुधिर ले लेता है।

🔹 (ii) स्थलीय जंतु :-

स्थलीय जीव श्वसन के लिए वायुमंडल की ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। विभिन्न जीवों में यह ऑक्सीजन भिन्न-भिन्न अंगों (फेफड़े, त्वचा, ट्रैकिया) द्वारा अवशोषित की जाती है। इन सभी अंगों में एक रचना होती है, जो उस सतही क्षेत्रफल को बढ़ाती है, जो ऑक्सीजन बाहुल्य वायुमंडल के संपर्क में रहता है।

  • उदाहरण:
    • फेफड़े (मानव, स्तनधारी)
    • त्वचा (मेंढक, केंचुआ)
    • ट्रैकिया (कीट)

श्वसन अंगों की विशेषताएं :-

सभी स्थलीय जीवों में ऑक्सीजन अवशोषित करने वाले अंगों (जैसे फेफड़े) की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं ताकि गैसों का विनिमय आसानी से हो सके:

  • बड़ा सतही क्षेत्रफल: जिससे अधिक मात्रा में ऑक्सीजन का अवशोषण हो सके।
  • पतली और नम सतह: जिससे गैसों का विसरण सरलता से हो सके।
  • सुरक्षा हेतु शरीर के अंदर स्थित: ताकि श्वसन अंग बाहरी क्षति से सुरक्षित रहें।
  • वायु के आने–जाने के लिए मार्ग और क्रियाविधि: जिससे ऑक्सीजन अंदर जा सके और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकल सके।

मनुष्य में श्वसन :-

मानव श्वसन तंत्र का कार्य ऑक्सीजन को शरीर में प्रवेश कराना तथा कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालना है।

🔹 वायु का प्रवाह क्रम :-

शरीर के अंदर वायु का प्रवाह निम्न क्रम में होता है: नासाद्वार →ग्रसनी → कंठ → श्वासनली → ब्रोंकाई → ब्रोंकायोल्स → कूपिकाएँ → कूपिकाओं में गैस विनिमय → नि:श्वास द्वारा CO₂ निष्कासन

मानव श्वसन तंत्र एवं क्रियाविधि :-

🔸 नासाद्वार :- मनुष्य में वायु शरीर के अंदर नासाद्वार द्वारा जाती है।

निस्पंदन: नासाद्वार द्वारा जाने वाली वायु मार्ग में यहाँ महीन बाल और श्लेष्मा की परत होती है, जो धूल और अशुद्धियों को रोककर वायु को साफ करती है।

🔸 ग्रसनी :- नासाद्वार से आई वायु ग्रसनी से होकर आगे बढ़ती है। यह वायु के लिए एक सामान्य मार्ग का कार्य करती है।

🔸 कंठ :- ग्रसनी से वायु कंठ में प्रवेश करती है। कंठ का मुख्य कार्य ध्वनि उत्पन्न करना है।

🔸 श्वासनली :- श्वासनली वायु को कंठ से फेफड़ों तक पहुँचाती है। इसमें उपस्थित C-आकार के उपास्थि वलय यह सुनिश्चित करते हैं कि वायु मार्ग निपतित न हो।

🔸 ब्रोंकाई ओर ब्रोंकायोल्स :- श्वासनली दो शाखाओं में विभाजित होकर ब्रोंकाई बनाती है। ब्रोंकाई आगे चलकर ब्रोंकायोल्स में विभाजित होती हैं, जो वायु को फेफड़ों के हर भाग तक पहुँचाती हैं।

🔸 फुफ्फुस और कूपिका :-

फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाता है, जो अंत में गुब्बारे जैसी रचना में अंतकृत हो जाता है, जिसे कूपिका कहते हैं।

🔸 कूपिका :- यह गुब्बारे जैसी संरचना है। कार्य: कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है, जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है। कूपिकाओं की भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है।

🔸 गैसों का आदान-प्रदान :- रुधिर शेष शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। कूपिका रुधिर वाहिका का रुधिर कूपिका वायु से ऑक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है।

श्वास लेने की क्रियाविधि :-

श्वसन के दौरान दो क्रियाएँ होती हैं — उच्छ्वास और नि:श्वास

🔹 उच्छ्वास (श्वास अंदर लेना) :-

जब हम श्वास अंदर लेते हैं, हमारी पसलियाँ ऊपर उठती हैं और हमारा डायाफ्राम चपटा हो जाता है, इसके परिणामस्वरूप वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है। इस कारण वायु फुफ्फुस के अंदर चूस ली जाती है और विस्तृत कूपिकाओं को भर लेती है।

🔹 नि:श्वास (श्वास बाहर छोड़ना) :-

जब हम श्वास बाहर छोड़ते हैं, तो पसलियाँ नीचे और अंदर की ओर आ जाती हैं तथा डायाफ्राम गुंबदाकार (ऊपर की ओर उठ) हो जाता है। इससे वक्षगुहिका का आयतन घट जाता है और फेफड़ों के अंदर का दाब बढ़ जाता है। दाब बढ़ने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु फेफड़ों से बाहर निकल जाती है।

मानव श्वसन क्रिया :-

अंतःश्वसनउच्छ्वसन
अंतःश्वसन के दौरान वक्षीय गुहा फैलती हैउच्छ्वसन के दौरान वक्षीय गुहा अपने मूल आकार में वापस आ जाती है
पसलियों से संलग्न पेशियाँ सिकुड़ती हैंपसलियों की पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं
पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर गति करती हैंपसलियाँ नीचे और अंदर की ओर आ जाती हैं
वक्ष गुहा में वायु का दाब कम हो जाता हैवक्ष गुहा में वायु का दाब बढ़ जाता है
दाब कम होने के कारण वायु फेफड़ों में भर जाती हैदाब बढ़ने के कारण वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) फेफड़ों से बाहर निकल जाती है

संवहन तंत्र :-

मनुष्य में भोजन, ऑक्सीजन तथा अन्य आवश्यक पदार्थों की शरीर के विभिन्न भागों तक निरंतर आपूर्ति करने वाला तंत्र संवहन तंत्र कहलाता है।

मानव में वहन :-

मानव शरीर में विभिन्न पदार्थों जैसे ऑक्सीजन, भोजन, हार्मोन तथा अपशिष्ट पदार्थों का वहन संवहन तंत्र द्वारा किया जाता है।

मानव संवहन तंत्र के मुख्य अवयव :-

  • हृदय
  • रक्त नलिकाएं (धमनी व शिरा)
  • वहन माध्यम (रक्त व लसीका)

हमारा पंप-हृदय :-

  • प्रकृति: यह एक पेशीय अंग है।
  • आकार: यह हमारी मुट्ठी के आकार का होता है।
  • कार्य: हृदय का मुख्य कार्य रक्त को पूरे शरीर में पंप करना।

🔸 कोष्ठ :-

ऑक्सीजन युक्त रुधिर और कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रुधिर को आपस में मिलने से रोकने के लिए हृदय चार कोष्ठों में बंटा होता है:

  • दायाँ अलिंद
  • दायाँ निलय
  • बायाँ अलिंद
  • बायाँ निलय

हृदय में रक्त का प्रवाह (रुधिर प्रवाह की क्रियाविधि) :-

हृदय पंप की तरह कार्य करता है। इसे दो चरणों में समझा जा सकता है:

🔹 A. ऑक्सीजन युक्त रुधिर का प्रवाह (हृदय का बायाँ भाग) :-

  • फेफड़ों (फुफ्फुस) से: ऑक्सीजन प्रचुर रुधिर बाएँ अलिंद में आता है (इस समय अलिंद शिथिल रहता है)।
  • बायाँ अलिंद संकुचित: जब यह सिकुड़ता है, तो रुधिर बाएँ निलय में जाता है (निलय फैलता है)।
  • शरीर में पंप: जब पेशीय बायाँ निलय संकुचित होता है, तो रुधिर पूरे शरीर में पंप कर दिया जाता है।

🔹 B. विऑक्सीजनित (CO₂ युक्त) रुधिर का प्रवाह (हृदय का दायाँ भाग)

  • शरीर से: कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रुधिर दाएँ अलिंद में आता है (अलिंद फैलता है)।
  • दायाँ अलिंद संकुचित: रुधिर नीचे स्थित दाएँ निलय में जाता है।
  • फेफड़ों में पंप: दायाँ निलय रुधिर को ऑक्सीजनीकरण के लिए वापस फुफ्फुस में पंप कर देता है।

🔹 In short :-

  • शरीर (विऑक्सीजनित) → दायाँ अलिंद → दायाँ निलय → फेफड़े (ऑक्सीजनीकरण)
  • फेफड़े (ऑक्सीजनित) → बायाँ अलिंद → बायाँ निलय → शरीर

वाल्व :-

हृदय में वाल्व होते हैं। जब हृदय संकुचित होता है, तो वाल्व यह सुनिश्चित करते हैं कि रुधिर उल्टी दिशा में न बहे। इससे रक्त का प्रवाह एक ही दिशा में बना रहता है।

निलय की भित्ति मोटी क्यों होती है?

निलय को रक्त को दूर-दूर तक भेजना होता है। इसलिए निलय की पेशीय भित्ति अलिंद से अधिक मोटी होती है।

कोष्ठों का बँटवारा क्यों आवश्यक है?

  • उद्देश्य: ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से रोकना।
  • लाभ: यह शरीर को उच्च दक्षतापूर्ण ऑक्सीजन की पूर्ति कराता है।
  • किनके लिए जरूरी है?
    • पक्षियों और स्तनधारियों के लिए।
  • कारण: इन्हें अपने शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए निरंतर उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है (ये समतापी होते हैं)।

दोहरा परिसंचरण :-

एक पूर्ण परिसंचरण चक्र में रुधिर का दो बार हृदय से होकर गुजरना दोहरा परिसंचरण कहलाता है। मानव तथा अन्य कशेरुकी जीवों में दोहरा परिसंचरण पाया जाता है। इसमें रक्त दो अलग-अलग मार्गों से प्रवाहित होता है:

  • 1. फुफ्फुसीय परिसंचरण :- इसमें विऑक्सीजनित रक्त हृदय → फेफड़े → हृदय तक प्रवाहित होता है, जहाँ रक्त का ऑक्सीजनकरण होता है।
  • 2. शारीरिक परिसंचरण :- इसमें ऑक्सीजन युक्त रक्त हृदय → शरीर के सभी भाग → हृदय तक प्रवाहित होता है।

अन्य जीवों में हृदय :-

🔹 उभयचर और सरीसृप :-

  • इनमें तीन कोष्ठीय हृदय पाया जाता है (दो अलिंद, एक निलय)।
  • ये असमतापी जीव होते हैं, अर्थात इनका शरीर का तापमान पर्यावरण पर निर्भर करता है।
  • इनके हृदय में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर का आंशिक मिश्रण होता है।
  • ये जीव इस मिश्रित रक्त को सहन कर सकते हैं।
  • उदाहरण: मेंढक (उभयचर), छिपकली (सरीसृप)

🔹 मछली :-

  • मछली में दो कोष्ठीय हृदय पाया जाता है (एक अलिंद, एक निलय)।
  • रुधिर हृदय से क्लोम में जाता है, जहाँ वह ऑक्सीजनित होता है।
  • इसके बाद ऑक्सीजनित रुधिर सीधे शरीर के विभिन्न भागों में चला जाता है।
  • इस प्रकार मछली में रुधिर एक परिसंचरण चक्र में केवल एक बार हृदय से होकर गुजरता है।
  • 👉 इसे एकल परिसंचरण कहते हैं।

रक्तदाब :-

रुधिर वाहिकाओं की भित्ति के विरुद्ध रुधिर द्वारा लगाया गया दाब रक्तदाब कहलाता है। यह दाब शिराओं की अपेक्षा धमनियों में अधिक होता है।

🔸 रक्तदाब मापने का यंत्र :- रक्तदाब को स्फिग्मोमैनोमीटर नामक यंत्र से मापा जाता है।

रक्तदाब के प्रकार :-

धमनियों में रक्तदाब हृदय के निलयों की क्रिया के अनुसार दो प्रकार का होता है:

  1. प्रकुंचन दाब :-

जब निलय संकुचित होते हैं और रक्त को धमनियों में पंप करते हैं, तब धमनियों में उत्पन्न दाब को प्रकुंचन दाब कहते हैं।

👉 सामान्य मान ≈ 120 mm Hg (पारा)

  1. अनुशिथिलन दाब :-

जब निलय शिथिल होते हैं, तब धमनियों में बना रहने वाला दाब अनुशिथिलन दाब कहलाता है।

👉 सामान्य मान ≈ 80 mm Hg (पारा)

उच्च रक्तदाब :-

उच्च रक्तदाब को अति तनाव भी कहते हैं और यह सामान्यतः धमनिकाओं के सिकुड़ने के कारण होता है, जिससे रक्त प्रवाह में प्रतिरोध बढ़ जाता है। अत्यधिक उच्च रक्तदाब से धमनी फट सकती है तथा आंतरिक रक्तस्रवण हो सकता है।

रुधिर वाहिकाएँ :-

रुधिर को शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाली नलिकाएँ रुधिर वाहिकाएँ कहलाती हैं।

रुधिर वाहिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं:

  • धमनियाँ
  • शिराएँ
  • केशिकाएँ

🔹 धमनियाँ :-

  • धमनियाँ वे रुधिर वाहिकाएँ हैं, जो रुधिर को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं।
  • इनकी भित्तियाँ मोटी, पेशीय और लचीली होती हैं, क्योंकि रुधिर हृदय से उच्च दाब पर निकलता है।

🔹 शिराएँ :-

  • शिराएँ विभिन्न अंगों से रुधिर को एकत्र कर वापस हृदय तक लाती हैं।
  • इनमें रुधिर का दाब कम होता है, इसलिए इनकी भित्तियाँ पतली होती हैं।
  • रुधिर को एक ही दिशा में प्रवाहित रखने के लिए शिराओं में वाल्व पाए जाते हैं।

🔹 केशिकाएँ :-

  • किसी अंग या ऊतक तक पहुँचकर धमनियाँ छोटी-छोटी शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं।
  • केशिकाओं की भित्ति केवल एक कोशिका मोटी होती है।
  • इन्हीं पतली भित्तियों के माध्यम से रुधिर और ऊतकों के बीच गैसों, पोषक तत्वों तथा अपशिष्ट पदार्थों का विनिमय होता है।

लसिका :-

लसिका एक अन्य प्रकार का द्रव है, जो शरीर में वहन में सहायता करता है। इसे लसिका या ऊतक तरल भी कहते हैं। लसिका रुधिर के प्लाज्मा के समान होती है, लेकिन यह रंगहीन होती है तथा इसमें प्रोटीन की मात्रा कम होती है।

🔹 लसिका का निर्माण :-

केशिकाओं की भित्ति में उपस्थित छिद्रों द्वारा कुछ प्लाज्मा, प्रोटीन तथा रुधिर कोशिकाएँ बाहर निकलकर ऊतक के अंतर्कोशिकीय अवकाश में आ जाते हैं तथा ऊतक तरल या लसिका का निर्माण करते हैं।

🔹 लसिका का प्रवाह :-

लसिका अंतर्कोशिकीय अवकाश से लसिका केशिकाओं में चला जाता है जो आपस में मिलकर बड़ी लसिका वाहिका बनाती है और अंत में बड़ी शिरा में खुलती है

🔹 लसिका के कार्य :-

लसिका के दो मुख्य कार्य हैं:

  • वसा का वहन: क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) द्वारा अवशोषित और पचे हुए वस का वहन लसिका द्वारा ही होता है।
  • तरल संतुलन: यह ऊतकों से अतिरिक्त तरल को वापस रक्त में ले जाने का कार्य करता है।

पादपों में परिवहन :-

🔹 पादपों में परिवहन की आवश्यकता क्यों है?

पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा पत्तियों में भोजन (ऊर्जा) का निर्माण करते हैं, जबकि जल और खनिज लवण मृदा से जड़ों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं।

जब पौधा छोटा होता है विसरण द्वारा पदार्थों का आदान-प्रदान हो सकता है। जब पौधा बड़ा हो जाता है विसरण पर्याप्त नहीं होता। इसलिए परिवहन तंत्र आवश्यक हो जाता है।

पादपों का परिवहन तंत्र :-

पादपों में परिवहन दो अलग-अलग पथों से होता है:

  • जाइलम :- यह मृदा से जल और खनिज लवणों का वहन करता है।
  • फ्लोएम :- यह पत्तियों से भोजन (प्रकाश संश्लेषण के उत्पाद) को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है।

जाइलम द्वारा पादपों में जल परिवहन :-

जाइलम ऊतक में जड़ों, तनों और पत्तियों की वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ आपस में जुड़कर जल संवहन का एक सतत जाल बनाती हैं।

जल के ऊपर चढ़ने के लिए दो मुख्य बल कार्य करते हैं:

🔹 A. मूल दाब – “धकेलने वाला बल” :-

यह प्रक्रिया मुख्य रूप से रात्रि के समय प्रभावी होती है।

  • जड़ों की कोशिकाएँ मृदा से सक्रिय रूप से आयन ग्रहण करती हैं।
  • इससे जड़ और मृदा के बीच सांद्रण अंतर बनता है।
  • इस अंतर को खत्म करने के लिए जल मिट्टी से जड़ में प्रवेश करता है।
  • यह एक दाब बनाता है जो जल को ऊपर की ओर धकेलता है।

(🔸 नोट: ऊँचे पेड़ों में केवल यह दाब जल पहुँचाने के लिए पर्याप्त नहीं है, वहां दूसरी युक्ति काम आती है)

🔹 B. वाष्पोत्सर्जन कर्षण – “खींचने वाला बल” :-

यह प्रक्रिया मुख्य रूप से दिन के समय प्रभावी होती है।

  • पत्तियों के रंध्रों से जल का वाष्पन होता है।
  • इससे एक चूषण बल उत्पन्न होता है।
  • यह चूषण बल जड़ों में उपस्थित जाइलम कोशिकाओं से जल को ऊपर की ओर खींचता है।
  • यही जाइलम में जल की ऊपर की गति का मुख्य कारण है।

वाष्पोत्सर्जन :-

पादप के वायवीय भागों द्वारा वाष्प के रूप में जल की हानि वाष्पोत्सर्जन कहलाती है।

🔹 वाष्पोत्सर्जन के लाभ :-

  • जल का अवशोषण: जल के अवशोषण एवं जड़ से पत्तियों तक जल तथा उसमें विलेय खनिज लवणों के उपरिमुखी गति में सहायक है।
  • ताप नियमन: यह पौधे के तापमान को नियंत्रित करने में सहायक है।

फ्लोएम द्वारा पादपों में भोजन का परिवहन :-

🔹 स्थानांतरण :-

पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने भोजन को पादप के अन्य भागों तक पहुँचाने की प्रक्रिया को स्थानांतरण कहते हैं। यह प्रक्रिया संवहन ऊतक फ्लोएम द्वारा संपन्न होती है।

🔹 फ्लोएम क्या वहन करता है?

  • फ्लोएम प्रकाश संश्लेषण के उत्पादों एवं अमीनो अम्ल तथा अन्य घुलनशील पदार्थों का परिवहन करता है।
  • ये पदार्थ विशेष रूप से जड़ के भंडारण अंगों, फलों, बीजों तथा वृद्धि वाले अंगों में ले जाए जाते हैं।

🔹 फ्लोएम में परिवहन की दिशा (स्थानांतरण की दिशा) :-

  • फ्लोएम में पदार्थों का वहन उपरिमुखी (ऊपर की ओर) तथा अधोमुखी (नीचे की ओर) दोनों दिशाओं में होता है।
  • यह प्रक्रिया चालनी नलिकाओं तथा उनसे जुड़ी साथी कोशिकाओं की सहायता से होती है।

🔹 फ्लोएम परिवहन की विशेषता :-

  • जाइलम का परिवहन भौतिक बलों पर आधारित होता है।
  • जबकि फ्लोएम द्वारा स्थानांतरण ऊर्जा (ATP) का उपयोग करके होता है।

फ्लोएम परिवहन की क्रियाविधि :-

  • सुक्रोज सरीखे पदार्थ फ्लोएम ऊतक में ए.टी.पी. से प्राप्त ऊर्जा से ही स्थानांतरित होते हैं।
  • यह ऊतक का परासरण दाब बढ़ा देता है, जिससे जल इसमें प्रवेश कर जाता है।
  • यह दाब पदार्थों को फ्लोएम से उस ऊतक तक ले जाता है, जहाँ दाब कम होता है।
  • यह फ्लोएम को पादप की आवश्यकता के अनुसार पदार्थों का स्थानांतरण कराता है।

उत्सर्जन :-

शरीर में होने वाली उपापचयी क्रियाओं से हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं। इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। मुख्य अपशिष्ट: कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), नाइट्रोजन युक्त पदार्थ (यूरिया, यूरिक अम्ल)

विभिन्न जीवों में उत्सर्जन :-

  • एककोशिक जीव: अपशिष्ट पदार्थों को शरीर की सतह से सीधे जल में विसरित कर देते हैं।
  • बहुकोशिक जीव: उत्सर्जन के लिए विशिष्ट अंगों का उपयोग करते हैं।

मानव में उत्सर्जन :-

🔹 मानव उत्सर्जन तंत्र :-

मानव उत्सर्जन तंत्र में निम्न अंग होते हैं:

  • एक जोड़ा वृक्क: उदर में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं।
  • एक जोड़ा मूत्रवाहिनी: वृक्क से मूत्र को मूत्राशय तक लाती हैं।
  • मूत्राशय: जहाँ मूत्र जमा होता है।
  • मूत्रमार्ग: जिससे मूत्र शरीर से बाहर निकलता है।

🔹 मूत्र का प्रवाह :-

वृक्क (मूत्र निर्माण) → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय (भंडारण) → मूत्रमार्ग → बाहर निष्कासन

वृक्क में मूत्र बनने के बाद मूत्रवाहिनी में होता हुआ मूत्राशय में आ जाता है तथा यहाँ तब तक एकत्र रहता है, जब तक मूत्रमार्ग से बाहर निकल नहीं जाता है।

🔹 मूत्र बनने का उद्देश्य :-

मूत्र बनने का उद्देश्य रुधिर में से वर्ज्य पदार्थों को छानकर बाहर करना है।

वृक्क की संरचनात्मक इकाई – ( वृक्काणु या नेफ्रॉन ) :-

वृक्काणु वृक्क की आधारी निस्यंदन इकाई है। प्रत्येक वृक्क में असंख्य वृक्काणु पाए जाते हैं, जो आपस में निकटता से पैक रहते हैं।

पादप में उत्सर्जन :-

पादपों में उत्सर्जन के लिए कोई विशेष अंग नहीं होते। पादप अपशिष्ट पदार्थों से छुटकारा पाने के लिए विविध विधियों का उपयोग करते हैं।

🔹 पादपों में उत्सर्जन की विधियाँ :-

  • कोशिका रिक्तिका में संचयन: अपशिष्ट पदार्थों को कोशिका की रिक्तिकाओं में संचित कर लिया जाता है।
  • गोंद, रेजिन आदि के रूप में निष्कासन: कुछ अपशिष्ट पदार्थ गोंद, रेजिन, लेटेक्स आदि के रूप में बाहर निकाल दिए जाते हैं।
  • गिरती पत्तियों द्वारा निष्कासन: पत्तियों में संचित अपशिष्ट पदार्थ पत्ती झड़ने पर बाहर निकल जाते हैं।
  • मृदा में उत्सर्जन: कुछ अपशिष्ट पदार्थ जड़ों द्वारा आस-पास की मृदा में उत्सर्जित कर दिए जाते हैं।
  • गैसीय अपशिष्टों का निष्कासन: ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें रंध्रों और लेन्टिसेल्स द्वारा बाहर निकलती हैं।
यह भी देखें ✯ कक्षा 10
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