कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 7 नोट्स: जीव जनन कैसे करते हैं class 10 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 10 |
| Subject | Science |
| Chapter | Chapter 7 |
| Chapter Name | जीव जनन कैसे करते हैं नोट्स |
| Medium | Hindi |
क्या आप class 10 biology chapter 7 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से jiv janan kaise karte hai notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम जानवरों और पौधों में जनन, अलैंगिक जनन, लैंगिक जनन आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
जनन :-
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने ही समान नए जीव उत्पन्न करते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक होती है।
डी.एन.ए. क्या है?
🔸 पूरा नाम :- डी.एन.ए.-DNA (डि. आक्सीराइबोन्यूक्लीक अम्ल)
डी.एन.ए. (DNA) कोशिका के केंद्रक में पाया जाता है। डी.एन.ए. में आनुवंशिक गुणों की पूरी जानकारी होती है यही जानकारी माता-पिता से संतान में जाती है।
डी.एन.ए. और प्रोटीन संश्लेषण द्वारा विविधता :-
कोशिका के केंद्रक के डी.एन.ए. में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है। इस संदेश के भिन्न होने की अवस्था में बनने वाली प्रोटीन भी भिन्न होगी। विभिन्न प्रोटीन के कारण अंततः शारीरिक अभिकल्प में भी विविधता होगी।
🔸 सरल शब्दों में :- डी.एन.ए. में प्रोटीन निर्माण की जानकारी होती है। यदि डी.एन.ए. में उपस्थित संदेशों में परिवर्तन हो जाए, तो बनने वाली प्रोटीन भी भिन्न प्रकार की होगी, जिससे जीवों में विविधता उत्पन्न होती है।
जनन की मूल घटना – डी.एन.ए. की प्रतिकृति :-
जनन की मूल घटना डी.एन.ए. (DNA) की प्रतिकृति बनना है। डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाने के लिए कोशिका विभिन्न रासायनिक क्रियाओं का उपयोग करती है।
जब जनन कोशिका में डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनती है, तब केवल डी.एन.ए. का बनना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि नई कोशिका के निर्माण के लिए कोशिका द्रव्य, झिल्ली और अन्य संरचनाओं का बनना भी आवश्यक होता है।
इसलिए डी.एन.ए. की प्रतिकृति के साथ-साथ कोशिका विभाजन होता है, जिससे दो नई कोशिकाएँ बनती हैं।
क्या दोनों नई कोशिकाएँ एकदम समान होती हैं?
नहीं, हमेशा पूरी तरह समान नहीं।
🔸 विभिन्नता का कारण :- DNA की प्रतिकृति पूरी तरह सटीक नहीं होती उसमें छोटी-छोटी त्रुटियाँ हो सकती हैं यही कारण है कि संतति पूरी तरह माता-पिता जैसी नहीं होती।
🔸 विभिन्नता के परिणाम :- कुछ विभिन्नताएँ लाभदायक होती हैं कुछ हानिकारक होती हैं बहुत अधिक बदलाव होने पर कोशिका नष्ट भी हो सकती है।
विभिन्नता का महत्व :-
विभिन्नताएँ स्पीशीज की उत्तरजीविता बनाए रखने में उपयोगी हैं।
🔸 उदाहरण: मान लो ठंडे पानी के जीवाणुओं की आबादी है। अगर ग्लोबल वार्मिंग से पानी गर्म हो जाता है, तो अधिकतर जीवाणु मर जाएँगे। लेकिन कुछ जीवाणु जिनमें गर्मी सहने की क्षमता (विविधता) होगी, वे जीवित रहेंगे और बढ़ेंगे।
अतः इससे स्पष्ट होता है कि विभिन्नता जीवों को बचाती है।
जनन के प्रकार :-
जनन को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है —
🔸 अलैंगिक जनन :- अलैंगिक जनन वह विधि है जिसमें केवल एक ही जनक भाग लेता है। इसमें नर और मादा युग्मकों का निर्माण नहीं होता। उदाहरण: अमीबा, हाइड्रा, यीस्ट आदि।
🔸 लैंगिक जनन :- लैंगिक जनन वह विधि है जिसमें नर और मादा दोनों भाग लेते हैं। इसमें नर व मादा युग्मकों का संलयन होता है, जिससे संतान उत्पन्न होती है। उदाहरण: मनुष्य, मेंढक, पौधे आदि।
अलैंगिक जनन एवं लैंगिक जनन में अंतर :-
| अलैंगिक जनन | लैंगिक प्रजनन |
|---|---|
| इसमें केवल एक ही जीव भाग लेता है। | इसमें नर और मादा दोनों भाग लेते हैं। |
| युग्मकों का निर्माण नहीं होता। | नर व मादा युग्मकों का निर्माण होता है। |
| उत्पन्न संतान माता के समान (समरूप) होती है। | संतान माता-पिता से मिलती-जुलती होती है पर समान नहीं होती। |
| यह तेज़ गति से होता है। | यह अपेक्षाकृत धीमी प्रक्रिया है। |
| इसमें विविधता नहीं होती। | इसमें आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। |
| यह प्रायः निम्न वर्ग के जीवों में पाया जाता है। | यह उच्च वर्ग के जीवों में पाया जाता है। |
| सतत् गुणन के लिए उपयोगी है। | विकास और अनुकूलन में सहायक है। |
एककोशिक जीवों में जनन :-
एककोशिक जीवों में जनन कोशिका विभाजन द्वारा होता है। एक ही कोशिका विभाजित होकर नया जीव बनाती है। इसे अलैंगिक जनन कहते हैं।
अलैंगिक जनन के प्रकार :-
एकल जीवों में प्रजनन की विधि :-
- विखंडन
- खंडन
- पुनरुद्धवन (पुनर्जनन)
- मुकुलन
- कायिक प्रवर्धन
- बीजाणु समासंघ
(i) विखंडन :-
विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें एक कोशिका टूटकर नई कोशिकाएँ बनाती है। यह दो प्रकार का होता है:
- (A) द्विखंडन :- इसमें एक कोशिका टूटकर दो बराबर भागों में बँट जाती है। उदाहरण: अमीबा
- (B) बहुखंडन :- इसमें एक कोशिका एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। उदाहरण: प्लैज्मोडियम
(ii) खंडन :-
खंडन वह अलैंगिक जनन की विधि है जिसमें सरल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीव अपने शरीर के छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाते हैं। इनमें से प्रत्येक टुकड़ा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर एक नया जीव बना लेता है।
उदाहरण: स्पाइरोगाइरा
(iii) पुनरुद्भवन :-
पुनरुद्भवन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी जीव का शरीर यदि किसी कारणवश टुकड़ों में टूट जाता है, तो प्रत्येक टुकड़ा विकसित होकर एक नया पूर्ण जीव बना लेता है।
🔸 सरल शब्दों मे :- कुछ जीवों में यह क्षमता होती है कि शरीर के कटे हुए भाग से नया जीव बन जाए। इसे पुनरुद्भवन कहते हैं।
उदाहरण: प्लैनारिया, हाइड्रा
पुनरुद्भवन की प्रक्रिया :-
- विशिष्ट कोशिकाएँ इस कार्य को करती हैं।
- ये कोशिकाएँ विभाजित होकर अनेक कोशिकाएँ बनाती हैं।
- फिर ये कोशिकाएँ विभिन्न प्रकार के ऊतकों और अंगों में व्यवस्थित रूप से विकसित होती हैं।
- यह सब एक व्यवस्थित क्रम में होता है जिसे परिवर्धन कहते हैं और अंत में पूर्ण जीव बन जाता है।
(iv) मुकुलन :-
मुकुलन वह अलैंगिक जनन की विधि है जिसमें जीव के शरीर पर एक छोटा उभार बनता है, जिसे मुकुल कहते हैं। यह मुकुल धीरे-धीरे बढ़कर पूर्ण विकसित जीव बन जाता है और अंत में मूल जनक से अलग हो जाता है।
उदाहरण: हाइड्रा, यीस्ट (खमीर)
(v) कायिक प्रवर्धन :-
कुछ पौधों में नए पौधे का निर्माण उसके कायिक भाग जैसे जड़, तना पत्तियाँ आदि से होता है, इसे कायिक प्रवर्धन कहते हैं।
🔸 सरल शब्दों में :- पौधों के कायिक भागों (जड़, तना, पत्तियाँ) से नए पौधे उत्पन्न होने की क्रिया को कायिक प्रवर्धन कहते हैं।
कृषि में कायिक प्रवर्धन का महत्व :-
परतन, कलम अथवा रोपण जैसी कायिक प्रवर्धन की तकनीक का उपयोग कृषि में भी किया जाता है। गन्ना, गुलाब अथवा अंगूर इसके कुछ उदाहरण हैं।
कायिक प्रवर्धन के लाभ :-
- नए पौधे शीघ्र विकसित होते हैं।
- फूल और फल जल्दी लगते हैं।
- नए पौधे जनक पौधे जैसे ही होते हैं।
- बीज रहित पौधों (केला, संतरा) के लिए उपयोगी है।
- अच्छे गुणों वाले पौधों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
(vi) बीजाणु समासंघ :-
बीजाणु समासंघ अलैंगिक जनन की वह विधि है जिसमें कुछ जीवों के तंतुओं के सिरे पर बीजाणु धानियाँ बनती हैं। इन धानियों के अंदर अनेक सूक्ष्म बीजाणु पाए जाते हैं।
बीजाणु मोटी भित्ति से घिरे होते हैं, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं। जब अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं, तो ये बीजाणु अंकुरित होकर नए जीव में विकसित हो जाते हैं।
उदाहरण: राइजोपस
ऊतक संवर्धन :-
प्रयोगशाला में पौधे के ऊतकों या कोशिकाओं से नए पौधे उगाने की तकनीक को ऊतक संवर्धन कहते हैं।
🔸 सरल शब्दों में :- यह एक आधुनिक तकनीक है जिसमें पौधे के छोटे ऊतक या कोशिकाओं से प्रयोगशाला में नए पौधे उगाए जाते हैं।
ऊतक संवर्धन की प्रक्रिया :-
- पौधे के शीर्ष के वर्धमान भाग से कोशिकाएँ ली जाती हैं।
- इन कोशिकाओं को कृत्रिम पोषक माध्यम में रखा जाता है।
- जिससे कोशिकाएँ विभाजित होकर अनेक कोशिकाओं का छोटा समूह बनाती हैं, जिसे कैलस कहते हैं।
- कैलस को वृद्धि एवं विभेदन के हार्मोन युक्त एक अन्य माध्यम में स्थानांतरित करते हैं।
- पौधे को फिर मिट्टी में रोप देते हैं, जिससे कि वे वृद्धि कर विकसित पौधे बन जाते हैं।
लैंगिक जनन :-
जनन की वह विधि जिसमें नई संतति उत्पन्न करने के लिए दो एकल जीवों (नर और मादा) की भागीदारी आवश्यक होती है, लैंगिक जनन कहलाती है।
पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन :-
पुष्पी पौधों (आवृतबीजी) में जनन पुष्प के माध्यम से होता है। पुष्प में उपस्थित जनन अंगों द्वारा लैंगिक जनन संपन्न होता है।
🔸 पुष्प के मुख्य भाग :- एक फूल के मुख्य भाग- बाह्य दल, पंखुडो, स्त्रीकेसर एवं पुंकेसर होते हैं।
फूलों के प्रकार :-
🔸 एकलिंगी पुष्प :- जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्रीकेसर में से कोई एक जननांग उपस्थित होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं। उदहारण: पपीता, तरबूज।
🔸 उभयलिंगी पुष्प :- जब पुष्प में पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर दोनों उपस्थित होते हैं तो उन्हें उभयलिंगी पुष्प कहते हैं। उदहारण: गुड़हल, सरसों।
नर जननांग – पुंकेसर :-
पुंकेसर नर जननांग है, जो परागकण बनाते हैं। परागकण सामान्यतः पीले हो सकते हैं।
मादा जननांग – स्त्रीकेसर :-
स्त्रीकेसर पुष्प के केंद्र में अवस्थित होता है तथा यह पुष्प का मादा जननांग है। यह तीन भागों से बना होता है। आधार पर उभरा-फूला भाग अंडाशय है, मध्य में लंबा भाग वर्तिका है तथा शीर्ष भाग वर्तिकाग्र है, जो प्रायः चिपचिपा होता है।
परागण :-
पुष्पी पौधों में जनन प्रक्रम में परागकण परागकोश से स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरित होते हैं, जिसे परागण कहते हैं। इसका अनुगमन निषेचन द्वारा होता है।
🔹 परागण के प्रकार :-
🔸 (i) स्वपरागण :- परागकणों का यह स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है तो यह स्वपरागण कहलाता है।
🔸 (ii) परपरागण :- एक पुष्प के परागकण दूसरे पुष्प पर स्थानांतरित होते हैं, तो उसे परपरागण कहते हैं।
🔹 परागण के वाहक :-
एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक परागकणों का यह स्थानांतरण वायु, जल अथवा प्राणी जैसे वाहक द्वारा संपन्न होता है।
निषेचन :-
निषेचन वह प्रक्रिया है जिसमें नर युग्मक और मादा युग्मक आपस में मिलकर युग्मनज बनाते हैं।
पुष्पीय पौधों में निषेचन :-
पुष्पीय पौधों में निषेचन परागण के बाद होता है, जब परागकण से निकला नर युग्मक अंडाशय में स्थित अंडकोशिका से संलयित होता है।
🔹 निषेचन के बाद परिवर्तन :-
निषेचन के पश्चात, युग्मनज में अनेक विभाजन होते हैं तथा बीजांड में भ्रूण विकसित होता है। बीजांड से एक कठोर आवरण विकसित होता है तथा यह बीज में परिवर्तित हो जाता है। अंडाशय तीव्रता से वृद्धि करता है तथा परिपक्व होकर फल बनाता है। इस अंतराल में बाह्यदल, पंखुड़ी, पुंकेसर, वर्तिका एवं वर्तिकाग्र प्रायः मुरझाकर गिर जाते हैं।
अंकुरण :-
बीज में भावी पौधा अर्थात् भ्रूण उपस्थित होता है। जब बीज को उपयुक्त परिस्थितियाँ जैसे जल, वायु और तापमान प्राप्त होते हैं, तब भ्रूण विकसित होकर नए पौधे में बदल जाता है। इस प्रक्रिया को अंकुरण कहते हैं।
यौवनारंभ :-
वह अवस्था या आयु जब जनन ऊतक परिपक्व होने लगते हैं और व्यक्ति में जनन की क्षमता विकसित होने लगती है, उसे यौवनारंभ कहते हैं।
यौवनारंभ के समय होने वाले परिवर्तन :-
इस दौरान शरीर में कई बदलाव आते हैं। इन्हें हम निम्न भागों में बाँट सकते हैं:
🔹 (A) सामान्य परिवर्तन :- (जो लड़के और लड़कियों दोनों में होते हैं)
- काँख तथा जाँघों के बीच जननांग क्षेत्र में बाल उगने लगते हैं।
- त्वचा तैलीय हो जाती है और चेहरे पर मुँहासे (पिम्पल्स) निकलने लगते हैं।
- शरीर के विभिन्न अंगों का आकार बढ़ने लगता है।
🔹 (B) लड़कियों में होने वाले विशेष परिवर्तन :-
- स्तनों का आकार बढ़ने लगता है।
- लड़कियों में स्तन के आकार में वृद्धि होने लगती है।
- स्तनाग्र की त्वचा का रंग भी गहरा होने लगता है।
- इस समय लड़कियों में रजोधर्म होने लगता है।
🔹 (C) लड़कों में होने वाले विशेष परिवर्तन :-
- लड़कों के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ निकल आती है।
- उनकी आवाज़ फटने लगती है।
- साथ ही दिवास्वप्न अथवा रात्रि में शिश्न भी अक्सर विवर्धन के कारण ऊर्ध्व हो जाता है।
यह सब परिवर्तन क्यों होते हैं? (हार्मोन का महत्व)
यौवनारंभ के समय शरीर में कुछ विशेष हार्मोन स्रावित होने लगते हैं, जिनके कारण शारीरिक और मानसिक परिवर्तन दिखाई देते हैं।
- लड़कों में: टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित होता है।
- लड़कियों में: एस्ट्रोजन हार्मोन स्रावित होता है।
नर जनन तंत्र :-
जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले अंग, संयुक्त रूप से, नर जनन तंत्र बनाते हैं।
मानव में नर जनन तंत्र में वृषण, शुक्राणुवाहिनी, शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि, मूत्र मार्ग तथा शिश्न होते हैं।
नर जनन तंत्र के मुख्य भाग :-
🔹 वृषण :-
नर जनन-कोशिका अथवा शुक्राणु का निर्माण वृषण में होता है। यह उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं। वृषण शरीर के बाहर होते हैं क्योंकि शुक्राणु बनने के लिए शरीर से कम तापमान की आवश्यकता होती है।
- कार्य:
- नर युग्मक (शुक्राणु) का निर्माण करना।
- टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्राव करना।
🔹 शुक्रवाहिका :-
यह एक नली है जो उत्पादित शुक्राणुओं को वृषण से आगे ले जाती है। ये शुक्रवाहिकाएँ मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़कर एक संयुक्त नली बनाती है।
🔹 मूत्रमार्ग :-
मूत्रमार्ग शुक्राणुओं एवं मूत्र दोनों के प्रवाह के उभय मार्ग है।
🔹 सहायक ग्रंथियाँ :-
प्रोस्ट्रेट तथा शुक्राशय अपने स्राव शुक्रवाहिका में डालते हैं, जिससे शुक्राणु एक तरल माध्यम में आ जाते हैं। इसके कारण इनका स्थानांतरण सरलता से होता है साथ ही यह स्राव उन्हें पोषण भी प्रदान करता है।
🔹 शुक्राणु की संरचना :-
शुक्राणु सूक्ष्म सरंचनाएँ हैं, जिसमें मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ होते हैं तथा एक लंबी पूँछ होती है, जो उन्हें मादा जनन-कोशिका की ओर तैरने में सहायता करती है।
मादा जनन तंत्र :-
मानव के मादा जनन तंत्र में अंडाशय, अंडवाहिका, गर्भाशय तथा योनि पाए जाते हैं।
🔹 (i) अंडाशय :-
- मादा जनन-कोशिकाओं अथवा अंड-कोशिका का निर्माण अंडाशय में होता है।
- लड़की के जन्म के समय ही अंडाशय में हज़ारों अपरिपक्व अंड होते हैं।
- यौवनारंभ में इनमें से कुछ परिपक्व होने लगते हैं।
- दो में से एक अंडाशय द्वारा प्रत्येक माह एक अंड परिपक्व होता है।
- अंडाशय एस्ट्रोजन व प्रोजैस्ट्रोन हॉर्मोन भी उत्पन्न करता है।
🔹 (ii) अंडवाहिका :-
- परिपक्व अंड अंडाशय से निकलकर अंडवाहिका में आता है।
- अंड कोशिका व शुक्राणु का निषेचन यहाँ पर होता है।
- यह अंड को गर्भाशय तक पहुँचाती है।
🔹 (iii) गर्भाशय :-
- यह एक लचीली थैली जैसी संरचना है जहाँ भ्रूण (शिशु) का विकास होता है।
- यह ग्रीवा के द्वारा योनि में खुलता है।
निषेचन से जन्म तक की प्रकिया :-
🔸 निषेचन :- मैथुन के समय शुक्राणु योनि मार्ग में स्थापित होते हैं, जहाँ से ऊपर की ओर यात्रा करके वे अंडवाहिका तक पहुँच जाते हैं, जहाँ अंडकोशिका से मिल सकते हैं।
🔸 रोपण :- निषेचित अंडा विभाजित होकर कोशिकाओं की गेंद जैसी संरचना या भ्रूण बनाता है। भ्रूण गर्भाशय में स्थापित हो जाता है, जहाँ यह लगातार विभाजित होकर वृद्धि करता है तथा अंगों का विकास करता है।
🔸 गर्भकाल :- भ्रूण के पूर्ण विकास में लगभग 9 महीने (280 दिन) लगते हैं। इस समय भ्रूण को पोषण माँ के रक्त से नाल के माध्यम से मिलता है।
🔸 जन्म :- जब भ्रूण पूरी तरह विकसित हो जाता है, तब गर्भाशय संकुचन के कारण शिशु का जन्म होता है।
प्लेसेंटा :-
भ्रूण को माँ के रुधिर से ही पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होती है जिसे प्लैसेंटा कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा संरचना है, जो गर्भाशय की भित्ति में धँसी होती है।
इसमें भ्रूण की ओर के ऊतक में प्रवर्ध होते हैं। माँ के ऊतकों में रक्तस्थान होते हैं, जो प्रवर्ध को आच्छादित करते हैं।
🔸 इनके माध्यम से —
- माँ के रक्त से ग्लूकोज, ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्व भ्रूण तक पहुँचते हैं।
- भ्रूण द्वारा बने अपशिष्ट पदार्थ माँ के रक्त में भेज दिए जाते हैं।
क्या होता है जब अंड का निषेचन नहीं होता?
यदि अंडकोशिका का निषेचन नहीं होता है, तो वह लगभग 24 घंटे तक ही जीवित रहती है। अंडाशय प्रत्येक माह एक अंडा मुक्त करता है, इसलिए गर्भाशय हर महीने निषेचित अंडे के लिए तैयार होता है।
🔸 इस तैयारी के दौरान:
- गर्भाशय की भीतरी परत मोटी, मुलायम और स्पंजी हो जाती है
- यह परत भ्रूण को पोषण देने के लिए बनती है
🔸 लेकिन जब निषेचन नहीं होता, तो:
- इस परत की आवश्यकता नहीं रहती
- यह परत टूटकर
- रक्त और म्यूकस के रूप में योनि मार्ग से बाहर निकल जाती है
- इसी प्रक्रिया को रजोधर्म या मासिक धर्म कहते हैं।
जनन स्वास्थ्य :-
जनन स्वास्थ्य का अर्थ है कि कोई व्यक्ति जनन से संबंधित सभी पहलुओं में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और व्यवहारिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हो।
यौन क्रियाओं से होने वाले रोग (STDs) :-
असुरक्षित यौन संबंधों के कारण कई रोग एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:
- जीवाणु जनित रोग :-
- गोनोरिया
- सिफलिस
- विषाणु जनित रोग :-
- एच.आई.वी./एड्स
- जननांग मस्से
🔹 बचाव :-
- कंडोम का प्रयोग
- एक ही साथी से संबंध
- जागरूकता एवं स्वच्छता
गर्भरोधन :-
गर्भरोधन वह विधि है जिसके द्वारा अनचाहे गर्भधारण को रोका जाता है।
गर्भनिरोध के तरीके :-
- (i) यांत्रिक विधियाँ :-
- कंडोम
- कॉपर-T
- ➡ शुक्राणु को अंडाणु तक पहुँचने से रोकती हैं
- (ii) हार्मोनल विधियाँ :-
- गर्भनिरोधक गोलियाँ
- अंडोत्सर्जन को रोकती हैं
- ⚠ लेकिन इनके दुष्प्रभाव हो सकते हैं
- (iii) शल्यक्रिया :-
- पुरुष → नसबंदी
- महिला → ट्यूबेक्टॉमी
- ➡ स्थायी गर्भनिरोधक उपाय
भ्रूण हत्या :-
- भ्रूण हत्या वह अमानवीय कृत्य है जिसमें मादा भ्रूण को गर्भाशय में ही नष्ट कर दिया जाता है।
- यह समाज के लिए एक गंभीर समस्या है।
- एक स्वस्थ समाज के लिए संतुलित लिंग अनुपात अत्यंत आवश्यक होता है।
- यदि लड़कियों की संख्या घटती जाएगी, तो भविष्य में सामाजिक असंतुलन उत्पन्न होगा।
🔹 इस समस्या को रोकने के लिए —
- लोगों में जागरूकता फैलाना आवश्यक है
- भ्रूण लिंग निर्धारण जैसी अवैध गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए
- कानूनों का सख्ती से पालन करना चाहिए
