Class 10 Science chapter 9 notes in hindi || प्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन notes

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कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 9 नोट्स: प्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन class 10 notes

TextbookNcert
ClassClass 10
SubjectScience
ChapterChapter 9
Chapter Nameप्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन नोट्स
MediumHindi

क्या आप Class 10 Science chapter 9 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से prakash ka pravartan tatha apvartan class 10 notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम गोलीय दर्पण, वक्रता केंद्र, मुख्य अक्ष, मुख्य फोकस, दर्पण सूत्र, अपवर्तन के नियम, अपवर्तनांक, गोलाकार लेंस द्वारा प्रकाश का अपवर्तन, गोलाकार लेंस द्वारा बनाई गई छवि, लेंस सूत्र आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

हम वस्तुओं को कैसे देखते हैं?

हम अपने चारों ओर अनेक वस्तुएँ देखते हैं। अँधेरे कमरे में कुछ दिखाई नहीं देता, क्योंकि वहाँ प्रकाश नहीं होता। जब कमरे में प्रकाश होता है, तो वस्तुएँ दिखाई देने लगती हैं।

इसका कारण है — प्रकाश

जब प्रकाश किसी वस्तु पर गिरता है, तो वह वस्तु उस प्रकाश को परावर्तित करती है। जब यह परावर्तित प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचता है, तब हमें वह वस्तु दिखाई देती है।

प्रकाश :-

प्रकाश ऊर्जा का वह रूप है जो हमारी आँखों में संवेदना उत्पन्न करता है और हमें वस्तुओं को देखने में सहायता करता है।

प्रकाश से जुड़ी कुछ दैनिक जीवन की घटनाएँ :-

प्रकाश से जुड़ी कई रोचक और अद्भुत घटनाएँ हमारे चारों ओर देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए—

  • दर्पण द्वारा प्रतिबिंब का बनना
  • तारों का टिमटिमाना
  • इंद्रधनुष के सुंदर रंगों का दिखाई देना
  • किसी एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करने पर प्रकाश का मुड़ना

ये सभी घटनाएँ प्रकाश के विभिन्न गुणों के कारण होती हैं।

प्रकाश के गुण :-

  • प्रकाश सरल (सीधी) रेखाओं में गमन करता है।
  • प्रकाश एक विद्युत चुंबकीय तरंग है, इसलिए इसके संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
  • प्रकाश अपारदर्शी वस्तुओं की तीक्ष्ण छाया बनाता है।
  • प्रकाश की चाल निर्वात में सबसे अधिक होती है, जिसका मान लगभग 👉 3 × 10⁸ m/s होता है।
  • जब कोई प्रकाश किरण किसी सतह पर आपतित होती है, तो उसके साथ परावर्तन, अपवर्तन या अवशोषण हो सकता है।

प्रकाश किरण :-

प्रकाश जिस सीधी रेखा में चलता हुआ प्रतीत होता है, उस सरलरेखीय पथ को प्रकाश किरण कहते हैं।

पारदर्शी माध्यम :-

पारदर्शी माध्यम वे माध्यम होते हैं जिनमें से प्रकाश पूर्ण रूप से पार हो जाता है। इसी कारण हम पारदर्शी माध्यम के आर-पार स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। उदाहरण: काँच, साफ पानी, काँच की खिड़की

प्रकाश का विवर्तन :-

यदि प्रकाश के पथ में रखी अपारदर्शी वस्तु अत्यंत छोटी हो तो प्रकाश सरल रेखा में चलने की बजाय इसके किनारों पर मुड़ने की प्रवृत्ति दर्शाता है- इस प्रभाव को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।

🔸 सरल शब्दों में :- जब प्रकाश किसी बहुत छोटी अपारदर्शी वस्तु या संकीर्ण छिद्र के किनारों से मुड़ता है, तो इस प्रभाव को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।

प्रकाश का परावर्तन :-

जब प्रकाश किसी चिकनी और पॉलिश की हुई सतह (जैसे दर्पण) पर गिरता है, तो उसका अधिकांश भाग उसी माध्यम में वापस लौट आता है। प्रकाश के इस वापस लौटने की क्रिया को परावर्तन कहते हैं।

🔸 सरल शब्दों में :- जब प्रकाश किसी चमकदार सतह से टकराकर वापस लौट आता है, तो इसे प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।

प्रकाश के परावर्तन के नियम :-

परावर्तन के दो मुख्य नियम होते हैं:

🔸 नियम (i): आपतन कोण (∠i) हमेशा परावर्तन कोण (∠r) के बराबर होता है।

  • आपतन कोण = परावर्तन कोण
  • ∠i = ∠r

🔸 नियम (ii): आपतित किरण, दर्पण के आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण, सभी एक ही तल में होते हैं।

🔸 नोट: ये नियम सभी प्रकार के दर्पणों (समतल, गोलीय) के लिए लागू होते हैं।

प्रतिबिंब :-

प्रतिबिंब वह बिंदु या स्थान है जहाँ पर कम से कम दो परावर्तित किरणें वास्तव में मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं।

वास्तविक प्रतिबिंब :-

  • यह तब बनता है जब प्रकाश की किरणें वास्तव में परावर्तन के बाद मिलती हैं।
  • इसे पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है।
  • वास्तविक प्रतिबिंब उल्टा बनता है।

आभासी प्रतिबिंब :-

  • यह तब बनता है जब प्रकाश की किरणें मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
  • इसे पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  • आभासी प्रतिबिंब सीधा बनता है।

समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की विशेषताएँ :-

हम रोज़ सुबह आईने में अपना चेहरा देखते हैं। यह आईना एक समतल दर्पण होता है। समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • आभासी तथा सीधा: समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब आभासी और सीधा होता है, इसलिए इसे पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  • समान आकार: प्रतिबिंब का आकार वस्तु (बिंब) के आकार के बराबर होता है।
  • समान दूरी: वस्तु दर्पण के सामने जितनी दूरी पर रखी होती है, प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है।
  • पार्श्व परिवर्तन: प्रतिबिंब पार्श्व परिवर्तित होता है।

पार्श्व परिवर्तन :-

पार्श्व परिवर्तन इसमें वस्तु का दायाँ भाग प्रतिबिंब में बायाँ दिखाई देता है और बायाँ भाग दायाँ। उदाहरण के लिए— एम्बुलेंस पर शब्द उल्टे लिखे होते हैं।

गोलीय दर्पण :-

ऐसे दर्पण जिनका परावर्तक पृष्ठ गोलीय है, गोलीय दर्पण कहलाते हैं।

गोलीय दर्पण के प्रकार :-

🔸 अवतल दर्पण :- जिसका परावर्तक पृष्ठ अंदर की ओर अर्थात गोले के केंद्र की ओर वक्रित है, वह अवतल दर्पण कहलाता है।

🔸 उत्तल दर्पण :- वह गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित है, उत्तल दर्पण कहलाता है।

अवतल दर्पणों के उपयोग :-

  • टॉर्च, सर्चलाइट और वाहनों की हेडलाइट्स मे :- अवतल दर्पणों का उपयोग टॉर्च, सर्चलाइट तथा वाहनों के अग्रदीपों में प्रकाश का शक्तिशाली समानांतर किरण पुंज प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • शेविंग दर्पण के रूप में :- इन्हें शेविंग दर्पण के रूप में उपयोग किया जाता है, क्योंकि ये चेहरे का बड़ा और स्पष्ट प्रतिबिंब बनाते हैं।
  • दंत विशेषज्ञों द्वारा उपयोग :- दंत चिकित्सक अवतल दर्पणों का उपयोग मरीजों के दाँतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए करते हैं।
  • सौर भट्टियों में :- सौर भट्टियों में सूर्य के प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित करने के लिए बड़े अवतल दर्पणों का उपयोग किया जाता है।

उत्तल दर्पणों के उपयोग :-

  • उत्तल दर्पणों का उपयोग सामान्यतः वाहनों के पश्च-दृश्य (Rear view / Wing) दर्पणों के रूप में किया जाता है।
  • ये दर्पण वाहन के पार्श्व भाग में लगाए जाते हैं, जिनसे चालक पीछे चल रहे वाहनों को देख सकता है और सुरक्षित रूप से वाहन चला सकता है।
  • उत्तल दर्पण सदैव सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाते हैं, यद्यपि प्रतिबिंब का आकार छोटा होता है।
  • इन दर्पणों का दृष्टि-क्षेत्र अधिक होता है क्योंकि ये बाहर की ओर वक्रित होते हैं।
  • इसलिए समतल दर्पण की तुलना में उत्तल दर्पण चालक को अपने पीछे का अधिक बड़ा क्षेत्र देखने में सहायता करते हैं।

गोलीय दर्पण में सामान्यतः प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द :-

🔹 ध्रुव :-

गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के केंद्र को दर्पण का ध्रुव कहते हैं। यह दर्पण के पृष्ठ पर स्थित होता है। ध्रुव को प्रायः P अक्षर से निरूपित करते हैं।

🔹 वक्रता केंद्र :-

गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ एक गोले का भाग है। इस गोले का केंद्र गोलीय दर्पण का वक्रता केंद्र कहलाता है। यह अक्षर C से निरूपित किया जाता है।

🔸 ध्यान दें: यह दर्पण का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसके बाहर होता है।

  • अवतल दर्पण → वक्रता केंद्र दर्पण के सामने होता है।
  • उत्तल दर्पण → वक्रता केंद्र दर्पण के पीछे होता है।

🔹 वक्रता त्रिज्या :-

गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ जिस गोले का भाग है, उसकी त्रिज्या दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहलाती है। इसे अक्षर R से निरूपित किया जाता है।

🔹 मुख्य अक्ष :-

गोलीय दर्पण के ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) से होकर गुजरने वाली सीधी रेखा को मुख्य अक्ष कहते हैं। मुख्य अक्ष, ध्रुव पर दर्पण के अभिलंब होती है।

🔹 द्वारक :-

गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ सामान्यतः वृत्ताकार सीमा में होता है। इस वृत्ताकार सीमा के व्यास को दर्पण का द्वारक कहते हैं। इसे MN से दर्शाया गया है।

🔹 मुख्य फोकस (F) :-

मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरणें, गोलीय दर्पण से परावर्तन के बाद जिस बिंदु पर आकर वास्तव में मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, उस बिंदु को गोलीय दर्पण का मुख्य फोकस (F) कहते हैं।

🔹 अवतल दर्पण का मुख्य फोकस :-

अवतल दर्पण पर मुख्य अक्ष के समांतर कुछ किरणें आपतित हो रही हैं। परावर्तित किरणों का प्रेक्षण कीजिए। वे सभी दर्पण की मुख्य अक्ष के एक बिंदु पर मिल रही प्रतिच्छेदी हैं। यह बिंदु अवतल दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है।

🔹 उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस :-

उत्तल दर्पण पर जब मुख्य अक्ष के समांतर किरणें गिरती हैं, तो वे परावर्तन के बाद फैल जाती हैं। लेकिन ये परावर्तित किरणें मुख्य अक्ष के एक बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं। यह बिंदु उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है।

🔹 फोकस दूरी :-

गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा मुख्य फोकस के बीच की दूरी फोकस दूरी कहलाती है। इसे अक्षर f द्वारा निरूपित करते हैं।

यह भी देखें ✯ कक्षा 10

वक्रता त्रिज्या और फोकस दूरी का संबंध :-

छोटे द्वारक के गोलीय दर्पणों के लिए वक्रता त्रिज्या फोकस दूरी से दोगुनी होती है। हम इस संबंध को R = 2f द्वारा व्यक्त कर सकते हैं।

यह दर्शाता है कि किसी गोलीय दर्पण का मुख्य फोकस, उसके ध्रुव तथा वक्रता केंद्र को मिलाने वाली रेखा का मध्य बिंदु होता है।

गोलीय दर्पण के किरण-आरेख बनाने के नियम :-

🔸 नियम 1: मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरण अवतल दर्पण से परावर्तन के बाद मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरती है। उत्तल दर्पण में यह किरण मुख्य फोकस से आती हुई प्रतीत होती है।

🔸 नियम 2: जो किरण अवतल दर्पण के मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरती है, या उत्तल दर्पण के फोकस की ओर निर्देशित होती है, वह परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है।

🔸 नियम 3: जो किरण अवतल दर्पण के वक्रता केंद्र (C) से होकर गुजरती है, या उत्तल दर्पण के वक्रता केंद्र की ओर निर्देशित होती है, वह परावर्तन के बाद उसी मार्ग से वापस लौट जाती है।

🔸 नियम 4: जो किरण मुख्य अक्ष से तिर्यक दिशा में आकर दर्पण के ध्रुव (P) पर गिरती है वह तिर्यक दिशा में ही परावर्तित होती है। आपतित किरण और परावर्तित किरण मुख्य अक्ष के साथ समान कोण बनाती हैं। यह किरण परावर्तन के नियमों का पूर्ण पालन करती है।

नई कार्तीय चिह्न परिपाटी :-

गोलीय दर्पणों द्वारा प्रकाश के परावर्तन का अध्ययन करते समय हम एक निश्चित चिह्न परिपाटी का पालन करते हैं, जिसे नई कार्तीय चिह्न परिपाटी कहते हैं।

  • इस परिपाटी में—
    • दर्पण के ध्रुव (P) को मूल बिंदु (Origin) माना जाता है।
    • दर्पण के मुख्य अक्ष को निर्देशांक पद्धति का x-अक्ष (XX′) माना जाता है।

इस चिह्न परिपाटी के नियम निम्नलिखित हैं—

🔹 बिंब की स्थिति :-

बिंब सदैव दर्पण के बाईं ओर रखा जाता है, अर्थात् प्रकाश दर्पण पर बाईं ओर से आपतित होता है।

🔹 दूरियों का मापन :-

मुख्य अक्ष के समानांतर सभी दूरियाँ दर्पण के ध्रुव से मापी जाती हैं।

  • मूल बिंदु के दाईं ओर ( +x-अक्ष ) मापी गई दूरियाँ धनात्मक मानी जाती हैं, जबकि
  • मूल बिंदु के बाईं ओर ( –x-अक्ष ) मापी गई दूरियाँ ऋणात्मक मानी जाती हैं।

🔹 ऊँचाई का मापन :-

  • मुख्य अक्ष के ऊपर की ओर ( +y-अक्ष ) मापी गई दूरियाँ धनात्मक मानी जाती हैं।
  • मुख्य अक्ष के नीचे की ओर ( –y-अक्ष ) मापी गई दूरियाँ ऋणात्मक मानी जाती हैं।

दर्पण सूत्र :-

गोलीय दर्पण में बिंब (वस्तु), प्रतिबिंब और फोकस के बीच के संबंध को जिस सूत्र से दर्शाया जाता है, उसे दर्पण सूत्र कहते हैं।

🔸 महत्वपूर्ण दूरियाँ :-

  • बिंब दूरी (u) :- दर्पण के ध्रुव से बिंब की दूरी, बिंब दूरी (u) कहलाती है।
  • प्रतिबिंब दूरी (v) :- दर्पण के ध्रुव से प्रतिबिंब की दूरी, प्रतिबिंब दूरी (v) कहलाती है।
  • फोकस दूरी (f) :- ध्रुव से मुख्य फोकस की दूरी, फोकस दूरी (1) कहलाती है।

🔹 सूत्र :-

दर्पण सूत्र को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जाता है: 1/v + 1/v = 1/f

आवर्धन (m) :-

आवर्धन वह संख्या है जो बताती है कि प्रतिबिंब, बिंब (वस्तु) की तुलना में कितना गुना बड़ा या छोटा बना है।

प्रकाश का अपवर्तन :-

जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तिरछा होकर जाता है तो दूसरे माध्यम में इसके संचरण की दिशा परिवर्तित हो जाती है। इस परिघटना को प्रकाश-अपवर्तन कहते हैं।

अपवर्तन के दैनिक जीवन के उदाहरण और उनका कारण :-

  • पानी से भरे तालाब या टंकी की तली ऊपर उठी हुई दिखाई देती है।
    • ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पानी से वायु में आते समय प्रकाश की दिशा बदल जाती है।
  • काँच के स्लैब पर रखे अक्षर उठे हुए प्रतीत होते हैं।
    • यह भी प्रकाश के अपवर्तन के कारण होता है।
  • पानी में आंशिक रूप से डूबी पेंसिल मुड़ी हुई दिखाई देती है।
    • पेंसिल के पानी में डूबे भाग से आने वाली किरणें, पानी से वायु में आते समय मुड़ जाती हैं, जबकि ऊपर वाले भाग से आने वाली किरणें सीधी आती हैं। इसी कारण पेंसिल टेढ़ी दिखाई देती है।
  • काँच के बर्तन में रखा नींबू पार्श्व से देखने पर बड़ा दिखाई देता है।
    • इसका कारण भी प्रकाश का अपवर्तन ही है।

अपवर्तन के नियम :-

जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाता है, तो वह निम्नलिखित दो नियमों का पालन करता है:

🔸 नियम (i) :- आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा दोनों माध्यमों को पृथक् करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब सभी एक ही तल में होते हैं।

🔸 नियम (ii) :- प्रकाश के किसी निश्चित रंग तथा निश्चित माध्यमों के युग्म के लिए आपतन कोण की ज्या (sine i) तथा अपवर्तन कोण की ज्या (sine r) का अनुपात स्थिर होता है। इस नियम को स्नेल का अपवर्तन का नियम भी कहते हैं।

  • यहाँ i आपतन कोण है और r अपवर्तन कोण है।
  • यह कोण 0° < i < 90° के लिए सत्य है

अपवर्तनांक :-

दो माध्यमों के लिए, आपतन कोण की ज्या (sine i) तथा अपवर्तन कोण की ज्या (sine r) का अनुपात उस माध्यम का अपवर्तनांक कहलाता है।

निरपेक्ष अपवर्तनांक :-

किसी माध्यम का वह गुणांक है, जो उस माध्यम में प्रकाश की गति की तुलना में निर्वात में प्रकाश की गति को दर्शाता है। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा परिभाषित किया जाता है:

n= v/c

जहाँ, n निरपेक्ष अपवर्तनांक है, c निर्वात में प्रकाश की गति है, और v उस माध्यम में प्रकाश की गति है।

प्रकाशिक घनत्व :-

किसी माध्यम की प्रकाश को अपवर्तित करने की क्षमता को उसका प्रकाशिक घनत्व कहते हैं। प्रकाशिक घनत्व का अर्थ द्रव्यमान घनत्व से अलग होता है। इसका संबंध प्रकाश की चाल और अपवर्तनांक से होता है।

प्रकाशिक सघन और विरल माध्यम :-

🔸 प्रकाशिक सघन माध्यम :- दो माध्यमों की तुलना करते समय अधिक अपवर्तनांक वाला माध्यम दूसरे की अपेक्षा प्रकाशिक सघन होता है।

🔸 प्रकाशिक विरल माध्यम :- दो माध्यमों की तुलना करते समय कम अपवर्तनांक वाला माध्यम प्रकाशिक विरल माध्यम है।

लेंस :-

दो पृष्ठों से घिरा हुआ कोई पारदर्शी माध्यम, जिसका एक या दोनों पृष्ठ गोलीय हैं, लेंस कहलाता है।

लेंस के प्रकार :-

🔹 उत्तल लेंस :-

किसी लेंस में बाहर की ओर उभरे दो गोलीय पृष्ठ हो सकते हैं। ऐसे लेंस को द्वि-उत्तल लेंस या केवल उत्तल लेंस भी कहते हैं। यह किनारों की अपेक्षा बीच से मोटा होता है। उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को अभिसरित करता है। इसलिए इसे अभिसारी लेंस भी कहते हैं।

🔹 अवतल लेंस :-

इसमें दो अंदर की ओर वक्रित गोलीय पृष्ठ होते हैं। इसे द्वि-अवतल लेंस या अवतल लेंस कहते हैं। यह बीच से पतला और किनारों से मोटा होता है। अवतल लेंस प्रकाश किरणों को अपसरित करता है। इसलिए इसे अपसारी लेंस भी कहते हैं।

लेंस में सामान्यतः प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द :-

🔸 नोट: ये शब्द लेंस के बारे में चर्चा करते समय सामान्यतः प्रयोग में आते हैं।

🔹 वक्रता केंद्र :-

किसी लेंस में चाहे वह उत्तल हो या अवतल, दो गोलीय पृष्ठ होते हैं। इनमें से प्रत्येक पृष्ठ एक गोले का भाग होता है। इन गोलों के केंद्र को लेंस के वक्रता केंद्र कहते हैं। लेंस के वक्रता केंद्र को प्रायः C₁ और C₂ से दर्शाया जाता है।

🔹 मुख्य अक्ष :-

किसी लेंस के दोनों वक्रता केंद्रों से होकर जाने वाली काल्पनिक सीधी रेखा को लेंस की मुख्य अक्ष कहते हैं।

🔹 प्रकाशिक केंद्र :-

लेंस का केंद्रीय बिंदु इसका प्रकाशिक केंद्र कहलाता है। इसे प्रायः अक्षर O से निरूपित करते हैं। लेंस के प्रकाशिक केंद्र से गुजरने वाली प्रकाश किरण बिना किसी विचलन के निर्गत होती है।

🔹 द्वारक :-

किसी गोलीय लेंस की वृत्ताकार रूपरेखा का प्रभावी व्यास उसका द्वारक कहलाता है।

🔹 छोटे द्वारक का पतला लेंस :-

वे लेंस जिनका द्वारक उनकी वक्रता त्रिज्या की तुलना में बहुत छोटा होता है तथा जिनके दोनों वक्रता केंद्र प्रकाशिक केंद्र से समान दूरी पर होते हैं, छोटे द्वारक के पतले लेंस कहलाते हैं।

🔹 मुख्य फोकस :-

🔸 (a) उत्तल लेंस का मुख्य फोकस :- जब मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली अनेक प्रकाश किरणें उत्तल लेंस पर आपतित होती हैं, तो वे लेंस से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर एक बिंदु पर अभिसरित हो जाती हैं। मुख्य अक्ष पर स्थित यह बिंदु उत्तल लेंस का मुख्य फोकस कहलाता है।

🔸 (b) अवतल लेंस का मुख्य फोकस :- जब मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरणें अवतल लेंस पर आपतित होती हैं, तो वे लेंस से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के एक बिंदु से अपसरित होती हुई प्रतीत होती हैं। मुख्य अक्ष पर यह बिंदु अवतल लेंस का मुख्य फोकस कहलाता है।

🔹 फोकस दूरी :-

लेंस के मुख्य फोकस और प्रकाशिक केंद्र के बीच की दूरी को फोकस दूरी कहते हैं। इसे f अक्षर से निरूपित किया जाता है।

लेंस द्वारा प्रतिबिंब बनाने के नियमों :-

🔹 नियम 1: मुख्य अक्ष के समांतर किरण :-

  • उत्तल लेंस: मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरण, लेंस से अपवर्तन के बाद लेंस की दूसरी ओर स्थित मुख्य फोकस (F₂) से होकर गुजरती है।
  • अवतल लेंस: मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरण, अपवर्तन के बाद लेंस के उसी ओर स्थित मुख्य फोकस (F₁) से अपसरित होती हुई प्रतीत होती है।

🔹 नियम 2: मुख्य फोकस से गुजरने वाली किरण :-

  • उत्तल लेंस: यदि कोई प्रकाश किरण मुख्य फोकस (F₁) से होकर लेंस पर गिरती है, तो अपवर्तन के बाद वह मुख्य अक्ष के समांतर निकल जाती है।
  • अवतल लेंस: यदि कोई किरण मुख्य फोकस (F₂) की दिशा में निर्देशित होकर लेंस पर गिरती है, तो अपवर्तन के बाद वह मुख्य अक्ष के समांतर निकल जाती है।

🔹 नियम 3: प्रकाशिक केंद्र से गुजरने वाली किरण :-

दोनों लेंसों (उत्तल एवं अवतल) में लेंस के प्रकाशिक केंद्र (O) से होकर गुजरने वाली प्रकाश किरण अपवर्तन के बाद बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है।

गोलीय लेंसों के लिए चिह्न-परिपाटी :-

गोलीय लेंसों के लिए भी हम नई कार्तीय चिह्न-परिपाटी का प्रयोग करते हैं, जैसे दर्पणों के लिए किया गया था। इस परिपाटी में सभी दूरियाँ प्रकाशिक केंद्र (O) से मापी जाती हैं।

  • उत्तल लेंस के लिए फोकस दूरी धनात्मक होती है।
  • अवतल लेंस के लिए फोकस दूरी ऋणात्मक होती है।
  • बिंब दूरी (u) और प्रतिबिंब दूरी (v) के चिह्न ध्यानपूर्वक लेने चाहिए।

लेंस सूत्र :-

गोलीय लेंस के लिए बिंब दूरी (v), वस्तु दूरी (u) और फोकस दूरी (f) के बीच संबंध को लेंस सूत्र कहते हैं।

1/v + 1/v = 1/f

यह सूत्र उत्तल और अवतल दोनों लेंसों के लिए सभी स्थितियों में मान्य होता है, बशर्ते चिह्न-परिपाटी का सही पालन किया जाए।

आवर्धन :-

किसी लेंस द्वारा बने प्रतिबिंब का आकार वस्तु के आकार की तुलना में कितना बड़ा या छोटा है, इसे आवर्धन कहते हैं। आवर्धन को m से दर्शाते हैं।

लेंस की क्षमता :-

किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरण या अपसरण करने की मात्रा को उसकी क्षमता के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसे अक्षर P द्वारा निरूपित करते हैं।

किसी f फोकस दूरी के लेंस की क्षमता, P = 1/f

  • जहाँ
    • P = लेंस की क्षमता
    • f = लेंस की फोकस दूरी (मीटर में)

लेंस की क्षमता का SI मात्रक ‘डाइऑप्टर’ (Dioptre) है। इसे अक्षर D द्वारा दर्शाया जाता है।

यह भी देखें ✯ कक्षा 10
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