Class 12 history chapter 10 notes in hindi, उपनिवेशवाद और देहात notes

इस्तमरारी बंदोबस्त ( स्थाई बंदोबस्त ) के किसानों पर बुरे प्रभाव : –

🔹 किसानों को जमीदारों की दया पर छोड़ दिया गया ।

🔹 जमीदार किसानों का बेरहमी से शोषण करने लगे ।

🔹 किसानों का जमीन पर कोई हक नहीं रहा वह सिर्फ जमीन पर मजदूर बनकर रह गए।

🔹 लगान की दरें बहुत अधिक थी जिससे वह दिनों दिन गरीब होते चले गए ।

🔹 किसानों के पास अपनी जमीन बचाने के लिए कोई कानूनी अधिकार नहीं रह गया ।

🔹 समाज में आर्थिक और सामाजिक शोषण बढ़ता गया जिसके कारण किसान गरीब व जमीदार धनवान बनते चले गए ।

जमींदारों द्वारा समय पर राजस्व राशि जमा न करने के कारण ( in short ) : –

🔹 इस्तमरारी बंदोबस्त लागू होने के कुछ दशकों में ही जमींदार अपनी राजस्व राशि चुकाने में असफल रहे, जिसके कारण राजस्व की बकाया राशि बढ़ती चली गई। कम्पनी को राजस्व की राशि चुका पाने में जमींदारों की असफलता के प्रमुख कारण इस प्रकार थे : –

  • प्रारंभिक राजस्व माँगें बहुत ऊँची थीं।
  • ये ऊँची राजस्व माँगें 1790 के दशक से लागू की गईं जब कृषि उपज की कीमतें नीची थीं, जिससे रैयत (किसानों) के लिए, जमींदारों को उनकी देय राजस्व चुका पाना कठिन था ।
  • राजस्व की दर असमान थीं।
  • फसल अच्छी हो या खराब राजस्व का ठीक समय पर भुगतान अनिवार्य था ।
  • जमींदार की शक्ति को सीमित कर दिया गया।

राजस्व राशि के भुगतान में जमींदार क्यों चूक करते थे? जमींदारों द्वारा समय पर राजस्व राशि जमा न करने के कारण ( in detail ) : –

🔸 पहला : प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची थीं, क्योंकि ऐसा महसूस किया गया था कि यदि माँग को आने वाले संपूर्ण समय के लिए निर्धारित किया जा रहा है तो आगे चलकर कीमतों में बढ़ोतरी होने और खेती का विस्तार होने से आय में वृद्धि हो जाने पर भी कंपनी उस वृद्धि में अपने हिस्से का दावा कभी नहीं कर सकेगी।

🔸 दूसरा : यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई थी जब कृषि की उपज की कीमतें नीची थीं, जिससे रैयत (किसानों) के लिए, ज़मींदार को उनकी देय राशियाँ चुकाना मुश्किल था। जब ज़मींदार स्वयं किसानों से राजस्व इकट्ठा नहीं कर सकता था तो वह आगे कंपनी को अपनी निर्धारित राजस्व राशि कैसे अदा कर सकता था?

🔸 तीसरा : राजस्व असमान था, फ़सल अच्छी हो या ख़राब राजस्व का ठीक समय पर भुगतान ज़रूरी था । वस्तुतः सूर्यास्त विधि (कानून) के अनुसार, यदि निश्चित तारीख़ को सूर्य अस्त होने तक भुगतान नहीं आता था तो ज़मींदारी को नीलाम किया जा सकता था।

🔸 चौथा : इस्तमरारी बंदोबस्त ने प्रारंभ में ज़मींदार की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने क सीमित कर दिया था।

जमींदारों की शक्तियों पर नियंत्रण : –

🔹 कम्पनी जमींदारों को पूरा महत्व देती थी, किन्तु उनकी शक्तियों को सीमित करना चाहती थी। इसलिए

  • जमींदारों की सैन्य टुकड़ियाँ समाप्त कर दी गई।
  • सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया।
  • उनकी कचहरियों को कम्पनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया।
  • जमींदारों से स्थानीय न्याय और पुलिस की शक्ति छीन ली गई।

जमींदार अपनी जमीन को नीलामी से बचाने के लिए क्या करते थे ?

  • जमींदारी को घर की महिलाओं के नाम करवा देते थे।
  • अपने एजेंट के माध्यम से नीलामी में जोड़-तोड़ करते थे ।
  • अपने लठैतो के माध्यम से दूसरे व्यक्ति को बोली लगाने से रोकते थे ।
  • जान बूझकर ऊँची बोली लगाते तथा बाद में खरीदने से इनकार कर देते ।

सूर्यास्त विधि : –

🔹 इस विधि के अनुसार यदि जमींदार निश्चित तिथि में सूर्यास्त होने तक अपना राजस्व नहीं चुका पाते थे तो कर की कीमत दोगुनी कर दी जाती थी और कई स्थितियों में जमींदारों की संपत्ति को नीलम भी कर दिया जाता था ।

जोतदार : –

🔹 18वीं शताब्दी के अन्त में धनी किसानों के कुछ समूह गाँवों में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे, जिनको ‘जोतदार’ कहा जाता था जिसका विवरण फ्रांसिस बुकानन के सर्वे में पाते हैं।

जोतदारों का उदय : –

🔹 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े टुकड़ों पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया था। जमींदार का स्थानीय व्यापार तथा साहूकार के कारोबार पर भी त्रण था। उसकी जमीन का एक बड़ा भाग बटाईदारों (अधियारों या बरगादारों) द्वारा जोता जाता था। वे अपना हल स्वयं लाते थे, खेतों में मेहनत करते थे तथा जोतदारों को फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा देते थे।

जोतदारों की स्थिति : –

🔹 जमींदारों की अपेक्षा जोतदारों की शक्ति गाँवों में अधिक प्रभावी थी।

🔹 जोतदार गाँव की जमा (लगान) को बढ़ाने के लिए जमींदारों द्वारा किए जाने वाले प्रयासों का घोर प्रतिरोध करते थे।

🔹 जोतदार अपने पर निर्भर रैयतों को अपने पक्ष में एकजुट रखते थे तथा जान-बूझकर जमींदार को राजस्व के भुगतान में देरी कराते थे।

🔹 जब राजस्व का भुगतान न किए जाने पर जमींदार की जमींदारी को नीलाम किया जाता था तो प्रायः जोतदार ही उन जमीनों को खरीद लेते थे।

🔹 उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे।

🔹 कुछ स्थानों पर उन्हें ‘हवलदार’ तथा कुछ अन्य स्थानों पर वे ‘गाँटीदार’ या ‘मंडल’ कहलाते थे।

पाँचवीं रिपोर्ट : –

🔹 1813 में ब्रिटिश संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई थी । ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ एक ऐसी ही रिपोर्ट है जो एक प्रवर समिति द्वारा तैयार की गई थी। यह रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के स्वरूप पर ब्रिटिश संसद में गंभीर वाद-विवाद का आधार बनी

🔹 ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से उल्लिखित यह रिपोर्ट 1,002 पृष्ठों में थी। इसके 800 से अधिक पृष्ठ परिशिष्टों के थे जिनमें ज़मींदारों और रैयतों की अर्जियाँ, भिन्न-भिन्न जिलों के कलेक्टरों की रिपोर्टें, राजस्व विवरणियों से संबंधित सांख्यिकीय तालिकाएँ और अधिकारियों द्वारा बंगाल और मद्रास के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखित टिप्पणियाँ शामिल की गई थीं।

पहाड़ियाँ कौन थे?

🔹 पहाड़िया राजमहल पहाड़ी के जंगलों में रहते थे। झूम खेती करते थे। खाने के लिए महुआ इकट्ठा करते और बेचने के लिए रेशम के कीड़े पालते लकड़ियों से काठ कोयला बनाते इमली और आम के पेड़ आश्रय स्थल थे। पूरे प्रदेश को ये अपने निजी भूमि मानते ।

🔹 वे बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। उनके मुखिया लोग अपने समूह में एकता बनाए रखते थे, आपसी लड़ाई-झगड़े निपटा देते थे और अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ने पर अपनी जनजाति का नेतृत्व करते थे।

पहाड़ियाँ और स्थानीय कृषकों के बीच विवाद : –

🔹 जब स्थायी कृषि का विकास हुआ, कृषि क्षेत्र के विकास के लिए पहाड़ियाँ और स्थानीय कृषकों के बीच झगड़ा प्रारंभ हुआ, वे नियमित रूप से गाँव पर हमले बोलने लगे और ग्रामवासियों से अनाज और पशु छीन-झपट कर ले जाने लगे।

🔸पहाड़ियों द्वारा आक्रमण करने का कारण : – पहाड़ियों द्वारा ये आक्रमण ज़्यादातर अपने आपको विशेष रूप से अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे। साथ ही, ये हमले मैदानों में बसे हुए समुदायों पर अपनी ताक़त दिखलाने का भी एक तरीक़ा था। इसके अलावा, ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों के साथ अपने राजनीतिक संबंध बनाने के लिए भी किए जाते थे।

ब्रिटिश अधिकारियों और पहाड़ियाँ : –

🔹 1770 ई. के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़िया लोगों का दमन करने की क्रूर नीति अपनाई तथा उनका शिकार व संहार करना शुरू कर दिया।

🔹 भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने 1780 के दशक में शांति स्थापना की नीति का प्रस्ताव रखा जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था तथा बदले में उन्हें अपने आदमियों के चाल-चलन को सही रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने वालों में से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता से बाहर हो गए।

संथाल : –

🔹 1780 के दशक के आस-पास संथाल लोग बंगाल में आने लगे वे जमींदारों के यहाँ भाड़े पर काम करते थे, अंग्रेजों ने उनका उपयोग जंगल की सफाई के लिए किया। वे भूमि को ताकत लगाकर जोतते । हल इनकी पहचान थी तथा ये स्थायी कृषि में विश्वास करते थे।

संथालो का आगमन : –

🔹 सन् 1800 ई. के आसपास राजमहल के पहाड़ी क्षेत्रों में संथाल लोगों का आगमन हुआ। ये लोग वहाँ के जंगलों को साफ करने के लिए इमारती लकड़ी को काटते थे तथा वहाँ की जमीन जोतकर चावल तथा कपास उगाते थे। चूँकि संथालों ने निचली पहाड़ियों पर अपना अधिकार जमा लिया था इसलिए पहाड़ी लोगों को राजमहल की पहाड़ियों में और भी पीछे हटना पड़ा।

🔹 वैसे दोनों जनजातियाँ थीं, दोनों झूम खेती करते थे लेकिन फर्क इतना था कि पहाड़िया खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे जबकि संथाल हलों का। संथाल और पहाड़ियों के मध्य संघर्ष काफी समय तक चला। (संघर्ष में पहाड़ियों को पीछे हटना पड़ा था। )

संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में कैसे पहुँचे ?

🔹 संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। ज़मींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे । ब्रिटिश अधिकारियों का ध्यान संथालों की ओर गया।

🔹 उन्होंने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों पर जंगल साफ करने के लिए आमन्त्रण दिया था। ये स्थायी कृषि भी करते थे तथा हल भी चलाते थे। 1832 में इन्हें राजमहल पहाड़ियों के निचले भाग में बसने के लिए एक बड़ा क्षेत्र ‘दामिन-इ-कोह’ दे दिया। इस जगह को संथालों की भूमि घोषित कर यहाँ तक इनको सीमांकित कर दिया ।

संथालों की बस्तियों में वृद्धि : –

🔹 दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ीं, संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेज़ी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी अवधि में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई ।

संथाल विद्रोह : –

🔹 संथालों ने स्थायी कृषि तो शुरू कर दी, परन्तु सरकार के द्वारा संथालों की जमीन पर भारी कर लगा दिया गया। साहूकार बहुत उच्च ब्याज दर पर ऋण दे रहे थे व कर्ज अदा न कर पाने की स्थिति में उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे थे और तो और जमींदार लोग संथालों की जमीन पर नियन्त्रण का दावा कर रहे थे। अतः 1850 ई. के दशक में उन्होंने विद्रोह कर दिया जिसे अंग्रेजों ने बुरी तरह कुचला ।

🔹इस विद्रोह का नेतृत्व सिद्धू तथा कान्हू ने किया था । विद्रोही गतिविधियों के तहत संथालों ने जमींदारों तथा महाजनों के घरों को लूटा, खाद्यान्न को छीना, सरकारी अधिकारियों ने विद्रोह को दबाने के लिये मार-पीट करके उनका दमन प्रारम्भ किया जिससे ये विद्रोही और अधिक उग्र हो गये। सिद्धू तथा कान्हू को संथालों ने ईश्वर के भेजे हुए दूत माना और इन्हें विश्वास था कि ये इन शोषणों से मुक्ति दिलायेंगे ।

संथाल विद्रोह के प्रमुख कारण : –

  • संथालों की जमीन पर सरकार द्वारा भारी कर लगाना।
  • सरकार द्वारा ऊँची ब्याज दर वसूलना तथा कर्ज न अदा करने की स्थिति में जमीन पर कब्जा कर लेना था।

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