Class 9 Geography chapter 2 notes in hindi || भारत का भौतिक स्वरूप notes

Follow US On 🥰
WhatsApp Group Join Now Telegram Group Join Now

कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 नोट्स: भारत का भौतिक स्वरूप class 9 notes

TextbookNcert
ClassClass 9
SubjectGeography
ChapterChapter 2
Chapter Nameभारत का भौतिक स्वरूप नोट्स
MediumHindi

आप यहां से bharat ka bhautik swaroop notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम हिमालय पर्वत, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, तटीय मैदान, द्वीप आदि बारे में विस्तार से पड़ेगे।

भारत की भौगोलिक आकृतियाँ :-

भारत की भौगोलिक आकृतियों को मुख्य रूप से छह भागों में बाँटा गया है।

  • (1) हिमालय पर्वत श्रृंखला
  • (2) उत्तरी मैदान
  • (3) प्रायद्वीपीय पठार
  • (4) भारतीय मरुस्थल
  • (5) तटीय मैदान
  • (6) द्वीप समूह

(1) हिमालय पर्वत श्रृंखला :-

हिमालय को नवीन वलित पर्वत कहा जाता है। हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा एवं बनावट के दृष्टिकोण से वलित पर्वत श्रृंखला है। हिमालय विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रेणी है और एक अत्यधिक असम अवरोधों में से एक है।

  • स्थिति: भारत की उत्तरी सीमा पर हिमालय पर्वत श्रृंखला विस्तृत है।
  • विस्तार: पश्चिम-पूर्व दिशा में सिंधु नदी से ब्रह्मपुत्र नदी तक फैली हुई है।
  • लम्बाई: हिमालय की लम्बाई 2400 कि.मी. है।
  • चौड़ाई: हिमालय की चौड़ाई कश्मीर में 400 कि॰मी॰ एवं अरुणाचल में 150 कि॰मी॰ है।
  • आकृति: एक अर्द्धवृत्त का निर्माण करती है।

हिमालय का विभाजन :-

हिमालय का विभाजन दो आधार पर किया गया है :-

  • A. उत्तर-दक्षिण विभाजन
  • B. पश्चिम-पूर्व विभाजन

🔸 A. उत्तर-दक्षिण विभाजन: हिमालय को उत्तर से दक्षिण की ओर तीन समानांतर श्रृंखलाओं में बाँटा गया है:

  • (क) महान हिमालय / हिमाद्रि
  • (ख) निम्न हिमालय / हिमाचल
  • (ग) शिवालिक / बाह्य हिमालय

🔸 B. पश्चिम-पूर्व विभाजन: नदी घाटियों के आधार पर हिमालय को पश्चिम से पूर्व इन क्षेत्रों में बाँटा जाता है:

  • पंजाब हिमालय
  • कुमाऊ हिमालय
  • नेपाल हिमाचल
  • असम हिमालय

(क) महान हिमालय / हिमाद्रि :-

यह हिमालय का सबसे उत्तरी एवं सबसे ऊँचा भाग हैं। यह सबसे अधिक सतत् श्रृंखला है, जिसमें 6,000 मीटर की औसत ऊँचाई वाले सर्वाधिक ऊँचे शिखर हैं।

हिमालय के सभी मुख्य शिखर (जैसे मांउट एवरेस्ट, कंचनजंगा, मकालु, नंगा पर्वत) इसमें स्थित हैं। हिमालय के इस भाग का क्रोड ग्रेनाइट का बना है। यह श्रृंखला हमेशा बर्फ से ढँकी रहती है तथा इससे बहुत-सी हिमानियों का प्रवाह होता है।

(ख) निम्न हिमालय / हिमाचल :-

यह हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित हैं एवं हिमाचल या निम्न हिमालय के नाम से जानी जाती है। इन श्रृंखलाओं का निर्माण मुख्यतः अत्याधिक संपीडित तथा परिवर्तित शैलों से हुआ हैं।

  • ऊँचाई: इनकी ऊँचाई 3,700 मीटर से 4.500 मीटर के बीच हैं।
  • चौड़ाई: औसत चौड़ाई 50 किलोमीटर है।
  • मुख्य श्रृंखलाएँ: पीर पंजाल (सबसे लंबी एवं महत्वपूर्ण श्रृंखला), धौलाधर, महाभारत श्रृंखला।
  • प्रमुख घाटियाँ: कश्मीर घाटी, कांगड़ा घाटी, कुल्लू घाटी।

इस क्षेत्र को पहाड़ी नगरों के लिए जाना जाता है।

(ग) शिवालिक / बाह्य हिमालय :-

हिमालय की सबसे बाहरी श्रृंखला को शिवालिक कहा जाता है। इनकी चौड़ाई 10 से 50 कि॰मी॰ तथा ऊँचाई 900 से 1.100 मीटर के बीच है।

  • श्रृंखलाएँ का निर्माण: ये श्रृंखलाएँ, उत्तर में स्थित मुख्य हिमालय की श्रृंखलाओं से नदियों द्वारा लायी गयी असपिडित अवसादों से बनी है।
  • घाटियाँ: ये घाटियाँ बजरी तथा जलोढ़ की मोटी परत से ढँकी हुई हैं।

🔸 दून: हिमाचल और शिवालिक के बीच स्थित लंबवत घाटियों को दून कहते हैं। उदाहरण: देहरादून, कोटलीदून, पाटलीदून।

हिमालय का पूर्व–पश्चिम विभाजन :-

इस उत्तर-दक्षिण के अतिरिक्त हिमालय को पश्चिम से पूर्व के आधार पर भी विभाजित किया गया है। इन वर्गीकरणों को नदी घाटियों की सीमाओं के आधार पर किया गया है।

  • पंजाब हिमालय – सतलुज एवं सिंधु के बीच स्थित हिमालय के भाग को पंजाब हिमालय के नाम से जाना जाता है।
  • कश्मीर हिमालय / हिमाचल हिमालय – पश्चिम से पूर्व तक क्रमशः इसे कश्मीर तथा हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।
  • कुमाँऊ हिमालय – सतलुज तथा काली नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को कुमाँऊ हिमालय के नाम से जाना जाता है।
  • नेपाल हिमालय – काली और तिस्ता नदी के बीच स्थित हिमालय के भाग को नेपाल हिमालय के नाम से जाना जाता है।
  • असम हिमालय – तिस्ता और दिहाँग नदी के बीच स्थित हिमालय के भाग को असम हिमालय के नाम से जाना जाता है।

पूर्वाचल / पूर्वी पहाड़ियाँ :-

ब्रह्मपुत्र के दिहांग महाखड्ड (गार्ज) के बाद हिमालय दक्षिण की ओर एक तीखा मोड़ बनाते हुए भारत की पूर्वी सीमा के साथ फैल जाता है। इन्हें पूर्वाचल या पूर्वी पहाड़ियों तथा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम से जाना जाता है। ये पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्वी राज्यों से होकर गुजरती हैं।

  • विशेषताएँ:
    • संरचना: मज़बूत बलुआ पत्थर (अवसादी शैल) से बनी हैं।
    • आकृति: ये घने जंगलों से ढँकी हैं तथा अधिकतर समानांतर श्रृंखलाओं एवं घाटियों के रूप में फैली हैं।
    • मुख्य पहाड़ियाँ: पूर्वाचल में पटकाई, नागा, मिजो तथा मणिपुर पहाड़ियाँ शामिल हैं।

(2) उत्तरी मैदान :-

उत्तरी मैदान तीन प्रमुख नदी प्रणालियों सिंधु, गंगा एवं ब्रहापुत्र तथा इनकी सहायक नदियों से बना है। यह मैदान जलोढ़ मृदा से बना है।

🔸 निर्माण: लाखों वर्षों में हिमालय के गिरिपाद में स्थित बहुत बड़े बेसिन (द्रोणी) में जलोढ़ों का निक्षेप हुआ, जिससे इस उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ है।

🔸 आकार व विस्तार :-

  • कुल क्षेत्रफल: इसका विस्तार 7 लाख वर्ग किमी के क्षेत्र पर है।
  • आकार: लगभग 2400 किमी लंबा तथा 240 से 320 किमी चौड़ा है।

🔸 महत्व:

  • यह सघन जनसंख्या वाला भौगोलिक क्षेत्र है।
  • समृद्ध मृदा, पर्याप्त जल एवं अनुकूल जलवायु के कारण भारत का अत्यंत उत्पादक कृषि क्षेत्र हैं।
🔹 नदियों द्वारा निर्मित आकृतियाँ :-
  • नदीय द्वीप: नदी के निचले भाग में ढाल कम होने से गति मंद पड़ती है, जिससे नदीय द्वीपों का निर्माण होता है।
  • वितरिकाएँ: यह नदियाँ अपने निचले भाग में गाद जमा होने के कारण अनेक धाराओं में बँट जाती हैं, इन्हें वितरिकाएँ कहते हैं।
यह भी देखें ✯ कक्षा 9

उत्तरी मैदानों का विभाजन :-

🔹 1. नदी घाटियों के आधार पर उत्तरी मैदानों का विभाजन :-

उत्तरी मैदान को मोटे तौर पर तीन उपवर्गों में विभाजित किया गया है।

🔸 (A) पंजाब का मैदान :- उत्तरी मैदान के पश्चिमी भाग को पंजाब का मैदान कहा जाता है। यह मैदान सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज) द्वारा निर्मित है। इसका बड़ा भाग पाकिस्तान में है। मैदान के इस भाग में दोआबों की संख्या बहुत अधिक है।

🔸 (B) गंगा का मैदान :- गंगा के मैदान का विस्तार घघ्घर तथा तिस्ता नदियों के बीच है। यह उत्तरी भारत में हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के कुछ भाग तथा पश्चिम बंगाल में फैला है।

🔸 (C) ब्रह्मपुत्र का मैदान :- ब्रह्मपुत्र का मैदान गंगा के मैदान के पूर्व विशेषकर असम में स्थित है।

🔹 2. आकृतिक भिन्नता के आधार पर उत्तरी मैदानों का विभाजन :-

उत्तरी मैदान को उसकी भौगोलिक आकृतियों के आधार पर चार भागों में बाँटा गया है:

  • 🔸 (क) भाबर :- नदियाँ पर्वतों से नीचे उतरते समय शिवालिक की ढाल पर 8 से 16 कि॰मी॰ के चौड़ी पट्टी में गुटिका का निक्षेपण करती हैं। इसे ‘भाबर’ के नाम से जाना जाता है।
    • विशेषता: सभी नदियाँ इस भावर पट्टी में विलुप्त हो जाती हैं।
  • 🔸 (ख) तराई :- भाबर के दक्षिण में भाबर में लुप्त हुई नदियाँ यहाँ पुनः निकल आती हैं। एवं नम तथा दलदली क्षेत्र का निर्माण करती हैं, जिसे ‘तराई’ कहा जाता है।
    • इतिहास: यह घने जंगलों और वन्य जीवों से भरपूर क्षेत्र था, लेकिन बँटवारे के बाद कृषि भूमि के लिए अधिकांश जंगल काटे गए।
  • 🔸 (ग) भांगर :- उत्तरी मैदान का सबसे विशालतम भाग पुराने जलोढ़ का बना है। वे नदियों के बाढ़ वाले मैदान के ऊपर स्थित हैं तथा वेदिका जैसी आकृति प्रदर्शित करते हैं। इस भाग को ‘भांगर’ के नाम से जाना जाता है।
    • विशेषता: इस क्षेत्र की मृदा में चुनेदार निक्षेप पाए जाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कंकड़’ कहा जाता है।
  • 🔸 (घ) खादर :- बाढ़ वाले मैदानों के नये तथा युवा निक्षेपों को ‘खादर’ कहा जाता है।
    • विशेषता: इनका लगभग प्रत्येक वर्ष पुननिर्माण होता है. इसलिए ये उपजाऊ होते हैं तथा गहन खेती के लिए आदर्श होते हैं।

(3) प्रायद्वीपीय पठार :-

भारत का सबसे प्राचीन भूभाग, प्रायद्वीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय तथा रूपांतरित शैलों से बना है। यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अपवाह के कारण बना था। यहाँ चौड़ी, छिछली घाटियाँ और गोलाकार पहाड़ियाँ पाई जाती हैं।

प्रायद्वीपीय पठार के दो मुख्य भाग हैं:

  • (क) मध्य उच्चभूमि
  • (ख) दक्कन का पठार

(क) मध्य उच्चभूमि :-

नर्मदा नदी के उत्तर में प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग जो कि मालवा के पठार के अधिकतर भागों पर फैला है उसे मध्य उच्चभूमि के नाम से जाना जाता है।

  • आकार: मध्य उच्चभूमि पश्चिम में चौड़ी लेकिन पूर्व में संकीर्ण है।
  • सीमाएँ:
    • विंध्य श्रृंखला दक्षिण में सतपुड़ा श्रृंखला तथा उत्तर-पश्चिम में अरावली से घिरी है।
    • पश्चिम में यह धीरे-धीरे राजस्थान के बलुई तथा पथरीले मरुस्थल से मिल जाता है।
  • नदियाँ:
    • इस क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ, चंबल, सिंध, बेतवा, केन।
      • (ये सभी दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं, जो इस क्षेत्र के ढाल को दर्शाती हैं)
  • स्थानीय नाम:
    • इस पठार के पूर्वी विस्तार को बुंदेलखंड तथा बघेलखंड के नाम से जाना जाता है।
    • इसके और पूर्व के विस्तार को दामोदर नदी द्वारा अपवाहित छोटा नागपुर पठार।

(ख) दक्कन का पठार :-

दक्षिण का पठार एक त्रिभुजाकार भूभाग है. जो नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है।

  • सीमाएँ: उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है, जबकि महादेव, कैमूर की पहाड़ी तथा मैकाल श्रृंखला इसके पूर्वी विस्तार हैं।
  • ढाल: दक्षिण का पठार पश्चिम में ऊँचा एवं पूर्व की ओर कम ढाल वाला है।
  • उत्तर-पूर्व का हिस्सा: स्थानीय रूप से ‘मेघालय’, ‘कार्बो एंगलौंग पठार’ तथा ‘उत्तर कचार पहाड़ी’ के नाम से जाना जाता है।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर तीन महत्त्वपूर्ण श्रृंखलाएँ गारो, खासी तथा जयंतिया हैं।

पूर्वी व पश्चिमी घाट :-

दक्षिण के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर क्रमशः पूर्वी तथा पश्चिमी घाट स्थित हैं।

कारक पश्चिमी घाट पूर्वी घाट
स्थिति दक्कन के पठार के पश्चिमी सिरे परदक्कन के पठार के पूर्वी सिरे पर
सम्बन्ध पश्चिमी तट के समानांतरतट के साथ अनियमित / समानांतर नहीं
सातत्य सतत् (निरंतर) श्रृंखलाअसतत् (टूटी-फूटी) एवं अनियमित
ऊँचाईअधिक (900 मी. – 1,600 मी.)कम (औसतन 600 मी.)
ऊँचाई में प्रवृत्तिऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती है
प्रमुख दर्रे थाल घाट, भोर घाट, पाल घाट (इन्हीं से होकर गुजरा जा सकता है)कोई प्रमुख दर्रे नहीं
नदियों का प्रभावनदियों द्वारा कटा हुआ (बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों ने)
विस्तार महानदी घाटी से नीलगिरी तक
प्रमुख शिखर अनाई मुडी (2,695 मी.),
डोडा बेटा (2,633 मी.)
महेंद्रगिरी (1,500 मी.)
वर्षापर्वतीय वर्षा (आर्द्र हवाएँ पश्चिमी ढाल से टकराकर वर्षा करती हैं)
अन्य पहाड़ियाँशेवरॉय तथा जावडी पहाड़ियाँ (दक्षिण-पश्चिम में स्थित)

दक्कन ट्रैप :-

प्रायद्वीपीय पठार का वह क्षेत्र जहाँ काली मृदा पाई जाती है वह दक्कन ट्रैप कहलाता है। ज्वालामुखीय क्रिया से बनी आग्नेय चट्टानों के अपरदन से यह मृदा बनी है।

(4) भारतीय मरुस्थल :-

भारतीय मरुस्थल को थार मरुस्थल कहा जाता है। यह अरावली पर्वत के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। यह बालू के टिब्बों से ढँका तरंगित मैदान है।

  • क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 150 मि.मी. से भी कम होती है।
  • शुष्क जलवायु के कारण वनस्पति बहुत कम है।
  • वर्षा ऋतु में कुछ अस्थायी नदियाँ बहती हैं, जो बाद में बालू में विलीन हो जाती हैं।
  • लूनी नदी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और मुख्य नदी है।
  • बालू के टिब्बे :-
    • बरखान: अर्धचंद्राकार बालू के टिब्बे। इनका विस्तार बहुत अधिक क्षेत्र पर होता है।
    • लंबवत् टिब्बे: ये टिब्बे भारत-पाकिस्तान सीमा के समीप प्रमुखता से पाए जाते हैं।

(5) तटीय मैदान :-

प्रायद्वीपीय पठार के किनारों संकीर्ण तटीय पट्टीयों का विस्तार है। यह पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत है।

🔹 पश्चिमी तटीय मैदान :-

पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित एक संकीर्ण मैदान है। इस मैदान के तीन भाग हैं। तट के उत्तरी भाग को कोंकण (मुंबई तथा गोवा), मध्य भाग को कन्नड मैदान एवं दक्षिणी भाग को मालाबार तट कहा जाता है।

🔹 पूर्वी तटीय मैदान :-

बंगाल की खाड़ी के साथ विस्तृत मैदान हैं। यह पश्चिमी तट की तुलना में चौड़ा एवं समतल मैदान है।

  • भाग: उत्तरी भाग में इसे ‘उत्तरी सरकार’ कहा जाता है। जबकि दक्षिणी भाग ‘कोरोमंडल’ तट के नाम से जाना जाता है।
  • नदी डेल्टा: बड़ी नदियाँ, जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी इस तट पर विशाल डेल्टा का निर्माण करती हैं।

(6) द्वीप समूह :-

भारत के मुख्य स्थल भाग के अतिरिक्त दो प्रमुख द्वीप समूह भी हैं:

  1. लक्षद्वीप समूह (अरब सागर में)
  2. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (बंगाल की खाड़ी में)

लक्षद्वीप द्वीप समूह :-

  • स्थान: केरल के मालाबार तट के पास, अरब सागर में स्थित हैं। द्वीपों का यह समूह छोटे प्रवाल द्वीपों से बना है।
  • पुराना नाम: इन्हें पहले लकादीव, मीनीकाय और एमीनदीव के नाम से जाना जाता था। इनका नाम 1973 में बदलकर लक्षद्वीप रखा गया।
  • कुल क्षेत्र: यह 32 वर्ग कि॰मी॰ के छोटे से क्षेत्र में फैला है।
  • प्रशासनिक मुख्यालय: कावारत्ती द्वीप।

🔸 विशेषताएँ:

  • जैव विविधता: इस द्वीप समूह पर पादप तथा जंतु के बहुत से प्रकार पाए जाते हैं।
  • पिटली द्वीप: यह एक मनुष्य-विहीन द्वीप है, जो एक पक्षी अभयारण्य के रूप में जाना जाता है।

अंडमान और निकोबार द्वीप :-

बंगाल की खाड़ी में, उत्तर से दक्षिण की ओर फैली हुई द्वीपों की श्रृंखला अंडमान और निकोबार द्वीप है। यह द्वीप समूह आकार में बड़े संख्या में बहुल तथा बिखरे हुए हैं।

  • विभाजन: इस द्वीप समूह को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:
    • उत्तर में: अंडमान द्वीप समूह
    • दक्षिण में: निकोबार द्वीप समूह
  • ऐसा माना जाता है कि ये डूबी हुई पर्वत श्रेणियों के शिखर हैं।

🔸 मुख्य विशेषताएँ :-

  • आकार में बड़े, अधिक संख्या में और बिखरे हुए।
  • देश की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
  • ये द्वीप विषवत् वृत के समीप स्थित हैं एवं यहाँ की जलवायु विषुवतीय है।
  • तथा यह घने जंगलों से आच्छादित है।
  • यहां पादपों और जंतुओं में अत्यधिक विविधता पाई जाती है।
यह भी देखें ✯ कक्षा 9
❣️SHARING IS CARING❣️
🔔

Get in Touch With Us

Have questions, suggestions, or feedback? We'd love to hear from you!

Ncert Books PDF

English Medium

Hindi Medium

Ncert Solutions and Question Answer

English Medium

Hindi Medium

Revision Notes

English Medium

Hindi Medium

Related Chapters