कक्षा 9 इतिहास अध्याय 1 नोट्स: फ्रांसीसी क्रांति class 9 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 9 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 1 |
| Chapter Name | फ्रांसीसी क्रांति नोट्स |
| Medium | Hindi |
आप यहां से francisi kranti notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम फ्रांसीसी क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति के कारण, मध्यवर्ग, फ्रांस संवैधानिक राजतंत्र आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
फ्रांसीसी क्रांति :-
फ्रांसीसी क्रांति (1789–1799) फ्रांस में हुई एक राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल थी, जिसमें जनता ने राजशाही और सामंती व्यवस्था को समाप्त किया, एक गणतंत्र की स्थापना की, और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को समाज की नींव बनाया।
फ्रांसीसी क्रांति के कारण :-
- सामाजिक कारण:
- सामाजिक विभाजन
- जन्म के आधार पर विशेषाधिकार
- असमानता और अन्याय की भावना
- तीसरे एस्टेट पर करों का बोझ
- राजनीतिक कारण:
- कमजोर शासक
- लुई XVI की खराब नीति
- आर्थिक कारण:
- खाली राजकोष
- राजदरबार की फिजूलखर्ची
- बढ़ता कर्ज
- खराब फसल
- तात्कालिक कारण:
- 1789 में कर बढ़ाने का प्रस्ताव
- एस्टेट जेनराल की बैठक
- तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों का विरोध
- दार्शनिकों का योगदान:
- लोगों पर दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव
- जन्म के आधार पर विशेषाधिकार के अंत की कल्पना
- स्वतंत्रता समानता और भ्रातृत्व पर आधारित शासन के मॉडल की प्रस्तुति।
राजा लुई सोलहवाँ (Louis XVI) :-
- सन् 1774 में फ्रांस की गद्दी पर बैठा।
- उम्र: केवल 20 वर्ष
- पत्नी: ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मेरी एन्तोआनेत (Marie Antoinette)
- राज्यारोहण के समय उसने राजकोष खाली पाया।
📌 फ्रांसीसी क्रांति के कारण (सामाजिक कारण) 📌
अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज की वर्ग-व्यवस्था :-
अठारहवीं शताब्दी के दौरान फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित थाः
🔸 1. प्रथम एस्टेट :-
- इसमें पादरी वर्ग के लोग आते थे।
- पादरी वर्ग के लोगों को कुछ विशेषाधिकार जन्मना प्राप्त थे।
- इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषाधिकार था राज्य को दिए जाने वाले करों से छूट।
- चर्च भी किसानों से करों का एक हिस्सा, टाइद (Tithe), धार्मिक कर के रूप में वसूलता था।
🔸 2. द्वितीय एस्टेट :-
- इसमें फ्रांसीसी समाज का कुलीन वर्ग आता था।
- कुलीन वर्ग को जन्मना प्राप्त कुछ विशेषाधिकारो के साथ-साथ कुछ अन्य सामती विशेषाधिकार भी हासिल थे।
- वह किसानों से सामंती कर वसूल करता था।
🔸 3. तृतीय एस्टेट :-
- इसमें बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान और कारीगर, छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर, नौकर आते थे।
- तृतीय एस्टेट में कुछ लोग अमीर हैं तो कुछ गरीब भी हैं।
- यह किसी विशेषाधिकार से वंचित थे।
- तीसरा एस्टेट यानी आम जनता पर सभी करों का बोझ था।
किसान :-
- पूरी आबादी में लगभग 90 प्रतिशत किसान थे।
- कार्य :- किसान अपने स्वामी की सेवा स्वामी के घर एवं खेतों में काम करना, सैन्य सेवाएँ देना अथवा सड़कों के निर्माण में सहयोग आदि करने के लिए बाध्य थे।
- केवल कुछ ही किसान ज़मीन के मालिक थे।
- लगभग 60 प्रतिशत जमीन पर कुलीनों, चर्च और तीसरे एस्टेट्स के अमीरों का अधिकार था।
कर प्रणाली :-
- टाइल (प्रत्यक्ष कर)
- अप्रत्यक्ष कर ( अप्रत्यक्ष कर नमक और तम्बाकू जैसी रोजाना उपभोग की वस्तुओं पर लगाया जाता था। )
- टाइद (चर्च को दिया जाने वाला धार्मिक कर)
- सामंती कर (कुलीनों को देना पड़ता था)
यह सभी प्रकार का कर तीसरा एस्टेट यानी आम जनता को देना पड़ता था।
महत्वपूर्ण Definitions :-
- लिव्रे :- फ्रांस की मुद्रा जिसे 1794 में समाप्त कर दिया गया।
- एस्टेट क्रांति :- पूर्व फ्रांसीसी समाज में सत्ता और सामाजिक हैसियत को अभिव्यक्त करने वाली श्रेणी।
- पादरी वर्ग :- चर्च के विशेष कार्यों को करने वाले व्यक्तियों का समूह।
- टाइद :- चर्च द्वारा वसूल किया जाने वाला कर। यह कर कृषि उपज के दसवें हिस्से के बराबर होता था।
- टाइल :- सीधे राज्य को अदा किया जाने वाला कर।
📌 फ्रांसीसी क्रांति के कारण (राजनीतिक कारण ) 📌
फ्रांस की आर्थिक और सामाजिक स्थिति :-
- लंबे युद्धों से फ्रांस के वित्तीय संसाधन नष्ट हो चुके थे।
- वर्साय महल और राजदरबार की शानो-शौकत पर फिजूलखर्ची कर रहे थे।
- अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटेन के खिलाफ सहायता देने से फ्रांस पर 10 अरब लिव्रे से अधिक कर्ज बढ़ा।
- फ्रांस पर पहले से ही 2 अरब लिव्रे का कर्ज मौजूद था।
- सरकार से कर्जदाता अब 10 प्रतिशत ब्याज की माँग करने लगे थे।
- फ्रांसीसी सरकार अपने बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में चला जाता था।
- सरकारी खर्च (सेना, राजदरवार, सरकारी कार्यालयों, विश्वविद्यालय) को चलाने के लिए कर बढ़ाने पड़े।
- कर बढ़ाने के बावजूद भी सरकार का यह कदम भी नाकाफ़ी था।
📌 फ्रांसीसी क्रांति के कारण (आर्थिक कारण) 📌
फ़्रांस में जनसंख्या और जीविका संकट :-
🔸 जनसंख्या में वृद्धि :-
- फ़्रांस की जनसंख्या सन् 1715 में 2.3 करोड़ थी जो सन् 1789 में बढ़कर 2.8 करोड़ हो गई।
- परिणामस्वरूप, अनाज उत्पादन की तुलना में उसकी माँग काफ़ी तेज़ी से बढ़ी।
🔸 खाद्य संकट और महँगाई :-
- जनता का मुख्य भोजन पावरोटी (रोटी) था।
- अनाज की माँग बढ़ने से रोटी की कीमतें तेज़ी से बढ़ी।
- परिणामस्वरूप महँगाई बढ़ी और गरीब जनता का जीवन कठिन हो गया।
🔸 मज़दूरी और कामगार वर्ग की स्थिति :-
- अधिकांश कामगार कारखानों में मजदूरी करते थे।
- मजदूरी दरें मालिक तय करते थे।
- लेकिन मज़दूरी महँगाई की दर से नहीं बढ़ रही थी।
- इससे कामगार वर्ग की स्थिति दयनीय हो गई।
🔸 जीविका संकट :-
- सूखा या ओले पड़ने से फसलें नष्ट हो जाती थीं।
- इससे अनाज की कमी और कीमतों में और वृद्धि होती।
- नतीजतन, जनता को रोज़गार और भोजन का संकट झेलना पड़ता — इसे ही “जीविका संकट” कहा गया।
🔸 सामाजिक असमानता :- महँगाई बढ़ने और मजदूरी न बढ़ने से अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी होती गई।
🔸 नोट :- इन परिस्थितियों ने विशाल असमानता और अन्याय की भावना पैदा की। सारे करों का बोझ तीसरे एस्टेट (जनसाधारण) पर था, जबकि पहले दो एस्टेट्स कर-मुक्त थे। एवं जनसंख्या वृद्धि, अनाज की कमी, महँगाई, कम मजदूरी यही आर्थिक और सामाजिक असमानता आगे चलकर फ़्रांसीसी क्रांति का प्रमुख कारण बनी।
मध्य वर्ग का उदय :-
अठारहवीं सदी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे मध्य वर्ग कहा गया। ये लोग तीसरे एस्टेट का हिस्सा थे, परंतु संपन्न और शिक्षित थे।
- आर्थिक आधार: इस वर्ग ने समुद्रपारीय व्यापार और उद्योगों (जैसे ऊनी व रेशमी वस्त्र) के द्वारा अपनी संपत्ति अर्जित की।
- सदस्य: इसमें इन सौदागरों एवं निर्माताओं के अलावा प्रशासनिक सेवा व वकील जैसे पेशेवर लोग भी शामिल थे।
- मध्य वर्ग के विचार: ये सभी पढ़े-लिखे थे और नए दार्शनिक विचारों से प्रभावित थे।
- मुख्य मान्यताएँ: इनका विश्वास था कि –
- किसी के पास जन्म से विशेषाधिकार नहीं होने चाहिए।
- सामाजिक हैसियत का आधार योग्यता होनी चाहिए।
- समाज में स्वतंत्रता, समान नियम और समान अवसर की माँग।
📌 फ्रांसीसी क्रांति के कारण (दार्शनिकों का योगदान) 📌
प्रमुख दार्शनिक और उनके विचार :-
- जॉन लॉक: अपने टू ट्रीटाइजेज ऑफ़ गवर्नमेंट में जॉन लॉक ने राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत का विरोध किया; जनता की सहमति से शासन की बात की।
- ज़्याँ जाक रूसो: (जिन्होंने पुस्तक द सोशल कॉन्ट्रैक्ट लिखी) जिसमें उन्होंने लोगों और उनके प्रतिनिधियों के बीच सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का एक स्वरूप प्रस्तावित किया।
- मॉन्तेस्क्यू: मॉन्तेस्क्यू ने द स्पिरिट ऑफ़ द लॉज़ नामक रचना में सरकार के अंदर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही।
🔹 विचारों का प्रसार :-
- दार्शनिकों के इन विचारों पर कॉफ़ी हाउसों व सैलॉन की गोष्ठियों में चर्चाएँ होती थीं।
- पुस्तकों व अखबारों के माध्यम से ये विचार जनता तक पहुँचे।
- अनपढ़ भी उन्हें समझ सकें, इसलिए पुस्तकों एवं अखबारों को लोगों के बीच ज़ोर से पढ़ा जाता।
एस्टेट्स जेनराल :-
प्राचीन राजतंत्र में फ्रांसीसी सम्राट अपनी मर्ज़ी से कर नहीं लगा सकता था। इसके लिए उसे एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलानी पड़ती थी।
एस्टेट्स जेनराल एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट अपने-अपने प्रतिनिधि भेजते थे। लेकिन सम्राट ही यह निर्णय करता था कि इस संस्था की बैठक कब बुलाई जाए। इसकी अंतिम बैठक सन् 1614 में बुलाई गई थी।
📌 फ्रांसीसी क्रांति के कारण (तात्कालिक) 📌
फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत :-
🔹 एस्टेट्स जेनराल की बैठक (5 मई 1789, वर्साय) :-
फ्रांसीसी सम्राट लुई XVI ने 5 मई 1789 को नये करों के प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए एस्टेट्स जेनराल की बैठक बुलाई, जो वर्साय के एक आलीशान भवन के थी।
🔹 इसमें तीनों एस्टेट्स के प्रतिनिधि शामिल हुए –
- पहला एस्टेट (पादरी वर्ग): 300 प्रतिनिधि
- दूसरा एस्टेट (कुलीन वर्ग): 300 प्रतिनिधि
- तीसरा एस्टेट (जनसाधारण): 600 प्रतिनिधि, तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधि मुख्यतः समृद्ध और शिक्षित नागरिक थे।
किसानों, औरतों एवं कारीगरों का सभा में प्रवेश वर्जित था। फिर भी लगभग 40,000 पत्रों के माध्यम से उनकी शिकायतों एवं माँगों की सूची बनाई गई, जिसे प्रतिनिधि अपने साथ लेकर आए थे।
🔹 सभा में विवाद –
पुरानी प्रथा: पुराने एस्टेट्स जेनराल के नियमों के अनुसार प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार था। ( इससे पहले और दूसरे एस्टेट (पादरी और कुलीन) मिलकर तीसरे एस्टेट (आम जनता) के प्रस्ताव को हमेशा हरा सकते थे। )
तीसरे एस्टेट की माँग: तीसरे एस्टेट ने माँग की कि अबकी बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा।
राजा का रवैया: राजा लुई XVI ने इस लोकतांत्रिक माँग को अस्वीकार कर दिया।
🔹 नैशनल असेंबली की स्थापना ( टेनिस कोर्ट शपथ ( 20 जून 1789)) :-
- विद्रोह: तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों ने विरोध जताते हुए सभा से बाहर निकलकर एक अलग सभा बनाई।
- टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून 1789): 20 जून को इन प्रतिनिधियों ने वर्साय के टेनिस कोर्ट में एकत्रित होकर स्वयं को नैशनल असेंबली घोषित किया।
- शपथ: उन्होंने शपथ ली कि जब तक सम्राट की शक्तियों को कम करने वाला संविधान तैयार नहीं किया जाएगा तब तक असेंबली भंग नहीं होगी।
- नेतृत्व: इस आंदोलन का नेतृत्व मिराब्यो और आबे सिए जैसे नेताओं ने किया।
🔹 जनता का असंतोष और विद्रोह :-
- इस समय भयंकर ठंड और फसल खराब होने से रोटी की कीमतें बहुत बढ़ गईं।
- बेकरी मालिकों की जमाखोरी से जनता में आक्रोश फैल गया।
- औरतों की भीड़ ने बेकरी की दुकानों पर हमला किया।
- उधर राजा ने सेना को पेरिस भेज दिया।
- परिणामस्वरूप 14 जुलाई 1789 को जनता ने बास्तील किले पर धावा बोल दिया।
🔹 ग्रामीण क्षेत्रों में विद्रोह :-
- गाँवों में अफ़वाह फैली कि जागीरों के मालिकों ने भाड़े पर लठैतों लुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो पकी फ़सलों को तबाह करने निकल पड़े हैं।
- किसानों ने ग्रामीण किलों (chateau) पर आक्रमण किया।
- किसानों ने अन्न भंडार लूटे, और लगान व बंधनों के दस्तावेज़ जला दिए।
- कई कुलीन देश छोड़कर भाग गए, कुछ ने पड़ोसी देशों में शरण ली।
तत्कालिक परिणाम :-
🔹 नैशनल असेंबली को मान्यता :-
- बढ़ते जन-विरोध को देखकर लुई XVI ने नैशनल असेंबली को मान्यता दे दी।
- उसने यह भी स्वीकार किया कि अब उसकी शक्ति संविधान से सीमित होगी।
🔹 4 अगस्त 1789 – सामंती व्यवस्था का अंत :-
- राष्ट्रीय सभा ने ऐतिहासिक निर्णय लिया – 4 अगस्त, 1789 की रात को असेंबली ने करों, कर्त्तव्यों और बंधनों वाली सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया।
- पादरी वर्ग को अपने विशेषाधिकार छोड़ने पर मजबूर किया गया।
- धार्मिक कर (Tithe) समाप्त किया गया।
- चर्च की संपत्ति जब्त कर ली गई — इस प्रकार कम से कम 20 अरब लिव्रे की संपत्ति सरकार के हाथ में आ गई।
नेशनल असेंबली का उद्देश्य :-
- इसका मुख्य उद्देश्य था सम्राट की शक्तियों को सीमित करना।
- एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रीकृत होने के बजाय अब इन शक्तियों को विभिन्न संस्थाओं-विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में बांटा जाएगा।
- सन् 1791 के संविधान ने कानून बनाने का अधिकार नेशनल असेंबली को सौंप दिया।
1791 का संविधान: फ्रांस एक संवैधानिक राजतंत्र बना :-
🔸 संविधान का निर्माण (1791) :- नैशनल असेंबली ने सन् 1791 में संविधान का प्रारूप तैयार किया।
🔸 इसका मुख्य उद्देश्य:
- राजा की शक्तियों को सीमित करना
- सत्ता को संस्थाओं में बाँटना। — ताकि सारी शक्ति एक व्यक्ति (राजा) के हाथ में न रहे।
🔸 सत्ता का विभाजन :-
- संविधान के अनुसार शासन तीन भागों में बाँटा गया –
- विधायिका (कानून बनाने वाली) – नैशनल असेंबली
- कार्यपालिका (कानून लागू करने वाली) – राजा और मंत्री
- न्यायपालिका (न्याय करने वाली) – स्वतंत्र न्यायालय
🔸 निर्वाचन व्यवस्था :- नैशनल असेंबली अप्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती थी। सर्वप्रथम नागरिक एक निर्वाचक समूह का चुनाव करते थे, जो पुनः असेंबली के सदस्यों को चुनते थे।
🔹 नागरिक मतदान का अधिकार (‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ नागरिक) :-
सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था।
- सक्रिय नागरिक :- केवल 25 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुष, जो कम से कम तीन दिन की मजदूरी के बराबर कर चुकाते हों उन्हें मतदान के अधिकार का दर्जा मिला।
- निष्क्रिय नागरिक:- महिलाएँ और वे पुरुष जो कर नहीं चुकाते थे इन्हें मतदान का अधिकार नहीं था।
- निर्वाचक :- करदाताओं की उच्चतम श्रेणी के लोग ही निर्वाचक या असेंबली सदस्य बन सकते थे।
पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र :-
संविधान की शुरुआत इसी घोषणापत्र से हुई। जीवन के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और कानूनी बराबरी के अधिकार को ‘नैसर्गिक एवं अहरणीय’ अधिकार के रूप में स्थापित किया गया।
- सिद्धांत: ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को जन्मना प्राप्त थे और इन अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
- राज्य का दायित्व: राज्य का कर्तव्य है कि वह इन अधिकारों की रक्षा करे।
राजनीतिक प्रतीकों के मायने :-
अठारहवीं सदी में स्यादातर स्त्री-पुरुष पढ़े लिखे नहीं थे। इसलिए महत्त्वपूर्ण विचारों का प्रचार करने के लिए छपे हुए शब्दों के बजाय अकसर आकृतियों एवं प्रतीकों का प्रयोग किया जाता था।
- टूटी हुई जंजीर :- दासों को बाँधने के लिए जंजीरों का प्रयोग होता था। टूटी हुई हथकड़ी उनकी आजादी का प्रतीक है।
- त्रिभुज के अंदर रोशनी बिखेरती आँख :- सर्वदर्शी आँख ज्ञान का प्रतीक है सूर्य की किरणे अज्ञान रूपी अंधेरे को मिटा देती है।
- छड़ों का बछींवार गट्ठर :- अकेली छड़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है पर पूरे गट्ठर को नहीं। एकता में ही बल है।
- राजदंड :- शाही सत्ता का प्रतीक।
- अपनी पूँछ मुँह में लिए साँप :- सनातनता का प्रतीक। अँगूठी का कोई ओर-छोर नहीं होता।
फ़्रांस में राजतंत्र का अंत और गणतंत्र की स्थापना :-
🔹 युद्ध का आरंभ (अप्रैल 1792) :-
तनावपूर्ण स्थिति: लुई XVI ने संविधान पर हस्ताक्षर किए, पर गुप्त रूप से प्रशा के राजा से संपर्क में था।
कारण: पड़ोसी देशों के शासक फ्रांस की क्रांति से डर गए और इसलिए 1789 की गर्मियों के बाद सेना भेजने की योजना बनाई।
क्रांतिकारी प्रतिक्रिया: अप्रैल 1792 में नैशनल असेंबली ने प्रशा एवं ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का प्रस्ताव पारित कर दिया।
जनभागीदारी: हजारों स्वयंसेवक सेना में भरती हुए। उन्होंने इस युद्ध को यूरोपीय राजाओं एवं कुलीनों के विरुद्ध जनता की जंग के रूप में लिया।
राष्ट्रगान: इसी दौरान ‘मार्सिले’ गीत गाया गया, जो आगे चलकर फ्रांस का राष्ट्रगान बना।
🔹 आर्थिक कठिनाइयाँ और असंतोष :-
- युद्ध से जनता को भारी कष्ट और महँगाई झेलनी पड़ी।
- पुरुषों के युद्ध पर जाने से महिलाओं पर घर-परिवार ओर रोजी-रोटी की ज़िम्मेदारी आ गई।
- जनता को लगा कि क्रांति अधूरी है — क्योंकि 1791 का संविधान केवल अमीरों के पक्ष में था।
🔹 राजनीतिक क्लबों का उदय :-
- लोग राजनीतिक क्लबों में इकट्ठा होकर नीतियों पर चर्चा करते थे।
- इनमें सबसे प्रसिद्ध था जैकोबिन क्लब, जिसका नेता था मैक्समिलियन रोबेस्प्येर।
- सदस्य गरीब वर्ग से आते थे — दुकानदार, कारीगर, मजदूर आदि।
- पहचान: उन्होंने लंबी धारीदार पतलून (लोगों के कपड़े) पहनना शुरू किया और स्वयं को “साँ कुलॉत” (बिना घुटन्ने वाले) कहलाए। ऐसा उन्होंने कुलीनों से खुद को अलग करने के लिए किया।
- प्रतीक: उनकी लाल टोपी स्वतंत्रता का प्रतीक थी।
🔹 10 अगस्त 1792 का विद्रोह :-
- कारण: खाद्यान्न संकट, महंगाई और युद्ध से उपजी परेशानियों से जनता में गुस्सा उमड़ा।
- घटना: 10 अगस्त की सुबह जैकोबिनों ने पेरिस के लोगों के साथ मिलकर राजमहल ट्यूलरी पर हमला किया।
🔹 परिणाम:
- राजा को बंधक बनाया गया और बाद में जेल में डाल दिया गया।
- नये चुनाव कराये गए। अब सभी 21 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों को मतदान का अधिकार मिला।
🔹 राजतंत्र का अंत और गणतंत्र की स्थापना (21 सितंबर 1792) :-
- कन्वेंशन: नवनिर्वाचित असेंबली को कन्वेंशन नाम दिया गया।
- ऐतिहासिक फैसला: 21 सितंबर 1792 को कन्वेंशन ने राजतंत्र समाप्त कर फ्रांस को गणतंत्र घोषित किया।
- गणतंत्र का अर्थ: ऐसी सरकार जहाँ प्रमुख का चुनाव जनता करती है, न कि वंशानुगत राजा होता है।
🔹 राजा और रानी का अंत :-
- राजा लुई XVI को देशद्रोह का दोषी पाया गया।
- 21 जनवरी 1793 को उसे फाँसी दी गई।
- बाद में रानी मेरी एंतोआनेत को भी फाँसी दी गई।
फ़्रांस में राजतंत्र का अंत और गणतंत्र की स्थापना (Short explanation) :-
🔸 युद्ध की घोषणा (1792) – फ्रांस ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। यह युद्ध यूरोपीय राजाओं के खिलाफ जनता की जंग बन गया।
🔸 मार्सिले गीत – रॉजेट दि लाइल द्वारा रचित देशभक्ति गीत मार्सिले फ्रांस का राष्ट्रगान बना।
🔸 जैकोबिन क्लब का उदय – मैक्समिलियन रोबेस्प्येर के नेतृत्व में बना। सदस्य समाज के निम्न वर्ग से थे – छोटे दुकानदार, कारीगर, मजदूर आदि। इन्हें “सौं कुलॉत” (बिना घुटन्ने वाले) कहा गया क्योंकि वे कुलीनों के फैशन के विरोध में साधारण पोशाक पहनते थे।
🔸 10 अगस्त 1792 का विद्रोह – जैकोबिनों और पेरिसवासियों ने ट्यूलेरी महल पर हमला किया, राजा को बंदी बना लिया और राजशाही का अंत कर दिया।
🔸 कन्वेंशन की स्थापना (सितंबर 1792) – नए चुनावों के बाद कन्वेंशन असेंबली का गठन हुआ, जिसने 21 सितंबर 1792 को फ्रांस को गणतंत्र घोषित किया।
🔸 राजा और रानी की मृत्यु – लुई XVI को देशद्रोह के आरोप में 21 जनवरी 1793 को फाँसी दी गई; कुछ ही समय बाद रानी मेरी एंतोआनेत को भी मृत्युदंड मिला।
आतंक राज (1793–1794) :-
🔸 काल अवधि – सन् 1793 से 1794 तक के काल को आतंक का युग कहा जाता है।
🔸 नेता – इस समय शासन मैक्समिलियन रोबेस्प्येर के हाथों में था।
🔸 रोबेस्प्येर की कठोर नीतियाँ – रोबेस्प्येर ने नियंत्रण एवं दंड की सख्त नीति अपनाई। गणतंत्र के शत्रु समझे जाने वाले — कुलीन एवं पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, उसकी कार्यशैली से असहमति रखने वाले पार्टी सदस्य सभी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया और एक क्रांतिकारी न्यायालय द्वारा उन पर मुकदमा चलाया गया।
🔸 गिलोटिन और उसका प्रयोग –
- दोषी पाए गए लोगों को गिलोटिन पर सिर कलम कर दिया जाता था।
- यह एक मशीन थी जिसमें दो खंभों के बीच लटकते आरे से सिर अलग किया जाता था।
- इसका नाम इसके आविष्कारक डॉ. गिलोटिन के नाम पर पड़ा।
🔸 आर्थिक और सामाजिक नियंत्रण नीतियाँ –
- मूल्य नियंत्रण: सरकार ने मजदूरी और वस्तुओं की अधिकतम कीमत तय की।
- राशनिंग: गोश्त एवं पावरोटी की राशनिंग कर दी गई।
- किसानों पर दबाव: किसानों को अनाज सरकारी तय कीमत पर बेचने का आदेश दिया गया।
- समता रोटी: सफेद आटे पर प्रतिबंध लगाकर सभी के लिए साबुत गेहूँ की समान रोटी खाना अनिवार्य कर दिया गया, जो सामाजिक समानता का प्रतीक थी।
- समान संबोधन: लोग एक-दूसरे को परंपरागत मॉन्स्यूर “मॉन्स्यूर” और “मदाम” जैसे संबोधनों की जगह सभी को “सितोयेन (नागरिक)” और “सितोयीन (नागरिका)” कहकर संबोधित करने लगे।
- धर्म पर नियंत्रण: चर्च बंद कर दिए गए, उनके भवनों को बैरक और दफ्तरों में बदल दिया गया।
🔸 आतंक का अंत (रोबेस्प्येर का पतन) –
- उसकी नीतियाँ इतनी कठोर थीं कि उसके अपने समर्थक भी डर गए।
- जुलाई 1794 में उसे गिरफ्तार किया गया।
- अगले ही दिन उसे गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया। इसके साथ ही “आतंक के राज” का अंत हुआ।
डायरेक्ट्री शासित फ्रांस :-
🔹 सत्ता परिवर्तन:
- जैकोबिन सरकार के पतन के बाद मध्य वर्ग के संपन्न तबके के पास सत्ता आ गई।
- नए संविधान के तहत सम्पत्तिहीन तबके को मताधिकार से वंचित कर दिया गया।
🔹 नई शासन व्यवस्था:
- विधान परिषदें: दो चुनी हुई विधान परिषदों का गठन किया गया।
- कार्यपालिका: इन परिषदों ने पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका डिरेक्ट्री को नियुक्त किया।
- उद्देश्य: जैकोबिन शासन की तरह एक व्यक्ति की तानाशाही से बचना। शासन में संतुलन और स्थिरता बनाए रखना।
🔹 राजनीतिक अस्थिरता –
- डायरेक्टरों और विधान परिषदों में लगातार संघर्ष होता रहा।
- इससे सरकार कमज़ोर और अस्थिर हो गई।
🔹 परिणाम – इस राजनीतिक अस्थिरता ने नेपोलियन बोनापार्ट के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
🔹 महत्त्व – इन सभी परिवर्तनों के बावजूद, स्वतंत्रता, विधिसम्मत समानता और बंधुत्व प्रेरक के आदर्श फ्रांस और पूरे यूरोप में क्रांतिकारी आंदोलनों की प्रेरणा बने रहे।
🔹 निष्कर्ष – डिरेक्ट्री शासन एक असफल संवैधानिक प्रयोग था, जिसने क्रांति के बाद की अवधि में स्थिरता स्थापित करने में विफल रहा। इसकी कमजोरी ने ही नेपोलियन की सैनिक तानाशाही के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
नेपोलियन बोनापार्ट :-
🔹 नेपोलियन का उदय –
- 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने स्वयं को फ़्रांस का सम्राट घोषित किया।
- उसने पड़ोसी यूरोपीय देशों पर विजय अभियान शुरू किया।
- पुराने राजवंशों को हटाकर नए साम्राज्य स्थापित किए और अपने परिवार के सदस्यों को शासन की बागडोर दी।
🔹 नेपोलियन के सुधार –
नेपोलियन खुद को यूरोप का आधुनिकीकरण करने वाला नेता मानता था।
- बनाए गए प्रमुख सुधार:
- निजी संपत्ति की सुरक्षा के कानून बनाए।
- दशमलव प्रणाली पर आधारित एकसमान नाप-तौल प्रणाली लागू की।
🔹 जनता की धारणा –
- प्रारंभ में लोग उसे मुक्तिदाता मानते थे, जो स्वतंत्रता लाएगा।
- परन्तु बाद में उसकी सेनाएँ आक्रमणकारी समझी जाने लगीं।
🔹 नेपोलियन का पतन –
- 1815 में वॉटरलू के युद्ध में नेपोलियन की हार हुई।
- इसके बाद उसका शासन समाप्त हो गया।
क्या महिलाओं के लिए भी क्रांति हुई? (महिलाओं की भूमिका और अधिकार)
🔹 क्रांति में महिलाओं की भागीदारी –
- महिलाएँ शुरू से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थीं।
- उन्हें उम्मीद थी कि क्रांति उनके जीवन में सुधार लाएगी।
- उन्होंने विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया, राजनीतिक क्लब बनाए और अखबार निकाले।
🔹 महिलाओं की स्थिति –
- तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ सिलाई, कपड़े धोने, सब्ज़ी बेचने या घरेलू काम करके जीविका चलाती थीं।
- उन्हें परिवार का पालन-पोषण (खाना बनाना, बच्चों की देखभाल) भी करना पड़ता था।
- शिक्षा के अवसर बहुत सीमित थे। केवल धनी परिवारों की लड़कियाँ ही पढ़ पाती थीं।
- उन्हें पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती थी।
🔹 महिला क्लब और आंदोलन –
- महिलाओं ने अपने क्लब बनाए और अख़बार निकाले।
- फ्रांस में लगभग 60 महिला क्लब बने; सबसे प्रसिद्ध था “Society of Revolutionary and Republican Women”।
- माँगें — पुरुषों के समान मताधिकार, राजनीतिक पदों पर भागीदारी और समान अधिकार।
🔹 महिलाओं के लिए सरकार द्वारा सुधार –
- प्रारंभिक वर्षों में सरकार द्वारा कुछ सकारात्मक कदम उठाए गए:
- लड़कियों की शिक्षा अनिवार्य की गई।
- शादी को स्वैच्छिक अनुबंध घोषित किया गया।
- तलाक का अधिकार पुरुष और महिला दोनों को दिया गया।
- महिलाएँ व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थीं और छोटे व्यवसाय चला सकती थीं।
🔹 सीमाएँ और दमन –
- 1791 के संविधान में महिलाओं को “निष्क्रिय नागरिक” कहा गया (मताधिकार नहीं)।
- आतंक के दौर में
- महिला क्लब बंद कर दिए गए,
- उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई,
- कई महिलाओं को गिरफ्तार या फाँसी दी गई।
🔹 दीर्घकालीन संघर्ष –
- मताधिकार और समान वेतन के लिए आंदोलन 19वीं–20वीं सदी तक चलता रहा।
- अंततः 1946 में फ्रांस की महिलाओं को मताधिकार मिला।
🔹 लंबा संघर्ष और परिणाम –
- महिलाओं का मताधिकार और समान वेतन के लिए संघर्ष आगे भी चलता रहा।
- यह आंदोलन 19वीं और 20वीं सदी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी रहा।
- अंततः 1946 में फ्रांस की महिलाओं को मताधिकार मिला।
नीग्रो :-
अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में रहने वाले स्थानीय लोग। यह अपमानजनक शब्द है, जिसका अब प्रायः इस्तेमाल नहीं किया जाता।
दास प्रथा का उन्मूलन :-
- फ्रांस के कैरिबियाई उपनिवेश — मार्टिनिक, ग्वाडेलोप और सैन डोमिंगो —
- तम्बाकू, नील, चीनी एवं कॉफ़ी जैसी वस्तुओं के महत्त्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता थे।
- यूरोपीय लोग कठिन जलवायु और परिश्रम से बचते थे, इसलिए वहाँ मजदूरों की कमी थी।
- इस कमी को पूरा करने के लिए त्रिकोणीय दास व्यापार शुरू हुआ।
🔹 त्रिकोणीय दास व्यापार –
- यह व्यापार यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के बीच चलता था।
🔹 दास- व्यापार की शुरुआत :-
- दास- व्यापार सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुआ।
- फ्रांसीसी व्यापारी बोर्दो और नांत बंदरगाहों से अफ्रीका जाते थे।
- अफ्रीका के तट से स्थानीय सरदारों से दास खरीदते थे।
- दासों को हथकड़ियों में जकड़कर जहाजों में कैरिबियाई द्वीपों तक ले जाया जाता था।
- वहाँ उन्हें बागान मालिकों को बेच दिया जाता, जहाँ वे कठिन श्रम करते थे।
- इस व्यापार से फ्रांस के बंदरगाह शहर बहुत समृद्ध हुए।
🔹 दास प्रथा की आलोचना और बहस –
- 18वीं सदी में फ्रांस में दास प्रथा की ज़्यादा आलोचना नहीं हुई।
- नेशनल असेंबली में बहस हुई कि
- व्यक्ति के मूलभूत अधिकार उपनिवेशों में रहने वाली प्रजा सहित समस्त फ़्रांसीसी प्रजा को प्रदान किए जाएँ या नहीं।
- परंतु व्यापारियों के विरोध के डर से कोई कानून नहीं बना।
🔹 1794 में दास प्रथा का उन्मूलन –
- 1794 में कन्वेंशन असेंबली ने
- फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा समाप्त करने का कानून पारित किया।
- इससे सभी दासों को मुक्ति मिली।
🔹 नेपोलियन द्वारा दास प्रथा की पुनर्स्थापना और अंतिम उन्मूलन –
- नेपोलियन बोनापार्ट ने दस वर्ष बाद दास प्रथा फिर से लागू कर दी।
- बागान मालिकों को दोबारा अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाने की अनुमति मिल गई।
- अंततः फ़्रांसीसी उपनिवेशों से अंतिम रूप से दास प्रथा का उन्मूलन 1848 में किया गया।
क्रांति और रोज़ाना की ज़िंदगी :-
🔹 दैनिक जीवन पर असर –
- 1789 की क्रांति ने लोगों के पहनावे, बोलचाल और जीवनशैली तक को प्रभावित किया।
- सरकार ने स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों को रोजमर्रा की ज़िंदगी में लागू करने की कोशिश की।
🔹 सेंसरशिप का अंत (1789) –
- 1789 में बास्तील किले के पतन के बाद सबसे अहम बदलाव था — सेंसरशिप की समाप्ति।
- पहले राजा की अनुमति के बिना कोई किताब, अखबार या नाटक प्रकाशित नहीं किया जा सकता था।
- क्रांति के बाद सेंसरशिप समाप्त कर दी गई।
- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को “नैसर्गिक अधिकार” घोषित किया गया।
🔹 प्रिंट माध्यम का विस्फोट और विचारों की आज़ादी –
- अखबार, पर्चे, किताबें और चित्र बड़ी संख्या में छपने लगे।
- इनसे शहरों और गाँवों तक क्रांति की खबरें और विचार फैलने लगे।
- प्रिंट माध्यम ने लोगों को राजनीतिक बहसों से जोड़ा और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया।
🔹 सांस्कृतिक परिवर्तन –
- नाटक, संगीत और उत्सवी जुलूसों में असंख्य लोग जाने लगे।
- स्वतंत्रता और न्याय के बारे में राजनीतिज्ञों व दार्शनिकों के पांडित्यपूर्ण लेखन को समझने और उससे जुड़ने का यह लोकप्रिय तरीका था क्योंकि किताबों को पढ़ना तो मुट्ठी भर शिक्षितों के लिए ही संभव था।
