कक्षा 9 इतिहास अध्याय 3 नोट्स: नात्सीवाद और हिटलर का उदय class 9 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 9 |
| Subject | History |
| Chapter | Chapter 3 |
| Chapter Name | नात्सीवाद और हिटलर का उदय नोट्स |
| Medium | Hindi |
आप यहां से natsivad or hitler ka uday notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम वाइमर गणराज्य, राजनीतिक रैडिकलवाद और आर्थिक संकट, द्वितीय विश्व युद्ध, नात्सी जर्मनी में युवाओं की स्थिति, लोकतंत्र का ध्वंस आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
नात्सी :-
नात्सी शब्द जर्मन भाषा के शब्द ‘नात्सियोणाल’ के प्रारंभिक अक्षरों को लेकर बनाया गया है। ‘नात्सियोणाल’ शब्द हिटलर की पार्टी के नाम का पहला शब्द था इसलिए इस पार्टी के लोगों को नात्सी कहा जाता था।
नात्सीवाद क्या था?
दुनिया और राजनीति के बारे में एक संपूर्ण व्यवस्था, विचारों की एक पूरी संरचना का नाम नात्सीवाद था। एडॉल्फ हिटलर इसका नेता था।
- इसमें हिटलर का सपना था कि—
- वह जर्मनी को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाना चाहता था,
- वह पूरे यूरोप को जीत लेना चाहता था।,
- जर्मन नस्ल को श्रेष्ठ बनाना।
नात्सीवाद के उदय का कारण :-
- पहले विश्वयुद्ध (World War I) के बाद जर्मनी पर कठोर दंड लगाए गए।
- इससे जर्मनी की आर्थिक व सामाजिक स्थिति बिगड़ गई।
- जनता में गुस्सा और निराशा थी, जिसका फायदा हिटलर ने उठाया।
नात्सियों के अमानवीय अपराध :-
जर्मनी ने जनसंहार शुरू किया – जिसके तहत यूरोप में रहने वाले कुछ खास नस्ल के लोगों को सामूहिक रूप से मारा जाने लगा।
- मारे गए लोगों की संख्या :-
- 60 लाख (6 million) यहूदी
- 2 लाख जिप्सी
- 10 लाख पोलैंड के नागरिक
- 70,000 जर्मन नागरिक जिन्हें मानसिक या शारीरिक रूप से अपंग घोषित किया गया था।
- अनेक राजनीतिक विरोधी
तरीका: कत्लखाने बनाए गए, जैसे औषवित्स।
औषवित्स :-
बड़ी तादाद में लोगों को मारने के लिए औषवित्स जैसे कत्लखाने बनाए गए जहाँ जहरीली गैस से हजारों लोगों को एक साथ मौत के घाट उतार दिया जाता था।
मित्र राष्ट्र :-
वे देश जो द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) में धुरी राष्ट्रों के विरुद्ध लड़े। मुख्य चार मित्र राष्ट्र थे: इंग्लैंड (ब्रिटेन), फ्रांस, रूस (सोवियत संघ), और अमेरिका (संयुक्त राज्य अमेरिका)।
धुरी राष्ट्र :-
वे देश जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के खिलाफ युद्ध लड़ा। मुख्य तीन धुरी राष्ट्र थे: जर्मनी, इटली, और जापान।
द्वितीय विश्व युद्ध का अंत :-
- मई 1945 में जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के सामने समर्पण कर दिया।
- हिटलर और उसका प्रचार मंत्री गोएबेल्स ने अप्रैल 1945 में बर्लिन के बंकर में आत्महत्या कर ली।
न्यूरेम्बर्ग ट्रायल :-
युद्ध खत्म होने के बाद न्यूरेम्बर्ग में एक अंतर्राष्ट्रीय सैनिक अदालत स्थापित की गई।
- इस अदालत का उद्देश्य था:
- शांति के विरुद्ध किए अपराधों का न्याय,
- मानवता के खिलाफ अपराधों की सजा,
- युद्ध अपराधों के लिए नात्सी युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाने का जिम्मा सौंपा गया था।।
परिणाम: 11 मुख्य नात्सियों को ही मौत की सजा दी। बाकी आरोपियों में से बहुतों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई।
जर्मनी और प्रथम विश्वयुद्ध :-
🔸 प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) में जर्मनी :-
- बीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में जर्मनी एक ताकतवर साम्राज्य था।
- उसने ऑस्ट्रियाई साम्राज्य के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस, रूस) के खिलाफ़ पहला विश्वयुद्ध (1914–1918) लड़ा।
- युद्ध की शुरुआत में जर्मनी को सफलता मिली, उसने फ्रांस और बेल्जियम पर कब्ज़ा किया।
- 1917 में अमेरिका के युद्ध में शामिल होने से मित्र राष्ट्रों की शक्ति बढ़ी।
- अंततः नवंबर 1918 में जर्मनी को हार माननी पड़ी।
वर्साय की संधि (1919) :-
पहले विश्वयुद्ध के बाद विजयी मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी पर बहुत कठोर शर्तें थोप दी थीं। मित्र राष्ट्रों के साथ जर्मनी ने वर्साय में शांति-संधि की। वर्साय की संधि जर्मनी के लिए बेहद कठोर और अपमानजनक थी। इसके मुख्य प्रावधान थे:
- जर्मनी को खोने पड़े:
- जर्मनी को अपने सारे उपनिवेश,
- तकरीबन 10 प्रतिशत आबादी,
- 13 प्रतिशत भूभाग,
- 75 प्रतिशत लौह भंडार और
- 26 प्रतिशत कोयला भंडार
- ये क्षेत्र फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और लिथुआनिया के हवाले करने पड़े।
- सेना को भंग कर दिया गया।
- युद्ध अपराधबोध अनुच्छेद के तहत युद्ध के कारण हुई सारी तबाही के लिए जर्मनी को ज़िम्मेदार ठहराया गया।
- 6 अरब पौंड का जुर्माना लगाया गया।
- खनिज संसाधनों वाले राइनलैंड पर मित्र राष्ट्रों का कब्ज़ा।
वाइमर गणराज्य की स्थापना :-
जर्मनी की हार और सम्राट के पदत्याग के बाद एक नई लोकतांत्रिक सरकार बनाने का मौका मिला। वाइमर में एक राष्ट्रीय सभा की बैठक बुलाई गई और संघीय आधार पर एक लोकतांत्रिक संविधान पारित किया गया।
- संविधान की मुख्य विशेषताएँ:
- संविधान संघीय ढांचे पर आधारित।
- राइखस्टाग नामक संसद के लिए चुनाव की व्यवस्था।
- सभी वयस्क नागरिकों, पुरुष और महिलाएँ, को समान मताधिकार दिया गया।
🔹 वाइमर गणराज्य के प्रति असंतोष :-
बहुत से जर्मन लोग इस नए लोकतंत्र से खुश नहीं थे। कारण —
- पहले विश्वयुद्ध में पराजय का अपमान।
- वर्साय की संधि की कठोर शर्तें।
जर्मनी को महसूस हुआ कि उसके साथ अन्याय और अपमान हुआ है। बहुत से जर्मनों ने इस हार और अपमान के लिए वाइमर गणराज्य को जिम्मेदार ठहराया।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वाइमर गणराज्य पर प्रभाव :-
नए गणराज्य पर दो मुख्य समस्याओं का बोझ था:
- राजनीतिक बोझ:
- उसे युद्ध में हार का अपराधबोध और वर्साय संधि का राष्ट्रीय अपमान ढोना पड़ा।
- पुराने साम्राज्य के “अपराधों” की कीमत इस नवजात गणराज्य को चुकानी पड़ी।
- आर्थिक बोझ:
- भारी हर्जाना (मुआवजा) चुकाने के कारण यह आर्थिक रूप से अपंग हो गया।
वाइमर गणराज्य के समर्थक और विरोधी :-
- समर्थक: वाइमर गणराज्य के हिमायतियों में मुख्य रूप से समाजवादी, कैथलिक और डेमोक्रैट खेमे के लोग थे।
- विरोधी: रूढ़िवादी और पुरातनपंथी राष्ट्रवादी।
- हमले का तरीका:
- विरोधियों ने मिथकों का इस्तेमाल किया।
- गणराज्य के समर्थकों को ‘नवंबर के अपराधी’ कहकर अपमानित किया गया।
- परिणाम: इस विरोध की मनोदशा का 1930 के दशक की शुरुआती राजनीति पर गहरा असर पड़ा।
यूरोप पर प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव :-
पहला विश्वयुद्ध (1914–1918) ने पूरे यूरोप को मनोवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया। युद्ध से पहले यूरोप कर्ज देने वाला महाद्वीप था, पर युद्ध के बाद वह कर्जदार महाद्वीप बन गया।
🔹 यूरोपीय समाज पर युद्ध के प्रभाव :-
- सिपाहियों को आम नागरिकों के मुकाबले ज़्यादा सम्मान दिया जाने लगा।
- राजनेताओं ने जोर दिया कि पुरुष आक्रामक, ताकतवर और मर्दाना होने चाहिए।
- मीडिया ने खंदकों में सैनिकों के जीवन का महिमामंडन किया।
- मीडिया के प्रचार के विपरीत, सैनिकों का जीवन बहुत दयनीय था:
- वे लाशें खाने वाले चूहों से घिरे रहते थे।
- उन्हें जहरीली गैस और लगातार गोलाबारी का सामना करना पड़ता था।
- उन्हें अपने साथियों को पल-पल मरते हुए देखना पड़ता था।
🔹 यूरोपीय राजनीतिक पर युद्ध के प्रभाव :-
- सार्वजनिक जीवन में आक्रामक फौजी प्रचार और राष्ट्रीय सम्मान की भावना प्रमुख हो गई।
- समाज में रूढ़िवादी तानाशाहों को व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा।
- लोकतंत्र एक नया और नाजुक विचार था जो दोनों विश्वयुद्धों के बीच की अस्थिरता को झेल नहीं पाया।
खंदक :-
युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों के छिपने के लिए खोदे गए गड्ढे को खंदक कहा जाता था।
वाइमर गणराज्य के प्रारंभिक चुनौतियाँ (राजनीतिक विद्रोह और आर्थिक संकट) :-
🔹 राजनीतिक विद्रोह (स्पार्टाकिस्ट विद्रोह) :-
वाइमर गणराज्य की स्थापना के समय ही जर्मनी में भी स्पार्टाकिस्ट लीग अपने क्रांतिकारी विद्रोह की योजनाओं को अंजाम देने लगी।
- प्रेरणा: यह रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित थे।
- लक्ष्य: जर्मनी में सोवियत-शैली (कम्युनिस्ट) की सरकार बनाना।
- कार्यवाही:
- बहुत सारे शहरों में मजदूरों और नाविकों की सोवियतें बनाई गईं।
- बर्लिन और कई अन्य शहरों में “सोवियत शासन” के नारे लगाए गए।
🔸 वाइमर गणराज्य की प्रतिक्रिया :-
- समाजवादी, डेमोक्रैट और कैथोलिक दलों ने इस प्रकार की साम्यवादी व्यवस्था का विरोध कर,
- वाइमर में एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना का निर्णय लिया।
- वाइमर गणराज्य ने पुराने सैनिकों के फ़्री कोर नामक संगठन की मदद से इस विद्रोह को कुचल दिया।
🔸 परिणाम :-
- स्पार्टकिस्टों ने जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी की नींव डाली।
- कम्युनिस्ट और समाजवादी एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए।
- इस विभाजन के कारण हिटलर के खिलाफ कभी साझा मोर्चा नहीं बन सका।
🔹 आर्थिक संकट (1923 का अति-मुद्रास्फीति संकट) :-
आर्थिक संकट के कारण :-
- जर्मनी ने पहला विश्वयुद्ध कर्ज लेकर लड़ा था।
- युद्ध के बाद उसे स्वर्ण मुद्रा में भारी हर्जाना भरना पड़ा।
- इस दोहरे बोझ से जर्मनी का स्वर्ण भंडार खत्म होने लगा।
- आखिरकार 1923 में जर्मनी ने कर्ज और हर्जाना चुकाने से इनकार कर दिया।
रूर क्षेत्र पर फ्रांसीसी कब्जा :- कर्ज और हर्जाना चुकाने से इनकार करने पर फ्रांस ने जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र “रूर (Ruhr)” पर कब्जा कर लिया। यह जर्मनी के विशाल कोयला भंडारों वाला इलाका था।
सरकार की गलत प्रतिक्रिया :- जर्मन सरकार ने निष्क्रिय प्रतिरोध के नाम पर अत्यधिक कागजी मुद्रा छापनी शुरू कर दी।
🔸 परिणाम: अति-मुद्रास्फीति
- मुद्रा का अवमूल्यन: जर्मन मार्क का मूल्य तेजी से गिरा।
- अप्रैल 1923 → 1 डॉलर = 24,000 मार्क
- जुलाई 1923 → 1 डॉलर = 3,53,000 मार्क
- अगस्त 1923 → 1 डॉलर = 46,21,000 मार्क
- दिसंबर 1923 → 1 डॉलर = 9,88,60,000 मार्क (!!)
🔸 मुद्रास्फीति का जन-जीवन पर प्रभाव :-
- रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बेतहाशा बढ़ गईं।
- लोग पावरोटी खरीदने के लिए बैलगाड़ी में नोट भरकर ले जाते थे।
- जर्मन समाज दुनिया भर में हमदर्दी का पात्र बन कर रह गया।
🔸 नोट: इस संकट को बाद में अति-मुद्रास्फीति का नाम दिया गया।
🔹 संकट का समाधान: डॉव्स योजना (1924) :-
- 1924 में अमेरिकी सरकार ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए डॉव्स योजना बनाई।
- मुख्य उद्देश्य: जर्मनी के आर्थिक संकट को दूर करना।
- कार्यवाही: हर्जाने की शर्तों को दोबारा तय (पुनर्निर्धारित) किया गया ताकि जर्मनी पर बोझ कम हो।
अति-मुद्रास्फीति :-
मुद्रा के मूल्य में अत्यधिक गिरावट और जब वस्तुओं व आवश्यक चीज़ों की कीमतें बेहिसाब बढ़ जाती हैं तो उस स्थिति को अति-मुद्रास्फीति का नाम दिया जाता है।
वैश्विक आर्थिक मंदी (1929-1933) :-
🔹 1929 – वॉल स्ट्रीट दुर्घटना और महामंदी की शुरुआत :-
- कारण: अक्टूबर 1929 में अमेरिकी शेयर बाज़ार (वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज) ध्वस्त हो गया।
- लोग घबराकर अपने शेयर बेचने लगे — केवल 24 अक्टूबर को ही 1.3 करोड़ शेयर बेचे गए। जिससे शेयरों का मूल्य गिर गया।
- यह घटना आर्थिक महामंदी की शुरुआत थी।
- 🔸 अमेरिका पर प्रभाव 1929–1932 के बीच:
- अमेरिका की राष्ट्रीय आय आधी रह गई।
- फ़ैक्ट्रियाँ बंद, निर्यात घटा, और बेरोज़गारी बढ़ी।
- वैश्विक प्रभाव: इस मंदी का असर पूरी दुनिया पर, विशेष रूप से जर्मनी पर, पड़ा।
जर्मनी पर महामंदी का प्रभाव :-
अमेरिकी सहायता बंद: जर्मनी की अर्थव्यवस्था अमेरिकी कर्ज पर निर्भर थी, जो वॉल स्ट्रीट दुर्घटना के बाद अचानक बंद हो गया।
(i) औद्योगिक और आर्थिक स्थिति :-
- 1932 तक औद्योगिक उत्पादन 1929 के स्तर का मात्र 40% रह गया।
- 60 लाख लोग बेरोज़गार हो गए।
- वेतन घट गए, रोजगार खत्म हो रहे थे।
(ii) बेरोज़गारी और सामाजिक हताशा :-
- सड़कों पर लोग “मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ” लिखी तख्तियाँ लेकर खड़े रहते।
- युवा वर्ग बेरोज़गार होकर या तो ताश खेलते, नुक्कड़ों पर झुंड बनाते, या अपराधों में लिप्त हो गया।
- रोज़गार दफ्तरों के बाहर लंबी कतारें लगती थीं।
- चारों ओर हताशा और डर का माहौल था।
(iii) मध्यवर्ग और व्यवसायी वर्ग पर असर :-
- मुद्रा के अवमूल्यन से मध्यवर्ग की बचत खत्म हो गई।
- वेतनभोगी कर्मचारी, पेंशनभोगी, छोटे व्यवसायी, व्यापारी — सब प्रभावित हुए।
- स्वरोजगारियों और खुदरा व्यापारियों को डर था कि वे गरीबी या मजदूरी तक पहुँच जाएंगे।
(iv) किसान वर्ग पर प्रभाव :-
- कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट आई।
- किसान कर्ज़ में डूब गए और उनकी आय घट गई।
वाइमर गणराज्य का पतन ( वाइमर गणराज्य की संवैधानिक कमजोरियाँ) :-
वाइमर गणराज्य की दो प्रमुख संवैधानिक कमजोरियों ने संकट को और गहरा किया:
- 🔸 आनुपातिक प्रतिनिधित्व :-
- इस नियम के कारण किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना मुश्किल था।
- परिणाम: लगातार कमजोर गठबंधन सरकारें बनीं।
- आँकड़ा: अपने छोटे से जीवन काल में वाइमर गणराज्य का शासन 20 मंत्रिमंडलों के हाथों में रहा और उनकी औसत अवधि 239 दिन से ज्यादा नहीं रही।
- 🔸 अनुच्छेद 48 (Article 48) :-
- इसके तहत राष्ट्रपति को आपातकाल लगाने, नागरिक अधिकार रद्द करने और अध्यादेशों के जरिए शासन चलाने का अधिकार था।
- इसका खूब दुरुपयोग हुआ, जिससे लोकतंत्र कमजोर हुआ।
🔹 अंतिम परिणाम: लोकतंत्र में विश्वास का संकट :-
- आर्थिक संकट का हल लोकतांत्रिक सरकारें नहीं ढूँढ पाईं।
- आर्थिक मंदी और राजनीतिक अस्थिरता के कारण:
- जनता वाइमर सरकार से निराश हो गई।
- लोगों का लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था से विश्वास उठने लगा।
- लोग “मजबूत नेता” की तलाश करने लगे।
- इसी माहौल ने हिटलर और नात्सी पार्टी को सत्ता तक पहुँचने का रास्ता दिया।
प्रोपेगेंडा :-
जनमत को पोस्टरों, फ़िल्मों और भाषणों आदि के माध्यम से प्रभावित करने के लिए किया जाने वाला एक खास तरह का प्रचार प्रोपेगेंडा कहलाता हैं।
हिटलर का उदय और नात्सीवाद का फैलाव :-
🔹 हिटलर का प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक शुरुआत :-
- जन्म: 1889, ऑस्ट्रिया में।
- बचपन और युवावस्था काफी गरीबी में बीती।
- कोई स्थायी रोज़गार नहीं था, इसलिए पहले विश्वयुद्ध के समय फौज में भर्ती हो गया।
- युद्ध में वह संदेशवाहक और बाद में कॉर्पोरल बना।
- बहादुरी के लिए उसने कुछ तमगे भी हासिल किए।
🔸 जर्मनी की हार का हिटलर पर प्रभाव: जर्मन सेना की पराजय ने तो उसे हिला दिया था, लेकिन वर्साय की संधि ने तो उसे आग-बबूला ही कर दिया।
🔸 हिटलर का राजनीति में प्रवेश: 1919 में जर्मन वर्कर्स पार्टी नामक छोटे समूह में शामिल हुआ।
🔸 नात्सी पार्टी का गठन: धीरे-धीरे उसने इस पार्टी पर नियंत्रण कर लिया और इसका नाम बदलकर नैशनल सोशलिस्ट पार्टी रख दिया। जिसे आगे चलकर नात्सी पार्टी के नाम से जाना गया।
हिटलर के सत्ता की ओर बढ़ते कदम :-
🔸 1923 का विफल विद्रोह: हिटलर ने बवेरिया पर कब्ज़ा करने और बर्लिन पर चढ़ाई करने और सत्ता पर कब्ज़ा करने की योजना बनाई। यह प्रयास असफल रहा, हिटलर को गिरफ़्तार किया गया। लेकिन कुछ समय बाद छोड़ दिया गया।
🔸 1930 के दशक तक सीमित लोकप्रियता: शुरुआती वर्षों में नात्सी पार्टी जनता को बड़े पैमाने पर आकर्षित नहीं कर पाई।
🔸 1929 के चुनाव: 1929 में नात्सी पार्टी को जर्मन संसद राइख़स्टाग- के लिए मात्र 2.6 फीसदी वोट मिले।
🔸 महामंदी ने रास्ता साफ किया: 1929 की महामंदी ने जर्मनी को गहरे संकट में डाल दिया, जिसने नात्सीवाद को एक जन आंदोलन बना दिया।
🔸 1932 के चुनाव: 1932 तक आते-आते यह देश की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी और उसे 37 फ़ीसदी वोट मिले।
हिटलर की लोकप्रियता के कारण :-
🔸 जबर्दस्त वक्ता: वह एक शक्तिशाली और प्रभावशाली वक्ता था जो लोगों को भावनात्मक रूप से झकझोर सकता था।
🔸 हिटलर के आकर्षक वादे :-
- वह अपने भाषणों में एक शक्तिशाली राष्ट्र की स्थापना,
- वर्साय संधि का प्रतिशोध और जर्मनी की खोई हुई प्रतिष्ठा की वापसी।
- बेरोजगारों को रोजगार और युवाओं को सुरक्षित भविष्य देगा।
- देश को विदेशी प्रभाव से मुक्त कराएगा और तमाम विदेशी ‘साजिशों’ का मुँहतोड़ जवाब देगा।
नात्सी प्रचार शैली (प्रचार और नाटकीयता की नई शैली) :-
- हिटलर ने राजनीति की एक नई शैली विकसित की जिसमे वह प्रदर्शन और प्रतीकों का भरपूर प्रयोग करता था।
- बड़ी रैलियाँ और सभाएँ आयोजित कीं ताकि एकता और शक्ति का प्रदर्शन हो सके।
- प्रतीकों का इस्तेमाल: स्वस्तिक छपे लाल झंडे, नात्सी सैल्यूट और भाषणों के बाद खास अंदाज में तालियों की गड़गड़ाहट ये सारी चीजें शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा थीं।
- हिटलर की ‘मसीहा’ छवि: प्रचार के जरिए हिटलर को एक रक्षक और एक मसीहा के रूप में पेश किया गया, जो जर्मनी को संकट से उबारने आया था।
- युद्ध, बेरोज़गारी और अस्थिरता से जूझ रही जनता के लिए यह छवि आकर्षक और आशावान लगी।
कंसन्ट्रेशन कैंप :-
ऐसे स्थान जहाँ बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को कैद रखा जाता था, कंसन्ट्रेशन कैंप कहलाते थे। ये कंसन्ट्रेशन कैंप बिजली का करंट दौड़ते कँटीले तारों से घिरे रहते थे।
हिटलर का सत्ता में आना और तानाशाही की स्थापना (1933-1934) :-
🔹 हिटलर का सत्ता में आगमन :-
30 जनवरी 1933 – जर्मनी के राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग ने एडॉल्फ हिटलर को “चांसलर” (प्रधान मंत्री) नियुक्त किया।
- चांसलर का पद जर्मन मंत्रिमंडल का सबसे शक्तिशाली पद था।
- इस समय तक नात्सी पार्टी ने रूढ़िवादियों को भी अपने पक्ष में कर लिया था।
🔹 संसद भवन में आग की घटना और नागरिक अधिकारों का निलंबन :-
फरवरी 1933 में जर्मन संसद भवन में रहस्यमय आग लगी। नात्सियों ने इसका झूठा आरोप कम्युनिस्टों पर लगाया।
🔸 अग्नि अध्यादेश (28 फरवरी 1933): इस अग्निकांड का बहाना लेकर एक आपातकालीन कानून (अग्नि अध्यादेश (फ्रायर डिक्री)) लागू किया गया।
- इस अध्यादेश के तहत:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
- प्रेस की स्वतंत्रता, और
- सभा करने का अधिकार
➤ इन नागरिक अधिकारों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया गया।
- परिणाम: हिटलर ने लोकतंत्र के सभी संवैधानिक अधिकारों को खत्म कर दिया।
- हजारों कम्युनिस्टों को गिरफ्तार कर कंसन्ट्रेशन कैंप में डाल दिया गया।
- उदाहरण: केवल पाँच लाख की आबादी वाले ड्यूस्सलडॉर्फ़ शहर में दर्ज 1,440 कम्युनिस्ट गिरफ्तार हुए।
- नात्सियों ने केवल कम्युनिस्टों ही नहीं, बल्कि कुल 52 वर्गों के लोगों को निशाना बनाया।
🔹 विशेषाधिकार अधिनियम “इनेबलिंग एक्ट” – 3 मार्च 1933 :-
3 मार्च 1933 को प्रसिद्ध विशेषाधिकार अधिनियम (इनेबलिंग ऐक्ट) पारित किया गया। यह अधिनियम जर्मनी में तानाशाही की कानूनी स्थापना था।
इसके तहत: इस कानून ने हिटलर को संसद को हाशिए पर धकेलने और केवल अध्यादेशों के जरिए शासन चलाने का निरंकुश अधिकार प्रदान कर दिया।
- सभी राजनीतिक पार्टियाँ और ट्रेड यूनियनें पाबंदी लगा दी गई।
- अर्थव्यवस्था, मीडिया, सेना और न्यायपालिका पर राज्य का पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया।
- लोकतंत्र की जगह नात्सी तानाशाही स्थापित हुई।
नात्सी नियंत्रण और दमनकारी संस्थाएँ :-
समाज पर पूरा नियंत्रण स्थापित करने के लिए विशेष सुरक्षा दस्ते बनाए गए :- पहले से मौजूद हरी वर्दीधारी पुलिस और स्टॉर्म दूपर्स (एसए) के अलावा गेस्तापो (गुप्तचर राज्य पुलिस), एसएस (अपराध नियंत्रण पुलिस) और सुरक्षा सेवा (एसडी) का भी गठन किया गया।
इन संगठनों को असंवैधानिक और निरंकुश अधिकार दिए गए।
- इन संस्थाओं को दिए गए अधिकार:
- किसी को भी बंद किया जा सकता था।
- किसी को भी बिना मुकदमे के गिरफ्तार, यातना गृहों में भेजा, या देश निकाला दिया जा सकता था।
- इन्हीं की वजह से नात्सी राज्य को एक खूंखार आपराधिक राज्य की छवि प्राप्त हुई।
हिटलर की नीतियाँ और विस्तारवाद :-
🔹 हिटलर का अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के प्रयास :-
- हिटलर ने अर्थव्यवस्था को सँभालने की जिम्मेदारी प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ह्यालमार शाख़्त को दी।
- शाख़्त ने सरकारी निवेश के ज़रिए रोज़गार संवर्धन कार्यक्रम शुरू किए।
- लक्ष्य: सौ फ़ीसदी उत्पादन और सौ फ़ीसदी रोज़गार उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया।
- परिणामस्वरूप: मशहूर जर्मन सुपर हाइवे और जनता की कार-फ़ॉक्सवैगन-इस परियोजना की देन थी।
🔹 हिटलर की विदेश नीति और उसमें शुरुआती सफलताएँ :-
हिटलर ने विदेश नीति में एक जन, एक साम्राज्य, एक नेता का नारा दिया और वर्साय संधि की शर्तों को तोड़कर जर्मनी का विस्तार शुरू किया:
- 1933: लीग ऑफ नेशंस से अलग हो गया।
- 1936: राईनलैंड पर दोबारा कब्जा किया।
- 1938: ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय कर दिया।
- 1938-39: सुडेटनलैंड और फिर पूरे चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया।
- 🔸 इंग्लैंड की भूमिका: इंग्लैंड का भी खामोश समर्थन था क्योंकि इंग्लैंड को लगा था कि वर्साय की संधि ने जर्मनी के साथ अन्याय किया था।
द्वितीय विश्वयुद्ध (1933–1945) :-
🔹 युद्ध का मार्ग :-
- शाख्त ने चेताया कि हथियारों पर खर्च से अर्थव्यवस्था बिगड़ेगी, पर हिटलर ने उसे हटा दिया।
- हिटलर ने आर्थिक विस्तार के लिए युद्ध को समाधान माना।
🔸 द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत: सितंबर 1939 में पोलैंड पर हमले के साथ युद्ध शुरू हुआ, जिससे ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध में कूद पड़े।
🔹 त्रिपक्षीय संधि – 1940 :-
सितंबर 1940 में जर्मनी, इटली और जापान ने मिलकर एक त्रिपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए।
- यह तीनों देश मिलकर “धुरी राष्ट्र” बने।
- इस संधि से हिटलर की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति मजबूत हो गई।
- यूरोप के कई देशों में नात्सी समर्थक कठपुतली सरकारें बिठा दी गईं।
🔹 युद्ध का विस्तार और हिटलर की पराजय :-
जून 1941 को हिटलर ने सोवियत संघ (USSR) पर आक्रमण किया। यह निर्णय हिटलर की “सबसे बड़ी गलती” साबित हुआ।
- परिणाम:
- पश्चिमी मोर्चा: जर्मन पश्चिमी मोर्चा ब्रिटिश वायुसैनिकों के बमबारी की चपेट में आ गया।
- पूर्वी मोर्चा: पूर्वी मोर्चे पर सोवियत सेनाएँ जर्मनों को नाकों चने चचवा रही थीं।
- सोवियत सेना ने जर्मनों को खदेड़ते हुए बर्लिन पर कब्जा कर लिया।
🔹 अमेरिका का युद्ध में प्रवेश :-
अमेरिका शुरू में युद्ध से दूर रहा। अमेरिका पहले विश्वयुद्ध की वजह से पैदा हुई आर्थिक समस्याओं को दोबारा नहीं झेलना चाहता था।
- कारण: परंतु जापान के विस्तार और 7 दिसंबर 1941 को पर्ल हार्बर पर अमेरिकी नौसैनिक ठिकानों पर हमले के बाद अमेरिका भी युद्ध में शामिल हो गया।
- अब यह संघर्ष विश्व स्तर का युद्ध (World War II) बन गया।
🔹 युद्ध का अंत (1945) :- यह युद्ध मई 1945 में हिटलर को पराजय और जापान के हिरोशिमा शहर पर अमेरिकी परमाणु बम गिराने के साथ खत्म हुआ।
नॉर्डिक जर्मन आर्य :-
आर्य बताए जाने वालों की एक शाखा। ये लोग उत्तरी यूरोपीय देशों में रहते थे और जर्मन या मिलते-जुलते मूल के लोग थे।
नात्सियों का विश्व दृष्टिकोण :-
- नात्सी अपराध एक विशिष्ट मूल्य प्रणाली और नस्ली सोच पर आधारित थे।
- नात्सी विचारधारा हिटलर के व्यक्तिगत विश्व-दृष्टिकोण पर आधारित थी।
- हिटलर के अनुसार सभी समाज बराबर नहीं हैं। समाजों को नस्ल के आधार पर ऊँचा या नीचा माना गया।
- सर्वोच्च नस्ल: ब्लॉन्ड, नीली आँखों वाले, नॉर्डिक जर्मन आर्य सबसे ऊपरी
- सबसे निचली नस्ल: यहूदी, जिन्हें आर्यों का कट्टर शत्रु माना जाता था।
- अन्य सभी समाजों को इस पैमाने पर आर्यों और यहूदियों के बीच में रखा गया था।
डार्विन के सिद्धांत का गलत इस्तेमाल :-
हिटलर की नस्लीय सोच चार्ल्स डार्विन (विकास का सिद्धांत) और हर्बर्ट स्पेंसर (“योग्यतम की उत्तरजीविता”) के विचारों से प्रभावित थी।
- नात्सियों की दलील बहुत सरल थी:
- जो नस्ल सबसे ताकतवर है वह जिंदा रहेगी; कमजोर नस्लें खत्म हो जाएँगी।
- आर्य नस्ल सर्वश्रेष्ठ है। उसे अपनी शुद्धता बनाए रखनी है, ताकत हासिल करनी है और दुनिया पर वर्चस्व कायम करना है।
🔸 महत्वपूर्ण तथ्य: डार्विन ने इसे एक प्राकृतिक प्रक्रिया बताया था, इसमें मानवीय हस्तक्षेप की वकालत नहीं की थी। नात्सियों ने साम्राज्यवाद को सही ठहराने के लिए इस सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया।
लेबेन्सराउम – ‘जीवन-परिधि’ :-
- यह एक भू-राजनीतिक अवधारणा थी।
- मुख्य विचार: जर्मन लोगों को बसाने और संसाधन जुटाने के लिए अधिक-से-अधिक भौगोलिक क्षेत्र पर कब्जा करना जरूरी है।
- (लक्ष्य):
- मातृदेश का क्षेत्रफल बढ़ाना।
- जर्मन राष्ट्र के लिए अपार शक्ति और संसाधन इकट्ठा करना।
- सभी जर्मनों को भौगोलिक रूप से एक ही स्थान पर एकत्र करना।
- पहला प्रयोग: पोलैंड को इस नीति की पहली प्रयोगशाला बनाया गया।
नात्सी शासन में स्कूल, शिक्षा और युवाओं की स्थिति :-
- हिटलर का मानना था कि “मजबूत नात्सी समाज” बनाने के लिए बच्चों को नात्सी विचारधारा की घुट्टी पिलाना जरूरी है।
- बच्चों पर स्कूल के भीतर और बाहर दोनों जगह पूरा नियंत्रण स्थापित किया गया।
- स्कूलों में शुद्धीकरण अभियान चलाया गया —
- यहूदी और “राजनीतिक रूप से अविश्वसनीय” शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया गया या बाद में मार दिया गया।
- जर्मन और यहूदी बच्चे एक साथ न तो बैठ सकते थे और न खेल-कूद सकते थे।
- बाद में “अवांछित बच्चों” (यहूदी, जिप्सी, विकलांग) को स्कूलों से निकाल दिया गया।
- चालीस के दशक में तो उन्हें भी गैस चेंबरों में झोंक दिया गया।
- “अच्छे जर्मन बच्चों” को नात्सी विचारधारा पर आधारित शिक्षा दी गई।
- पाठ्यपुस्तकें नई लिखी गईं; “नस्ल विज्ञान” को विषय के रूप में जोड़ा गया।
- गणित तक में यहूदियों को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया।
- बच्चों को सिखाया गया कि वे वफादार व आज्ञाकारी बनें, यहूदियों से नफ़रत और हिटलर की पूजा करें।
- खेल-कूद (विशेषकर मुक्केबाज़ी) को बच्चों को मर्दाना और आक्रामक बनाने का साधन माना गया।
नात्सी युवा संगठन (हिटलर यूथ लीग):-
- 10 वर्ष की आयु में बच्चों को “जुंगफोल्क” में भर्ती किया जाता था।
- 14 वर्ष की आयु में सभी लड़कों को हिटलर यूथ का सदस्य बनना अनिवार्य था।
यहाँ उन्हें सिखाया जाता था — इस संगठन में वे युद्ध की उपासना, आक्रामकता व हिंसा, लोकतंत्र की निंदा और यहूदियों, कम्युनिस्टों, जिप्सियों व अन्य ‘अवांछितों’ से घृणा का सबक सीखते थे।
18 वर्ष की आयु में वे लेबर सर्विस (श्रम सेवा) में जाते और फिर सेना में भर्ती होते थे।
🔸 हिटलर यूथ लीग (1922) :- नात्सी यूथ लीग का गठन 1922 में हुआ था। चार साल बाद उसे हिटलर यूथ का नया नाम दिया गया। 1933 तक आते-आते इस संगठन में 12.5 लाख से ज्यादा बच्चे थे।
युवा आंदोलन को नात्सीवाद के तहत एकजुट करने के लिए बाकी सभी युवा संगठनों को पहले भंग कर दिया गया और बाद में उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
नात्सी जर्मनी में महिलाओं की स्थिति :-
- नात्सी जर्मनी में बच्चों को सिखाया जाता था कि औरतें मर्दों से अलग हैं।
- महिलाओं के समान अधिकारों का संघर्ष गलत और समाज के लिए हानिकारक माना जाता था।
🔸 महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिकाएँ :-
लड़कों / पुरुषों के लिए: आक्रामक, मर्दाना और कठोर बनने की शिक्षा।
लड़कियों / महिलाओं के लिए:
- मुख्य कर्तव्य: एक अच्छी माँ बनना था।
- जिम्मेदारियाँ:
- शुद्ध आर्य रक्त वाले बच्चों को जन्म देना।
- बच्चों का पालन-पोषण करना।
- नस्ल की शुद्धता बनाए रखना।
- घर संभालना।
- बच्चों को नात्सी मूल्यों की शिक्षा देना।
- महिलाओं को आर्य संस्कृति और नस्ल की ध्वजवाहक माना जाता था।
- 1933 में हिटलर ने कहा था ‘मेरे राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण नागरिक माँ है।
- लेकिन सभी माताओं के साथ समान व्यवहार नहीं था।
- “अवांछित नस्ल” के बच्चों की माताओं को दंड दिया जाता था।
- “वांछित नस्ल” के बच्चों की माताओं को इनाम मिलते थे।
🔹 माताओं को प्रोत्साहन और पुरस्कार :-
पुरस्कार प्रणाली: चार बच्चे पैदा करने वाली माँ को काँसे का, छः बच्चे पैदा करने वाली माँ को चाँदी का और आठ या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली माँ को को सोने सोने का का। तमगा दिया जाता था।
अन्य लाभ: अस्पताल में विशेष सुविधाएँ, दुकानों पर छूट, सस्ते थिएटर और रेलवे टिकट मिलते थे।
🔹 कठोर दंड और सार्वजनिक अपमान :-
- निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली ‘आर्य’ औरतों की सार्वजनिक रूप से निंदा की जाती थी और उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था।
- सजा के रूप में औरतों को गंजा करके, मुँह पर कालिख पोत कर और उनके गले में तख्ती लटका कर पूरे शहर में घुमाया जाता था।
- उनके गले में लटकी तख्ती पर लिखा होता था ‘मैंने राष्ट्र के सम्मान को मलिन किया है।’
- अन्य दंड: जेल की सजा। नागरिक अधिकारों की हानि और परिवार से वंचित किया जाना।
नात्सी प्रचार और भाषा का हथियार के रूप में इस्तेमाल :-
नात्सी शासन ने भाषा और मीडिया का चतुराई से उपयोग किया।
हिटलर का उद्देश्य: जनता के विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण करना।
🔹 भाषा का भ्रामक इस्तेमाल: शब्दों को छिपाना
नात्सियों ने अपने अमानवीय अपराधों को छिपाने के लिए भ्रामक और नरम शब्दावली का इस्तेमाल किया। ‘हत्या’ या ‘मौत’ जैसे शब्दों का उपयोग नहीं किया जाता था।
- भ्रामक शब्दावली बनाई गई:
- ‘विशेष व्यवहार’ → सामूहिक हत्या
- ‘अंतिम समाधान’ → यहूदियों का संहार
- ‘यूथनेज़िया’ → विकलांगों की हत्या
- ‘इवैक्युएशन’ → लोगों को गैस चेंबरों में ले जाना
- ‘संक्रमण-मुक्ति क्षेत्र’ → गैस चेंबर
गैस चेंबरों को “स्नानघर” जैसा दिखाया जाता था, एवं नकली फव्वारे लगाए जाते थे।
🔹 मीडिया और प्रचार का इस्तेमाल :-
- नात्सी शासन ने अपना समर्थन बढ़ाने और अपनी विचारधारा फैलाने के लिए मीडिया का सोच-समझकर इस्तेमाल किया।
- प्रचार के साधन: तस्वीरें, फिल्में, रेडियो, पोस्टर, नारे, पर्चे।
- पोस्टरों में “जर्मनों के दुश्मनों” को मजाक उड़ाते हुए, अपमानित रूप में दिखाया जाता था।
- यहूदियों को “केंचुआ, चूहा, कीड़ा” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया।
- समाजवादी और उदारवादी – उन्हें कमजोर, पथभ्रष्ट और विदेशी एजेंट के रूप में दिखाया जाता था।
🔹 प्रचार का उद्देश्य और प्रभाव :-
- प्रचार फिल्मों में यहूदियों के प्रति नफरत फैलाना मुख्य उद्देश्य था।
- नात्सीवाद ने लोगों के दिल-दिमाग पर गहरा असर डाला।
- जनता के गुस्से और नफरत को “अवांछितों” की ओर मोड़ा गया।
- इस प्रचार ने नात्सीवाद का सामाजिक आधार तैयार किया।
- नात्सियों ने हर वर्ग के लोगों को यह विश्वास दिलाया कि “उनकी समस्याओं का हल केवल नात्सी दे सकते हैं।”