Class 9 History chapter 4 notes in hindi || वन्य समाज और उपनिवेशवाद notes

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कक्षा 9 इतिहास अध्याय 4 नोट्स: वन्य समाज और उपनिवेशवाद class 9 notes

TextbookNcert
ClassClass 9
SubjectHistory
ChapterChapter 4
Chapter Nameवन्य समाज और उपनिवेशवाद नोट्स
MediumHindi

आप यहां से vanya samaj aur upniveshvad notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम भारत में वन विनाश, भारतीय वन सेवा, वन अधिनियम, वैज्ञानिक वानिकी, वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

 जंगलों से प्राप्त होने वाली वस्तुएँ (हमारे दैनिक जीवन में) :- 

🔸 जंगल से मिलने वाली वस्तुएँ: हमारे दैनिक जीवन की बहुत सी वस्तुएँ जंगलों से आती हैं, जैसे —

  • कागज़ – किताबों और कॉपियों के लिए
  • लकड़ी की वस्तुएँ – मेज़, कुर्सियाँ, दरवाज़े, खिड़कियाँ
  • रंग और मसाले – कपड़ों और भोजन में प्रयोग
  • सेलोफ़ेन रैपर – टॉफ़ी पैक करने में
  • तेंदू पत्ते – बीड़ी बनाने में
  • गोंद, शहद, कॉफ़ी, चाय, रबड़ – दैनिक जीवन की वस्तुएँ
  • साल के बीजों का तेल – चॉकलेट आदि में प्रयोग
  • टैनिन – चमड़ा तैयार करने में
  • जड़ी-बूटियाँ – औषधियों में उपयोग

🔸 अन्य वस्तुएँ जो जंगलों से मिलती हैं: बाँस, जलावन की लकड़ी, घास, कच्चा कोयला (चारकोल), पैकिंग सामग्री, फल-फूल, पशु-पक्षी एवं ढेरों दूसरी चीजें भी जंगलों से ही आती हैं।

जंगलों की जैव-विविधता :- 

ऐमेज़ॉन या पश्चिमी घाट के जंगलों के एक छोटे से भाग में ही 500 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह विविधता अब तेज़ी से लुप्त हो रही है।

औद्योगीकरण और जंगलों की हानि :-

सन् 1700 से 1995 के बीच लगभग 139 लाख वर्ग किलोमीटर जंगल साफ किए गए। यह दुनिया के कुल क्षेत्रफल का 9.3% भाग था।

🔸 विनाश का कारण :- यह जंगल के भाग औद्योगिक उपयोग, खेती, चरागाहों और ईंधन की लकड़ी के लिए साफ़ किए गए।

 वन-विनाश :-

वनों के लुप्त होने को वन-विनाश कहा जाता है।

वनों का विनाश क्यों हुआ? 

यह कोई नई समस्या नहीं थी, लेकिन औपनिवेशिक शासन में यह अधिक व्यवस्थित और व्यापक रूप में हुआ।

औपनिवेशिक काल में भारत में वन विनाश के मुख्य कारण ज़मीन की बेहतरी (कृषि का विस्तार), रेलवे के विस्तार के लिए स्लीपर और बागान थे।

वन विनाश के मुख्य कारण :-

🔹 1. ज़मीन की बेहतरी (कृषि का विस्तार) :-

सन् 1600 में हिंदुस्तान के कुल भू-भाग के लगभग छठे हिस्से पर खेती होती थी। आज यह आँकड़ा बढ़ कर आधे तक पहुँच गया है।

🔸 कारण :-

  • जनसंख्या वृद्धि: जनसंख्या बढ़ने और खाद्य पदार्थों की बढ़ती माँग के कारण किसानों ने जंगल काटकर खेती का क्षेत्र बढ़ाया।
  • अंग्रेजों की नीतियाँ:
    • व्यावसायिक फसलें: अंग्रेजों ने जूट, गन्ना, गेहूँ, कपास जैसी फसलों को प्रोत्साहित किया ताकि यूरोप की बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न और उद्योगों के लिए कच्चा माल मिल सके।
    • जंगलों को ‘अनुत्पादक’ मानना: औपनिवेशिक सरकार जंगलों को बेकार भूमि मानती थी और उसे कृषि योग्य बनाकर राजस्व (टैक्स) बढ़ाना चाहती थी।

🔸 परिणाम: खेती के लिए जंगलों की कटाई बढ़ी। 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य जमीन के क्षेत्रफल में 67 लाख हेक्टेयर की बढ़त हुई।

🔹 2. रेलवे का विस्तार (पटरी पर स्लीपर) :- 

इंग्लैंड में लकड़ी की कमी: 19वीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में ओक (बलूत) के जंगल खत्म होने से नौसेना के जहाजों के लिए लकड़ी की कमी हो गई।

  • 1820 के दशक में अंग्रेजों ने भारत की वन संपदा का सर्वेक्षण कराया।
    • → इसके बाद बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और भारी मात्रा में लकड़ी का हिंदुस्तान से निर्यात होने लगा।
  • रेलवे की माँग: 1850 के दशक में रेलवे के विस्तार के लिए ईंधन और पटरियों के नीचे लगने वाले स्लीपरों के रूप में लकड़ी की भारी माँग पैदा हुई।

🔸 तथ्य: एक मील लंबी रेल लाइन के लिए 1760 से 2000 स्लीपरों की आवश्यकता होती थी।

🔸 परिणाम :-

  • 1890 तक 25,500 किमी और 1946 तक 7,65,000 किमी रेल लाइन बिछ गई।
  • स्लीपरों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए (जैसे केवल मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रतिवर्ष 35,000 पेड़ स्लीपरों के लिए काटे गए)।
  • रेलवे लाइनों के आस-पास के जंगल तेज़ी से समाप्त हो गए।
🔹 3. बागान :- 

🔸 यूरोप में माँग: यूरोप में चाय, कॉफ़ी और रबड़ की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए बागान बनाए गए। इसके लिए प्राकृतिक वनों को साफ़ किया गया।

  • औपनिवेशिक सरकार ने:
    • जंगलों को अपने कब्ज़े में लेकर, उनके बड़े हिस्से यूरोपीय बागान मालिकों को सस्ती दरों पर दिए।
    • बागान क्षेत्रों की बाड़ाबंदी की गई और वहाँ चाय व कॉफ़ी की खेती शुरू हुई।

औपनिवेशिक वन प्रबंधन और वैज्ञानिक वानिकी :- 

अंग्रेजों को डर था कि स्थानीय लोगों और व्यापारियों द्वारा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जंगल नष्ट हो जाएँगे। इसलिए उन्होंने जर्मन विशेषज्ञ डायट्रिच ब्रैंडिस को भारत बुलाया।

🔹 वन प्रबंधन की शुरुआत (डायट्रिच ब्रैंडिस) :- 

🔸 डायट्रिच ब्रैंडिस: एक जर्मन विशेषज्ञ थे, जिन्हें भारत बुलाया गया और देश का पहला वन महानिदेशक नियुक्त किया गया।

  • ब्रैंडिस ने ज़ोर दिया कि:
    • लोगों को संरक्षण विज्ञान में प्रशिक्षित किया जाए।
    • कानूनी नियम बनाए जाएँ ताकि जंगलों का व्यवस्थित प्रबंधन हो सके।
    • पेड़ों की कटाई, पशुओं की चराई आदि पर नियंत्रण लगाया जाए।
    • नियम तोड़ने वालों को सज़ा मिले।
🔹 पहला भारतीय वन सेवा और भारतीय वन अधिनियम :- 
  • 1864: ब्रैंडिस ने भारतीय वन सेवा की स्थापना की।
  • 1865: पहला भारतीय वन अधिनियम बना।
  • 1906: देहरादून में इम्पीरियल फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। यहाँ “वैज्ञानिक वानिकी” की शिक्षा दी जाती थी।
🔹 वन अधिनियमों में संशोधन :- 

वन अधिनियम 1865 में लागू हुआ और बाद में 1878 और 1927 में इसमें दो बार संशोधन किए गए।

  • 1878 के अधिनियम के तहत जंगलों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
    • आरक्षित वन: सबसे अच्छे जंगलों को ‘आरक्षित वन’ कहा गया। 
      • गाँव वाले इन जंगलों से अपने उपयोग के लिए कुछ भी नहीं ले सकते थे।
    • सुरक्षित वन: आंशिक सरकारी नियंत्रण। गाँव वालो को सीमित उपयोग की अनुमति।
    • ग्रामीण वन: स्थानीय लोगों को ईंधन, लकड़ी, चराई आदि के लिए उपयोग की अनुमति।

वैज्ञानिक वानिकी :- 

वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई जिसमें पुराने पेड़ काट कर उनकी जगह नए पेड़ लगाए जाते हैं, इस विधि को वैज्ञानिक वानिकी कहते हैं।

वैज्ञानिक वानिकी की विशेषताएँ :- 

  • वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर विविध प्रजाति वाले प्राकृतिक वनों को काट डाला गया।
  • इनकी जगह सीधी पंक्ति में एक ही किस्म के पेड़ लगा दिए गए। → इसे “बागान” कहा गया।
  • वन विभाग सर्वेक्षण करता था और योजना बनाता था कि हर साल कितने इलाके के पेड़ काटे जाएँगे।
  • कटाई के बाद वहाँ दोबारा पेड़ लगाए जाने थे, ताकि कुछ वर्षों बाद फिर कटाई के लिए तैयार हो सके।

🔸 आलोचना: आज पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पद्धति विज्ञान नहीं बल्कि दोहन की नीति थी।

एक अच्छा जंगल कैसा होना चाहिए?

‘अच्छे जंगल’ की परिभाषा में अंतर: इसके बारे में वन विभाग / अंग्रेज़ और ग्रामीणों के विचार बहुत अलग थे।

वन विभाग / अंग्रेज़स्थानीय ग्रामीण
उन्हें व्यावसायिक लकड़ी (जैसे जहाज़ और रेलवे के लिए) की आवश्यकता थी।उन्हें विविध ज़रूरतों (ईंधन, चारा, पत्ते, भोजन, दवा) के लिए जंगल चाहिए थे।
वे सख्त, लंबे और सीधे पेड़ चाहते थे।उन्हें विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और लताएँ चाहिए थीं।
उन्होंने सागौन और साल जैसी प्रजातियों को बढ़ावा दिया और अन्य प्रजातियों को काट डाला।उन्हें जैव-विविधता (बहुत प्रकार के पेड़-पौधे) वाला जंगल पसंद था।

ग्रामीणों के लिए जंगल का महत्व :-

स्थानीय लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए जंगल पर निर्भर थे:

  • भोजन: फल, कंद-मूल (विशेषकर बारिश के मौसम में जब अनाज नहीं होता)।
  • दवाई: दवाओं के लिए जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है।
  • कृषि एवं उपकरण: लकड़ी का प्रयोग हल बनाने के लिए, बाड़ और टोकरी बनाने के लिए बाँस।
  • घरेलू सामान: पानी की बोतल (लौकी के खोल से), पत्तल-दोने (पत्तों से), रस्सी (लताओं से)।
  • ऊर्जा: खाना पकाने और रोशनी के लिए महुए का तेल।

👉 संक्षेप में: जंगल = ग्रामीणों का “जीवन–स्रोत”

इन वन नीतियों का स्थानीय लोगों पर प्रभाव :- 

🔹 वन अधिनियम का प्रभाव :-
  • वन अधिनियम लागू होने के बाद:
  • घर के लिए लकड़ी काटना, पशुओं को चराना, कंद-मूल-फल इकट्ठा करना आदि — सब ग़ैरक़ानूनी हो गया।
  • ग्रामीणों की दैनिक गतिविधियाँ अपराध मानी जाने लगीं।
  • लोगों को जंगल से चोरी-छिपे लकड़ी लेनी पड़ती, पकड़े जाने पर घूस देनी पड़ती।
  • जलावनी लकड़ी एकत्र करने वाली औरतें विशेष तौर से परेशान रहने लगीं।
  • पुलिस और वन चौकीदार लोगों से मुफ्त में खाने-पीने की माँग करके उन्हें तंग करते थे।
यह भी देखें ✯ कक्षा 9

झूम खेती (घुमंतू कृषि) पर औपनिवेशिक प्रभाव :-

🔹 झूम खेती क्या है? 

यह खेती का एक परंपरागत तरीका है, जो एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में प्रचलित था।

  • स्थानीय नाम: इस खेती के कई स्थानीय नाम हैं जैसे:
    • दक्षिण-पूर्व एशिया में लादिंग, मध्य अमेरिका में मिलपा, अफ्रीका में चितमेन या तावी व श्रीलंका में चेना। 
    • हिंदुस्तान में घुमंतू खेती के लिए धया, पेंदा, बेवर, नेवड़, झूम, पोडू, खंदाद और कुमरी ऐसे ही कुछ स्थानीय नाम हैं
🔹 झूम खेती की प्रक्रिया :-
  • जंगल का एक हिस्सा काटा और जलाया जाता है।
  • मॉनसून की पहली बारिश के बाद राख में बीज बो दिए जाते थे।
  • फसल अक्टूबर-नवंबर में काट ली जाती थी।
  • भूमि पर 2-3 साल खेती करने के बाद, उसे 12-18 साल के लिए परती छोड़ दिया जाता था ताकि जंगल दोबारा उग आए।
  • मिश्रित फसलें बोई जाती हैं, जैसे: जैसे मध्य भारत और अफ्रीका में ज्वार-बाजरा, ब्राजील में कसावा और लैटिन अमेरिका के अन्य भागों में मक्का व फलियाँ।
🔹 ब्रिटिश नज़र में झूम खेती :-
  • अंग्रेजों द्वारा झूम खेती पर रोक के कारण: अंग्रेज वन अधिकारियों ने इस पद्धति को नुकसानदेह माना। उनके अनुसार:
    • इससे रेलवे के लिए उपयोगी इमारती लकड़ी के पेड़ नहीं उग पाते थे।
    • जंगल को जलाने से अन्य बहुमूल्य पेड़ों के जलने का खतरा रहता था।
    • घुमंतू खेती करने वालों से लगान (टैक्स) वसूलना मुश्किल था।

इसलिए ब्रिटिश सरकार ने झूम खेती पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया।

🔹 रोक लगाने के परिणाम :-

अंग्रेजों द्वारा झूम खेती पर प्रतिबंध लगाने के गंभीर परिणाम हुए:

  • जबरन विस्थापन: अनेक समुदायों को जंगलों में उनके घरों से जबरन विस्थापित कर दिया गया।
  • जीविका का संकट: लोगों को अपना पारंपरिक पेशा (कृषि) बदलना पड़ा।
  • प्रतिरोध: इस नीति के विरोध में कई समुदायों ने छोटे-बड़े विद्रोह किए।

औपनिवेशिक वन नीतियों का शिकार पर प्रभाव :-

🔹 स्थानीय लोगों पर प्रभाव: शिकार पर प्रतिबंध :-
  • परंपरा: वनवासी हिरन, तीतर आदि छोटे जानवरों का शिकार करके अपना जीवनयापन करते थे।
  • औपनिवेशिक नीति: नए वन कानूनों ने इस पारंपरिक प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया।
  • परिणाम: शिकार करते हुए पकड़े जाने वालों को अवैध शिकार के लिए दंडित किया जाने लगा।

औपनिवेशिक काल में “शिकार” का रूपांतरण :-

  • जहाँ स्थानीयों के लिए शिकार अपराध बन गया, वहीं अंग्रेज़ों के लिए शिकार “खेल” बन गया।
  • पहले यह राजाओं और नवाबों की परंपरा थी, अब यह अंग्रेज़ अफ़सरों का शौक़ बन गया। ब्रिटिश काल में शिकार बेतहाशा बढ़ा।

🔸 अंग्रेजों का दृष्टिकोण:

  • बड़े जानवर (जैसे बाघ, भेड़िए, तेंदुए) को “जंगली, बर्बर, असभ्य समाज” का प्रतीक माना गया।
  • उनका मानना था कि इन जानवरों को मारकर वे भारत को “सभ्य” बना रहे हैं।
  • किसानों की रक्षा के बहाने इन जानवरों के शिकार पर इनाम दिए जाते थे।
🔹 शिकार और इनाम प्रणाली :- 
  • 1875 से 1925 के बीच: इनाम के लालच में 80,000 से ज़्यादा बाघ, 1,50,000 तेंदुए और 2,00,000 भेड़िये मार गिराए गए।
  • धीरे-धीरे बाघ के शिकार को एक खेल की ट्रॉफ़ी के रूप में देखा जाने लगा।
  • जॉर्ज यूल नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने अकेले 400 बाघों का शिकार किया।

🔸 परिणाम: कई प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर पहुँच गईं। बाद में पर्यावरणविदों और संरक्षणवादियों ने इनके संरक्षण की माँग उठाई।

वन नीतियों का आर्थिक प्रभाव और सामाजिक परिवर्तन :- 

🔹 वन उत्पादों के व्यापार में परिवर्तन :- 

🔸 परंपरागत व्यापार: मध्यकाल से ही आदिवासी और घुमंतू समुदाय (जैसे बंजारे) वन उत्पादों का व्यापार करते थे। इनमें खाल, सींग, रेशम के कोये, हाथी-दाँत, बाँस, मसाले, रेशे, घास, गोंद और राल के व्यापार आदि शामिल थे।

  • औपनिवेशिक नियंत्रण: अंग्रेजों के आने के बाद व्यापार पर सरकार का पूरा नियंत्रण हो गया।
  • इजारेदारी (एकाधिकार): ब्रिटिश सरकार ने बड़ी यूरोपीय कंपनियों को विशेष इलाकों में वन उत्पादों के व्यापार का एकाधिकार दे दिया।

विभिन्न समुदायों पर प्रभाव :- 

🔸 (क) पारंपरिक व्यवसायों का नुकसान:

  • शिकार और पशु चराने पर पाबंदी लगने से कई चरवाहा और घुमंतू समुदाय (जैसे कोरावा, कराचा, येरुकुला) अपनी रोज़ी-रोटी से वंचित हो गए।
  • इनमें से कुछ को ‘अपराधी कबीले’ कहा जाने लगा और ये सरकार की निगरानी में फ़ैक्ट्रियों, खदानों व बागानों में काम करने को मजबूर हो गए।

🔸 (ख) नए व्यापारिक अवसर (लेकिन निर्भरता):

  • कुछ समुदायों ने वन उत्पादों के व्यापार में नए अवसर तलाशे।
    • उदाहरण: ब्राज़ील के मुनदुरुकु समुदाय ने रबड़ व्यापारियों के लिए लेटेक्स इकट्ठा करना शुरू किया, लेकिन इससे वे पूरी तरह व्यापारियों पर निर्भर हो गए।

🔸 (ग) नए रोज़गार और उनकी स्थिति :- 

बागान मजदूर के रूप में शोषण: असम के चाय बागानों में काम के लिए संथाल, उराँव, गोंड जैसे आदिवासी पुरुषों और महिलाओं की भर्ती की गई।

  • शोषण की स्थिति:
  • उनकी मज़दूरी बहुत कम थी।
  • बहुत खराब काम करने की स्थितियाँ।
  • वापसी मुश्किल: उन्हें उनके गाँवों से उठा कर भर्ती तो कर लिया गया था लेकिन उनकी वापसी आसान नहीं थी।

वन विद्रोह :-

वन विभाग के नियंत्रण, नए कानूनों और शोषण ने जंगलों में रहने वाले समुदायों का जीवन कठिन बना दिया। इन अत्याचारों के विरुद्ध भारत और दुनिया के कई हिस्सों में विद्रोह हुए।

  • प्रमुख विद्रोहों के नायक:
    • संथाल परगना: सीधू और कानू
    • छोटा नागपुर: बिरसा मुंडा
    • आंध्र प्रदेश: अल्लूरी सीताराम राजू
    • छत्तीसगढ़ (बस्तर): गुंडा धूर

बस्तर का वन-विद्रोह (1910) :- 

🔹 बस्तर और उसके लोग :- 
  • स्थिति: बस्तर छत्तीसगढ़ के दक्षिणी छोर पर स्थित, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र की सीमाओं से लगा हुआ क्षेत्र है।
  • मुख्य नदी: इन्द्रावती नदी बस्तर के आर-पार पूरब से पश्चिम की तरफ़ बहती है।
  • निवासी: बस्तर में मरिया और मुरिया गोंड, धुरवा, भतरा, हलबा आदि अनेक आदिवासी समुदाय रहते हैं।
🔹 बस्तर लोगो के विश्वास और परंपराएँ :- 
  • गाँव की ज़मीन को ‘धरती माँ’ का देन मानते थे।
  • हर खेतिहर त्योहार पर धरती माँ को चढ़ावा चढ़ाया जाता है।
  • नदी, जंगल और पहाड़ को भी आत्मा स्वरूप माना जाता है।

🔸 बस्तर लोगो के द्वारा जंगल का प्रबंधन:

  • प्रत्येक गाँव की अपनी सीमा (चौहद्दी) होती थी।
  • दूसरे गाँव के जंगल से लकड़ी लेने पर देवसारी / दांड़ / मान नामक शुल्क दिया जाता था।
  • जंगलों की रक्षा के लिए चौकीदार रखे जाते थे, जिन्हें अनाज से वेतन दिया जाता था।
  • हर वर्ष परगने की सभा होती थी जहाँ जंगल व अन्य विषयों पर चर्चा की जाती थी।
🔹 बस्तर का वन-विद्रोह के कारण :- 

🔸 औपनिवेशिक नीतियाँ: 1905 में ब्रिटिश सरकार ने प्रस्ताव रखा की जंगल के दो-तिहाई हिस्से को आरक्षित करने, घुमंतु खेती को रोकने और शिकार व वन्य उत्पादों के संग्रह पर पाबंदी।

  • परिणाम: कुछ गाँवों को “वन ग्राम” घोषित किया गया: 
    • → इनसे कहा गया कि वे मुफ्त में पेड़ों की कटाई, लकड़ी ढुलाई करें और जंगल को आग से बचाएँ।
  • बाकी गाँवों के लोग बगैर किसी सूचना या मुआवजे के हटा दिए गए।
  • पहले से मौजूद समस्याएँ:
    • बढ़ा हुआ लगान।
    • अंग्रेज अधिकारियों द्वारा बेगार (बिना मजदूरी के काम) और चीजों की माँग।
    • भयानक अकाल का दौर: पहले 1899-1900 में और फिर 1907-1908 1907-1 में।
🔹 विद्रोह की शुरुआत :- 
  • लोगों ने त्योहारों, बाज़ारों और सभाओं में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की।
  • धुरवा समुदाय (काँगेर वन क्षेत्र) सबसे पहले विरोध में आया।
  • नेतृत्व: कोई एक नेता नहीं, पर गुंडा धूर (नेधानार गाँव) को प्रमुख माना गया।
  • संदेश का तरीका: आम की टहनियाँ, मिट्टी के बेले, मिर्च और तीर गाँव-गाँव भेजकर विद्रोह का संदेश दिया गया।
🔹 विद्रोह की घटनाएँ :- 
  • गाँवों ने पैसे और अनाज देकर आंदोलन का सहयोग किया।
  • बाज़ार लूटे गए, अफ़सरों और व्यापारियों के घर, स्कूल और पुलिस थानों को लूटा व जलाया गया।
  • अनाज का पुनर्वितरण किया गया।
  • केवल औपनिवेशिक व्यवस्था से जुड़े लोगों को निशाना बनाया गया।
🔹 विद्रोह का दमन और परिणाम :- 
  • अंग्रेज़ों ने सेना भेजकर विद्रोह दबाया।
  • आदिवासी नेताओं ने बातचीत करनी चाही लेकिन अंग्रेज फ़ौज ने उनके तंबुओं को घेर कर उन पर गोलियाँ चला दीं।
  • तीन महीने (फरवरी–मई 1910) में विद्रोह दबाया गया।
  • बहुत से गाँव खाली हो गए क्योंकि लोग भाग कर जंगलों में चले गए थे।
  • गुंडा धूर पकड़ा नहीं गया।
🔹 विद्रोह की उपलब्धियाँ :- 
  • वन आरक्षण का काम कुछ समय के लिए रोक दिया गया।
  • आरक्षित क्षेत्र को भी 1910 से पहले की योजना से लगभग आधा कर दिया गया।
🔹 विद्रोह के बाद की स्थिति :- 
  • वनों को औद्योगिक उपयोग के लिए आरक्षित करने की नीति जारी रही।
  • 1970 का दशक: विश्व बैंक ने प्राकृतिक साल के जंगलों को काटकर देवदार के बागान लगाने का प्रस्ताव रखा।
  • स्थानीय पर्यावरणविदों के विरोध के कारण इस परियोजना को रोक दिया गया।

जावा (इंडोनेशिया) में वन-प्रबंधन और विद्रोह :- 

🔹 जावा द्वीप का परिचय :- 
  • जावा आज इंडोनेशिया का चावल उत्पादक द्वीप है, लेकिन पहले यह घना वन क्षेत्र था।
  • जावा (इंडोनेशिया) एक डच उपनिवेश था।
  • 1600 में जावा की आबादी लगभग 34 लाख थी।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में घुमंतू खेती करने वाले समुदाय रहते थे।
  • भारत और इंडोनेशिया के वन कानूनों में कई समानताएँ थीं।
  • इंडोनेशिया में जावा ही वह क्षेत्र है जहाँ डचों ने वन-प्रबंधन की शुरुआत की थी।
  • डच, अंग्रेजों की तरह, जहाज़ निर्माण के लिए जावा से लकड़ी प्राप्त करना चाहते थे।
🔹 जावा के लकड़हारे (कलांग समुदाय) :- 
  • कलांग समुदाय कुशल लकड़हारे और घुमंतू किसान थे।
  • 1755: माताराम रियासत के बँटवारे में 6,000 कलांग परिवारों को दो हिस्सों में बाँट दिया गया।
  • उनके कौशल के बिना राजाओं के महल बनाना मुश्किल था।
  • डचों ने भी उनसे काम लेना चाहा, लेकिन 1770 में कलांगों ने विद्रोह किया, जिसे दबा दिया गया।

डच वैज्ञानिक वानिकी :- 

  • डचों ने वन कानून लागू करके ग्रामीणों की जंगल तक पहुँच प्रतिबंधित कर दी।
  • प्रतिबंध: बिना परमिट लकड़ी ढोना, मवेशी चराना, जंगल से गुजरने वाली सड़क पर घोड़ा गाड़ी अथवा जानवरों पर चढ़ कर आने-जाने के लिए ददंडित किया जाने लगा।
  • रेलवे का प्रभाव: 1882 में अकेले जावा से 2,80,000 स्लीपर निर्यात किए गए।

ब्लैन्डाँगडिएन्स्टेन प्रथा :- 

डचों ने पहले तो जंगलों में खेती की जमीनों पर लगान लगा दिया और बाद में कुछ गाँवों को इस शर्त पर इससे मुक्त कर दिया कि वे सामूहिक रूप से पेड़ काटने और लकड़ी ढोने के लिए भैंसें उपलब्ध कराने का काम मुफ्त में किया करेंगे। इस व्यवस्था को ब्लैन्डाँगडिएन्स्टेन के नाम से जाना गया।

सामिन की चुनौती :- 

  • 1890 के आसपास, रान्दुब्लातुंग गाँव के सुरोन्तिको सामिन ने डच सरकार के जंगलों पर मालिकाने को चुनौती दी।
  • सामिन का तर्क: “हवा, पानी, ज़मीन और लकड़ी ये राज्य की बनाई हुई नहीं हैं, इसलिए राज्य इन पर अधिकार नहीं जमा सकता।”
  • 1907 तक: 3,000 परिवार सामिन के विचारों से प्रभावित।
  • जल्दी ही एक व्यापक आंदोलन खड़ा हो गया।

🔸 प्रतिरोध के तरीके:

  • ज़मीन सर्वेक्षण के विरोध में लेट कर विरोध।
  • लगान और जुर्माना भरने से इनकार।
  • बेगार (बिना मजदूरी का काम) करने से मना करना।

युद्ध और वन-विनाश :- 

  • प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध का जंगलों पर बुरा प्रभाव पड़ा।
  • भारत में: अंग्रेजों की जंगी ज़रूरतों के लिए बेतहाशा पेड़ काटे गए।
  • जावा में: जापानी कब्जे से पहले डचों ने ‘भस्म कर भागो नीति’ अपनाई और सागौन के लट्ठों और आरा मशीनों को जला दिया ताकि जापानियों को न मिलें।
  • जापानियों ने युद्ध उद्योग के लिए जंगलों का निर्मम दोहन किया।
  • गाँववालों ने इसका फायदा उठाकर खेती का विस्तार किया।

🔸 युद्ध के बाद :-

  • इंडोनेशियाई वन सेवा के लिए इन जमीनों को वापस लेना कठिन हो गया।
  • भारत की तरह यहाँ भी खेती बनाम वन नियंत्रण का संघर्ष जारी रहा।

वानिकी में नए बदलाव (वन प्रबंधन में बदलाव और नई सोच) :-

🔸 पुरानी नीतियों की समस्याएँ: 1980 के दशक तक, सरकारों को यह एहसास हुआ कि “वैज्ञानिक वानिकी” और स्थानीय समुदायों को जंगलों से बाहर रखने की नीतियों के कारण बार-बार टकराव हो रहे थे।

🔸 वन नीति में बदलाव:

  • नया लक्ष्य: वनों से सिर्फ लकड़ी प्राप्त करने के बजाय, अब जंगलों का संरक्षण अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया।
  • नई समझ: सरकार ने माना कि संरक्षण के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वनों में रहने वाले स्थानीय समुदायों की सहभागिता और मदद जरूरी है।

🔸 स्थानीय समुदायों की भूमिका: भारत में सकारात्मक उदाहरण:

  • पवित्र वनों का संरक्षण: मिजोरम से लेकर केरल तक, ग्रामीणों ने सरना, देवराकुडु, कान, राई जैसे पवित्र वनों के रूप में जंगलों की रक्षा करके उन्हें बचाया है।
  • सामुदायिक पहल: कई गाँव वन रक्षकों पर निर्भर न रहकर खुद ही जंगलों की चौकसी करते हैं, जिसमें हर परिवार बारी-बारी से योगदान देता है।

🔸 निष्कर्ष: स्थानीय वन-समुदाय और पर्यावरणविद् अब वन-प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों पर विचार कर रहे हैं, जहाँ संरक्षण और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

यह भी देखें ✯ कक्षा 9
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