Class 9 History chapter 5 notes in hindi || आधुनिक विश्व में चरवाहे notes

Follow US On 🥰
WhatsApp Group Join Now Telegram Group Join Now

कक्षा 9 इतिहास अध्याय 5 नोट्स: आधुनिक विश्व में चरवाहे class 9 notes

TextbookNcert
ClassClass 9
SubjectHistory
ChapterChapter 5
Chapter Nameआधुनिक विश्व में चरवाहे नोट्स
MediumHindi

आप यहां से adhunik vishwa mein charwahe notes in hindi download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम भारत तथा विश्व में पाए जाने वाले प्रमुख घुमंतू चरवाहे के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

घुमंतू चरवाहे कौन होते हैं?

ऐसे लोग जो एक जगह स्थायी रूप से नहीं रहते एवं रोज़गार, पानी और चराई भूमि की तलाश में लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। घुमंतू चरवाहे कहलाते हैं। इनके पास भेड़, बकरी, ऊँट या अन्य पशुओं के झुंड होते हैं।

भाबर :-

गढ़वाल और कुमाऊँ के इलाके में पहाड़ियों के निचले हिस्से के आसपास पाए जाने वाला शुष्क या सूखे जंगल का इलाके को भाबर कहते हैं।

बुग्याल :-

ऊँचे पहाड़ों में स्थित घास के मैदानों को बुग्याल कहते हैं।

खरीफ :-

खरीफ शरद ऋतु की फसल है, जिसे आमतौर पर सितंबर और अक्टूबर के बीच काटा जाता है।

रबी :-

रबी जाड़ों की फ़सलें जिनकी कटाई मार्च के बाद शुरू होती है।

ठूंठ :-

पौधों की कटाई के बाद ज़मीन में रह जाने वाली उनकी जड़ों को ठूंठ कहते है।

भारत के हिमालय क्षेत्र के घुमंतू चरवाहे (पहाड़ो में चरवाहे) :-

जम्मू–कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल चरवाहे :-

गुज्जर–बकरवाल भेड़-बकरियों के बड़े रेवड़ पालने वाले घुमंतू चरवाहे हैं। ये उन्नीसवीं सदी में चरागाहों की तलाश में जम्मू–कश्मीर क्षेत्र में आए और यहीं बस गए।

🔸 मौसमी गति के अनुसार गुज्जर-बकरवाल की जीवनचर्या :-

  • सर्दियों में:
    • ऊँची पहाड़ियों में बर्फ़ जमने पर शिवालिक की निचली पहाड़ियों की ओर उतर आते।
    • सूखी झाड़ियों से मवेशियों को चारा मिलता।
  • गर्मियों में:
    • अप्रैल के अंत में उत्तर दिशा की ओर जाने लगते – गर्मियों के चरागाहों के लिए।
    • पीर पंजाल दर्रे पार कर कश्मीर घाटी पहुँचते।
    • बर्फ़ पिघलने पर यहाँ घनी हरी घास मिलती जो पशुओं के लिए उत्तम आहार होती।
  • सितंबर में:
    • फिर से नीचे की ओर लौट जाते और जाड़ों वाले ठिकाने में बस जाते।
    • जब पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ़ जमने लगती तो वे निचली पहाड़ियों की शरण में चले जाते।

हिमाचल प्रदेश के गद्दी चरवाहे :-

गद्दी भी मौसमी उतार-चढ़ाव के साथ स्थान बदलने वाले घुमंतू चरवाहे हैं।

🔸 मौसमी गति के अनुसार गद्दी समुदाय की जीवनचर्या :-

  • सर्दियाँ: शिवालिक की निचली पहाड़ियों में बिताते, झाड़ियों में मवेशी चराते।
  • गर्मियाँ:
    • अप्रैल में उत्तर की ओर चलते।
    • लाहौल और स्पीति में अपनी गर्मियाँ बिताते।
    • बर्फ़ पिघलने पर उनमें से बहुत सारे ऊपरी घास के मैदानों में पहुँच जाते।
  • सितंबर:
    • सितंबर तक वे दोबारा वापस चल पड़ते।
    • लाहौल–स्पीति के गाँवों में ठहर कर गर्मियों की फसल काटते और सर्दियों की बुवाई करते।
    • फिर शिवालिक की पहाड़ियों में लौट जाते।
    • और अगली अप्रैल में भेड़-बकरियाँ लेकर वे दोबारा गर्मियों के चरागाहों की तरफ रवाना हो जाते।

🔸 अन्य हिमालयी समुदाय :- भोटिया, शेरपा और किन्नौरी समुदाय भी इसी प्रकार की मौसमी गति करने वाले चरवाहे थे।

गढ़वाल और कुमाऊँ के गुज्जर :-

  • ये चरवाहे सर्दियों में भाबर के सूखे जंगलों में और गर्मियों में बुग्याल (ऊँचे घास के मैदान) में जाते थे।
  • कई गुज्जर उन्नीसवीं सदी में जम्मू से उत्तर प्रदेश की पहाड़ियों (गढ़वाल–कुमाऊँ) में आए और बाद में वहीं बस गए।

भारत के पठारी, मैदानी और रेगिस्तानी चरवाहे :-

महाराष्ट्र के धंगर समुदाय :-

धंगर महाराष्ट्र का एक जाना-माना चरवाहा समुदाय है। बीसवीं सदी की शुरुआत में इस समुदाय की आबादी लगभग 4,67,000 थी।

🔸 पेशा: उनमें से ज़्यादातर गड़रिये या चरवाहे थे हालाँकि कुछ लोग कम्बल और चादरें भी बनाते थे जबकि कुछ भैंस पालते थे।

🔸 मौसमी गति के अनुसार धंगर समुदाय की जीवनचर्या :-

बरसात में: बरसात के दिनों में महाराष्ट्र के शुष्क मध्य पठार पर रहते थे (यह सभी एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र, कम वर्षा, कंटीली झाड़ियाँ वाला इलाका था) । यहाँ की कंटीली झाड़ियाँ उनके जानवरों का भोजन बनती थीं।

अक्टूबर में: बाजरे की कटाई करते फिर बाद में, चरागाह की तलाश में कोंकण (उपजाऊ तटीय क्षेत्र) की ओर चल पड़ते। एक महीना पैदल चलकर कोंकण पहुँचते।

🔸 कोंकण में धंगरों की भूमिका :-

  • कोंकणी किसान खरीफ की फसल काटकर खेतों को रबी के लिए तैयार करते थे।
  • धंगरों के पशु खेतों की ठूंठ खाकर खेत उपजाऊ बनाते (जानवरों का गोबर खेतों को प्राकृतिक खाद देता था।)।
  • बदले में कोंकणी किसान उन्हें चावल देते थे, जो पठार में आसानी से नहीं मिलता था।
  • मॉनसून आते ही: धंगर तटीय क्षेत्र छोड़कर वापस सूखे पठारों में लौट जाते ( क्योंकि भेड़ें गीला मौसम सहन नहीं करती)।
यह भी देखें ✯ कक्षा 9

कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के चरवाहे :-

🔸 क्षेत्र: कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सूखा मध्य पठार — घास, झाड़ियाँ और पत्थरों से भरा हुआ क्षेत्र था। इनमें मवेशियों, भेड़-बकरियों और गड़रियों का ही बसेरा रहता था।

  • गोल्ला – यहाँ गोल्ला समुदाय के लोग गाय-भैंस पालते थे।
  • कुरुमा और कुरुबा समुदाय – भेड़-बकरियाँ पालते थे और हाथ के बुने कम्बल बेचते थे।

ये लोग जंगलों और छोटे खेतों के पास बसे रहते।

🔸 मौसमी गति के समुदाय की जीवनचर्या :-

पहाड़ी चरवाहों के विपरीत, उनकी गति सर्दी-गर्मी से नहीं बल्कि बारिश और सूखे से तय होती थी।

  • सूखे के मौसम में: तटीय इलाकों की ओर जाते थे।
  • बरसात (मॉनसून) में: सूखे पठारी इलाकों में वापस लौट आते थे क्योंकि तटीय इलाके दलदली हो जाते थे, जो सिर्फ भैंसों के लिए उपयुक्त थे।

उत्तर भारत के बंजारे :-

क्षेत्र: बंजारे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में रहते थे।

🔸 विशेषता:

  • लंबी दूरी की यात्रा: ये लोग बहुत दूर-दूर तक चले जाते थे
  • व्यापारिक भूमिका: रास्ते में गाँव वालों को अनाज, चारा इत्यादि के बदले खेत जोतने वाले पशु और अन्य सामान बेचते थे।
  • उद्देश्य: जहाँ भी जाते, अपने जानवरों के लिए अच्छे चरागाहों की खोज में रहते।

राजस्थान के राइका (रेगिस्तानी चरवाहे) :-

राजस्थान के रेगिस्तानों में राइका समुदाय रहता था।

  • पर्यावरण: रेगिस्तानी इलाका, जहाँ बारिश अनिश्चित और कम होती है।
  • मिश्रित आजीविका: खेती अस्थिर होने के कारण खेती + चरवाही दोनों करते थे।

🔸 मौसमी प्रवास :-

  • बरसात में: बरसात में तो बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर के राइका अपने गाँवों में ही रहते थे, क्योंकि स्थानीय चारा उपलब्ध होता था।
  • अक्टूबर के बाद: चरागाह सूखने पर दूसरे इलाकों में चले जाते और अगली बरसात में वापस लौटते।

🔸 पशु: एक तबका ऊँट पालता था, जबकि दूसरा भेड़-बकरियाँ पालता था।

चरवाहा जीवन की सामान्य चुनौतियाँ एवं रणनीतियाँ :-

  • सोच-विचार कर योजना बनाना:
    • हर समुदाय को यह सोचना पड़ता था कि कहाँ कितना समय ठहरें।
    • वे पानी, चारा और सुरक्षा के हिसाब से मार्ग चुनते थे।
    • किन क्षेत्रों से गुजरने की अनुमति है, यह ध्यान में रखते थे।
  • अन्य समुदायों से संबंध: रास्ते के गाँवों के किसानों से अच्छे संबंध बनाने पड़ते थे, ताकि उनके जानवर खेतों के ठूंठ खाकर खेत उपजाऊ बनाते चले।
  • विविध आजीविका: जीविका चलाने के लिए चरवाही, खेती और व्यापार जैसे कई काम एक साथ करना पड़ते थे।

औपनिवेशिक शासन का चरवाहों पर प्रभाव :-

औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों के जीवन में गहरे बदलाव आए। उनकी मुख्य समस्याएँ और उनके कारण निम्नलिखित थे:

🔹 पहली बात: खेती का विस्तार और चरागाहों का सिमटना
  • कारण: अंग्रेज़ सरकार कृषि-भूमि बढ़ाकर लगान बढ़ाना चाहती थी।
  • उद्देश्य:
    • लगान की अधिक आय: अधिक भूमि पर खेती से सरकार को अधिक लगान मिलता।
    • कच्चे माल की पूर्ति: इंग्लैंड के उद्योगों के लिए जूट, कपास, गेहूँ आदि का उत्पादन बढ़ाना अंग्रेजों का उद्देश्य था।
  • कार्यवाही:
    • गैर-खेती भूमि को अंग्रेज़ “बेकार जमीन” मानते थे।
    • उन्नीसवीं सदी के मध्य से परती भूमि विकास कानून बनाए गए।
    • सरकार गैर-खेतिहर जमीन को अपने कब्जे में लेकर चुनिंदा लोगों को दे देती थी।
    • इन्हें लोगों को रियायतें देकर खेती बढ़ाने को प्रोत्साहित किया गया।
  • परिणाम: कब्जे में ली गई ज्यादातर जमीन चरागाह थी इसलिए चरवाहों के लिए उपलब्ध चरागाहों का क्षेत्रफल कम हो गया। इससे चरवाहों की समस्या बढ़ी।
🔹 दूसरी बात: वन अधिनियम

उन्नीसवीं सदी के मध्य में विभिन्न प्रांतों में वन अधिनियम लागू हुए।

  • कारण: कीमती लकड़ी (जैसे देवदार, साल) वाले जंगलों का संरक्षण करना। अंग्रेजों का मानना था कि चरवाहों के जानवर पेड़ों की छोटी कोपलों और पौधों को नष्ट कर देते हैं। जिससे नए पेड़ों की बढ़त रुक जाती है।
  • कार्यवाही:
    • जंगलों को ‘आरक्षित वन’ (जहाँ प्रवेश वर्जित) और ‘संरक्षित वन’ (जहाँ पारंपरिक अधिकार सीमित) घोषित किया गया।
    • चरवाहों के लिए परमिट (पास) प्रणाली शुरू की गई।
    • जंगल में प्रवेश और निकास की तारीखें पहले से तय कर दी जाती थीं।
  • परिणाम:
    • चरागाह के पुराने स्रोत बंद हो गए।
    • चरवाहों की आवाजाही पर कठोर नियंत्रण हो गया।
    • परमिट की अवधि से अधिक समय तक रहने पर जुर्माना लगाया जाने लगा।
🔹 तीसरी बात: घुमंतुओं के प्रति अंग्रेजों का अविश्वास

अंग्रेजों की सोच: अंग्रेज अधिकारी घुमंतू लोगों पर भरोसा नहीं करते थे। वे एक स्थान पर बसे हुए लोगों को शांतिप्रिय और नियंत्रित करने में आसान मानते थे।

कार्यवाही: 1871 में औपनिवेशिक सरकार ने अपराधी जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) पारित किया।

  • कई घुमंतू समुदायों (दस्तकारों, व्यापारियों और चरवाहों) को ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया गया।
  • उन्हें निश्चित गाँवों में बसने का आदेश दिया गया।
  • बिना परमिट के यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • उन पर पुलिस की निरंतर नजर रहने लगी।
🔹 चौथी बात्त: कर (टैक्स) का बोझ

अंग्रेजों ने अपनी आय बढ़ाने के लिए हर तरह से कर लगाया: जमीन, नहरों का पानी, नमक, व्यापार, और मवेशियों पर टैक्स।

कार्यवाही: 19वीं सदी के मध्य से चरवाही टैक्स लागू किया गया। जिसके तहत प्रत्येक जानवर पर कर वसूला जाने लगा।

टैक्स वसूली की व्यवस्था:

  • 1850-1880: 1850–1880 के बीच टैक्स वसूली ठेकेदारों को बोली पर दी जाती थी, जो मनमाना कर वसूलते थे।
  • 1880 के बाद: सरकार ने सीधे अपने कर्मचारियों के माध्यम से कर वसूलना शुरू कर दिया।

🔸 पास प्रणाली :- हर चरवाहे को एक पास जारी किया जाता था, जिसमें जानवरों की संख्या और भुगतान किए गए कर का ब्यौरा दर्ज होता था। किसी भी चरागाह में प्रवेश से पहले पास दिखाना और टैक्स भरना अनिवार्य था।

इन औपनिवेशिक नीतियों से चरवाहों की जिंदगी पर प्रभाव :-

  • औपनिवेशिक नीतियों के कारण चरागाह लगातार कम होने लगे।
  • चरागाहों को खेतों में बदला गया, इसलिए चरवाहों के लिए उपलब्ध चरागाहों का क्षेत्रफल बहुत कम हो गया।
  • आरक्षित वनों में चराई पर रोक से पशुपालक जंगलों में आज़ादी से नहीं जा सके।
  • बचे हुए चरागाहों पर जानवरों का अत्यधिक दबाव पड़ा।
  • चरवाहों की आवाजाही सीमित होने से चरागाह दोबारा हरे नहीं हो पाए।
  • चराई की अधिकता से चरागाहों की गुणवत्ता गिरने लगी।
  • चारे की कमी हुई जिससे जानवर कमजोर होने लगे।
  • अकाल और भोजन की कमी से जानवरों का स्वास्थ्य खराब हुआ और बड़ी संख्या में जानवरों की मौत होने लगी।

औपनिवेशिक नीतियों पर चरवाहों की प्रतिक्रियाएँ और बदलाव :-

  • कई चरवाहों ने चरागाहों की कमी के कारण अपने जानवरों की संख्या घटाई।
  • कुछ समुदायों ने नए चरागाह ढूँढ़े — उदाहरण (राइका): 1947 के भारत-पाकिस्तान बँटवारे के बाद, राइका चरवाह सिंध नहीं जा सके। इसलिए उन्होंने हरियाणा के खेतों में नए चरागाह ढूँढे।
  • कुछ संपन्न चरवाहों ने जमीन खरीदकर खेती या व्यापार शुरू किया।
  • गरीब चरवाह सूदखोरों से कर्ज लेने लगे, अपने जानवर खो बैठे और मजदूर बनकर रह गए।
  • कई चरवाहों ने नई दुनिया के अनुसार अपने काम-धंधों में बदलाव किए।
  • कई क्षेत्रों में आज भी चरवाही जारी है, कुछ जगह बढ़ भी रही है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार सूखे इलाकों व पहाड़ों में चरवाही एक टिकाऊ (व्यावहारिक) जीवन-शैली है।
  • दुनिया के अन्य देशों में भी कानूनों और बसाहट के कारण चरवाहों को अपनी जीवनशैली बदलनी पड़ी।

अफ्रीका के चरवाहे :-

  • जनसंख्या: दुनिया की आधी से ज़्यादा चरवाहा आबादी अफ्रीका में रहती है।
  • आजीविका: लगभग 2.25 करोड़ (22.5 मिलियन) लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए चरवाही पर निर्भर हैं।
  • प्रमुख समुदाय: बेदुईन्स, बरबेर्स, मासाई, सोमाली, बोरान, तुर्काना आदि।
  • निवास क्षेत्र: इनमें से ज्यादातर अब अर्ध-शुष्क घास के मैदानों या सूखे रेगिस्तानों में रहते हैं जहाँ वर्षा आधारित खेती करना बहुत मुश्किल है।
  • पशुधन: यहाँ के चरवाहे गाय-बैल, ऊँट, बकरी, भेड़ व गधे पालते हैं
  • आय के स्रोत:
    • दूध, मांस, पशुओं की खाल, ऊन बेचना।
    • कुछ व्यापार और परिवहन का काम करते हैं।
    • कुछ मिश्रित आजीविका (चरवाही + खेती) अपनाते हैं।
    • बहुत गरीब चरवाहे कोई भी उपलब्ध काम कर लेते हैं।

अफ्रीका का मासाई समुदाय :-

मासाई पशुपालक मोटे तौर पर पूर्वी अफ्रीका के निवासी हैं। इनमें से लगभग 3,00,000 दक्षिणी कीनिया में और करीब 1,50,000 तंजानिया में रहते हैं।

समाज मुख्यतः दो श्रेणियों में बँटा था:

  • वरिष्ठ जन: समुदाय का शासन चलाते थे, महत्वपूर्ण फैसले लेते थे।
  • योद्धा: युवा लोग जो समुदाय की रक्षा करते थे और दूसरे समुदायों पर हमला करके मवेशी छीनते थे।

मवेशी छीनना ताकत और प्रतिष्ठा का प्रतीक था।

अफ्रीका में चरवाहों पर औपनिवेशिक प्रभाव :-

🔹 मासाई समुदाय का उदाहरण :- (औपनिवेशिक हस्तक्षेप और उसके प्रभाव)
  • अंग्रेजों ने ऐसे फैसले लिए जिनसे पारंपरिक सत्ता कमजोर हुई:
    • नियुक्त मुखिया: अंग्रेजों ने अपनी मर्जी से मुखिया नियुक्त किए और उन्हें प्रशासनिक जिम्मेदारी दी।
    • युद्ध पर प्रतिबंध: हमलों और लड़ाइयों पर पाबंदी लगा दी गई।
  • परिणाम: वरिष्ठ जनों और योद्धाओं की पारंपरिक सत्ता और प्रतिष्ठा बहुत कमजोर हो गई।
🔹 आर्थिक असमानता में वृद्धि :-

औपनिवेशिक काल ने मासाई समाज में “अमीर” और “गरीब” का नया विभाजन पैदा किया।

🔸 अमीर चरवाहे (नए मुखियाओं) :-

  • औपनिवेशिक सरकार द्वारा नियुक्त किए गए मुखियाओं के पास नियमित आमदनी आने लगी।
  • वे जमीन, जानवर और सामान खरीदने लगे।
  • गरीब पड़ोसियों को कर्ज देकर उनसे लगान वसूलते थे।
  • कई मुखिया शहरों में बस गए और व्यापार करने लगे।
  • उन्हें चरवाही + व्यापार, दोनों से आमदनी मिलती थी।

🔸 गरीब चरवाहे :-

  • सिर्फ मवेशियों पर निर्भर चरवाहे संकट में जल्दी टूट जाते थे।
  • अकाल या युद्ध में उनके मवेशी नष्ट हो जाते।
  • रोज़गार की खोज में शहरों जाना पड़ता — जैसे लकड़ी का कोयला बनाना, सड़क-बांध निर्माण का काम आदि।

मासाई चरवाहों पर औपनिवेशिक प्रभाव से समस्याएँ :-

🔹 1. चरागाहों का सिमटना :-
  • औपनिवेशिक शासन से पहले मासाईलैंड उत्तरी कीनिया से तंज़ानिया तक फैला था।
  • 1885 में ब्रिटिश कीनिया और जर्मन तांगान्यिका की सीमा खींचकर मासाईलैंड दो हिस्सों में बाँट दिया गया।
  • सरकार ने गोरों को बसाने के लिए बेहतरीन चरागाहों को अपने कब्जे में ले लिया।
  • परिणाम:
    • मासाइयों की लगभग 60% जमीन छीन ली गई।
    • मासाई सूखे और कम बारिश वाले छोटे इलाके में सीमित कर दिए गए।
🔹 2. खेती का विस्तार :-
  • ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय किसानों को खेती का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • खेती के विस्तार से कई चरागाह खेतों में बदल गए।
  • पहले मजबूत स्थिति वाले मासाई अब किसानों से कमजोर पड़ गए।
🔹 3. शिकारगाह बनना :-
  • कई चरागाहों को शिकारगाह/राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया।
    • उदाहरण: कीनिया का मारा व साम्बूरू नेशनल पार्क; तंजानिया का सेरेन्गेटी नेशनल पार्क।
  • इन क्षेत्रों में चरवाहों और उनके मवेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित किया गया।
  • इन क्षेत्रों में मासाइयों का चरना और शिकार करना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।
  • सेरेन्गेटी नैशनल पार्क का 14,760 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा क्षेत्रफल मासाइयों के चरागाहों पर कब्ज़ा करके बनाया गया था।

मासाई चरवाहों की समस्याएँ का प्रभाव :-

  • संसाधनों की कमी
  • अच्छे चरागाह और पानी के स्रोत खो गए।
  • छोटे इलाके में अत्यधिक चराई हुई।
  • चरागाह खराब होने लगे, चारे की कमी बढ़ी।
  • मवेशियों का पेट भरना मुश्किल हो गया और उनकी स्थिति खराब होने लगी।

चारवाहों पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ और उसके प्रभाव ( in simple ) :-

  • पहले चरवाहे चरागाहों की तलाश में दूर-दूर तक जाते थे।
  • 19वीं सदी के अंत में औपनिवेशिक सरकार ने उनकी आवाजाही पर कड़ी पाबंदियाँ लगाईं।
  • मासाइयों की तरह अन्य चरवाहों को भी आरक्षित इलाकों की सीमाओं में कैद कर दिया गया।
  • बिना परमिट सीमा पार करने या जानवर चराने की अनुमति नहीं थी।
  • परमिट लेना मुश्किल था क्योंकि परमिट लेने में कई बाधाएँ आती और अधिकारियों द्वारा परेशान किया जाता था।
  • नियम तोड़ने पर कठोर सज़ा दी जाती थी।
  • चरवाहों को गोरे बसने वालों के बाज़ारों में प्रवेश से रोका गया।
  • कई तरह के व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाए गए।
  • गोरे औपनिवेशिक अधिकारी चरवाहों को खतरनाक और बर्बर मानते थे।
  • नई सीमाओं ने उनकी चरवाही और व्यापार दोनों को कमजोर कर दिया।
  • चराई क्षेत्र सीमित होने से वे “कैद” जैसे हालात महसूस करने लगे।

सूखे होने पर चरवाहों पर प्रभाव :-

  • सूखे से चरागाह सूख जाते हैं और मवेशियों पर भुखमरी का खतरा बढ़ता है।
  • पारंपरिक चरवाहे घुमंतू होते थे, इसलिए सूखे में नए चरागाह खोजकर बच निकलते थे।
  • औपनिवेशिक शासन ने मासाइयों को एक निश्चित क्षेत्र में कैद कर दिया गया।
  • बेहतरीन चरागाह छीन लिए गए; उन्हें अर्ध-शुष्क और सूखाग्रस्त इलाके में बसाया गया।
  • सूखे के समय वे नए चरागाहों तक नहीं जा सकते थे।

🔸 परिणाम:

  • सूखे में भारी संख्या में मवेशी मरने लगे।
  • 1930 के आँकड़े: मासाइयों के पास 7.2 लाख मवेशी, 8.2 लाख भेड़, 1.71 लाख गधे थे।
  • केवल 1933–34 के दो सूखे वर्षों में आधे से अधिक जानवर मर गए।
  • चराई का क्षेत्र घटने से सूखे के प्रभाव और भी गंभीर होते गए।
  • लगातार बुरे सालों की वजह से मवेशियों की संख्या लगातार घटती गई।
यह भी देखें ✯ कक्षा 9
❣️SHARING IS CARING❣️
🔔

Get in Touch With Us

Have questions, suggestions, or feedback? We'd love to hear from you!

Ncert Books PDF

English Medium

Hindi Medium

Ncert Solutions and Question Answer

English Medium

Hindi Medium

Revision Notes

English Medium

Hindi Medium

Related Chapters