कक्षा 9 विज्ञान अध्याय 12 नोट्स: खाद्य संसाधनों में सुधार class 9 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter | Chapter 12 |
| Chapter Name | खाद्य संसाधनों में सुधार नोट्स |
| Medium | Hindi |
आप यहां से खाद्य संसाधनों में सुधार कक्षा 9 नोट्स download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम गुणवत्ता सुधार एवं प्रबंधन के लिए पादपों एवं जन्तुओं में चयन एवं प्रजनन, खाद और उर्वरक के उपयोग, रोगों तथा हानिकारक कीटों से सुरक्षा, कार्बनिक खेती आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
भोजन और उसकी आवश्यकता :-
सभी जीवों को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन से हमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज लवण मिलते हैं। ये सभी तत्व विकास, वृद्धि और स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं।
भोजन के स्रोत :-
- भोजन हमें पौधों और जानवरों से मिलता है।
- अधिकांश भोजन कृषि और पशुपालन से प्राप्त होता है।
भारत में खाद्य संसाधनों (कृषि उत्पादन और पशुपालन) बढ़ाने की आवश्यकता :-
🔸 कारण :- भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है। हमारे देश की जनसंख्या सौ करोड़ (एक बिलियन) से अधिक है तथा इसमें लगातार वृद्धि हो रही है।
- 🔸 समस्या :-
- जनसंख्या बढ़ने से अधिक अन्न उत्पादन की आवश्यकता होती है।
- भारत में कृषि के लिए नई भूमि उपलब्ध नहीं है क्योंकि पहले से ही अधिकतर भूमि पर खेती हो रही है।
🔸 समाधान :- इसलिए, हमे उपलब्ध भूमि पर ही फसल और पशुधन के उत्पादन की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।
अतीत में उत्पादन बढ़ाने के प्रयास और उनके परिणाम :-
- हरित क्रांति: हमने हरित क्रांति द्वारा फसल उत्पादन बढ़ाने में सफलता मिली है।
- श्वेत क्रांति: तथा श्वेत क्रांति द्वारा दूध के उत्पादन और प्रबंधन में सफलता मिली।
🔸 (परिणाम) नकारात्मक प्रभाव: इन क्रांतियों की प्रक्रिया में हमारी प्राकृतिक संपदाओं का बहुत अधिक उपयोग हुआ है। इसके परिणामस्वरूप हमारी प्राकृतिक संपदा को हानि होने के अवसर बढ़ गए हैं जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।
संपोषणीय कृषि प्रणालियाँ :-
संपोषणीय कृषि ऐसी खेती की विधि है जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भोजन की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
लक्ष्य: इसमें फसल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
खाद्य सुरक्षा की चुनौती :-
केवल अधिक अनाज पैदा करना और भंडारण करना ही काफी नहीं है। लोगों के पास अनाज खरीदने के लिए पैसा (आय) भी होना चाहिए। इसलिए, किसानों की आय बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है ताकि भूख और कुपोषण की समस्या का समाधान हो सके।
भोजन के विभिन्न पोषक तत्वों के स्रोत :-
- कार्बोहाइड्रेट के स्रोत (ऊर्जा के लिए): ऊर्जा की आवश्यकता के लिए अनाज; जैसे गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा तथा ज्वार से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त होता है।
- प्रोटीन के स्रोत: दालें जैसे चना, मटर, उड़द, मूँग, अरहर, मसूर से प्रोटीन प्राप्त होती है।
- वसा के स्रोत: तेल वाले बीजों; जैसे सोयाबीन, मूँगफली, तिल, अरंड, सरसों, अलसी तथा सूरजमुखी से हमें आवश्यक वसा प्राप्त होती है।
- विटामिन और खनिज लवण के स्रोत: सब्जियाँ, मसाले तथा फलों से हमें विटामिन तथा खनिज लवण, कुछ मात्रा में प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट भी प्राप्त होते हैं।
- चारा फसलें (पशुओं के भोजन के लिए): चारा फसलें; जैसे वर्सीम, जई अथवा सूडान घास का उत्पादन पशुधन के चारे के रूप में किया जाता है।
फसलों के मुख्य प्रकार :-
🔸 खरीफ फसलें :- कुछ ऐसी फसलें जिन्हें हम वर्षा ऋतु में उगाते हैं, खरीफ फसल कहलाती हैं, जो जून से आरंभ होकर अक्तूबर मास तक होती हैं। धान, सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूँग तथा उड़द आदि खरीफ फसलों के प्रमुख उदाहरण है।
🔸 रबी फसलें :- कुछ फसलें शीत ऋतु में उगायी जाती हैं, जो नवंबर से अप्रैल मास तक होती हैं। इन फसलों को रबी फसल कहते हैं। गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी आदि रबी फसलें के प्रमुख उदाहरण है।
अतीत में भारत की कृषि में उन्नति :-
- भारत में 1952 से 2010 तक कृषि भूमि में 25% वृद्धि हुई।
- लेकिन अनाज उत्पादन में चार गुनी वृद्धि हुई।
- यह वृद्धि वैज्ञानिक तकनीकों और सुधारित कृषि प्रणालियों के कारण संभव हुई।
कृषि में शामिल प्रणालियों के प्रमुख चरण :-
हम कृषि में शामिल प्रणालियों को तीन चरणों में बाँट सकते हैं। सबसे पहले है बीज का चुनना, दूसरा फसल की उचित देखभाल तथा तीसरा खेतों में उगी फसल की सुरक्षा तथा कटी हुई फसल को हानि से बचाना।
फसल उत्पादन में सुधार के प्रमुख वर्ग :-
फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में की जाने वाली गतिविधियाँ तीन मुख्य वर्गों में बाँटी जाती हैं —
- फसल की किस्मों में सुधार
- फसल-उत्पादन प्रबंधन
- फसल सुरक्षा प्रबंधन
फसल की किस्मों में सुधार :-
फसल उत्पादन को बढ़ाने के लिए अच्छी किस्मों का चयन और विकास करना ही फसल की किस्मों में सुधार कहलाता है।
🔸 इसके मुख्य लक्ष्य हैं :-
- अधिक उत्पादन प्राप्त करना
- रोग-प्रतिरोधक किस्में विकसित करना
- अच्छी गुणवत्ता वाली फसलें प्राप्त करना
- कम उर्वरक और जल में भी अच्छा उत्पादन देना
फसल सुधार की विधियाँ :-
किस्मों में ऐच्छिक (वांछित) सुधार हेतु दो प्रमुख तरीके अपनाए जाते हैं —
- 1. संकरण विधि
- 2. आनुवंशिक रूपांतरण विधि
1. संकरण :-
विभिन्न आनुवंशिक गुणों वाले पौधों के मध्य संकरण करके उच्च गुण वाले पौधे तैयार करने की प्रक्रिया को संकरण कहा जाता है।
🔸 सरल शब्दों में: दो विभिन्न गुणों वाले पौधों का संकरण करवाया जाता है। इससे उत्पन हुई नई किस्म में दोनों के सकारात्मक गुण आ जाते हैं।
- 🔸 यह तीन प्रकार का हो सकता है —
- अंतराकिस्मीय संकरण: एक ही फसल की अलग-अलग किस्मों के बीच।
- अंतरास्पीशीज संकरण: एक ही जीनस की दो विभिन्न स्पीशीजों के बीच।
- अंतरावंशीय संकरण: विभिन्न जेनरा (वंश) के पौधों के बीच।
2. आनुवंशिक रूपांतरण विधि :-
इस विधि में पौधों में ऐच्छिक गुणों वाले जीन को डाला जाता है। इससे आनुवंशिक रूप से परिवर्तित फसलें प्राप्त होती हैं। इन फसलों में रोग-प्रतिरोधक क्षमता और अधिक उत्पादन देने की शक्ति होती है।
इन विधियों अपनाने से पहले ध्यान देने योग्य बातें :-
- फसल की किस्में विभिन्न जलवायु और मिट्टी परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन दें।
- किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराए जाएँ।
- बीज अच्छी अंकुरण क्षमता वाले होने चाहिए।
फसल की किस्मों में सुधार के प्रमुख कारक :-
- 🔸 1. उच्च उत्पादन :-
- प्रति एकड़ फसल की उपज बढ़ाना।
- महत्व: इससे कम भूमि पर भी अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जिससे बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करा जा सके।
- 🔸 2. उन्नत किस्में :-
- फसल उत्पाद की गुणवत्ता, प्रत्येक फसल में भिन्न होती है। जैसे:-
- दाल में प्रोटीन की गुणवत्ता,
- तिलहन में तेल की गुणवत्ता और
- फल तथा सब्जियों का संरक्षण महत्वपूर्ण है।
- इन गुणों में सुधार से फसल की बाजार कीमत बढ़ती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है। एवं उपभोक्ताओं को पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन मिलता है।
- फसल उत्पाद की गुणवत्ता, प्रत्येक फसल में भिन्न होती है। जैसे:-
- 🔸 3. जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता :-
- जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकताः जैविक (रोग, कीट तथा निमेटोड) तथा अजैविक (सूखा, क्षारता, जलाक्रांति, गरमी, ठंड तथा पाला) पारिस्थितियों के कारण फसल उत्पादन कम हो सकता है।
- इन परिस्थितियों को सहन कर सकने वाली किस्में फसल उत्पादन में सुधार कर सकती हैं।
- 🔸 4. परिपक्वन काल में परिवर्तन :-
- फसल को उगाने से लेकर कटाई तक कम से कम समय लगना जिससे फसल जल्दी तैयार होगी तो किसान साल में कई फसलें उगा सकते हैं।
- जल्दी परिपक्व फसल में कम लागत और कम नुकसान होता है।
- समान परिपक्वन कटाई की प्रक्रिया को सरल बनाता है और कटाई के दौरान होने वाली फसल की हानि कम हो जाती है।
- 🔸 5. व्यापक अनुकूलता :-
- व्यापक अनुकूलता वाली किस्मों का विकास करना।
- ऐसी किस्में जो विभिन्न जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन दे सकें।
- इससे फसल उत्पादन स्थायी और भरोसेमंद बनता है।
- 🔸 6. ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण :-
- चारे वाली फसलों के लिए लंबी तथा सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण हैं।
- अनाज के लिए बौने पौधे उपयुक्त हैं ताकि इन फसलों को उगाने के लिए कम पोषकों की आवश्यकता हो।
- इस प्रकार सस्य विज्ञान वाली किस्में अधिक उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होती है।
फसल उत्पादन प्रबंधन :-
फसल उत्पादन प्रबंधन का अर्थ है, फसलों की अच्छी पैदावार के लिए खेत, संसाधन और तकनीक का सही उपयोग करना।
उत्पादन प्रणालियों के प्रकार :-
किसान की आर्थिक क्षमता के आधार पर उत्पादन प्रणालियाँ तीन प्रकार की हो सकती हैं:
- बिना लागत उत्पादन प्रणाली: बहुत कम या बिना पैसे खर्च किए परंपरागत तरीकों से खेती करना।
- अल्प लागत उत्पादन प्रणाली: सीमित पूंजी के साथ, कुछ बेहतर बीजों या खादों का उपयोग करना।
- अधिक लागत उत्पादन प्रणाली: अधिक पूंजी निवेश करके उन्नत बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई सुविधाएं और मशीनीकरण का उपयोग करना। इसका लक्ष्य अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना होता है।
फसल उत्पादन की वृद्धि के लिए उपयोग की जाने वाली तकनीकें :-
किसानों द्वारा भिन्न प्रकार की तकनीकी का इस्तेमाल जिससे कि फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है, वे निम्न हैं-
- (i) पोषक प्रबन्धन
- (ii) सिंचाई
- (iii) फसल पैटर्न
(i) पोषक प्रबंधन :-
🔹पोषक तत्व :-
हमारी तथा अन्य जीवों की तरह पौधों को भी उनकी वृद्धि के लिए विभिन्न पोषक तत्वों (जैसे- नाइट्रोजन, फॉस्फोरस) की आवश्यकता होती है, जिन्हें पोषक तत्व कहते हैं।
🔹पोषक तत्वों के स्रोत :-
- पौधों को ये पोषक तत्व तीन स्रोतों से मिलते हैं:
- हवा से: कार्बन और ऑक्सीजन
- पानी से: हाइड्रोजन और ऑक्सीजन
- मिट्टी से: अन्य सभी पोषक तत्व
🔹पोषक तत्वों के प्रकार :-
🔸 1. वृहत्-पोषक :- ऐसे पोषक तत्व जिनकी आवश्यकता पौधों को अधिक मात्रा में होती है। वृहत् पोषक तत्त्व कहलाते है। जैसे-नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर।
🔸 2. सूक्ष्म-पोषक :- ऐसे पोषक तत्व जिनकी आवश्यकता पौधों को बहुत कम मात्रा में होती है। सूक्ष्म पोषक तत्व कहलाते है। जैसे- आयरन, मैंगनीज, बोरॉन, जिंक, कॉपर, मॉलिब्डेनम्, क्लोरीन।
🔹पौधों पर पोषक तत्वों की कमी के प्रभाव :-
- पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
- पत्तियाँ पीली या विकृत हो सकती हैं।
- पौधों की जनन क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
- पौधे रोगों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
🔸 पौधों पर पोषक तत्वों की कमी का समाधान :- अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी में इन पोषक तत्वों की पूर्ति खाद और उर्वरक डालकर की जाती है।
खाद :-
खाद एक प्राकृतिक उर्वरक है जो पशु अपशिष्ट और पौधों (जैसे- गोबर, पत्तियाँ, सब्जी के छिलके) के कचरे के अपघटन से बनती है। खाद में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है तथा यह मिट्टी को अल्प मात्रा में पोषक प्रदान करते हैं।
🔹खाद के लाभ :-
- खाद मिट्टी को पोषकों तथा कार्बनिक पदार्थों से परिपूर्ण करती है।
- मिट्टी की उर्वरता और संरचना में सुधार करती है।
- रेतीली मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता बढ़ाती है।
- चिकनी मिट्टी में पानी को निकालने में सहायता करती है जिससे पानी एकत्रित नहीं होता।
- पर्यावरण संरक्षण में मदद करती है क्योंकि यह जैविक कचरे का उपयोग करती है।
🔹खाद के प्रकार :-
खाद बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न जैव पदार्थ के उपयोगों के आधार पर खाद को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है:
🔸 (i) कंपोस्ट और वर्मीकम्पोस्ट:
- कंपोस्ट: कंपोस्टीकरण प्रक्रिया में कृषि और घरेलू कचरे (जैसे- गोबर, सब्जी के छिलके, खरपतवार) को गड्ढों में सड़ाकर बनाई जाती है। कंपोस्ट में कार्बनिक पदार्थ तथा पोषक बहुत अधिक मात्रा में होते हैं।
- वर्मीकम्पोस्ट: केंचुओं की मदद से पौधों और जानवरों के अपशिष्ट पदार्थों के शीघ्र निरस्तीकरण की प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है। इसे वर्मी कंपोस्ट कहते हैं।
🔸 (ii) हरी खाद:
- बनाने की विधि: मुख्य फसल बोने से पहले, पटसन, मूँग या ग्वार जैसे पौधों को उगाकर, हलतत्पश्चात् उन पर हल चलाकर खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये पौधे हरी खाद में परिवर्तित हो जाते हैं ।
- लाभ: ये सड़कर मिट्टी में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाते हैं।
उर्वरक :-
उर्वरक वे व्यावसायिक रूप से तैयार रासायनिक पदार्थ हैं जो पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। ये पौधों को मुख्य पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम) प्रदान करते हैं।
🔹उर्वरक के लाभ :-
- पौधों की कायिक वृद्धि अच्छी होती है।
- कम समय में अधिक उत्पादन मिलता है।
- फसलें स्वस्थ और मजबूत बनती हैं।
🔹उर्वरकों के नुकसान / सावधानियाँ :-
- महँगे: इनका उपयोग आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है।
- मिट्टी की हानि: लगातार प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घट जाती है।
- जल प्रदूषण: अधिक मात्रा में उर्वरक देने से जल प्रदूषण हो सकता है।
- सही उपयोग जरूरी: इन्हें सही मात्रा में, सही समय पर और सही तरीके से ही प्रयोग करना चाहिए।
परम्परागत खाद और रासायनिक उर्वरकों में अंतर :-
| परम्परागत खाद | रासायनिक उर्वरक |
|---|---|
| यह वनस्पति एवं जंतुओं के अपशिष्ट पदार्थों के सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन से बनती है। | यह रासायनिक अभिकर्मकों द्वारा बनाई गई रासायनिक यौगिक होती है। |
| इसमें विभिन्न पोषक तत्वों का मिश्रण होता है। | इनमें प्रायः एक या दो पोषक तत्व ही होते हैं। |
| यह मिट्टी की संरचना और वातन (aeration) को सुधारती है। | यह मिट्टी की संरचना पर कोई प्रभाव नहीं डालती। |
| यह मिट्टी की जल रोकने की क्षमता बढ़ाती है। | यह मिट्टी की जल रोकने की क्षमता को प्रभावित नहीं करती। |
| इसका परिवहन और भंडारण कठिन होता है क्योंकि इसका आयतन अधिक होता है। | इसका परिवहन और भंडारण आसान होता है क्योंकि यह सघन (concentrated) रूप में होती है। |
| यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित है और दीर्घकालिक लाभ देती है। | इसका अधिक प्रयोग मिट्टी की उर्वरता घटाता है और पर्यावरण को हानि पहुँचा सकता है। |
कार्बनिक खेती :-
कार्बनिक खेती, खेती करने की वह पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरक, पीड़कनाशी, शाकनाशी आदि का उपयोग बहुत कम या बिलकुल नहीं होता। इसमें कार्बनिक खाद, कृषि अपशिष्ट, गोबर, नील-हरित शैवाल, जैविक उर्वरक का प्रयोग किया जाता है। एवं नीम की पत्तियाँ और हल्दी प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में प्रयोग होती हैं।
सिंचाई :-
एक ऐसी प्रणाली है जिस में फसल के लिए नियमित समयान्तराल पर नियन्त्रित पानी की आपूर्ति की जाती है, सिंचाई कहलाती है।
🔹 भारत में सिंचाई की आवश्यकता :-
- भारत की अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर है।
- यदि मानसून समय पर न आए या कम वर्षा हो, तो फसल उत्पादन घट जाता है।
- इसलिए फसलों की वृद्धि अवधि में उचित सिंचाई आवश्यक है।
🔹 सिंचाई के स्रोत :-
सिंचाई के लिए पानी के मुख्य स्रोत हैं:
- कुएँ
- नहरें
- नदियाँ
- तालाब
🔹 सिंचाई की विधियाँ :-
- (i) कुएँ: कुएँ दो प्रकार के होते हैं खुदे हुए कुएँ तथा नलकूप।
- खुदे हुए कुएँ: खुदे हुए कुएँ द्वारा भूमिगत जल स्तरों में स्थित पानी को एकत्रित किया जाता है। इन कुओं से सिंचाई के लिए पानी को पंप द्वारा निकाला जाता है।
- नलकूप: नलकूप में पानी गहरे जल स्तरों से निकाला जाता है।
- (ii) नहरें: इनमें पानी एक या अधिक जलाशयों अथवा नदियों से आता है। मुख्य नहर से शाखाएँ निकलती हैं जो विभाजित होकर खेतों में सिंचाई करती हैं।
- (iii) नदी जल उठाव प्रणाली: जिन क्षेत्रों में जलाशयों से कम पानी मिलने के कारण नहरों का बहाव अनियमित अथवा अपर्याप्त होता है वहाँ जल उठाव प्रणाली अधिक उपयोगी रहती है। इसमें नदियों से सीधे पानी उठाकर पास के खेतों में सिंचाई की जाती है।
- (iv) तालाब: छोटे जलाशय जो छोटे क्षेत्रों में बहे हुए, पानी का संग्रह करते हैं, तालाब का रूप ले लेते हैं।
🔹 सिंचाई की आधुनिक उपाय :-
कृषि में पानी की उपलब्धता बढ़ाने की आधुनिक विधियाँ:
- वर्षा जल संग्रहण: इसमें वर्षा का पानी संग्रह कर बाद में सिंचाई में उपयोग करना।
- छोटे बाँध: बाँध बनाकर वर्षा का पानी रोकना ताकि जिससे कि भूमि के नीचे जलस्तर बढ़ जाए।
- जल विभाजन प्रबंधन: पानी का सही वितरण करके हर खेत को समान मात्रा में पानी देना।
फसल पैटर्न :-
फसलों से अधिक लाभ प्राप्त करने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए फसलें उगाने की विभिन्न विधियों को फसल पैटर्न कहा जाता है।
🔹 फसल पैटर्न अपनाने के लाभ :-
- मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
- पोषक तत्वों का सही उपयोग होता है।
- कीट और रोगों का नियंत्रण होता है।
- अधिक उत्पादन और किसानों को लाभ प्राप्त होता है।
- पर्यावरण और मिट्टी की गुणवत्ता सुरक्षित रहती है।
🔹मुख्य प्रकार के फसल पैटर्न :-
- मिश्रित खेती
- अंतराफसलीकरण
- फसल चक्र
1. मिश्रित खेती :-
एक ही खेत में एक साथ दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ ही एक खेत में उगाते हैं। जिसे मिश्रित खेती कहते है।
- उदाहरण: गेहूँ + चना, गेहूँ + सरसों, मूँगफली + सूरजमुखी
- 🔸 लाभ: इससे नुकसान का खतरा कम होता है, क्योंकि यदि एक फसल नष्ट हो जाए तो दूसरी से उत्पादन मिल जाता है।
2. अंतराफसलीकरण :-
अंतराफसलीकरण में दो अथवा दो से अधिक फसलों को एक साथ एक ही खेत में निर्दिष्ट पैटर्न पर उगाते हैं। कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल तथा उनके एकांतर में स्थित दूसरी पंक्तियों में दूसरी प्रकार की फसल उगाते हैं।
- उदाहरण: सोयाबीन+मक्का अथवा बाजरा+लोबिया।
- 🔸 लाभ: इससे पोषक तत्वों का अधिकतम उपयोग होता है और कीट/रोग फैलने की संभावना कम होती है। इस प्रकार दोनों फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
3. फसल चक्र :-
किसी खेत में क्रमवार पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार विभिन्न फसलों के उगाने को फसल चक्र कहते हैं। उदाहरण: धान → गेहूँ → मूँग।
- आधार: फसलों के परिपक्वन काल, मिट्टी की नमी और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर फसल चक्र तय किया जाता है।
- 🔸 लाभ: इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, पोषक तत्वों की कमी नहीं होती और एक वर्ष में दो या तीन फसलें ली जा सकती हैं।
फसल सुरक्षा प्रबंधन :-
खेतों की फसलों को खर-पतवार, कीट, पीड़क और रोग फैलाने वाले जीवों तथा फसल को हानि पहुँचाने वाले कारकों से फसलों की सुरक्षा ही फसल सुरक्षा प्रबन्धन कहलाती है।
🔸 फसल के शत्रु :- फसल को मुख्य रूप से तीन चीजों से नुकसान होता है:
- खर-पतवार (अवांछित पौधे)
- कीट-पीड़क
- रोग (जीवाणु, कवक, विषाणु से)
खर-पतवार :-
फसल के साथ-साथ उगने वाले अवांछनीय पौधों को खरपतवार कहते हैं। ये कृषि योग्य भूमि में अनावश्यक होते हैं। उदाहरण :- गोखरू (जैथियम), गाजर घास (पारथेनियम), व मोथा (साइप्रस रोटेंडस) आदि।
🔸 नुकसान: ये फसल के साथ भोजन, स्थान तथा प्रकाश एवं पोषक तत्व के लिए स्पर्धा के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे फसलों की वृद्धि कम हो जाती है।
- 🔸 नियंत्रण :-
- अच्छी पैदावार के लिए प्रारंभिक अवस्था में ही खर-पतवार को खेतों में से निकाल देना चाहिए।
- शाकनाशी का प्रयोग किया जा सकता है।
- अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र खर-पतवार को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।
कीट एवं पीड़क :-
ये फसलों के मूल, तने, पत्तियों और फलों को नुकसान पहुँचाते हैं। कीट-पीड़क तीन प्रकार से पौधों पर आक्रमण करते हैं:
- (1) ये मूल, तने तथा पत्तियों को काट देते हैं,
- (2) ये पौधे के विभिन्न भागों से कोशिकीय रस चूस लेते हैं, तथा
- (3) ये तने तथा फलों में छिद्र कर देते हैं।
- 🔸 नियंत्रण :-
- कीटनाशी का प्रयोग करके इससे बचाव किया जा सकता हैं।
- पीड़कों पर नियंत्रण पाने के लिए प्रतिरोध क्षमता वाली किस्मों का उपयोग करके बचाव किया जा सकता हैं।
- ग्रीष्म काल में हल से जुताई बचाव की निरोधक विधियाँ हैं।
पौध रोग :-
पौधों में रोग बैक्टीरिया, कवक तथा वाइरस जैसे रोग कारकों द्वारा होता है। ये मिट्टी, पानी तथा हवा में उपस्थित रहते हैं और इन माध्यमों द्वारा ही पौधों में फैलते हैं।
🔸 नियंत्रण :- कवकनाशी और रोग-रोधी किस्मों का उपयोग करके इनसे बचाव किया जा सकता हैं।
अनाज का भंडारण :-
फसल की कटाई के बाद अनाज को सुरक्षित रखना ताकि वह लंबे समय तक बिना खराब हुए उपयोग या बिक्री योग्य बना रहे, इसे भंडारण कहते हैं।
🔹भंडारण के दौरान हानियाँ :-
भंडारण में दो प्रकार के कारकों से हानि होती है:
- जैविक कारक :- जैविक कारक कीट, कृतक, कवक, चिंचड़ी तथा जीवाणु हैं, ये कारक अनाज को खाते हैं या संक्रमित कर देते हैं।
- अजैविक कारक :- इस हानि के अजैविक कारक भंडारण के स्थान पर उपयुक्त नमी व ताप का अभाव हैं। ये परिस्थितियाँ कवक और कीटों के विकास को बढ़ावा देती हैं।
🔹कारकों से होने वाली हानि के प्रभाव :-
ये कारक अनाज को निम्नलिखित तरीकों से नुकसान पहुँचाते हैं:
- गुणवत्ता खराब कर देते हैं।
- वजन कम कर देते हैं।
- अंकुरण क्षमता कम कर देते हैं।
- उत्पाद को बदरंग कर देते हैं।
ये सब लक्षण बाजार में उत्पाद की कीमत को कम कर देते हैं।
🔹भंडारण हानि को रोकने के उपाय (नियंत्रण विधियाँ) :-
इन कारकों पर नियंत्रण पाने के लिए उचित उपचार और भंडारण का प्रबंधन होना चाहिए। भंडारण से पहले निरोधक एवं नियंत्रण विधियाँ अपनाना आवश्यक है। इन विधियों के भंडारण से पहले उत्पाद की नियंत्रित सफाई को अच्छी तरह सुखाना (पहले सूर्य के प्रकाश में और फिर छाया में) तथा धूमक का उपयोग, जिससे कि पीड़क मर जाए, सम्मिलित हैं।
पशुपालन :-
पशुधन के प्रबंधन को पशुपालन कहते हैं। इसके अंतर्गत बहुत-से कार्य; जैसे भोजन देना, प्रजनन तथा रोगों पर नियंत्रण करना आता है।
🔹पशुपालन का महत्व :-
- दूध, मांस, अंडे, ऊन, चमड़ा आदि प्राप्त होते हैं।
- किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है।
- कृषि में उपयोगी पशु शक्ति (जैसे बैल) मिलती है।
पशु कृषि :-
पशुपालन के साथ कृषि या कृषि के साथ पशुओं का पालन पशु कृषि कहलाती है।
🔹 पशुपालन के दो प्रमुख उद्देश्य हैं-
- दूध देने वाली नस्लों के पशुओं को पालना, तथा
- कृषि कार्यों (हल चलाना, सिंचाई, बोझा ढोना आदि) के लिए पशु पालना।
दुग्ध उत्पादन :-
- भारतीय पालतू पशुओं की दो मुख्य स्पीशीज़ हैं: गाय (बॉस इंडिकस), भैंस (बॉस बुबेलिस)। दूध देने वाली मादाओं को दुधारू पशु कहते हैं।
- दूध उत्पादन पशु के दुग्धस्रवण काल पर निर्भर करता है। दुग्धस्रवण काल जितना लंबा होगा, दूध उत्पादन उतना अधिक होगा।
🔹 दूध उत्पादन बढ़ाने के तरीके :-
- (i) नस्ल सुधार
- (ii) स्वच्छता एवं आवास प्रबंधन
- (iii) संतुलित आहार
- 🔸(i) नस्ल सुधार :-
- विदेशी नस्लें: लंबे समय तक दुग्धस्रवण काल के लिए विदेशी नस्लों जैसे जर्सी, ब्राउन स्विस का चुनाव करते हैं।
- देशी नस्लें: देशी नस्लों जैसे रेडसिंधी, साहीवाल में रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक होती है।
- संकरण: देशी और विदेशी नस्लों के संकरण से ऐसी नस्ल तैयार की जाती है, जिसमें दोनों के अच्छे गुण (लंबा दुग्धस्रवण काल + रोग प्रतिरोधक क्षमता) होते हैं।
- 🔸(ii) स्वच्छता एवं आवास प्रबंधन :-
- पशुओं के रहने की जगह साफ, सूखी और हवादार होनी चाहिए।
- पशुओं की नियमित सफाई (शरीर के बाल और धूल हटाना)।
- उनका आवास छतदार तथा रोशनदान युक्त होना चाहिए।
- आवास का फर्श ढलवा होना चाहिए ताकि पानी जमा न हो, जिससे कि वह साफ और सूखा रहे।
- 🔸(iii) संतुलित आहार :-
- पशु के आहार में दो प्रकार के चारे शामिल होते हैं:
- मोटा चारा: रेशेदार भोजन जैसे सूखी घास, भूसा।
- सांद्र आहार: दाना, चोकर, तेल-बीज आदि – इनमें प्रोटीन और पोषक तत्व अधिक होते हैं।
- एक संतुलित आहार में सभी आवश्यक पोषक तत्व और सूक्ष्म पोषक शामिल होने चाहिए।
पशु रोग एवं नियंत्रण :-
🔹 (i) रोग के प्रकार:
- बाह्य परजीवी: त्वचा पर रहने वाले (जूँ, खटमल) – त्वचा रोग का कारण।
- अंतः परजीवी: शरीर के अंदर रहने वाले (कीड़े, फीताकृमि) – आमाशय, आंत और यकृत को प्रभावित करते हैं।
- संक्रामक रोग: बैक्टीरिया और वायरस से फैलने वाले।
🔹 (ii) रोगों से रोकथाम के उपाय :-
- टीकाकरण: पशुओं को नियमित टीकाकरण किया जाता है।
- साफ-सफाई और उचित आहार से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
कुक्कुट पालन (मुर्गी पालन) :-
कुक्कुट पालन का उद्देश्य है अंडे और मांस का उत्पादन बढ़ाना। इसके लिए उन्नत नस्लों की मुर्गियाँ पाली जाती हैं।
🔹 मुर्गियों के प्रकार :-
- 🔸लेयर (अंडे देने वाली): जब मुर्गियों को अण्डों के लिए पाला जाता है तब उन्हें लेअर कहा जाता है।
- 🔸ब्रॉयलर (मांस देने वाली): जब कुक्कुटों को मांस के लिए पाला जाता है तब इन्हें ब्रौलर कहा जाता है।
मुर्गियों का नस्ल सुधार :-
🔸 नस्ल सुधार की विधि: इन दोनों गुणों के लिए नयी-नयी किस्में विकसित की जाती हैं। नई नस्लें बनाने के लिए देशी नस्लें (जैसे — एसिल) और विदेशी नस्लें (जैसे — लेगहार्न) का संकरण किया जाता है।
🔹 नई और बेहतर किस्में विकसित करने के मुख्य लक्ष्य हैं:
- चूजों की संख्या और गुणवत्ता: अधिक और स्वस्थ चूजों का उत्पादन।
- छोटे आकार के माता-पिता: कम भोजन में अधिक चूजे देने वाले।
- ताप अनुकूलन क्षमता: गर्मी और ऊँचे तापमान को सहन करने में सक्षम।
- कम लागत में देखभाल: भोजन और रखरखाव पर कम खर्च।
- सस्ता आहार: ऐसी मुर्गियाँ जो कृषि उपोत्पादों (जैसे- चोकर, भूसा) से बने सस्ते और रेशेदार आहार पर अच्छा उत्पादन दे सकें।
ब्रॉयलर उत्पादन :-
- ब्रॉयलर वे मुर्गियाँ होती हैं जिन्हें मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है।
- इन्हें तेज़ वृद्धि और अच्छी आहार दक्षता के लिए विटामिन से प्रचुर आहार दिया जाता है।
- इनके भोजन में पर्याप्त मात्रा में विटामिन, प्रोटीन, और वसा होती है।
- ब्रॉयलर के पंखों और मांस की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सावधानी बरती जाती है।
- उन्हें ब्रौलर के रूप में उत्पादित किया जाता है तथा मांस के प्रयोजन के लिए विपणन किया जाता है।
मुर्गी पालन की आवश्यक प्रबंधन प्रणालियाँ :-
अच्छे उत्पादन के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना जरूरी है:
- उचित आवास: आवास में सही तापमान और स्वच्छता का ध्यान रखना अवश्यक हैं।
- गुणवत्तापूर्ण आहार: पोषक तत्वों से भरपूर आहार देना चहिए।
- रोग नियंत्रण: इनके साथ-साथ रोगों तथा पीड़कों पर नियंत्रण तथा उनसे बचाव करना भी शामिल है।
मुर्गी में रोग प्रबंधन :-
🔸 रोगों के कारण: जीवाणु, विषाणु, कवक, परजीवी तथा पोषणहीनता के कारण मुर्गियों में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।
🔹रोग से बचाव के उपाय:
- सफाई तथा स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
- नियमित रूप से कीटाणुनाशक का छिड़काव करना चाहिए।
- संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण करवाना ताकि महामारी न फैले।
🔸 लाभ: इन सावधानियों को अपनाने से रोग फैलने की स्थिति में नुकसान कम होता है।
मत्स्य उत्पादन (मछली उत्पादन) :-
मछली हमारे भोजन में प्रोटीन का समृद्ध स्रोत है। यह स्वास्थ्यवर्धक, सस्ता, और आसानी से पचने वाला आहार है। मछली उत्पादन में पखयुक्त मछलियाँ, कवचीय मछलियाँ जैसे प्रॉन तथा मोलस्क सम्मिलित हैं।
🔸मछली प्राप्त करने की विधियाँ :- मछली प्राप्त करने की दो विधियाँ हैं: एक प्राकृतिक स्रोत (जिसे मछली पकड़ना कहते हैं) तथा दूसरा स्रोत मछली पालन (या मछली संवर्धन)।
🔸मछलियों के जल स्रोत :- मछलियाँ दो प्रमुख जल स्रोतों में पाई जाती हैं —
- समुद्री जल:
- जैसे समुद्र और महासागर।
- इनसे समुद्री मछलियाँ मिलती हैं।
- ताज़ा जल (अलवणीय जल):
- जैसे नदियाँ, तालाब और झीलें।
- इनसे मीठे पानी की मछलियाँ मिलती हैं।
समुद्री मत्स्यिकी :-
🔸 भारत का समुद्री संसाधन: भारत का समुद्री तट लगभग 7500 किलोमीटर लंबा है। इस विस्तृत तटरेखा और गहरे समुद्र के कारण भारत के पास समुद्री मछलियों का विशाल संसाधन है।
🔸 प्रमुख समुद्री मछलियाँ: भारत में पाई जाने वाली मुख्य समुद्री मछलियाँ हैं — पॉमफ्रेट, मैकरल, टूना, सारडाइन और बॉम्बे डक।
🔹मछली पकड़ने की तकनीक :-
- मछलियाँ पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जाल का उपयोग किया जाता है।
- ये जाल मछली पकड़ने वाली नावों से डाले जाते हैं।
- आधुनिक तकनीकें — सैटेलाइट, प्रतिध्वनि गभीरतामापी की मदद से समुद्र में मछलियों के समूह का पता लगाया जाता है।इससे मछली उत्पादन में वृद्धि होती है।
समुद्री संवर्धन (मेरीकल्चर) :-
भविष्य में समुद्री मछलियों का भंडार कम होने की अवस्था में इन मछलियों की पूर्ति संवर्धन के द्वारा हो सकती है। इस प्रणाली को समुद्री संवर्धन (मेरीकल्चर) कहते हैं।
🔸 समुद्री मछलियों का संवर्धन :- कुछ आर्थिक महत्त्व वाली समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन भी किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं : मुलेट, भेटकी तथा पर्लस्पॉट (पंखयुक्त मछलियाँ), कवचीय मछलियाँ जैसे झींगा, मस्सल तथा ऑएस्टर, एवं साथ ही समुद्री खर-पतवार।
👉 ऑएस्टर का पालन मोती प्राप्त करने के लिए किया जाता है — जिसे मोतियों की खेती कहा जाता है।
अंतःस्थली मत्स्यिकी :-
- अंतःस्थली मत्स्यिकी का संबंध ताज़े जल या खारे जल के स्रोतों से है।
- इसके अंतर्गत मछलियों का पालन नदियों, नालों, तालाबों, पोखरों, झीलों, और लैगून में किया जाता है।
- जहाँ समुद्री जल व ताज़ा जल मिलते हैं — जैसे नदीमुख — वहाँ भी मछलियाँ पाई जाती हैं।
धान के खेतों में मछली पालन :-
कुछ क्षेत्रों में धान की फसल के साथ-साथ मछली पालन भी किया जाता है। इससे किसान को दुगना लाभ मिलता है — फसल + मछली उत्पादन।
मिश्रित मछली संवर्धन :-
- विधि: इस विधि में देशी और विदेशी (आयातित) दोनों प्रकार की मछलियों को एक ही तालाब में पाला जाता है। सामान्यतः 5 या 6 प्रकार की मछलियाँ एक साथ डाली जाती हैं।
- सिद्धांत: ऐसी मछलियाँ चुनी जाती हैं जिनके आहार अलग-अलग हों ताकि वे प्रतिस्पर्धा न करें और तालाब के हर हिस्से का उपयोग कर सकें।
- उदाहरण:
- कतला: पानी की सतह से भोजन लेती है।
- रोहू: तालाब के बीच के हिस्से से भोजन लेती है।
- मृगल/कॉमन कार्प: तालाब की तली से भोजन लेती है।
- ग्रास कार्प: खरपतवार खाती है।
- लाभ: इस प्रकार तालाब का हर भाग उपयोग में आता है और मछली उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है।
मधुमक्खी पालन :-
मधुमक्खी पालन वह प्रक्रिया है जिसमें शहद (मधु) और मोम प्राप्त करने के लिए मधुमक्खियों को पाला जाता है।
- यह एक लघु कृषि उद्योग है।
- इसमें पूँजी निवेश बहुत कम होता है और लाभ अधिक मिलता है।
- इसलिए किसान इसे अतिरिक्त आय का अच्छा साधन मानते हैं।
🔹 मधुमक्खी पालन के मुख्य उत्पाद :-
- मधु :-
- पौधों के फूलों से प्राप्त मकरंद से मधुमक्खियाँ तैयार करती हैं।
- यह ऊर्जा, खनिज, एंजाइम और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
- मोम :-
- मधुमक्खियों के छत्तों से प्राप्त होता है।
- इसका उपयोग औषधि, सौंदर्य प्रसाधन और मोमबत्ती उद्योग में होता है।
🔹 मधुमक्खी पालन के लाभ :-
- कम लागत और अधिक लाभ।
- शहद और मोम दोनों का उत्पादन।
- रोजगार के नए अवसर।
- फसलों के परागण में सहायता – जिससे फसल उत्पादन भी बढ़ता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में सहायक उद्योग के रूप में महत्वपूर्ण।
🔹 मधुमक्खियों की किस्में :-
🔸 देशी किस्में: व्यावसायिक स्तर पर मधु उत्पादन के लिए देशी किस्म की मक्खी ऐपिस सेरना इंडिका, (सामान्य भारतीय मक्खी), ऐपिस डोरसेटा (एक शैल मक्खी) तथा ऐपिस फ्लोरी (लिटिल मक्खी) का प्रयोग करते हैं।
🔸 विदेशी किस्म: एक इटालियन मक्खी की प्रजाति (ऐपिस मेलीफेरा) का व्यावसायिक मधु उत्पादन में सर्वाधिक उपयोग होता है।
🔹 इटालियन मधुमक्खी की विशेषताएँ :-
- मधु एकत्र करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।
- वे डंक भी कम मारती हैं।
- छत्ते में लंबे समय तक रहती हैं।
- प्रजनन की गति तेज़ होती है।
- व्यावसायिक स्तर पर सर्वाधिक उपयोगी प्रजाति है।
मधु की गुणवत्ता पर प्रभाव डालने वाले कारक :-
- शहद की गुणवत्ता और स्वाद मधुमक्खियों को उपलब्ध फूलों के प्रकार पर निर्भर करता है।
- मधुमक्खियाँ फूलों से पराग और मकरंद एकत्र करती हैं।
- पर्याप्त चरागाह (फूलों की उपलब्धता) होना आवश्यक है।
- फूलों की किस्में मधु के स्वाद को निर्धारित करती हैं।
