कक्षा 9 विज्ञान अध्याय 5 नोट्स: जीवन की मौलिक इकाई class 9 notes
| Textbook | Ncert |
| Class | Class 9 |
| Subject | Science |
| Chapter | Chapter 5 |
| Chapter Name | जीवन की मौलिक इकाई नोट्स |
| Medium | Hindi |
क्या आप Class 9 Science chapter 5 notes in hindi ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से jivan ki maulik ikai notes download कर सकते हैं। इस अध्याय मे हम कोशिका जीवन की मौलिक इकाई के रूप में, प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिका, बहुकोशिकीय जीव, कोशिका झिल्ली व कोशिका भित्ति, कोशिकांग तथा कोशिका, माइटोकांड्रिया, अंतरद्रव्ययी जालिका, गॉल्जीकाय, केन्द्रक आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे ।
कोशिका :-
Cell (कोशिका) लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “छोटा कमरा”। सभी जीव सूक्ष्म इकाईयों के बने होते हैं। जिन्हें कोशिका कहते हैं। कोशिका किसी भी जीवित जीव की सबसे छोटी संरचनात्मक, कार्यात्मक और जैविक इकाई होती है।
कोशिका की खोज :-
कोशिका का सबसे पहले पता रॉबर्ट हुक ने 1665 में लगाया था। उसने कोशिका को कार्क की पतली काट में अनगढ़ सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा।
- 1665 – रॉबर्ट हुक → कार्क की पतली काट में पहली बार कोशिकाएँ देखीं (अनगढ़ सूक्ष्मदर्शी से)।
- 1674 – ल्यूवेनहॉक → उन्नत सूक्ष्मदर्शी से तालाब के जल में स्वतंत्र रूप से जीवित कोशिकाओं का पता लगाया।
- 1831 – रॉबर्ट ब्राउन → कोशिका में केंद्रक (Nucleus) की खोज।
- 1839 – जे. ई. पुरोकंज → कोशिका के तरल पदार्थ को जीवद्रव्य (Protoplasm) नाम दिया।
- 1838 – एम. श्लाइडन → बताया कि पौधे कोशिकाओं से बने हैं।
- 1839 – टी. स्वान → बताया कि जंतु कोशिकाओं से बने हैं।
कोशिका का निर्माण :-
प्रोटोप्लाज्म के विभिन्न संगठन में जल, आयन, लवण तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, न्यूक्लिक अम्ल और विटामिन सम्मिलित होते हैं। ये सभी घटक मिलकर कोशिका द्रव्य और केन्द्रक के साथ कोशिका का निर्माण करते हैं।
कोशिका: जीवन की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई :-
सभी जीव कोशिकाओं के बने होते हैं। ये जीवन की मूलभूत इकाई है। जीवित कोशिका में मूलभूत कार्य करने की क्षमता होती है अतः इसे जीवन की संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई कहते हैं।
कोशिका सिद्धांत :-
एम. स्लीडन (1838) तथा टी. स्वान (1839) ने कोशिका सिद्धांत के विषय में बताया। जिसके अनुसार:
- सभी पौधे व जीव कोशिका के बने होते हैं।
- कोशिका जीवन की मूल इकाई है।
- सभी कोशिकाएँ पूर्व निर्मित कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
जीवों का वर्गीकरण :-
- एककोशिकीय जीव
- बहुकोशिकीय जीव
एककोशिकीय जीव :-
ऐसे जीव जिनका शरीर केवल एक ही कोशिका से बना होता है। यही एक कोशिका उनके जीवन की सभी क्रियाएँ (भोजन करना, श्वसन, वृद्धि, प्रजनन आदि) करती है, एककोशिकीय जीव कहलाते है। उदाहरण: अमीबा, क्लैमिडोमोनास, पैरामीशियम तथा बैक्टीरिया।
बहुकोशिकीय जीव :-
वे जीव जिनमें अनेक कोशिकाएँ समाहित होकर विभिन्न कार्य को सम्पन्न करने हेतु विभिन्न अंगो का निर्माण करते है, बहुकोशिकीय जीव कहलाते है। उदाहरण: मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे।
📝 एककोशिकीय और बहुकोशिकीय जीव में अंतर
| आधार | एककोशिकीय जीव | बहुकोशिकीय जीव |
|---|---|---|
| कोशिकाओं की संख्या | केवल एक कोशिका से बने होते हैं। | अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं। |
| आकार | बहुत छोटे और सूक्ष्मदर्शी से देखे जा सकते हैं। | छोटे से लेकर बहुत बड़े आकार के हो सकते हैं। |
| कार्य विभाजन | एक ही कोशिका सभी जीवन क्रियाएँ करती है। | अलग-अलग कोशिकाएँ अलग कार्य करती हैं (श्रम विभाजन)। |
| जीवन-क्रियाएँ | भोजन, श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन – सब एक कोशिका करती है। | अलग-अलग अंग और अंग-प्रणालियाँ जीवन क्रियाएँ करती हैं। |
| जटिलता | सरल संरचना वाले। | जटिल संरचना वाले। |
| उदाहरण | अमीबा, क्लैमाइडोमोनास, पैरामीशियम, बैक्टीरिया। | मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे। |
कोशिका की आकृति :-
कोशिकाओं का आकार और आकृति अलग-अलग होती है। सामान्यतः कोशिकाएँ गोलाकार होती हैं। कुछ कोशिकाएँ लंबाकार, स्तंभाकार या चक्राकार/चपटे भी होती हैं। कोशिका का आकार उसके कार्य पर निर्भर करता है।
कोशिका का आकार :-
कोशिकाओं का आकार एवं आकृति उनके कार्यों के अनुरूप होते हैं। कुछ कोशिकाएँ अपना आकार बदलती रहती हैं जैसे एककोशिक अमीबा । कुछ जीवों में कोशिका का आकार लगभग स्थिर रहता है और प्रत्येक प्रकार की कोशिका के लिए विशिष्ट होता है; उदाहरण के लिए तंत्रिका कोशिका।
कोशिका का आकार (in brief) :-
विभिन्न जीवों (पादप और जन्तु) की कोशिकाएँ विभिन्न आकार और प्रकार की होती है। कुछ कोशिकाएँ सूक्ष्मदर्शीय होती हैं जबकि कुछ कोशिकाएँ नग्न आँखों से भी देखी जा सकती हैं। कोशिकाओं का आकार सामान्यतः 0.2 माइक्रोमीटर (µm) से 18 सेंटीमीटर (cm) तक पाया गया है।
उदाहरण:
- सामान्य बहुकोशिकीय जीवों की कोशिकाएँ → लगभग 2–120 µm तक होती हैं।
- सबसे बड़ी कोशिका → शुतुरमुर्ग का अंडा, लगभग 15 सेमी लंबा व 13 सेमी चौड़ा।
- सबसे छोटी कोशिका → माइकोप्लाज्मा, जिसका आकार लगभग 0.1 माइक्रोमीटर (µm) होता है।
- सबसे लंबी कोशिका → मानव तंत्रिका कोशिका, जिसकी लंबाई लगभग 1 मीटर तक हो सकती है।
कोशिका के मुख्य कार्य :-
- यह पाचन में सहायता करती है।
- यह ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायक है।
- यह पदार्थों के स्रावण में सहायता करती है।
- यह आवश्यक पदार्थों के संश्लेषण में सहायता करती है।
- कोशिका अपने भीतर बनने वाले अपशिष्ट को बाहर निकालती है।
- कोशिका विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाती है, जिससे जीव की वृद्धि और प्रजनन संभव होता है।
कोशिकांग और उनके कार्य :-
कोशिका में विशिष्ट घटक होते हैं जिन्हें कोशिकांग कहते हैं। प्रत्येक कोशिकांग का एक विशेष कार्य होता है। कोशिकांगों के कारण ही एक कोशिका जीवित रहती है और अपने सभी कार्य करती है। सभी कोशिकांग मिलकर कोशिका को एक मूलभूत इकाई बनाते हैं।
यह बड़ा रुचिकर है कि सभी कोशिकाओं में एक ही प्रकार के कोशिकांग होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके कार्य क्या हैं अथवा वे किस जीव में पाई जाती हैं।
कोशिका के भाग :-
सामान्यतः सभी कोशिकाओं के तीन मुख्य भाग होते हैं- (i) प्लाज्मा झिल्ली (Cell membrane) (ii) केन्द्रक (Nucleus) (iii) कोशिका द्रव्य (Cytoplasm)
प्लाज्मा झिल्ली :-
कोशिका के सभी अवयव एक झिल्ली द्वारा घिरे रहते हैं, इसे प्लाज्मा झिल्ली कहते हैं। कोशिका झिल्ली को ही प्लाज्मा झिल्ली या प्लाज्मालेमा कहा जाता है।
- इसकी मोटाई लगभग एक माइक्रोमीटर का हजारवाँ भाग (≈ 7–8 नैनोमीटर) होती है।
- यह जीवित संरचना है।
- प्लैज़्मा झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं जैसे लिपिड तथा प्रोटीन की बनी होती है।
- यह चयनात्मक रूप से पारगम्य होती है (केवल कुछ ही पदार्थों को कोशिका के अंदर जाने या बाहर निकलने देती है)।
प्लाज्मा झिल्ली के कार्य :-
- यह कोशिका के सभी आंतरिक अवयवों को सुरक्षित रखती है।
- यह कोशिका में आने और जाने वाले पदार्थों को नियंत्रित करती है।
- प्लाज्मा झिल्ली के अंदर व बाहर अणुओं का आदान-प्रदान होता है। यह दो प्रमुख प्रक्रियाओं द्वारा होता है:
- (a) विसरण (Diffusion)
- (b) परासरण (Osmosis)
विसरण :-
- पदार्थ उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर स्वतः गति करते हैं।
- यह प्रक्रिया ठोस, द्रव और गैस – सभी माध्यमों में संभव है।
- यह दोनों स्थानों की सान्द्रता को समान कर देता है।
- इसमें घुलनशील पदार्थ और विलायक दोनों गति कर सकते हैं।
परासरण :-
- अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से जल (विलायक) अणुओं का उच्च सान्द्रता वाले विलयन से निम्न सान्द्रता वाले विलयन की ओर गमन।
- यह केवल द्रव में संभव है।
- यह भी दोनों स्थानों की सान्द्रता को समान करने का कार्य करता है।
- इसमें केवल विलायक गति करने के लिए स्वतन्त्र विलयन नहीं।
विसरण और परासरण में अंतर :-
| विसरण | परासरण |
|---|---|
| इसमें उच्च सान्द्रता से निम्न सान्द्रता की और स्वतः गमन होता है। | इसमें वर्णात्मक झिल्ली द्वारा जल या विलायक के अणुओं का उच्च सान्द्रता से निम्न सान्द्रता की और गमन होता है। |
| इसमें दोनों पदार्थ की सान्द्रता समान हो जाती है। | परासरण में धीरे-धीरे दोनों ओर पानी की गति के कारण सांद्रता संतुलित हो जाती है। |
| अपनी सान्द्रता के आधार पर अलग-अलग पदार्थ के अणु गति करने लिए स्वतन्त्र होते हैं। | इसमें केवल विलायक ही गति करने के लिए स्वतन्त्र होता है, विलयन के नाहीं। |
| यह पदार्थ की सभी अवस्थाओं में लगभग होता है। | यह केवल द्रवीय अवस्था में सम्भव हो पाता है। |
सान्द्रता के अनुसार विलयन के प्रकार तथा उनका कोशिका पर प्रभाव :-
- समपरासरी विलयन-
- जब कोशिका के अंदर और बाहर की सान्द्रता समान होती है।
- परिणाम: कोशिका का आकार और आकार परिवर्तन नहीं होता।
- अतिपरासरण दाबी विलयन-
- जब कोशिका के अंदर की सान्द्रता बाहरी विलयन से अधिक होती है।
- परिणाम: जल कोशिका से बाहर निकल जाता है जिससे कोशिका सिकुड़ जाती है।
- पादप कोशिका में: जिवद्रव्यकुंचन
- अल्पपरासरण दाबी विलयन-
- जब कोशिका के बाहर का विलयन कोशिका की तुलना में कम सान्द्रता वाला होता है।
- परिणाम:
- जल कोशिका के अंदर जाता है → कोशिका फूल जाती है।
- जन्तु कोशिका में अत्यधिक जल प्रवेश → कोशिका फट सकती है।
जीवद्रव्य कुंचन :-
जब किसी पादप कोशिका में परासरण द्वारा पानी की हानि होती है तो कोशिका झिल्ली सहित आंतरिक पदार्थ संकुचित हो जाते हैं। इस घटना को जीवद्रव्य कुंचन कहते हैं।
कोशिका भित्ति :-
प्लाज्मा झिल्ली के बाहर एक और परत होती है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह कठोर तथा अजीवित परत है। पादप कोशिका भित्ति मुख्यतः सेल्यूलोज की बनी होती है।
कोशिका भित्ति के कार्य :-
- कोशिका को कठोरता और निश्चित आकार प्रदान करना।
- यह प्लाज्मा झिल्ली की सुरक्षा करती है।
- यह कोशिका के अन्दर व बाहर विभिन्न पदार्थों के संवहन में सहायता करती है।
- इसमें मरम्मत करने व पुनर्जनन की क्षमता होती है।
केन्द्रक :-
सबसे पहले 1831 ई. में रॉबर्ट ब्राउन ने केन्द्रक को देखा था। यह कोशिका का सबसे महत्वपूर्ण अंग है जो कि कोशिका की सभी क्रियाओं पर नियन्त्रण करता है इसी कारण इसे कोशिका का केन्द्र कहा जाता है।
🔸 केन्द्रक का स्थान: कोशिका के मध्य में एक केन्द्रक होता है जिसमें यह स्थित होता है।
🔸 केन्द्रक की संरचना :-
- केन्द्रक के चारों तरफ एक अपनी झिल्ली होती है जिसे केन्द्रक झिल्ली कहते हैं।
- इसकी आकृति गोलाकार या अण्डाकार या वर्तुलाकार भी हो सकती है।
- केन्द्रक झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनसे केन्द्रक के अन्दर का कोशिका द्रव्य बाहर आ सकता है।
- केन्द्रक में अत्यन्त पतली धागे जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें क्रोमेटिन कहते हैं।
🔸 केन्द्रक के कार्य :-
- केन्द्रक कोशिका की सभी गतिविधियों का नियंत्रण केंद्र होता है। यह कोशिका के विकास, वृद्धि और परिपक्वता को नियंत्रित करता है।
- केन्द्रक में गुणसूत्र होते हैं, जिनमें डीएनए (DNA) के रूप में आनुवंशिक जानकारी होती है। यह जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लक्षणों को स्थानांतरित करने में मदद करती है।
- कोशिका विभाजन के समय केन्द्रक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कोशिका विभाजन को नियंत्रित और समन्वित करता है, जिससे नई कोशिकाएं सही ढंग से बनती हैं।
- केन्द्रक कोशिकीय प्रजनन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो जीवों के प्रजनन और विकास के लिए आवश्यक है।
- केन्द्रक राइबोसोम के उत्पादन को नियंत्रित करता है। राइबोसोम, जो बाद में कोशिका द्रव्य में चले जाते हैं, प्रोटीन संश्लेषण के लिए जिम्मेदार होते हैं।
कोशिका द्रव्य :-
द्रव्य-कोशिका के अन्दर केन्द्रक के चारों तरफ एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसे कोशिका द्रव्य कहते हैं। यह एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से विशिष्ट कोशिका के घटक होते हैं। जिन्हें कोशिका अंगक कहते हैं। प्रत्येक अंगंक कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करता है। कोशिका द्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर “जीवद्रव्य” कहते है।
प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाओं में अंतर :-
| विशेषता | प्रोकैरियोटिक कोशिका | यूकैरियोटिक कोशिका |
|---|---|---|
| आकार | बहुत छोटी (0.1 – 5 µm) | बड़ी (5 – 100 µm) |
| केंद्रकीय भाग | न्यूक्लॉइड (Nucleoid), झिल्ली से घिरा नहीं | केंद्रक (Nucleus) झिल्ली से घिरा होता है |
| केंद्रक | अनुपस्थित, केवल 1 गुणसूत्र | उपस्थित, एक से अधिक गुणसूत्र |
| अंगक | झिल्ली-बद्ध अंगक अनुपस्थित | झिल्ली-बद्ध अंगक उपस्थित |
| कोशिका विभाजन | साधारण विखंडन या कलिका (Budding) द्वारा | माइटोसिस और मियोसिस द्वारा |
| संगठन | हमेशा एककोशिकीय (जैसे जीवाणु) | एककोशिकीय तथा बहुकोशिकीय दोनों (जैसे अमीबा, पौधे, मनुष्य) |
कोशिका अंगक :-
परिभाषा: कोशिका के भीतर पाई जाने वाली झिल्लीयुक्त सूक्ष्म संरचनाएँ, जिन्हें कोशिका अंगक (Cell Organelles) कहते हैं। ये अंगक विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को अलग-अलग करके कोशिका को व्यवस्थित रूप से कार्य करने में सहायता करते हैं।
🔸 विशेषता:
- अंगक झिल्ली से घिरे रहते हैं।
- अधिकांश केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही देखे जा सकते हैं।
- यह विशेषता यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाई जाती है, प्रोकैरियोटिक में नहीं।
कोशिका अंगकों के महत्वपूर्ण उदाहरण:
- (a) अन्तर्द्रव्यी-जालिका
- (b) राइबोसोम
- (c) माइटोकॉन्ड्रिया
- (d) गॉल्जी उपकरण
- (e) रसधानियाँ
- (f) सेन्ट्रोसोम
- (g) प्लैस्टिड
- (i) लाइसोसोम
इसके अतिरिक्त पादप कोशिका में क्लोरोप्लास्ट पाये जाते हैं।
अन्तः द्रव्यी जालिका :-
अंतर्द्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं तथा शीट का एक बहुत बड़ा तंत्र है। ये लंबी नलिका अथवा गोल या आयताकार थैलों (पुटिकाओं) की तरह दिखाई देती हैं। अंतर्द्रव्यी जालिका की रचना भी प्लैज्मा झिल्ली के समरूप होती है।
अंतर्द्रव्यी जालिका दो प्रकार की होती है:
- (i) खुरदरी अन्तःद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulam-RER),
- (ii) चिकनी अन्तः द्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulam-SER)।
🔸 (i) खुरदरी अन्तःद्रव्यी जालिका (RER):- सूक्ष्मदर्शी से देखने पर ये खुरदरी दिखाई देती हैं क्योंकि इनकी बाह्यः सतह पर कुछ कण लगे होते हैं, जिनको राइबोसोम (Ribosome) कहते हैं।
🔸 (ii) चिकनी अन्तः द्रव्यी जालिका (SER) – सूक्ष्मदर्शी से देखने पर ये नलिकायें चिकनी दिखाई देती हैं। ये कोशिका के लिए वसा या लिपिड संश्लेषित करती हैं। कुछ प्रोटीन तथा वसा कोशिका झिल्ली बनाने में उपयोग की जाती हैं। कुछ प्रोटीन व लिपिड एन्जाइम व हार्मोन के रूप में कार्य करते हैं।
अन्तर्दव्यी जालिका के कार्य :-
- कोशिकाद्रव्य के विभिन्न क्षेत्रों तथा केंद्रक और कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों का परिवहन के लिए नलिका सुविधा प्रदान करता है।
- कोशिका की कुछ जैव रासायनिक क्रियाओं के लिए ढाँचे का कार्य।
- प्रोटीन, लिपिड, एंजाइम और हार्मोन के संश्लेषण में सहायक।
- यह अंगकों के बीच Bio-chemical क्रियाओं के लिए स्थान उपलब्ध कराता है।
- SER यकृत की कोशिकाओं में विष तथा दवा का निर्विषीकरण (Detoxification) करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राइबोसोम :-
ये अत्यन्त छोटे, गोल कण हैं जो जीव द्रव्य में स्वतन्त्र रूप में तैरते या अन्तः द्रव्यी जालिका की बाह्य सतह पर चिपके पाये जाते हैं। वे RNA (Ribonucleic Acid) और प्रोटीन के बने होते हैं।
🔸 राइबोसोम का कार्य :-
- राइबोसोम (अमीनों एसिड से प्रोटीन संश्लेषण का मुख्य स्थान है।
- सभी संरचनात्मक व क्रियात्मक प्रोटीन (एन्जाइम) का संश्लेषण राइबोसोम द्वारा किया जाता है।
- संश्लेषित प्रोटीन कोशिका के विभिन्न भागों में अन्तंद्रव्यी जालिका द्वारा कोशिका के विभिन्न भागों तक भेज दिया जाता है।
गॉल्जी उपकरण :-
सचसे पहले कैमिली गॉल्जी ने गॉल्जी उपकरण का अध्ययन किया था। ये पतली झिल्ली युक्त चपटी पुटिकायें (Vesicles) हैं जो एक-दूसरे के ऊपर समानान्तर सजी रहती हैं। इन झिल्लियों का सम्पर्क हमेशा ER से होता है।
🔸 गॉल्जीकाय के कार्य :-
- प्रोटीन व लिपिड का संशोधन, संग्रहण व पैकेजिंग – ER में बने प्रोटीन और लिपिड गॉल्जीकाय में पहुँचकर पैक और रूपांतरित होते हैं, फिर उन्हें कोशिका के अंदर व बाहर भेजा जाता है।
- लाइसोसोम का निर्माण – गॉल्जीकाय एंजाइम-युक्त पुटिकाएँ बनाता है जिन्हें लाइसोसोम कहते हैं।
- पदार्थों का संचयन, रूपांतरण और पुटिकाओं में बंद करना।
- कोशिका झिल्ली व कोशिका भित्ति (पादप कोशिका में मध्य लेमिला) के निर्माण में सहायता – गॉल्जीकाय, कोशिका भित्ति बनाने वाले पदार्थ (जैसे पेक्टिन) के निर्माण और स्रवण में मदद करता है।
- स्रावी स्वभाव – कोशिका से बाहर स्रावित होने वाले पदार्थ (एंजाइम, हार्मोन आदि) को पैक कर बाहर भेजता है।
- लिपिड और जटिल शर्करा का निर्माण – कुछ लिपिड और शर्करा का संश्लेषण करता है तथा सामान्य शर्करा को जटिल शर्करा में बदलता है।
लाइसोसोम :-
लाइसोसोम एन्जाइम से भरी पुटिकाएँ हैं। लाइसोसोम कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तंत्र है। ये बाहरी पदार्थ एवं कोशिका अंगकों के टूटे-फूटे भागों को पाचित करके कोशिका को साफ करते हैं। लाइसोसोम में झिल्ली से घिरी हुई संरचना होती है जिनमें पाचक एंजाइम होते हैं। RER इन एंजाइमों को बनाते हैं।
🔸 लाइसोसोम का कार्य :-
- बाहरी पदार्थ तथा क्षतिग्रस्त कोशिका अंगकों का पाचन।
- कोशिका को अपशिष्ट से मुक्त रखना (कचरा निपटान तंत्र)।
- कोशिका क्षति होने पर फटकर एंजाइम छोड़ते हैं और कोशिका को स्वयं नष्ट कर देते हैं।
- इसी कारण इन्हें कोशिका की आत्मघाती थैली कहते हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया :-
माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का बिजलीघर कहा जाता है। यह कोशिका में जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा का उत्पादन करता है।
🔸 संरचना: माइटोकॉन्ड्रिया दोहरी झिल्ली की बनी होती है। बाहरी झिल्ली छिद्रित होती है। भीतरी झिल्ली बहुत अधिक वलित होती है। भीतर माइटोकॉन्ड्रियल मैट्रिक्स होता है। अपना DNA और राइबोसोम भी होता है।
🔸 आकार: इनका आकार 0.2 से 2 µm × 3 से 5 µm के मध्य होता है।
🔸 माइटोकॉन्ड्रिया के मुख्य कार्य :- माइटोकॉन्ड्रिया में कोशिकीय श्वसन के लिए आवश्यक एंजाइम होते हैं, जैसे कि क्रेब्स चक्र और इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला। इन एंजाइमों की मदद से, माइटोकॉन्ड्रिया भोजन के अणुओं (जैसे ग्लूकोज) को तोड़कर रासायनिक ऊर्जा को एटीपी (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) के रूप में संग्रहित करते हैं। चूँकि माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका के लिए अधिकांश ऊर्जा का उत्पादन करते हैं, इसलिए उन्हें ‘कोशिका का पावर हाउस’ कहा जाता है।
प्लैस्टिड :-
प्लैस्टिड केवल पादप कोशिकाओं (Plant Cells) में पाए जाते हैं। ये कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं, जैसे रंग देना, भोजन संग्रहीत करना आदि। प्लैस्टिड दो प्रकार के होते हैं: क्रोमोप्लास्ट (रंगीन प्लैस्टिड) तथा ल्यूकोप्लास्ट (श्वेत तथा रंगहीन प्लैस्टिड)।
- क्रोमोप्लास्ट:
- जिस क्रोमोप्लास्ट में क्लोरोफिल वर्णक होता है उसे क्लोरोप्लास्ट कहते हैं।
- पौधों में क्लोरोप्लास्ट प्रकाश संश्लेषण के लिए बहुत आवश्यक है।
- क्लोरोप्लास्ट में क्लोरोफिल के अतिरिक्त विभिन्न पीले अथवा नारंगी रंग के वर्णक भी होते हैं।
- ल्यूकोप्लास्ट:
- ल्यूकोप्लास्ट श्वेत या रंगहीन होते हैं जिनमें स्टार्च, तेल एवं प्रोटीन के कण संग्रहीत होते हैं।
🔸 प्लैस्टिड की संरचना: क्लोरोप्लास्ट (जो एक प्रकार का प्लैस्टिड है) की भीतरी रचना में बहुत-सी झिल्ली वाली परतें होती हैं जो स्ट्रोमा में स्थित होती हैं। प्लैस्टिड बाह्य रचना में माइटोकॉन्ड्रिया की तरह होते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया की तरह प्लैस्टिड में भी अपना DNA तथा राइबोसोम होते हैं।
रसधानियाँ :-
ये कोशिका द्रव्य में थैली की तरह की संरचनायें होती हैं जिनमें ठोस अथवा तरल पदार्थ भरे रहते हैं।
🔸 आकार और प्रकार: जंतु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं जबकि पादप कोशिकाओं में रसधानियाँ बहुत बड़ी होती हैं। कुछ पादप कोशिकाओं में केंद्रीय रसधानी का आकार कोशिका आयतन का 50–90% तक होता है।
🔸 भरे हुए पदार्थ :-
- पादप रसधानियों में कोशिका द्रव्य भरा होता है। ये कोशिका को स्फीति व दृढ़ता प्रदान करती है।
- पादप रसधानी में पौधे के लिए आवश्यक पदार्थ जैसे-शर्करा, अमीन अम्ल, विभिन्न कार्बनिक अम्ल एवं कुछ प्रोटीन भरे होते हैं।
- एक कोशिका जीव जैसे अमीबा में कुछ रसधानियों में खाद्य पदार्थ भरे होते हैं। उन्हें खाद्य रसधानी कहते हैं।
- कुछ रसधानियों में जल तथा अपशिष्ट पदार्थ भी भरे होते हैं और ये जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को कोशिका से बाहर निकालने में सहायक होती हैं।
🔸 रसधानियाँ के कार्य :-
- कोशिका को स्फीति (Turgidity) और कठोरता (Rigidity) प्रदान करना।
- भोजन, जल और अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण और परिवहन।
- अपशिष्ट पदार्थों को कोशिका से बाहर निकालने में सहायता।
📝 जन्तु कोशिका तथा पादप कोशिका में अंतर
| जन्तु कोशिका | पादप कोशिका |
|---|---|
| प्राणी कोशिका महीन झिल्ली जिसे प्लाज्मा झिल्ली कहते हैं से घिरी होती है। | प्लाज्मा झिल्ली के बाहर की ओर सेल्यूलोज की बनी मोटी कोशिका भित्ति होती है। |
| हरित लवक अनुपस्थित होते हैं। | हरितलवक उपस्थित होते हैं। |
| रिक्तिकायें या तो अनुपस्थित होते हैं या बहुत छोटे माप की होती हैं। | रिक्तिकाएँ बड़ी तथा मुख्य होती हैं। |
| सैन्ट्रोसोम उपस्थित। | सैन्ट्रोसोम अनुपस्थित। |
| कोशिका विभाजन ग्रूव (खाँच) निर्माण द्वारा होता है। | कोशिका विभाजन कोशिका पट्टी द्वारा प्रारम्भ होता है। |
| गोलजीकाय अटेंडेंट। | गॉल्जीकाय अलग-अलग इकाइयों डिक्टियोसोम्स का बना होता है। |
| कैल्शियम आक्जलेट के रवे सदैव अनुपस्थित होते हैं। | ये पादप कोशिकाओं में सदैव पाये जाते हैं। |
| इन कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण नहीं होता। | इनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है। |
| ये प्रायः छोटे आकार की होती हैं। | ये प्रायः बड़े आकार की होती हैं। |
कोशिका विभाजन :-
कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया, जिससे जीवधारियों में वद्धि हेतु नई कोशिकाएं बनती हैं जिससे पुरानी मृत एवं क्षतिग्रस्त कोशिकाओं का प्रतिस्थापन और प्रजनन हेतु युग्मक बनते हैं, उसे कोशिका विभाजन कहते हैं।
🔸 कोशिका विभाजन की प्रकिया के प्रकार :- सूत्री विभाजन और अर्ध सूत्री विभाजन नामक दो मुख्य प्रकार की कोशिका विभाजन की प्रक्रिया है।
सूत्री विभाजन :-
कोशिका विभाजन की प्रक्रिया, जिससे अधिकतर कोशिकाएं वृद्धि हेतु विभाजित होती हैं, उसे सूत्री विभाजन कहते हैं।
🔸 सूत्री विभाजन का कार्य :- इस प्रक्रिया में प्रत्येक कोशिका जिसे मातृ कोशिका भी कह सकते हैं, विभाजित होकर दो समरूप संतति कोशिकाएं बनाती हैं। संतति कोशिकाओं में गुणसुत्रों की संख्या मातृकोशिका के समान होती है। यह जीवों में वृद्धि एवं ऊतकों के मरम्मत में सहायता करती है।
अर्ध सूत्री विभाजन :-
जंतुओं और पौधों के प्रजनन अंगों अथवा ऊतकों की विशेष कोशिकाएं विभाजित होकर युग्मक बनाती है जो निषेचन के पश्चात् संतति निर्माण करती है। यह एक अलग प्रकार का विभाजन है जिसे अर्धसूत्रण कहते हैं।
🔸 अर्ध सूत्री विभाजन का कार्य :- इसमें क्रमशः दो विभाजन होते हैं। जब कोशिका अर्ध सूत्रण द्वारा विभाजित होती है तो इससे दो की जगह चार नई कोशिकाएं बनती हैं। नई कोशिकाओं में मातृ कोशिकाओं की तुलना में गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है।
