सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर: Class 12 Political Science chapter 4 ncert solutions in hindi
Textbook | NCERT |
Class | Class 12 |
Subject | Political Science |
Chapter | Chapter 4 ncert solutions |
Chapter Name | सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र |
Category | Ncert Solutions |
Medium | Hindi |
क्या आप कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 4 सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र के प्रश्न उत्तर ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से Political Science Class 12 Chapter 4 question answers in Hindi, सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर download कर सकते हैं।
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प्रश्न 1. तिथि के हिसाब से इन सबको क्रम दें –
- (क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
- (ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थपना
- (ग) यूरोपीय संघ की स्थापना।
- (घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
उत्तर:
- (घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
- (ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थपना
- (ग) यूरोपीय संघ की स्थापना।
- (क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
प्रश्न 2. ‘ASEAN way’ या आसियान शैली क्या है?
- (क) आसियान के सदस्य देशों की जीवन-शैली है।
- (ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।
- (ग) आसियान सदस्यों की रक्षा नीति है।
- (घ) सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है।
उत्तर: (ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।
प्रश्न 3. इसमें से किसने ‘खुले द्वार’ की निति अपनाई?
- (क) चीन
- (ख) दक्षिण कोरिया
- (ग) जापान
- (घ) अमेरिका
उत्तर: (क) चीन
प्रश्न 4. खाली स्थान भरें –
- (क) 1962 में भारत और चीन के बीच…………और………को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
- (ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में……….. और…….करना शामिल है।
- (ग) चीन ने 1972 में………….के साथ दोतरफा सम्बन्ध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
- (घ)…………. योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
- (ड़)…………. आसियान का एक स्तम्भ है, जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
उत्तर:
- (क) 1962 में भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों और लद्दाख के क्षेत्र को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
- (ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में आर्थिक विकास को तेज़ करना और सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास प्राप्त करना शामिल है।
- (ग) चीन ने 1972 में अमेरिका के साथ दोतरफा सम्बन्ध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
- (घ) मार्शल योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
- (ङ) आसियान सुरक्षा समुदाय आसियान का एक स्तम्भ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
प्रश्न 5. क्षेत्रीय संगठनों को बनाने के उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर: क्षेत्रीय संगठनों को बनाने के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) क्षेत्रीय संगठनों को बनाने का उद्देश्य अपने – अपने क्षेत्र में चलने वाली ऐतिहासिक दुश्मनियों को भुला देना है। साथ ही साथ जो भी कमरोरियाँ या कठिनाइया क्षेत्रीय देशों के सामने आएँ उन्हें परस्पर सहयोग से स्थानीय स्तर पर उनका समाधान ढूढ़ने का प्रयास करना है।
(ii) क्षेत्रीय संगठन का उद्देश्य यह भी है की क्षेत्रीय संगठनों के सदस्य राष्ट्र अपने – अपने क्षेत्रों में अधिक शंतिपूर्ण और सहकारी क्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने की कोशिश करें। वे चाहते हैं की वे अपने क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्थाओं का समूह बनाने की दिशा में कार्य करें। इसके दो उदाहरण यूरोपीय संघ और आसियान हैं।
प्रश्न 6. भौगोलिक निकटता का क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर क्या असर होता है?
उत्तर: क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर भौगोलिक निकटता बड़ा प्रभाव डालती है। भौगोलिक निकटता के कारण क्षेत्र विशेष में आने वाले देशों में संगठन की भावना विकसित होती है। इस भावना के विकास के साथ पारस्परिक संघर्ष और युद्ध धीरे – धीरे, पारस्परिक सहयोग और शांति का रूप ले लेती है। भौगोलिक एकता मेल – मिलाप के साथ – साथ आर्थिक सहयोग और अंतर्देशीय व्यापार को भी प्रोत्साहित करती है।
सदस्य राष्ट्र बड़ी आसानी से सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था करके कम धन व्यय करके अपने लिए सैनिक सुरक्षा दल गठित कर सकते हैं और बचे हुए धन को कृषि, उद्योग, विघुत, यातायात, शिक्षा, सड़क, संवादवहन, व्यवस्था आदि सुविधाओं को जुटाने और जीवन स्तर को ऊचा उठाने में प्रयोग कर सकते हैं। यह वातावरतण सामान्य सरकार के गठन के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण कर सकता है। एक क्षेत्र के विभिन्न राष्ट्र यदि क्षेत्रीय संगठन बना लें तो वे परस्पर सड़क मार्गो और रेल सेवाओं के माध्यम से बड़ी आसानी से जुड़ सकते हैं।
प्रश्न 7. ‘आसियान विजय – 2020’ की मुख्य – मुख्य बातें क्या हैं?
उत्तर: आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन हैं। इसके विजय दस्तावेज – 2020 में अंतर्राष्टीय समुदाय में आसियान को एक बहिर्मुखी भूमिका को प्रमुखता दी गई है। आसियान द्वारा अभी टकराव् की जगह बातचीत को देने की निति से ही यह बात सामने आई है। इसी तरकीब से आसियान ने कबोडिया के टकराव को समाप्त किया, पूर्वी तिमोर के संकट को संभाला है और दक्षिण – पर्व एशियाई सहयोग पर बातचीत के लिए 1999 से नियमित रूप से वार्षिक बैठकें आयोजित की हैं।
प्रश्न 8. आसियान समुदाय के मुख्य स्तंभों और उनके उद्देश्यों के बारे में बताएँ।
उत्तर: (i) आसियान समुदाय के मुख्य स्तम्भ स्वं इसके उद्देश्य: आसियान दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन है। 1967 में इस क्षेत्र के पाँच देशों ने ‘बैंकाक घोषणा’ पर हस्ताक्षर करके ‘आसियान’ की स्थपना की। ये देश थे – इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपोस, सिंगापुर और थाईलैंड। ‘आसियान’ का उद्देश्य मुख्य रूप से आर्थिक विकास को तेज करना और उसके माध्यम से सामाजिक और संस्कृतिक विकास हासिल करना था। कानून के शासन और संयुक्त राष्ट्र के कायदों पर आधारित क्षेत्रीय शांति और स्थयित्व को बढ़ावा देना भी इसका उद्देश्य था। बाद के वर्षों में ब्रूनेई, दारुस्सलाम, वियतनाम, लाओस , म्यांमार और कंबोडिया भी आसियान में शामिल हो गए तथा इसकी सदस्य संख्या दस हो गई।
(ii) यूरोपीय संघ की तरह इसने स्वंय को अधिराष्टीय संगठन बनाने या उसकी तरह अन्य व्यवस्थाओं को अपने हाथ में लेने का उद्देश्य नहीं रखा। अनौपचारिक, तकरावरहित और सहयोगात्मक मेल – मिलाप का नया उदाहरण पेश करके आसियान ने बहुत नाम कमाया है और इसको ‘आसियान शैली’ (आसियान) ही कहा जाने लगा हैं। आसियान के कामकाज में राष्ट्रीय सार्वभौमिकता का सम्मान करना बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहा है। दुनिया के सबसे तेज रफ़्तार से आर्थिक तरक्की करने वाले सदस्य देशों के समूह आसियान के अब अपने उद्देश्यों को आर्थिक और सामाजिक दायरे से अधिक व्यापक बनाया हैं।
(iii) 2003 में आसियान ने सामाजिक – सांस्कृतिक समुदाय नामक तीन स्तम्भों के आधार पर आसियान समुदाय बनाने की दिशा में कदम उठाए जो कुछ सिमा तक यूरोपीय संघ से मिलता – जुलता हैं। आसियान सुरक्षा समुदाय क्षेत्रीय विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाने की सहमति पर आधारित हैं। 2003 तक आसियान के सदस्य देशों ने कई समझौते किये जिनके द्वारा प्रत्येक सदस्य देश ने शन्ति, निप्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रो के आपसी अंतर तथा संप्रभुता के अधिकारों का सम्मान करने पर अपनी वचनवध्दता जाहिर की। आसियान के देशों की सुरक्षा और विदेश तीनियों में तालमेल बनाने के लिए 1994 में आसियान क्षेत्रीय मंच गठित हुआ।
प्रश्न 9. आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से किस तरह अलग है?
उत्तर: आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से निम्न प्रकार से अलग हैं –
(i) 1949 में माओ के नेतृत्व में हुई साम्यवादी क्रांति के बाद चीनी जनवादी गणराज्य शासन व्यवस्था की स्थापना के समय यहाँ की अर्थव्यवस्था सोवियत मॉडल पर आधारित थीं। आर्थिक रूप से पिछड़े साम्यवादी चीन ने पूँजीवादी दुनिया से अपने रिश्ते तोड़ लिए। ऐसे में इसके पास अपने ही संशाधनों से गुजारा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। कई समय तक इसे सोवियत मदद और सलाह भी मिली थी। इसने विकास का जो मॉडल अपनाया उसमे खेती से पूँजी लेकर सरकारी बड़े उद्योग खड़े करने पर जोर था। चूकि इसके पास विदेशी बाजारों से तकनीक और सामनों को खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा की कमी थी इसीलिए चीन ने आयात किए जाने वाले सामानों को धीरे – धीरे घरेलू स्तर पर ही तैयार करवाना शुरू किया।
(ii) इस मॉडल ने चीन को अभूतपूर्ण स्तर पर औद्योगिक अर्थव्यवस्था खड़ी करने का आधार बनाने के लिए सारे संसाधनों का इस्तमाल करने दिया। सभी नागरिकों को रोजगार और सामाजिक कल्याण योजनाओ का लाभ देने के दायरे में लाया गया और चीन अपने नागरिको को शिक्षित करने और उन्हें स्वस्थय सुविधाए उपलब्ध कराने के मामलो में सबसे विकसित देशों से भी आगे निकल गया।
(iii) चीन की अर्थव्यवस्था का विकास भी 5 से 6 फीसदी की दर से हुआ। परन्तु जनसंख्या में 2 – 3 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि इस विकास दर पर पानी फेर रहे थी और बढ़ती हुई आबादी विकास के लाभ से वंचित रह जा रही थीं। खेती की पैदावार उद्योगों की पूरी जरूरत लायक अधिक्षेप नहीं दे पति थी राज्य नियंत्रण आर्थिक के संकट का सामना चीन को भी करना पड रहा था। इसका औधोगिक उत्पादन पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ रहा था। विदेशी व्यापार न के बराबर था और प्रति व्यक्ति आय भी बहुत कम थी।
(iv) 1970 के बाद से जारी चीन की आर्थिक सफलता को एक महाशक्ति के रूप में इसके उभरने के साथ जोड़कर देखा जाता है और आर्थिक एकांतवास को समाप्त किया। 1973 में प्रधानमंत्री चाऊ एन – लाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान – प्रोधोगिक के क्षेत्र में अधीनीकरण के चार प्रस्ताव रखे। 1978 में तत्कालीन नेता देंग श्याओ पेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों द्वारा की निति की घोषणा की। अब निति यह बनाई गई की विदेशी पूँजी और प्रोधोगिक के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाए। बजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए चीन ने अपना तरीका आजमाया।
(v) 1978 के बाद से जारी चीन की आर्थिक साफलता को एक महाशक्ति के रूप में इसके उभरने के साथ जोड़कर देखा जाता है। आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने के बाद चीन सबसे ज्यादा तेजी से आर्थिक वृद्धि कर रहा है और मना जाता है की इस रफ़्तार से चलते हुए 2040 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, अमरीका से भी आगे निकल जाएग। आर्थिक स्तर पर अपने पडोसी मुल्कों से जुड़ाव के चलते चीन पूर्व एशिया के विकास का इंजन – जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्रीय मानलों में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया है। इसकी विशाल आबादी, बड़ा भू – भाग, संसाधन, क्षेत्रीय अवस्थिति और राजनैतिक प्रभाव इस तेज आर्थिक वृद्धि के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। चीन ने ‘शॉन थेरेपी’ पर अम्ल करने के बजाए अपनी अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध ढंग से खोला।
(vi) 1982 में खेती का निजीकरण किया गया और उसके बाद 1998 में उद्योगों का। व्यापार संबंधी अवरोधों को सिर्फ विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए ही हटाया गया है जहा विदेशी निवेशक अपने उद्यम लगा सकते हैं।
(vii) नयी आर्थिक नीतियों के कारण चीन को अर्थव्यवस्था को अपनी जड़ता से उबरने में मदद मिली। कृषि के निजीकारण के कारण कृषि – उत्पादो तथा ग्रामीण आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निजी बचत का परिणाम बढ़ा और इससे ग्रामीण उद्योगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी। व्यापार के नए कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण से विदेशी व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
(viii) राज्य द्वारा नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अंतर्गत विदेशी पूंजी के निवेश के लिए कोई स्थान नहीं होता। परन्तु चीन की अर्थव्यवस्था विदेशी पूँजी के निवेश को आकर्षित करती है और यह संसार में सबसे अधिक आकर्षक मानी जाती है।
(ix) राज्य द्वारा नियंत्रित अर्थव्यवस्था में निजी संपत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होता, परन्तु चीन में अब निजी संपत्ति की धरणा को स्वीकार किया गया है। सन 2004 में निजी संपत्ति, जो की वैध तरीकों से अर्जित की गई हो, रखे जाने का अधिकार दिया गया। मार्च 2007 में चीन की राष्टीय जन कांग्रेस ने यह प्रस्ताव पास कर दिया है की निजी संपत्ति भी उसी प्रकार से सरकार द्वारा सुरक्षित की जाएगी जैसे की सरकारी संपत्ति।
(x) राज्य द्वारा नियंत्रित अर्थव्यवस्था में उद्योगें संबंधी कड़े कानून लागु किये जाते है और श्रमिकों के हितों की ओर ही ध्यान दिया जाता है। उत्पादन की मात्रा तथा वस्तुओं की कीमते सरकारी निश्चित करती है। परन्तु चीन में इन कानूनों में ढील दे दी गई हैं।
(xi) चीनी अर्थव्यवस्था की एक नई विशेषता यह है की सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किये हैं। इस विशेष आर्थिक में लगाए जाने वाले उद्योगों पर उद्योग तथा श्रम संबंधी कानून को काफी ढील दी गई है और वह विदेशी निवेशकों को अपने निजी उद्योग लगाने के लिए आकर्षित करने हेतु यह कदम उठाया है। इन विशेष आर्थिक क्षेत्रो से बाहर लगे उद्योग पर कड़े कानून लागू होते हैं।
(xii) राज्य द्वारा नियंत्रित अर्थव्यवस्था विश्व मार्किट के साथ स्पर्धा नहीं करती परन्तु चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व बजार से स्पर्धा करने योग्य बनाया है और वह विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना है।
प्रश्न 10. किस तरह यूरोपीय देशों ने युद्ध के बाद की अपनी परेशानियाँ सुलझाई? संक्षेप में उन कदमों की चर्चा करें जिसमे होते हुए यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोप के अनेक नेता ‘यूरोप के सवालों’ को लेकर परेशान रहे की क्या यूरोप को अपनी पुरानी दुश्मनियों को फिर से शुरू करना चाहिए या अंतर्राष्टीय संबंधों में सकारात्मक योगदान करने वाले सिद्धांतो और संस्थाओं के आधार पर उसे अपने संबंधों को नए तरह से बनाना चाहिए? दूसरे विश्व युद्ध ने उन अनेक मान्यताओं और व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया जिसके आधार पर यूरोप के देशों के आपसी संबंध बने थें। 1945 तक यूरोपीय मुल्कों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओ की बर्बादी तो झेली ही, उन मान्यताओं और व्यवस्थाओं को ध्वस्त होते भी देख लिया जिन पर यूरोप खड़ा हुआ था उठाकर अपनी समस्याएँ सुलझाई
(i) अमरीकी सहयोग और यूरोपीय आर्थिक संगठन की स्थापना- 1945 के बाद यूरोप के देशों में मेल – पिलाप को शीतयुद्ध से भी मदद मिली। अमरीका ने यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए जबरदस्त मदद की। इसे मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है। अमरीका ने नाटो के तहत एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया। मार्शल योजना के तहत ही 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गई जिसके माध्यम से पश्चिमी योरोप के देशों को आर्थिक मदद दी गई। या एक ऐसा मंच बन गया जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों ने व्यापार और आर्थिक मामलों में एक – दूसरे की मदद शुरू की।
(ii) यूरोपीय परिषद और आर्थिक समुदाय का गठन – 1949 में यूरोपीय परिषद गठित की गई। यह राजनैतिक सहयोग के मामलो में एक अलग कदम साबित हुई। यूरोप के पूँजीवादी देशों के अर्थव्यवस्था के आपसी एकीकरण की प्रक्रिया चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ी और इसके परिणामस्वरूप सन 1957 में यूरोपियन इकोनॉमिक कम्युनिटी का गठन हुआ।
(iii) यूरोप पार्लियामेंट का गठन – यूरोपीय संसद के गठन के बाद आपसी जुड़ाव की इस प्रक्रिया ने राजनितिक स्वरूप हासिल कर लिया। सोवियत गुट के अंत के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आयी और सन 1992 में इस प्रक्रिया की परिणति यूरोपीय संघ की स्थापना के रूप में हुई। युरोपिय संघ के रूप में समान विदेश और सुरक्षा निति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एक समान मुद्रा के चलन के लिए रास्ता तैयार हो गया।
(iv) योरोप संघ का गठन – एक लम्बे समय में बना यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक रूप लेता गया हैं। अब यूरोपीय संघ स्वयं काफी हद तक एक विशाल राष्ट राज्य की तरह ही काम करने लगा है। हलाकि यूरोपीय संघ का एक संविधान बनाने की कोशिश तो असफल हो गई लेकिन इसका अपना झंडा, गान, स्थापना दिवस अपनी मुद्रा है। अन्य देशों से संबंधों के मामलों में इसने काफी हद तक सांझी विदेश और सुरक्षा निति भी बना ली है। नये सदस्यों को शामिल करते हुए यूरोपीय संघ ने सहयोग के दायरे में विस्तार की कोशिश की। नये सदस्य मुख्यतः भूतपूर्व सोवियत खेमे के थे। यह प्रक्रिया आसान नहीं रही। अनेक देशों के लोग इस बात को लेकर कुछ खास उत्साहित नहीं थे जो ताकत उनके देश की सरकार को हासिल थी वह अब यूरोपीय संघ को दी जाऐ। यूरोपीय देश के कुछ देशों को शामिल करने के प्रश्न पर भी असहमति है।
प्रश्न 11. यूरोपीय संघ को क्या चीजें एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन बनाती हैं।
उत्तर: यूरोपीय संघ को प्रभावी बनाने वाले कारक –
- यूरोपीय संघ के अनेक चीजें एक प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठन बनती हैं। इस महद्वीप के देशों की भौगोलिक निकटता इस क्षेत्र को मजबूती प्रदान करती है।
- इस महाद्वीप के लम्बे इतहास ने सभी यूरोपीय देशों को सीखा दिया की क्षेत्रीय शान्ति और सहयोग ही अंततः उन्हें समृद्धि और विकास दे सकता है। टकराव, संघर्ष और युद्ध विनाश और अवनीति के मूल कारण है।
- एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था ने उन्हें बता दिया है यदि वे अमरीका के वर्चस्व का सामना करना चाहते हैं तो उन्हें यूरोपीय संघ न केवल बनना ही चाहिए बल्कि उसे सुदुढ़ और परस्पर हितों की क़ुरबानी देकर पुरे यूरोप को सुदॄढ करना चाहिए ताकि वे समय आने पर अमरीका का रूप या चीन अथवा किसी विश्व की बड़ी शक्ति के सामने घुटने न टेकें और अपनी शर्तें पर उदारीकरण, वैश्वीकरण आदि को लागू करा सकें।
- यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनितिक – कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव बहुत जबदस्त है। 2005 में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पादन 1200 अरब डालर से ज्यादा था, जो अमरीका से तीन गुना ज्यादा हैं।
- यूरोपीय संघ का राजनैतिक और कूटनीतिक प्रभाव भी कम नहीं हैं। इसके दो सदस्य देश ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। यूरोप देश के कई और देश सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं इसके चलते यूरोपीय संघ अमरीका समेत सभी मुल्कों की नीतियों को प्रभावित करता हैं।
- सैनिक ताकत के हिसाब से यूरोपीय संघ के पास दुनिया का सबसे बड़ा सेना है। इसका कुल रक्षा बजट अमरीका के बाद सबसे अधिक हैं। यूरोपीय संघ के दो देशों – ब्रिटेन और संचार प्रौद्योगिक के मामले में भी यूरोपीय संघ का दुनिया में दूसरा स्थान है।
प्रश्न 12. चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मौजूद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकने की क्षमता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने तर्कों से अपने विचारों को पुष्ट करें।
उत्तर: हाँ, हम इस कथन से सहमत हैं। चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओ में मौजूदा एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकने की पूरी क्षमता है। हम इस विचार की पुष्टि के समर्थन में निम्न तर्क दे सकते हैं –
- चीन और भारत दोनों एशिया के दो प्राचीन, महान शक्तिशाली एवं साधन संपन्न देश है। दोनों में परस्पर सुदॄढ़ मित्रता और सहयोग अमरीका के लिए चिंता का कारण बन सकता है। दोनों देश अंतर्राष्टीय राजनैतिक और आर्थिक मंचो पर एक सी निति और दृष्टिकोण अपनाकर एकध्रुवीय विश्वव्यवस्था के संचालन करने वाले राष्ट अमरीका और उसके मित्रों को चुनौती देने में समक्ष हैं।
- चीन और भारत दोनों की जनसंख्या 200 करोड़ से भी अधिक है। इतना विशाल जनमानस अमरीका के निर्मित माल के लिए एक विशाल बाजार प्रदान कर सकता है। पश्चिमी देशों एवं अन्य देशों को कुशल और अकुशल सस्ते श्रमिक दे सकते हैं।
- दोनों देशों नई अर्थव्यवस्था, मुक्त व्यापार निति, उदारीकरण, वैश्वीकरण, और अंतर्राष्टीय सहयोग के पक्षधर हैं। दोनों देश विदेश पूंजी निवेश का स्वागत कर एकध्रुवीय महाशक्ति अमरीका और अन्य बहुराष्ट्रीय निगम समर्थक कम्पनियाँ स्थापित और संचालन करने वाले राष्टों को लुभाने, आंतरिक आवश्यकता सुविधाएँ प्रदान करके अपने यहाँ आर्थिक विकास की गति को बहुत ज्यादा बढ़ा सकते हैं।
- दोनों ही राष्ट वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यो में परस्पर सहयोग करके प्रौद्योगिक के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकते है।
- दोनों देश विश्व बैंक, अंतर्राष्टीय मुद्रा कोष से त्रृण लेते समय अमरीका और अन्य बड़ी शक्तियों की मनमानी शर्ते थोपने पर नियंत्रण रख सकते हैं।
- चीन और भारत तस्करी रोकने, नशीली दवाओं के उत्पादन, वितरण, प्रदूषण फैलाने वाले कारको और आतंकवादियों की गतिविधियों को रोकने में पूर्ण सहयोग देकर भी विश्व व्यवस्था की चुनौतियों को कम कर सकते हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में सहयोग से न केवल कीमतों के बढ़ने की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है बल्कि लोगों का स्वास्थ्य और सुरक्षा बढ़ेगी। दोनों में आंतरिक सद्भाव, शांति, औद्योगिक विकास के अनुकूल वातावरण से निःसंदेह विदेशी पूंजी, उधमियों, व्यापारियों, नवीनतम प्रोद्योगिक आदि के आने और नई – नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, विभिन्न प्रकार की सेवाओं की वृद्धि और विस्तार में मदद मिलेगी।
- दोनों ही देश सीमाओं पर स्थित या प्रवाहित होने वाली दनियों और जल भंडारों और बाँधों द्वारा बाढ़ नियंत्रिण, जल विद्युत्त निर्माण, जलआपूर्ति, मत्स्य उद्योग, पर्यटन उद्योग आदि को बढ़ा सकते हैं। दोनों ही देश सड़क निर्माण, रेल लाइन विस्तार, वायुयान और जल मार्ग संबंधी सुविधओं के क्षेत्रों में पारस्परिक आदान – प्रदान और असहयोग की नीतियाँ अपनाकर अपने को शीघ्र ही महाशक्तियों की श्रेणी में ला सकते हैं। खनिज संपदा, कृषि उत्पाद, प्राकृतिक संसाधनों (जैसे – वन उत्पादों, पशुधन) सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग आदि के क्षेत्र में यथा क्षमता तथा आवश्यकता की निति अपनाकर निःसंदेह एवध्रुवीय विश्वव्यवस्था को मजबूत चुनौती दे सकते हैं।
प्रश्न 13. मुल्कों की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय आर्थिक को बनाने और मजबूत करने पर टिकी है। इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर: प्रत्येक मुल्क की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों को बनाने और उन्हें दुदॄढ करने पर टिकी है क्योंकि क्षेत्रीय आर्थिक संगठन बनने पर कृषि, उद्योग – धंधों, व्यापार यातायात, आर्थिक संस्थाओं आदि को बढ़ावा मिलता है। ये आर्थिक संगठन बनेंगे तो लोग को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में रोजगार मिलेंगा। रोजगार गरीबी को दूर करता है। आर्थिक संगठनों के निर्माण से राष्टों में समृद्धि आती है। समृद्धि का प्रतिक राष्टीय आय और प्रतिव्यक्ति आय का बढ़ना प्रमुख सूचक है। जब लोगों को रोजगार मिलेगा, गरीबी दूर होगी तो आर्थिक विषमता कम करने के लिए साधारण लोग भी अपने – अपने आर्थिक संगठनों में आवाज उठाएँगे।
श्रमिकों को उनका उचित हिस्सा, अच्छी मजदूरियों/वेतनों, भत्तों, बोनस आदि के रूप में मिलेगा तो उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी। वे अपने परिवार के जनों को शिक्षा, स्वास्थ्य , यातायात संवादवहन आदि की अच्छी सुविधएँ प्रदान करेंगे। क्षेत्रीय आर्थिक संगठन बाजार शक्तियों और देश की सरकारों की नीतियों में गहरा संबंध रखते हैं। हर देश अपने यहाँ कृषि, उद्योगों और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए परस्पर क्षेत्रीय राज्यों (देशों) से सहयोग माँगते हैं और उन्हें पड़ोसियों को सहयोग देना होता है। वे चाहते हैं की उनके उद्योगों को कच्चा माल मिले।
वे अतिरिक्त संसाधनों का निर्यात करना चाहते हैं। यह तभी संभव होगा जब क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर शांति होगी। बिना शांति के विकास नहीं हो सकता। क्षेत्रीय आर्थिक संगठन पूरा व्यय नहीं कर सकते। पूरा उत्पादन हुए बिना समृद्धि नहीं आ सकती। संक्षेप में, क्षेत्रीय आर्थिक संगठन विभिन्न देशों में पूँजी निवेश, श्रम गतिशीलता, यातायात सुविधओं के विस्तार, विद्युत उत्पादन वृद्धि में सहायक होते हैं। यह सब मुल्कों की शांति और समृद्धि को सदृढ़ता प्रदान करते हैं।
प्रश्न 14. भारत और चीन के बीच विवाद के मामलों की पहचान करें और बताएँ की वृहत्तर सहयोग के लिए उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अपने सुझाव भी दीजिए।
उत्तर: भारत – चीन विवाद के क्षेत्र: भारत और चीन के बीच समय – समय पर मतभेद के कई क्षेत्र रहे हैं, जो इस प्रकार हैं –
- सन 1950 – 51 में तिब्बत पर चीनी आक्रमण के समय तिब्बत के राजनैतिक तथा आर्थिक नेताओं ने भारत में शरण ली। वे अभी भी भारत में रह रहे हैं इससे दोनों में तनाव बना हुआ है।
- दोनों देशों के बीच मैकमोहन रेखा जो दोनों के बीच की सीमा – रेखा है, पर विवाद है। चीन ने इस सीमा – रेखा को मानने से इंकार कर दिया हैं।
- पाकिस्तान ने 1965 तथा 1971 में भारत पर जब आक्रमण किए, जो चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया, उसकी सहायता की तथा उसे हथियार भी दिए। इससे भी भारत – चीन संबंधों में काफी तनाव पैदा हुआ (याद रहे अब भी चीन भारत के कुछ पड़ोसी देशों को जिसमें पाकिस्तान के साथ म्यांमार भी शामिल है खतरनाक हथियारों के निर्माण में मदद दे रहा है।) सन 1975 में दोनों देशों के बीच राजदूत स्तर पर कूटनीतिज्ञ संबंध फिर से स्थापित किऐ गए। सन 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी चीन के दौरे पर गए। सन 1991 में चीन के प्रधनमंत्री ली पेंग भारत की यात्रा पर आए। सन 1996 में चीन के राष्टपति ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान भारत तथा चीन के बीच चार समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए परन्तु भारत द्वारा मई, 1998 में किए गए परमाणु परिक्षणों के पश्चात दोनों देशों के बीच व्यापार वृद्धि तथा सीमा विवाद को हल करने के बारे में सहमति हुई परन्तु सीमा – विवाद अभी तक हल न हो पाने के कारण दोनों देशों के संबंध मित्रतापूर्ण नहीं कहे जा सकते।