Political Science Class 12 Chapter 5 question answers in Hindi

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समकालीन दक्षिण एशिया प्रश्न-उत्तर: Class 12 Political Science chapter 5 ncert solutions in hindi

TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science
ChapterChapter 5 ncert solutions
Chapter Nameसमकालीन दक्षिण एशिया
CategoryNcert Solutions
MediumHindi

क्या आप कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 5 समकालीन दक्षिण एशिया के प्रश्न उत्तर ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से Political Science Class 12 Chapter 5 question answers in Hindi, समकालीन दक्षिण एशिया प्रश्न-उत्तर download कर सकते हैं।

note: ये सभी प्रश्न और उत्तर नए सिलेबस पर आधारित है। इसलिए चैप्टर नंबर आपको अलग लग रहे होंगे।

प्रश्न 1. देशों की पहचान करें –

  • (क) राजतन्त्र, लोकतन्त्र-समर्थक समूहों और अतिवादियों के बीच संघर्ष के कारण राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना।
  • (ख) चारों तरफ भूमि से घिरा देश ।
  • (ग) दक्षिण एशिया का वह देश जिसने सबसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया।
  • (घ) सेना और लोकतन्त्र-समर्थक समूहों के बीच संघर्ष में सेना ने लोकतन्त्र के ऊपर बाजी मारी ।
  • (ड) दक्षिण एशिया के केन्द्र में अवस्थित । इन देशों की सीमाएँ दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों से मिलती हैं।
  • (च) पहले इस द्वीप में शासन की बागडोर सुल्तान के हाथ में थी। अब यह एक ‘गणतन्त्र है।
  • (छ) ग्रामीण क्षेत्र में छोटी बचत और सहकारी ऋण की व्यवस्था के कारण इस देश को गरीबी कम करने में मदद मिली है।
  • (ज) एक हिमालयी देश जहाँ संवैधानिक राजतन्त्र है । यह देश भी हर तरफ से भूमि से घिरा है।

उत्तर: (क) नेपाल, (ख) नेपाल, (ग) श्रीलंका, (घ) पाकिस्तान, (ड) भारत, (च) मालदीव, (छ) बांग्लादेश, (ज) भूटान

प्रश्न 2. दक्षिण एशिया के बारे में निम्नलिखित में से कौन – सा कथन गलत है?

  • दक्षिण एशिया में सिर्फ एक तरह की राजनितिक प्रणाली चलती है?
  • बांग्लादेश और भारत ने नदी – जल की हिस्सेदारी के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
  • ‘साफ्टा’ पर हस्ताक्षर इस्लामाबाद के 12वें सार्क – सम्मेलन में हुए।
  • दक्षिण एशिया की राजनिति में चीन और संयुक्त राज्य अमरीका महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उत्तर: दक्षिण एशिया में सिर्फ एक तरह की राजनितिक प्रणाली चलती है?

प्रश्न 3. पाकिस्तान के लोकतंत्रीकरण में कौन – कौन सी कठिनाइयाँ हैं?

उत्तर: पाकिस्तान में लोकतंत्रीकरण के रास्ते में कठिनाइयाँ: पाकिस्तान में कभी लोकतंत्र शासन चलता है तो कभी सैन्य शासन। वहाँ लोकतंत्र को स्थयित्व नहीं मिल पाया है बेशक वहाँ स्वतंत्र और प्रभावकारी प्रैस भी है और लोगों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास भी। वहाँ सैन्यशक्ति स्थापित होने और लोकतंत्र को मजबूत होने से रोकने में निम्नलिखित कारक भूमिका निभाते हैं –

  • पाकिस्तान में आरंभ से ही सैन्य शक्ति पर नागरिक प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है।
  • पाकिस्तान की सामाजिक व्यवस्था में भूस्वामियों, कटटरपंथी, धार्मिक नेताओं तथा सेना का दबदबा है और अवसर मिलते ही सैनिक शक्ति नागरिक प्रशासन पर प्रभावी हो जाती है।
  • पाकिस्तान के सामाजिक दल शुद्ध राजनितिक तथा आर्थिक मुद्दों पर आधारित नहीं है और उनमें आपसी खींचातानी बनी रहती है जिसका लाभ सैनिक अधिकारी उठाते हैं। जनता भी इनकी खींचातानी से तंग आ जाती है।
  • लोकतान्त्रिक सरकारों भी विदेशी सहायता पर मजे करती आई है और देश में सामाजिक, आर्थिक विकास की ओर ध्यान नहीं देतीं। जनता में प्रशासन के प्रति असंतोष बना रहता है।
  • निर्वाचित सरकारें भ्र्ष्टाचार मुक्त प्रशासन स्थापित नहीं कर पाई हैं और उनके काल में राजनितिक दल अपनी हित पूर्ति को प्राथमिकता देते रहे हैं तथा भ्र्ष्टाचार बढ़ता जाता है और सैनिक शक्ति इस का लाभ उठाकर जनता को भ्र्ष्टाचार समाप्त करके स्वच्छ शासन का वायदा देती है।

प्रश्न 4. नेपाल में लोग अपने देश में लोकतंत्र को बहाल करने में कैसे सफल हुए?

उत्तर: नेपाल के लोग अपने देश में लोकतंत्र को बहाल करने में निम्नलिखित तरिके से सफल हुए –

नेपाल में लोकतंत्र की बहाली – नेपाल अतीत में एक हिन्दू राज्य था फिर आधुनिक काल में कई सलों तक यहाँ संवैधानिक राजतंत्र रहा। संवैधानिक राजतंत्र के दौर में नेपाल की राजनितिक पार्टियाँ और आम जनता एक ज्यादा खुले और उत्तरदायी शासन की आवाज उठाती रहीं लेकिन राजा ने सेना की सहायता से शासन पर पूरा नियंत्रण कर लिया और नेपाल में लोकतंत्र की राह अवरुद्ध हो गई। आख़िरकार लोकतंत्र – समर्थक मजबूत आंदोलन की चपेट में आकर राजा ने 1990 में नए लोकतान्त्रिक संविधान की माँग मान ली, लेकिन नेपाल में लोकतान्त्रिक सरकारों का कार्यकाल बहुत छोटा और समस्याओं से भरा रहा।

1990 के दशक में नेपाल के माओवादी, नेपाल के अनेक हिस्सों में अपना प्रभाव जमाने में कामयाब हुए। माओवादी, राजा और सत्तांधारी अभिजन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करना चाहते थे। इस वजह से राजा की सेना और माओवादी गुरिल्लों के बीच हिसंक लड़ाई छिड़ गई। कुछ समय तक राजा की सेना, लोकतंत्र – समर्थक और माओवादियों के बीच त्रिकोणीय संघर्ष हुआ। 2002 में राजा ने खत्म कर दिया। अप्रैल 2006 में यहाँ देशव्यापी लोकतंत्र प्रदर्शन हुए। संघर्षरप लोकतंत्र – समर्थक शक्तियों ने अपनी पहली बड़ी जीत हासिल की जब राजा ज्ञानेंद्र के बाध्य होकर संसद को बहाल किया। इसे अप्रैल 2002 में भंग कर दिया गया था।

मोटे तौर पर अहिंसक रहे इस प्रतिरोध का तेतृत्व सात दलों के गठबंधन (सेवन पार्टी अलाएंस), माओवादी तथा सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने किया। नेपाल में लोकतंत्र की आमद अभी मुक़्क़म्मल नहीं हुई है। फिलहाल, नेपाल अपने इतिहास के एक अद्वितीय दौर से गुजर रहा है क्योंकि वहाँ संविधान – सभा के गठन की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। यह संविधानिक – सभा नेपाल का संविधानिक लिखेगी। नेपाल में राजतंत्र समाप्त हो गया और वहाँ लोकतंत्र हो चूका है।

प्रश्न 5. श्रीलंका के जातीय – संघर्ष में किनकी भूमिका प्रमुख है?

उत्तर: श्रीलंका में जातीय-संघर्षः श्रीलंका में स्वतंत्रता के बाद से ही जातीय संकट बना हुआ है और इसके कारण श्रीलंका को कई बार विकट संकटों तथा गृहयुद्ध की स्थिति का सामना भी करना पड़ा है। श्रीलंका में मुख्य जनसंख्या सिंहलियों (Sinhalese) की है, परन्तु जनसंख्या का एक भाग लगभग 18 प्रतिशत भारत मूल के तमिल लोगों का भी है जो स्वतंत्रता के पहले से ही वहाँ बसे हुए थे। और बाद में भी वहाँ जाकर बसते रहे। भारतीय मूल के निवासी मुख्य रूप से श्रीलंका के उत्तरी भाग में बसे हुए हैं। श्रीलंका के मूल निवासियों सिंहलियों का यह मानना है कि श्रीलंका सिंहलियों का है तथा तमिल लोग वहाँ विदेशी हैं। स्वाभाविक है कि शासन और राजनीति पर बहुसंख्यक सिंहलियों का दबदबा है। दोनों समुदायों की भाषा तथा तौर तरीकों में भी अन्तर है।

सिंहली मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के मानने वाले हैं और तमिल लोग बौद्ध धर्म को नहीं मानते। जब श्रीलंका स्वतंत्र हुआ तो सिंहलियों ने श्रीलंका को भाषा तथा धर्म के आधार पर एक एकात्मक राज्य स्थापित करने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य था कि एकात्मक शासन केंद्रित सरकार का समस्त श्रीलंका पर नियंत्रण रहेगा और वह सिंहलियों के हितों की रक्षा करेगी तथा तमिल लोगों को किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाएगी। सिंहलियों का मानना है तमिल जन संख्या विदेशी है और इन्हें सरकार तथा राजनीतिक संस्थाओं और सुविधाओं में अधिक भागीदारी का अधिकार नहीं है। तमिल लोगों ने एकात्मक सरकार बनाए जाने का विरोध किया। तमिल लोगों की मूल जड़ें भारत में तमिलनाडु में है और वे आशा तथा दावा करते हैं कि भारत सरकार को उनके हितों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए तथा श्रीलंका पर दबाव डालकर यह समस्या समाप्त करवानी चाहिए।

1983 के बाद तमिल लोगों का अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जरूरी हो गया जबकि तमिल जनसंख्या ने अपने लिए अलग राज्य ‘तमिल ईलम’ की माँग रखी और इसकी प्राप्ति के लिए तमिल ईलम स्वतंत्रता संगठन (लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम Liberation Tigers of Tamil Eeelam-LTTE) ने श्रीलंकाई सेनाओं के साथ सशस्त्र संघर्ष आरंभ कर दिया। इस संगठन ने कई बार श्रीलंकाई सेनाओं से टक्कर ली और शासन को अवरुद्ध बनाने के प्रयास किए। तमिलनाडु के नेताओं ने भी भारतीय सरकार पर दबाव बनाया कि वह तमिल लोगों के हितों की रक्षा हेतु कदम उठाए और श्रीलंका की सरकार को इस समस्या को हल करने के लिए कहे।

1987 में भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच संघर्ष को रोकने और शांति की स्थापना के लिए अपने सैनिक श्रीलंका भेजे परन्तु यह कदम सफलता प्राप्त नहीं कर सका और वहाँ की जनता तथा लिट्टे दोनों ने ही कुछ समय बाद इसका विरोध किया तथा भारत सरकार को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। श्रीलंका में आज तक इस संकट का कोई संतोषजनक हल नहीं निकल पाया। दूसरे देशों ने विशेष कर नार्वे ने दोनों में समझौता करवाने और शांति स्थापित करवाने के प्रयत्न किए हैं परन्तु वे सफल नहीं हो पाए हैं।

कभी युद्ध विराम की स्थिति बनी रहती है और कुछ समय बाद सशस्त्र संघर्ष या गृहयुद्ध की स्थिति बन जाती है। मार्च 2007 में लिट्टे उग्रवादियों ने श्रीलंका के कोलम्बो हवाई अड्डे पर भी आतंकवादी आक्रमण और एक बस में भी बम विस्फोट किया। यह संकट बड़ा गंभीर है। इस संकट तथा निरन्तर संघर्ष के होते हुए भी वहाँ शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक है और अच्छी अर्थव्यस्था तथा विकास की उच्च दर है।

प्रश्न 6. भारत और पाकिस्तान के बीच हाल में क्या समझौते हुए?

उत्तर: अभी हाल के वर्षों में भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मामलों के बारे में वार्ताओं के दौर चल रहे हैं। वास्तव में भारत और पाकिस्तान के संबंध कभी खत्म न होने वाले झगड़ों और हिंसा की एक कहानी जान पड़ते हैं फिर भी तनाव को कम करने और शांति बहाल करने के लिए इन देशों के बीच लगातार प्रयास हुए हैं। दोनों देश युद्ध के खतरे कम करने के लिए विश्वास बहाली के उपाय करने में सहमत हो गये हैं। सामाजिक कार्यकर्त्ता और महत्त्वपूर्ण हस्तियों दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती का माहौल बनांने के लिए एकजुट हुई हैं।

दोनों देशों के नेता एक – दूसरे को बेहतर ढंग से समझने और दोनों के बीच मौजूद बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए सम्मेलनों में भेंट करते हैं। पिछले पाँच वर्षों के दौरान दोनों देश के पंजाब वाले हिस्से के बीच कई बस मार्ग खोले गए हैं। अब वीसा पहले की तुलना में आसानी से मिल जाते हैं। दोनों देशों के शिखर नेता आपस में कई बार मिल चुके हैं तथा उनमें कई मुद्दों पर सहमति भी बनी है जिनमें द्विपक्षीय व्यापार एवं आंतकवादी प्रमुख हैं। परन्तु पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने (जैसे मुंबई पर आंतकवादी हमला) तथा कश्मीर मुद्दे को तूल देने से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

प्रश्न 7. ऐसे दो मसलों के नाम बताएँ जिन पर भारत – बांग्लादेश के बीच आपसी सहयोग है और इसी तरह दो ऐसे मसलों के नाम बताएँ जिन पर असहमति है।

उत्तर: भारत – बांग्लादेश के बीच आपसी सहयोग के मसले – भारत और बांग्लादेश ने कई मसलों पर आपसी सहयोग किया है। पिछले दस वर्षों के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध ज्यादा बेहतर हुए हैं। बांग्लादेश भारत के ‘पूरब चलों’ की निति का हिस्सा है। इस निति के अंतर्गत म्यांमार के मार्फत दक्षिण – पूर्व एशिया से संपर्क साधने की बात है। आपदा – प्रबंधन और पर्यावरण के मामले पर भी दोनों देशों ने निरंतर सहयोग किया है। इस बात के भी प्रयास किए जा रहे हैं की साझे खतरों को पहचान कर तथा एक – दूसरे की जरूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता बरतकर सहयोग के दायरे को बढ़ाया जाए।

भारत – बांग्लादेश के बीच असहमति के मसले – भारत और बांग्लादेश के बीच भी कई मुद्दों को लेकर सन्मुटाव है। बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा और ब्रह्पुत्र नदी के जल में हिस्सेदारी सहित कई मुद्दों पर मतभेद हैं। भारतीय सरकार के बांग्लादेश से नाखुश होने के कारणों में भारत में अवैध आप्रवास पर ढाका के खंडन, भारत – विरोधी इस्लामिक कटटरपंथी जमातों को समर्थन, भारतीय सेना को पूर्वोत्तर भारत में जाने के लिए अपने इलाके से रास्ता देने से बांग्लादेश के इंकार, ढाका के भारत को प्राकृतिक गैस निर्यात न करने के फैसले तथा म्यांमार को बांग्लादेश इलाके से होकर भारत को प्राकृतिक गैस निर्यात न करने देने जैसे मसले शामिल हैं। बांग्लादेश की सरकार का मानना है की भारतीय सरकार नदी – जल में हिस्सेदारी के सवाल पर क्षेत्रीय दादा की तरह वर्ताव करती है। इसके अलावा भारत की सरकार पर चटगांव पर्वतीय क्षेत्र में विद्रोह को हवा देने; बांग्लादेश के प्राकृतिक गैस में सेंधमारी करने और व्यापार में बेईमानी बरतने के भी आरोप हैं।

प्रश्न 8. दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधों को बाहरी शक्तियाँ कैसे प्रभावित करती हैं?

उत्तर: दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधो को बाहरी शक्तियों द्वारा प्रभावित करना – चाहे कोई क्षेत्र अपने को गैर – क्षेत्रीय शक्तियों से अलग रखने की कितनी भी कोशिश करें उस पर बाहरी ताकतों और घटनाओं का असर पड़ता ही है। चीन और संयुक्त राज्य अमरीका दक्षिण एशिया की राजनीती में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पिछले दस वर्षों में भारत और चीन के संबंधों में सुधार हुआ है। चीन की रणनीतिक साझेदारी पाकिस्तान के साथ है और यह भारत – चीन संबंधों में एक बड़ी कठिनाई है। विकास की जरूरत और वैश्वीकरण के कारण एशिया महादेश के ये दो बड़े देश ज्यादा नजदीक आये हैं। सन 1991 के बाद से इनके आर्थिक संबंध ज्यादा मजबूत हुए हैं।

शीतयुद्ध के बाद दक्षिण एशिया में अमरीका प्रभाव तेजी से बढ़ा है। अमरीका ने शीतयुद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों से अपने संबंधों में सुधार किया हैं। वह भारत – पाक के बीच लगातार मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा हैं। दोनों देशों में आर्थिक सुधार हुए है और उदार नीतियाँ अपनाई गई हैं। इससे दक्षिण एशिया में अमरीका भागीदारी ज्यादा गहरा हुई है। अमरीका में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की संख्या अच्छी – खासी है। फिर, इस क्षेत्र की जनसंख्या और बाजार का आकार भी भारी – भरकम हैं इस कारण इस क्षेत्र की सुरक्षा और शांति के भविष्य से अमरीका के हित भी बंधे हुए हैं।

प्रश्न 9. दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक सहयोग की राह तैयार करने में दक्षेस (सार्क) की भूमिका और सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें। दक्षिण एशिया को बेहतरी में ‘दक्षेस’ (सार्क) ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सके, इसके लिए आप क्या सुझाव देंगे?

उत्तर: दक्षेस (साऊथ एशिया एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन) दक्षिण एशियाई देशों द्वारा बहुस्तरीय साधनों से आपस में सहयोग करने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। इसकी शुरुआत 1985 में हुई। दुर्भाग्य से सदस्यों के मध्य विभेदों की मौजूदगी के कारण दक्षेस को ज्यादा सफलता नहीं मिली है। दक्षेस के सदस्य देशों ने सन 2002 में ‘दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार – क्षेत्र समझौते’ (साऊथ एशियन फ्री ट्रेड एरिया SAFTA) पर दस्तखत किये। इसमें पुरे दक्षिण एशिया के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने का वायदा है।

यदि दक्षिण एशिया के सभी देश अपनी सीमारेखा के आर – पार मुक्त – व्यापार पर सहमत हो जाएँ तो इस क्षेत्र में शांति और सहयोग के एक नए अध्यय की शुरुआत हो सकती है। दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौते (SAFTA) के पीछे यही भावना काम कर रही है। इस समझौते पर 2004 में हस्ताक्षर हुए और यह समझौता १ जनवरी, 2006 से प्रभावी हो गया। इस समझौते का लक्ष्य है की इन देशों के बीच आपसी व्यापार में लगने वाली सिमा शुल्क को 2007 तक बीस प्रतिशत कम कर दिए जाए।

दक्षेस की सीमाएँ –

1.कुछ छोटे देश मानते हैं की ‘सॉफ्ट’ की आड़ लेकर भारत उनके बाजार में सेंध मारना चाहता है और व्यावसायिक अघम तथा व्यावसायिक मौजूदगी के जरिये उनके समाज और राजनितिक पर असर डालना चाहता है। दूसरी ओर भारत सोचता है की ‘साफ्ट’ से क्षेत्र के हर देश को फायदा होगा और क्षेत्र में मुक्त व्यापार बढ़ाने से राजनितिक मामलों पर सहयोग ज्यादा बेहतर होगा।

2.दक्षेस के सदस्य देशों में आपसी मतभेद बहुत अधिक हैं। कहि सिमा विवाद तो कही पानी के बंटवारे को लेकर आपसी मनमुटाव बना रहता हैं। भारत पाकिस्तान द्वारा आयोजित आतंकवाद से परेशान है जबकि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर भारत से दुश्मनी रखता हैं। इसी सब कारणों से सदस्य देशों के हाथ अवश्य मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलते। दक्षेस को अपेक्षित सफलता न मिलने के यही कारण हैं।

दक्षेस या दक्षिण एशियाई देशों को मजबूत बनाने के सुझाव – दक्षेस की सफलता उसके सदस्य देशों की राजनितिक सहमति पर आधारित है सभी देशों को आपसी मतभेद भूलकर दक्षेस को मजबूत बनाना चाहिए ताकि अंतर्राष्टीय स्तर पर इस संगठन को महत्व मिले तथा उसकी आवाज सुनी जाए। आपसी मतभेद की छाया दक्षेस के कार्यन्वत्न पर नहीं पड़नी चाहिए दक्षेस के मंच पर बड़े देश या छोटे देश का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी उसकी सफलता के लिए बराबर जिम्मेदार हों। द्विपक्षीय मुद्दें को दक्षेस से दूर रखना चाहिए। इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तथा ताकतवर देश होने के कारण भारत को अपने पड़ोसियों की यथानुसार सहायता करनी चाहिए। इस दक्षेस की मजबूती ही इस क्षेत्र की मजबूती हैं।

प्रश्न 10. दक्षिण एशिया के देश एक – दूसरे पर अविश्वास करते हैं। इससे अन्तर्राष्टीय मंचों पर यह क्षेत्र एकजुट होकर अपना प्रभाव नहीं जमा पाता। इस कथन की पुष्टि में कोई भी दो उदाहरण दें और दक्षिण एशिया को मजबूत बनाने के लिए उपाय सुझाएँ।

उत्तर: दक्षिण एशिया के सभी देश एक – दूसरे पर विश्वास नहीं करते, इसलिए वे अंतर्राष्टीय मंच पर एक स्वर में नहीं बोल पाते। उदाहरण के लिए, अन्तर्राष्टीय मंच पर भारत पाकिस्तान के विचार सदैव एक – दूसरे के विपरीत होते हैं। दोनों ही देश एक – दूसरे में कमियाँ निकलना शुरू कर देते हैं।

दक्षिण एशिया के सारे झगड़े सिर्फ भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच ही नहीं हैं; बल्कि भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल के बीच में भी अनेक मुद्दों पर विवाद बने हुए हैं – जैसे – जातीय मूल के नेपालियों के भूटान अप्रवास तथा रोहिग्या लोग के म्यांमार में अप्रवास के मसलों के मतभेद भी अंतराष्टीय मंच पर उठते रहते हैं। बांग्लादेश और नेपाल के बीच हिमालय नदियों के बंटवारे को लेकर मतभेद बने हुए हैं।

दक्षेस के अन्य देशों को यह डर बना हुआ है की भारत कहीं बड़े होने का दबाव हम पर न बना बैठे। इसका कारण दक्षिण एशिया का भूगोल भी हैं, जहाँ भारत बीच में स्थित है और अन्य देश भारत की सीमा के चरों तरफ है।

दक्षिण एशिया को मजबूत बनाने का उपाय – दक्षिण एशिया को निम्नलिखित उपायों द्वारा मजबूत बनाया जा सकता है, जैसे मुक्त व्यापार संधि को पूरी ईमानदारी से लागू करना, सेवाओं के क्षेत्र में आदान – प्रदान को बढ़ावा देना, व्यापारियों तथा पर्यटकों को दीर्धकालीन बीजा देकर तथा इन देशों के जहाजों को अपने बंदरगाहों पर प्राथमिकता से आने – जाने की सुविधा देकर।

यदि दक्षिण एशिया के देश आपस में संदेश और अविश्वास की दिवारे तोड़ दें तो 140 करोड़ की आबादी वाले ये देश अपने संसाधनो का उचित विकास कर सकते हैं तथा विभिन्न कार्य क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं।

प्रश्न 11. दक्षिण एशिया के देश भारत को एक बाहुबली समझते हैं जो इस क्षेत्र के छोटे देशों पर अपना दबदबा जमाना चाहता है और उनके अंदरूनी मामलों में दखल देता है। इन देशों की ऐसी सोच के लिए कौन – कौन सी बातें जिम्मेदार हैं?

उत्तर: दक्षिण एशिया के छोटे – छोटे पड़ोसियों के साथ भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं भारत का आकार बहुत बड़ा है और वह शक्तिशाली हैं। इस कारण से अपेक्षाकृत छोटे देशों का भारत के इरादों को लेकर शक करना लाजिम हैं। दूसरी ओर भारत सरकार को अक्सर ऐसा लगता है की उसके पड़ोसी देश उसका बेजा फायदा उठा रहे हैं। भारत नहीं चाहता की इन देशों में राजनितिक अस्थिरता पैदा हो। उसे भय लगता है की ऐसी स्थिति में बाहरी ताकतों को इस क्षेत्र में प्रभाव जमाने में मदद करेगी।

छोटे देशों को लगता है की भारत दक्षिण एशिया के सारे विवाद केवल भारत और उसके पड़ोसी देशों के बिच नहीं हैं। नेपाल – भूटान तथा बांग्लादेश – म्यामांर के बीच जातीय मूल के नेपालियों के भूटान अप्रवास तथा रोहिंग्या लोगों के म्यांमार में अप्रवास के मसले पर मतभेद रहे हैं। बांग्लादेशन और नेपाल के बिच हैं इसका एक कारण दक्षिण एशिया का भूगोल भी है जहाँ भारत बीच में स्थित है और बाकि देश भारत की सिमा के इर्द – गिर्द स्थित हैं। मेरे विचार के अनुसार उन देशों की भारत के बारे में सोच गलत है क्योकि भारत एक शंतिप्रियदेश है। वह सारे विश्व को एक कुटुंब के समान समझता रहा है।

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