Political Science Class 12 Chapter 7 question answers in Hindi

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समकालीन विश्व में सुरक्षा प्रश्न-उत्तर: Class 12 Political Science chapter 7 ncert solutions in hindi

TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science
ChapterChapter 7 ncert solutions
Chapter Nameसमकालीन विश्व में सुरक्षा
CategoryNcert Solutions
MediumHindi

क्या आप कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 7 समकालीन विश्व में सुरक्षा के प्रश्न उत्तर ढूंढ रहे हैं? अब आप यहां से Political Science Class 12 Chapter 7 question answers in Hindi, समकालीन विश्व में सुरक्षा प्रश्न-उत्तर download कर सकते हैं।

note: ये सभी प्रश्न और उत्तर नए सिलेबस पर आधारित है। इसलिए चैप्टर नंबर आपको अलग लग रहे होंगे।

प्रश्न 1. निम्नलिखित पदों को उनके अर्थ से मिलाएँ

(i) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स-CBMs)(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज़।
(ii) अस्त्र- नियन्त्रण(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया।
(iii) गठबन्धन(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अपरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।
(iv) निरस्त्रीकरण(घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश।

उत्तर:

(i) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स-CBMs(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया ।
(ii) अस्त्र- नियन्त्रण(घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश।
(iii) गठबन्धन(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अपरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।
(iv) निरस्त्रीकरण(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसको आप सुरक्षा का परंपरागत सरोकार / सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार / ‘खतरे की स्थिति नहीं’ का दर्जा देंगे –

  • (क) चिकेनगुनिया/डेंगू बुखार का प्रसार
  • (ख) पड़ोसी देश से कामगारों की आमद
  • (ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद
  • (घ) अपने इलाके को राष्ट्र बनाने की माँग करने वाले समूह का उदय
  • (ङ) अपने इलाके को अधिक स्वायत्तता दिए जाने की माँग करने वाले समूह का उदय।
  • (च) देश की सशस्त्र सेना को आलोचनात्मक नज़र से देखने वाला अखबार।

उत्तर:

  • (क) सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार।
  • (ख) सुरक्षा का पारंपरिक सरोकार।
  • (ग) खतरे की स्थिति नहीं।
  • (घ) सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार।
  • (ङ) खतरे की स्थिति नहीं।
  • (च) सुरक्षा का पारंपरिक सरोकार।

प्रश्न 3. परंपरागत और अपारंपरिक सुरक्षा में क्या अंतर है? गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना इनमें से किस कोटि में आता है?

उत्तर: सुरक्षा की विभिन्न धारणाओं को दो कोटियों में रखा जाता है 1. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा और 2. सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा। दोनों में निम्न प्रमुख अंतर हैं –

सुरक्षा की पारंपरिक धारणासुरक्षा की अपारंपरिक धारणा
पारंपरिक धारणा का संबंध मुख्यत: बहरी सुरक्षा से होता है। यह सुरक्षा मुख्यतः राष्ट्र की सुरक्षा की धारणा से संबंधित होती है।सुरंक्षा की अपारंपरिक धारणा न केवल सैन्य खतरों से संबंध रखती है बल्कि इसमें मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले अन्य व्यापक खतरों और आशंकाओं को भी शामिल किया जाता है। इस अवधारणा में सरकार इस बात के लिए विवश होती है की वह किन – किन चीजों की सुरक्षा करे, किन खतरों से उन चीजों की सुरक्षा करे और सुरक्षा करने के लिए कौन – से तरिके अपनाए।
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक समझा जाता है।सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में भू – क्षेत्रों और संस्थाओं सहित राज्यों को संदर्भ माना जाता है लेकिन सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा में संदर्भों का दायरा बड़ा होता है अर्थात इसमें सिर्फ राज्य ही नहीं व्यक्तियों और संप्रदायों या कहें की संपूर्ण मानवता की सुरक्षा की जरूरत होती है। इसी कारण सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व सुरक्षा कहा जाता है।
बाहरी सुरक्षा के खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश (मुल्क) होता है। वह देश सैन्य आक्रमण की धमकी देकर संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता जैसे किसी देश के केंद्रीय मूल्यों के लिए खतरा उत्पन्न करता है।इस धारणा में मानवता की रक्षा का विचार जनता जनार्दन की सुरक्षा को जजों की सुरक्षा से बढ़कर (अधिक महत्त्वपूर्ण) माना जाता है। मानवता की सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा एक – दुसरे के पूरक होने चाहिए। और प्रायः होते भी हैं लेकिन सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता। नागरिकों को विदेशी हमलों से बचाना भले ही उनकी सुरक्षा की जरुरी शर्ते हो लेकिन इतने भर को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
बहरी आक्रमण होने पर न केवल उस देश की सेना बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी खतरा होता है।अपारंपरिक धारणा के अनुसार मानवता को विदेशी सेना के हाथों मारे जाने के साथ – साथ स्वयं अपनी ही सरकारों के हाथों से बचाना भी उतना जरुरी है। विद्वानों के विचारानुसार सच्चाई यह है की पिछले 100 वर्षों में जितने लोग विदेशी सेना के हाथों मारे गए उससे कहि ज्यादा लोग खुद अपनी ही सरकारों के हाथों जाते रहे।
बुनियादी तौर पर बहरी खतरे या आक्रमण से निबटने के – लिए आक्रमण के शिकार हुए देश की सरकार के समक्ष तीन विकल्प होते हैं – (क) वह आत्मसमर्पण कर दे। (ख) वह आक्रमण पक्ष की बात बिना युद्ध किए मान ले। (ग) या हमलावर का डटकर सामना करे यधासंभव अपनी हानि को कम – से – कम (जान और माल की) और शत्रु पक्ष ज्यादा से ज्यादा हानि पहुँचाए ताकि वह घुटने ठेक दे।अपारंपरिक सुरक्षा सरोकार की धारणा के अनुसार सुरक्षा के कई नए स्रोत हैं जैसे – आतंकवादी, भयंकर महामारियों और मानव अधिकारों पर चिंताजनक प्रहार।

प्रश्न 4. तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में क्या अंतर है?

उत्तर: तीसरी दुनिया के देशों एवं विकसित देशों की जनता के मौजूद खतरों में अंतर को निम्न – प्रकार से समझा जा सकता है – तीसरी दुनिया से हमारा अभिप्राय जापान को छोड़कर संपूर्ण एशियाई, अफ्रीकी और लेटिन अमरीकी देशों से है। इन देशों के सामने विकसित देशों की जनता के सामने आने वाले मौजूद खतरों में बड़ा अंतर है। विकसित देशों से हमारा अभिप्राय प्रथम दुनिया और द्वितीय दुनिया के देशों से है। प्रथम दुनिया के देशों में संयुक्त राज्य अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और पशिचमी यूरोप के अधिकांश देश आते हैं जबकि दूसरी दुनिया में प्रायः पूर्व सोवियत संघ (अब रूस) और अधिकास पूर्वी यूरोप के देश शामिल कीए जाते हैं।

तीसरी दुनिया के देशों के सामने बाह्य सुरक्षा का खतरा तो है ही लेकिन उनके सामने आंतरिक खतरे भी बहुत हैं। बहरी खतरों में उनके समक्ष बड़ी शक्तियों के वर्चस्व का खतरा होता है। ये देश उन्हें अपने सैन्य वर्चस्व, राजनैतिक विचारधारा के वर्चस्व और आर्थिक सहायता सशर्त देने के वर्चस्व से डराते रहते हैं। प्रायः बड़ी शक्तियाँ उनके पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करके या मनमानी कठपुतली सरकारें बनाकर उनसे मनमाने तरिके से तीसरी दुनिया के देशों के लिए खतरे पैदा करते है। अपरोक्ष रूस से वह आतंकवाद को बढ़ावा देकर या मनमानी कीमतों पर प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति या अपने हित के लिए ही उदारीकरण, मुक्त व्यापार, वैश्वीकरण, सशर्त निवेश आदि के द्वारा आंतरिक आर्थिक खतरे जैसे कीमतों की बढ़ोत्तरी बेरोजगारी में वृद्धि, निर्धनता, आर्थिक विषमता को प्रोत्साहन देकर, उन्हें निम्न जीवन स्तर की तरफ अप्रत्यक्ष रूप से धकेलकर नए – नए खतरे पैदा करते हैं।

तीसरी दुनिया के सामने आतंकवाद, एड्स , बर्ड फ्लू और अन्य महामारियाँ भी खतरा बनकर आती हैं। इन देशों में प्रायः संकीर्ण भावनाओं के कारण पारस्परिक घृणा उत्पन्न होती रहती है। जैसे धार्मिक उन्माद, जाति भेद – भाव पर आधारित आंतरिक दंगे का खतरा, महिलाओं और बच्चों का निरंतर बढ़ता हुआ यौवन और अन्य तरह का शोषण, भापावाद, क्षेत्रवाद आदि से भी इन देशों के खतरा उत्पन्न होता रहता है। कई बार बड़ी शक्तियों द्वारा इन देशों में सांस्कृतिक शोषण और पश्चात संस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है जिनके कारण उनकी पहचान और संस्कृति खतरे में आ सकती है।

जहाँ तक विकसित राष्ट्रों का प्रश्न है। उनके सामने अपने परमाणु बमों के वर्चस्व को बनाए रखना और विश्व की अन्य शक्तियों को नई परमाणु शक्ति बनने से रोकना हैं। दूसरी और पहली दुनिया के देश चाहते हैं की नाटो बना रहे लेकिन वैसा जैसा कोई सैन्य संगठन भूतपूर्व साम्यवादी देश पुनः न गठित होने पाए।

विकसित देश यह भी चाहते है की सभी देश मुक्त व्यापार, उदारीकरण और वैश्वीकरण को अपनाएँ, सभी तेल उत्पदक राष्ट्र उन्हें उनकी इच्छानुसार ठीक – ठाक कीमतों पर निरंतर तेल की सप्लाई करते रहें और उनके प्रभाव में रहे। विकसित देश यह चाहते है की आतंकवादी अथवा कथित इस्लामिक धर्माधता के पक्षधर आतंकवादियों से निपटने के लिए न केवल वे सभी परस्पर सहयोग करें बल्कि तीसरी दुनिया के सभी देश भी उनके साथ रहें।

प्रश्न 5. आतंकवाद सुरक्षा के लिए परंपरागत खतरे की श्रेणी में आता है या अपरंपरागत?

उत्तर: आतंकवाद सुरक्षा के लिए अपरंपरागत श्रेणी में आता है। आतंकवाद का आशय राजनितिक खून – खराबे से है जो जान बूझकर और बिना किसी मुरोब्बत के नागरिक को अपना निशाना बनाता है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं। कोई राजनीतिक संदर्भ या स्थिति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल – प्रयोग अथवा बल – प्रयोग की धमकी देकर बदलना चाहते हैं। जनमानस को आंतकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया बनाया जाता है। आतंकवादयों का नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल राष्ट्रय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के खिलाफ करता है।

आतंकवादयों का मकसद ही आतंक फैलाना है अतः वे असैनिक स्थानों अर्थात आम लोगों को अपनी दहशतगर्दी का निशाना बनाते होते हैं तो दूसरी और उन्हें प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता। आम लोग आसानी से उनके शिकार बन जाते हैं। आतंकवाद के चिर – परिचित उदाहरण है विमान अपहरण अथवा भीड़ भरी जगहों पर बम लगाना सन 2001 में 11 सितंबर को अमरीका के वर्ल्ड टेड सेंटर पर आतंकवायों ने हमला बोला। इस घटना के बाद से दूसरे देश और वहाँ की सरकारों आतंकवाद पर ध्यान देने लगी हैं। गुजरे वक्त में आतंकवाद की अधिकांश घटनाएँ मध्यपूर्ण यूरोप, लातिनी अमरीक और दक्षिण एशिया में हुई।

प्रश्न 6. सुरक्षा के परंपरागत दृष्टिकोण के हिसाब से बताएँ की अगर किसी राष्ट्र पर खतरा मंडरा रहा हो तो उसके सामने क्या विकल्प होते हैं?

उत्तर: अधिकतर हमारा सामना सुरक्षा की परंपरिक अर्थात राष्ट्रिय सुरक्षा की धारणा से होता है। सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है। इस खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है जो सैन्य हमले की धमकी देकर संप्रभुता, स्वतत्रंता और क्षेत्रीय अखंडता जैसे किसी देश के केंद्रीय मूल्यों के लिए खतरा पैदा करता है। सैन्य कार्यवाही से आम नागरिकों के जीवन को भी खतरा होता है।

अगर किसी राष्ट्र पर खतरा मंडरा रहा हो तो युनियादि तौर पर किसी सरकार के पास में तीन विकल्प होते हैं – आत्मसमर्पण करना तथा दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना अथवा युद्ध से होने वाले नाश को इस हद तक पढ़ने के संकेत देना की दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से बाज आये या युद्ध ठन जाए तो अपनी रक्षा करना ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो सके और पीछे हट जाये अथवा हमलावर को पराजित कर देना।

युद्ध में कोई सरकार भले ही आत्मसमर्पण कर दे परन्तु वह इसे अपने देश की निति के रूप में कभी प्रचारित नहीं करना चाहेगी। इस कारण सुरक्षा – निति का संबंध युद्ध की आशंका को रोकने में होता है जिसे ‘अवरोध’ कहा जाता है और युद्ध को सिमित रखने अथवा उसको समाप्त करने से होता है जिसे ‘रक्षा’ कहा जाता है।

प्रश्न 7. ‘शक्ति – संतुलन’ क्या है? कोई देश इसे कैसे कायम करता है?

उत्तर: परंपरागत सुरक्षा – निति का एक तत्व और है। इसे शक्ति – संतुलन कहा जाता है। कोई देश अपने अड़ोस – पड़ोस में देखने पर पाता है की कुछ मुल्क छोटे हैं तो कुछ बड़े। इससे इशारा मिल जाता है की भविष्य में किसी देश से उसे खतरा हो सकता हैं। उदाहरण के लिए कोई पड़ोसी देश संभव है यह न कहे की वह हमले की तैयारी में लगा हैं। हमले का कोई प्रकट कारण भी नहीं जान पड़ता हो। फिर भी यह देखकर की कोई देश बहुत ताकतवर है यह भॉपा जा सकता हैं की भविष्य में यह हमलावर हो सकता है।

इस वजह से हर सरकार अपने शक्ति – संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती हैं। कोई सरकार दूसरे देशों से शक्ति – संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठने के लिए जी – तोड़ कोशिश करती है। जो देश नजदीक हों, जिनके साथ अनवन हो या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो उसके साथ शक्ति – संतुलन को अपने पक्ष में करने पर खासतौर पर जोर दिया जाता है। शक्ति – संतुलन बनाये रखने की यह कोशिश ज्यादातर अपनी सैन्य – शक्ति बढ़ाने की होती है लेकिन आर्थिक और प्रौधोगिकी की शक्ति भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य – शक्ति का यह आधार है।

प्रश्न 8. सैन्य गठबंधन के क्या उद्देश्य होते हैं? किसी ऐसे सैन्य गठबंधन का नाम बताएँ जो अभी मौजूद है। इस गठबंधन के उद्देश्य भी बताएँ?

उत्तर: सैन्य गठबंधन के उद्देश्य – गठबंधन बनाना पारंपरिक सुरक्षा निति का एक तत्व है। गठबंधन में कई देश शामिल होते है और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए कदम उठाते हैं। अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से एक औपचारिक आकार प्राप्त होता है और ऐसे गठबंधनों को यह बात बिल्कुल स्पष्ट रहती है की की खतरा किस से हैं। किसी देश अथवा गठबंधन न की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंधन बनाते हैं। गठबंधन राष्ट्रिय हितों पर आधारित होते हैं नाटो एक बहुत शक्तिशाली गठबंधन है जो आज भी मौजूदा है।

इस गठबंधन के उद्देश्य संयुक्त राज्य अमरीका के नेतृत्व में सभी अमरीकी और पशिचमी यूरोपीय देशों की सामूहिक सैन्य सुरक्षा को बनाए रखना और पशिचमि देशों के सैन्य वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखना है। यह किसी भी अपने मित्र देश या उन देशों को जो उन्हें तेल इत्यादि प्रकृतिक संसाधन प्रदान करते हैं उन्हें अपने राजनैतिक और आर्थिक हितों के अनुकूल बनाए रखने के लिए अपने मनपसंद सरकार और राजनैतिक व्यवस्था बनाए रखने के भी इच्छुक हैं।

वे किसी अन्य देश को वहाँ अपनी सत्ता स्थापित करने या राजनैतिक व्यवस्था को उनके प्रतिकूल बनाने की इजाजत किसी पर नहीं देना चाहते। गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रिय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते है। उदाहरण के लिए संयुक्त राज्य अमरीका ने सन 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल – कायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितंबर, 2001 के दिन उस पर हमला किया तो उसने इस्लामी उग्रवादियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।

प्रश्न 9. पर्यावरण के तेजी से हो रहे नुकसान से देशों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण देते हुए अपने तर्को की पुष्टि करें।

उत्तर: पर्यावरण के तेजी से हो रहे नुकसान से देश की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। हम इस कथन से पूर्णत: सहमत हैं अपने निर्णय की पुष्टि में हम निम्न तर्क दे सकते हैं –

(i) विश्व की आबादी निरंतर बढ़ रही है। वह सात सौ करोड़ के आंकड़े को पहले ही पार कर चुकी है। इस विशाल मानव समूह वे लिए निवास स्थान, रोजगार के लिए नए – नए कारखानों के निर्माण के लिए भूमि – स्थल, जल संसाधनों का अभाव अभी से महसूस किया जा रहा हैं। विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है जिससे मानव की भावी पीडियों के लिए भयंकर खतरा पैदा होता जा रहा है।

(ii) जल प्रदूषण वायु प्रदूषण, मिटटी प्रदूषण के कारण मानव स्वरूप, सामान्य जीवन और शांत वातावरण के लिए खतरा पैदा हो गया है। समुद्रों में विकसित और औधोगिक राष्ट्रों द्वारा निरंतर फेंके जाने वाला कूड़ा जल में रहने वाले जीवों के जीवन के लिए खतरा बना चूका है। अनेक राष्ट्रों को समुद्रो से मानव भोजन मिलता है और अनेक समुदाय के लोगो को रोजी – रोटी भी समुद्र से मिलती है। समुद्र से अनेक खनिज संपदा और उपयोगी पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं जो औधोगिक और यातायात विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं।

प्रश्न 10. देशों के सामने फिलहाल जो खतरे मौजूद हैं उनमें परमाण्विक हथियार का सुरक्षा अथवा अपरोध के लिए बड़ा सीमित उपयोग रह गया है। इस कथन का विस्तार करें।

उत्तर: सुरक्षा की परंपरागत धारण में स्वीकार किया जाता है की हिंसा का यथसंभव सिमित इस्तेमाल होना चाहिए। आज लगभग पूरा विश्व मानता है की किसी देश को युद्ध उचित कारणों अर्थात आत्म – रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही करना चाहिए। किसी युद्ध में युद्ध साधनों का सिमित इस्तेमाल होना चाहिए। सेना को उतने ही बल का प्रयोग करना चाहिए जितना आत्मरक्षा के लिए जरुरी हो और उससे एक सिमा तक ही हिंसा का सहारा लेना चाहिए।

बल का प्रयोग करना चाहिए जितना आत्मरक्षा के लिए जरुरी हो और उससे एक सिमा तक ही हिंसा का सहारा लेना चाहिए। बल प्रयोग तभी किया जाए जब बाकी उपाय असफल हो गए हों। सुरक्षा की परंपरागत धारणा इस संभावना से इंकार नहीं करती की देशों के बीच किसी न किसी रूप में सहयोग हो। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है – निरस्त्रीकरण, अस्त्र – नियंत्रण तथा विश्वास की बहाली।

(i) निरस्त्रीकरण – निरस्त्रीकरण की माँग होती है की सभी राज्य चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ खास किस्म के हथियारों के निर्माण से बाज आएँ। उदाहरण के लिए, 1972 की जैविक हथियार संधि (बॉयोलॉजिक बिपनस संवेंशन, BWC) तथा 1992 की रासायनिक हथियार संधि (केमिकल वीपन्स कवेंशन CWC) में ऐसे हथियारों को बनाना और रखना प्रतिवधित कर दिया गया है। पहली संधि पर 100 से ज्यादा देशों के हस्ताक्षर किए हैं और इनमे से 14 को छोड़कर शेष ने दूसरी संधि और भी हस्ताक्षर किए। इन दोनों संधियों पर दस्तखत करने वालों में सभी महाशक्तियों शामिल हैं। लेकिन हमशक्तियाँ – अमरीका तथा सोवियत संघ सामूहिक संहार के अस्त्र यानी परमाण्विक हथियार का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती थी इसलिए दोनों ने अस्त्र – नियंत्रण का सहारा लिया।

(ii) अस्त्र नियंत्रण – अस्त्र नियंत्रण के अंतर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध के कुछ कायदे – कानूनों का पालन करना पड़ता हैं। सन 1972 की एंटी बेलेस्टिक मिसाइल संधि (ABM) ने अमरीका और सोवियत संघ को वैलेस्टिक मिसाइल को रक्षा – कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका। ऐसे प्रक्षेपास्त्रों से हमले की शुरुआत की जा सकती थी। संधि में दोनों देशों को सिमित संख्या में ऐसी रक्षा – प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी लेकिन इस संधि ने दोनों देशों को ऐसी रक्षा – प्रणाली के व्यापक उत्पादन से रोक दिया।

(iii) विश्वास को बहाली – सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में यह बात भी स्वीकार की गई है की विश्वास बहाली के उपायों से देशों के बीच हिंसाचार कम किया जा सकता है। विश्वास बहाली की प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वद्विंता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान – प्रदान का फैसला करते है। दो देश एक – दूसरे को यह भी बताते हैं की उनके पास किस तरह के सैन्य – बल हैं। ये यह भी बता सकते हैं की इन बलों को कहाँ तैनात किया जा रहा है। संक्षेप में कहे तो विश्वास बहाली की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है की प्रतिद्वेंद्वी देश किसी गलतफ़हमी या गफ़लता में पढ़कर जंग के लिए आमादा न हो जाएँ।

आज विभिन्न देशों के समाने अनेक तरह के खतरे मौजूद हैं। इन खतरों को टालने अथवा इनका दमन करने के सैन्य या परमाण्विक विकल्प बहुत सिमित हैं। आज विभिन्न देशों के पास परमाणु हथियार हैं या उन्हें बनाने की क्षमता है। ऐसी स्थिति में एक देश का परमाण्विक हमला उसे उल्टा पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में एक देश समाप्त हो सकता है पर दूसरा भी बच नहीं सकता आज के खतरों से निपटने में सैन्य बल उपयुक्त नहीं है। उदाहरण के लिए अमरीका का इराक और अफगानिस्तान पर हमला किसी समस्या को सुलझा नहीं पाया और वह खतरा आज भी मैजूद है।

निष्कर्ष: कुल मिलाकर देखा जाए तो सुरक्षा की परंपरागत धारणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के प्रयोग की आशंका से संबद्ध है। सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में माना जाता है की सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को बरकरार रखा जा सकता है।

प्रश्न 11. भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए – पारंपरिक या अपारंपरिक? अपने तर्क की पुष्टि में आप कौन – से उदाहरण देंगे?

उत्तर: भारत को पारंपरिक (सैन्य) और अपारंपरिक खतरों का सामना करना पड़ा है। ये खतरे सिमा के अंदर से भी उभरे एवं बाहर से भी। भारत की सुरक्षा निति के चार बड़े घटक हैं और अलग – अलग समय में इन्ही घटकों के हेर – फेर से सुरक्षा की रणनीति बनायी हुई है।

(i) प्रथम घटक – सुरक्षा निति का पहला घटक सैन्य क्षमता को मजबूत करना रहा है क्योंकि भारत पर पड़ोसी देशों के हमले होते रहे हैं। पाकिस्तान ने 1947 – 48, 1965, 1971 तथा 1999 में एवं चीन ने सन 1962 में भारत पर हमला किया। दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चरों ओर परमाणु हथियारों से लैस देश हैं। ऐसे में भारत के परमाणु परीक्षण करने के फैसले (1998) को उचित ठहराते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया था।

(ii) दूसरा घटक – भारत की सुरक्षा निति का दूसरा घटक अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संस्थओं को सुदृढ़ करना है। भारत ने अपनी सुरक्षा की रणनीति में यह सिद्धांत भी अपनाया है की अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, संस्थाओं तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों व नियमों को मजबूत बनाने में योगदान करे क्योंकि इनकी मजबूती से देशों की बाहरी सुरक्षा मजबूत होती है। भारत ने निउपनिवेशीकरण का समर्थन किया है; अभी राष्ट्रों की राष्ट्रिय स्वतंत्रता को उनका जन्मसिद्ध अधिकार माना है और साम्राजयवाद का विरोध किया है।

यदि संयुक्त राष्ट्र संघ मजबूत होता है तो किसी देश को पड़ोसी देश पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हो सकती। भारत ने अंतररष्ट्रीय संघर्षों के समाधान में संयुक्त राष्टसंघ को अंतिम तथा सबसे अधिक उचित मंच माने जाने पर जोर दिया है। भारत ने इस बात पर जोर दिया है की सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयों का सम्मान करना उनका मानवीय दायित्व है। भारत ने हथियारों के अप्रसार के संबंध में एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली निति चलाने की पहल कदमी की जिसमे हर देश को सामूहिक संहार के हथियारों (परमाणु, जैविक, रासायनिक) से संवद्ध बराबर के अधिकार और दायित्व हों।

भारत ने नव – अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग उठाई और सबसे बड़ी बात यह है की दो महाशक्तियों के खेमेबाजी से अलग उसने गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व – शांति का तीसरी विकल्प को सामने रखा। भारत उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटे प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं। क्योटो प्रोटोकॉल में वैश्विक तापवृद्धि पर काबू रखने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सृजन को कम करने के संबंध में दिशा – निर्देश बताए गए हैं। सयोहमुलक सुरक्षा की पहलकदमियों के समर्थन में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्र संघ के शांतिवहाली के मिशनों में भेजी है।

(iii) तीसरा घटक – भारत की सुरक्षा रणनीति का तीसरा घटक है देश की अंदरूनी सुरक्षा समस्याओं से निबटने की तैयारी। नागालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कई उग्रवादी समूहों ने समय – समय पर इन प्रांतो को भारत से अलगाने की कोशिश की। भारत ने राष्ट्रिय एकता को बनाये रखने के लिए लोकतान्त्रिक राजनितिक व्यवस्था का पालन किया है। यह व्यवस्था विभिन्न समुदाय और जन – समूहों को अपनी शिकायतों को खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी दे सके।

(iv) चौथा घटक – भारत में अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास किए गए हैं की बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और आभाव के निजात मिले तथा नागरिकों के बिच आर्थिक असमानता ज्यादा न हो। ये प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुए हैं। हमारा देश अब भी गरीब है और असमानताएँ मौजूद हैं। फिर भी, लोकतान्त्रिक राजनितिक में ऐसे अवसर उपलब्ध हैं की गरीब और वंचित नागरिक अपनी आवाज उठा सकें। लोकतान्त्रिक रीती से निर्वाचित सरकार के ऊपर दबाव होता है की वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए। इस प्रकार, लोकन्त्र सिर्फ राजनितिक आदर्श नहीं है; लोकतान्त्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया करने का साधन भी है

प्रश्न 12. निचे दिए गए कार्टून को समझें। कार्टून में युद्ध और आतंकवाद का जो संबंध दिखाया गया है उसके पक्ष या विपक्ष में एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: पक्ष में तर्क – दिए गए कार्टून के रूप में यह कहा जा सकता है की युद्ध को प्रायः मानव विनाश के लिए बहुत बड़ा खतरा माना जाता रहा है। यह खतरा परंपरागत है। जबसे मानव पैदा हुआ है तभी से उसे युद्ध करना पड रहा है। यह युद्ध मानव को अपने राज्य या धर्म या संसाधनों की रक्षा और अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए लड़ना पड़ा। युद्ध के पक्षधर देश यह मानते हैं की आतंकवाद को कुचलने के लिए सभी राष्ट्र एक हो जाएँ तथा वे तब तक युद्ध का मोर्चा खोले रहें जब तक आतंकवाद समाप्त नहीं हो जाता।

विपक्ष में तर्क – आतंकवाद मानव या विश्व सुरक्षा के लिए एक नया खतरा है। यधपि आतंकवाद आदिकाल से चल रहा है। लेकिन वह आतंकवाद बहुत सिमित क्षेत्र तक था। जो व्यवक्ति या समाज शक्ति के सिद्धांत में विश्वास करते हुए यह मानता था की शक्ति ही ठीक है यह कमजोर व्यक्ति, समुदाय या राज्य को निकल जाता था। उसे व्यक्तिगत या क्षेत्रीय स्तर पर संघर्ष या लड़ाई लड़नी होती थी। उस समय लड़ाई या युद्ध का प्रभाव सिमित होता था। आज आतंकवाद न केवल एक देश के लिए वर्ण संपूर्ण विश्वजाति के लिए खतरा बन गया है।

आतंकवादी अपनी विचारधारा – राजनैतिक या धार्मिक सिद्धांत और शिक्षाएँ अथवा प्राथमिकताएँ थोपने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे हथियारों का सहारा लेकर निर्दोष लोगों के मस्तिश्क और मन पर अपना प्रभाव जबरदस्ती डालकर उन्हें अपनी टोली में खींचने हैं और उन्हें प्रशिक्षण देते है और फिर छोटे बम या मानव बम अथवा संभव हो तो अधिक शक्तिशाली बम प्रयोग करने के लिए भेजते रहते हैं। धन लूटना, आतंक के भय का प्रचार – प्रसार करना, मिडिया का सहारा लेकर अपनी विचारधारा को प्रसारित करना, बड़ी – बड़ी शक्तियों या सरकारो के विरुद्ध गुरिल्ला अथवा खुले चुनौतीपूर्ण युद्धों या संघर्ष को जारी करना सर्वत्र भय के साथ – साथ प्रतिरक्षा के लिए सरकारों को गहरे जाल बिछाकर रखना या बड़ी संख्या में आंतरिक सुरक्षा का इंतजाम करने के लिए विवश करना। युद्ध का तो एक समय होता है लेकिन विश्व के वर्तमान आतंकवाद के शुरू होने और अंत होने का समय अभी तो दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। इससे प्रायः निर्दोष महिलाएँ, बच्चे, वयोवृद्ध लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं।

संक्षेप में यह कार्टून यह दिखाता है कि युद्ध की जड़ में एक अहम् कारण आतंकवाद है जो मानव सुरक्षा के लिए एक नया सरोकार बनाए हुए है।

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