Class 12 Political Science भारत में दल और दलीय व्यवस्था Notes In Hindi

12 Class Political Science – II Chapter 5 भारत में दल और दलीय व्यवस्था Notes In Hindi

TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science 2nd book
ChapterChapter 5
Chapter Nameभारत में दल और दलीय व्यवस्था
CategoryClass 12 Political Science
MediumHindi

Class 12 Political Science – II Chapter 5 भारत में दल और दलीय व्यवस्था Notes in Hindi इस अध्याय मे हम कांग्रेस प्रणाली , दो दलीय व्यवस्था , बहुदलीस गठबंधन व्यवस्था के बारे में विस्तार से जानेंगे ।

🍁 अध्याय = 5🍁
🌺 भारत में दल और दलीय व्यवस्था 🌺

💠 महत्वपूर्ण शब्द : –

  • PUF – पापुलर यूनाईटेड फ्रंट 
  • SVD – संयुक्त विधायक दल 
  • CWC – कांग्रेस वर्किंग कमेटी 
  • DMK – द्रविड़ मुनेत्र कड़गम

💠 कांग्रेस प्रणाली क्या है ?

🔹 आजादी के बाद भारत की दल प्रणाली का बहुदलीय होते हुए भी 1952 से 1964 के काल में कांग्रेस के केन्द्र व राज्यों में राजनीतिक वर्चस्व के कारण भारतीय विद्वान रजनी कोठारी ने इसे कांग्रेस प्रणाली की संज्ञा दी । इस काल को मॉरिस जॉन्स ने ‘ एक दलीय प्रभुत्व ‘ की संज्ञा दी ।

🔹 चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक – दल की भूमिका निभायी और विपक्ष की भी । इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को कांग्रेस प्रणाली कहा जाता है ।

💠 प्रथम आम चुनाव : –

🔹 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय देश में अंतरिम सरकार थी । अब संविधान के अनुसार नयी सरकार के लिए चुनाव करवाने थे । जनवरी 1950 में चुनाव आयोग का गठन किया गया । सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक प्रथम आम चुनाव हुए । पहले तीन आम चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व रहा ।

💠 चुनाव आयोग की चुनौतियाँ : –

  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाना । 
  • चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन ।
  • मतदाता सूची बनाने के मार्ग में बाधांए । 
  • अधिकारियों और चुनावकर्मियों को प्रशिक्षित करना ।
  • कम साक्षरता के चलते मतदान की विशेष पद्धति के बारे में सोचना ।

💠 भारत के एक दल का प्रभुत्व एवं दुनिया के अन्य देशों में एक पार्टी के प्रभुत्व में अंतर : –

🔹 भारत में एक दल का प्रभुत्व दुनिया के अन्य देशों में एक पार्टी के प्रभुत्व से इस प्रकार भिन्न रहा । 

  • मैक्सिको में PRI की स्थापना 1929 में हुई , जिसने मैक्सिको में 60 वर्षों तक शासन किया । परन्तु इसका रूप तानाशाही का था ।
  • बाकी देशों में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ । 
  • चीन , क्यूबा और सीरिया जैसे देशों में संविधान सिर्फ एक ही पार्टी को अनुमति देता है । 
  • म्यांमार , बेलारूस और इरीट्रिया जैसे देशों में एक पार्टी का प्रभुत्व कानूनी और सैन्य उपायों से कायम हुआ ।
  • भारत में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र एवं स्वतंत्र निष्पक्ष चुनावों के होते हुए रहा है ।

💠 कांग्रेस के प्रथम तीन आम चुनावों में प्रभुत्व का कारण : –

  • स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका ।
  • सुसंगठित पार्टी ।
  • सबसे पुराना राजनीतिक दल 
  • पार्टी का राष्ट्र व्यापी नेटवर्क ।
  • प्रसिद्ध नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू , राजीव गांधी , इन्दिरा जैसे सबसे लोकप्रिय नेता इसमें शामिल थे ।
  • सबको समेटकर मेलजोल के साथ चलने की प्रकृति । 
  • भारत की चुनाव प्रणाली ।

💠 नेहरु की मौत के बाद उत्तराधिकार का संकट :-

🔹 पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे । वे इस पद पर 1947 से 1964 तक रहे । मई , 1964 में पं नेहरू की मृत्यु हो गई । उनकी मृत्यु के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर बहस तेज हो गई । ऐसी आशंका होने लगी कि देश टूट जाएगा । देश में सेना का शासन आ जाएगा । देश में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा ।

💠 लाल बहादुर शास्त्री ( 1904 – 1966 )

🔹 लाल बहादुर शास्त्री ने 1930 से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी की ; उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री रहे ; कांग्रेस पार्टी के महासचिव का पदभार संभाला ; 1951 – 56 तक केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद पर रहे । 

🔹 इसी दौरान रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था । बाद में , 1957 – 64 के बीच भी मंत्री पद पर रहे । इन्होंने ‘ जय जवान जय किसान ‘ का मशहूर नारा दिया था । पं . जवाहर लाल नेहरू के बाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने । 10 जनवरी 1966 ताशकन्द में उनका निधन हो गया ।

💠 नेहरु के बाद लाल बहादुर शास्त्री का शासन काल : –

🔹 जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री 1964 से 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे । 

🔹 शास्त्री जी का 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में निधन हो गया । उस समय भारत चीन युद्ध का नुकसान , आर्थिक संकट , सूखा , मानसून की असफलता पाक से युद्ध जैसी घटनाओं से भारत गुजर रहा था ।

🔹 1965 के युद्ध की समाप्ति के सिलसिले में 1966 में सोवियत संघ के ताशकंद ( वर्तमान में उज्बेकिस्तान की राजधानी ) में भारत व पाकिस्तान के मध्य ताशकंद समझौता हुआ । ताशकंद समझौते पर भारत की तरफ से लाल बहादुर शास्त्री व पाकिस्तान की तरफ से मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किये ।

💠 लाल बहादुर शास्त्री जी के शासन काल के दौरान आई चुनौतिया : –

🔹 लाल बहादुर शास्त्री 1964 से 1966 तक प्रधानमंत्री रहे । इस अवधि में देश ने दो चुनौतियों का सामना किया ।

  • 1965 का भारत – पाकिस्तान युद्ध 
  • खाद्यान्न का संकट ( मानसून की असफलता से ) 

🔹 इन चुनौतियों से निपटने के लिये शास्त्री जी ने ‘ जय जवान जय किसान का नारा दिया । 

💠 शास्त्री जी के बाद उत्तराधिकारी इंदिरा गांधी : –

🔹  शास्त्री जी की मृत्यु के बाद मोरारजी देसाई व इंदिरा गांधी के मध्य राजनैतिक उत्तराधिकारी के लिये संघर्ष हुआ व इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया गया । 

🔹 सिंडिकेट ने इंदिरा गाँधी को अनुभवहीन होने के बावजूद प्रधानमंत्री बनाने में समर्थन दिया , यह मान कर वे दिशा निर्देशन के लिये सिंडीकेट पर निर्भर रहेंगी । नेतृत्व के लिये प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया ।

💠 इंदिरा गांधी के पीएम बनने के समय देश की समस्या : –

  • मानसून की असफलता , 
  • व्यापक सूखा , 
  • विदेशी मुद्रा भंडार में कमी , 
  • निर्यात में गिरावट
  • सैन्य खर्चे में बढ़ोत्तरी से देश में आर्थिक संकट की स्थिति । 

🔹 इंदिरा गांधी ने अमेरिका के दबाव में रुपए का अवमूल्यन किया । उस समय एक डॉलर 5 रुपए का था तो उसे बढ़ाकर 7 रुपए कर दिया ।

💠 चौथा आम चुनाव 1967 : –

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🔹 देश की ख़राब स्तिथि और अनुभवहीन नेता होने के कारण विपक्षी दलों ने जनता को लामबंद करना शुरू कर दिया ऐसी स्थिति में अनुभवहीन प्रधानमंत्री का चुनावों का सामना करना भी एक बड़ी चुनौती थी । 

🔹 फरवरी 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हुए । देश में चुनाव हमेशा की तरह ही आराम से हो गए पर उनके नतीजों ने सबको चौका दिया । कांग्रेस को केंद्र और राज्य दोनों जगह ही गहरा धक्का लगा । कांग्रेस किसी तरह से लोकसभा में सरकार बनाने में सफल रही पर सीटों और मतों की संख्या दोनों में ही भरी गिरावट आई । कांग्रेस के कई बड़े नेता चुनाव हार गए । चुनावों के नतीजों को राजनैतिक भूकम्प का संज्ञा दी गयी । 

🔹 कांग्रेस 9 राज्यों ( उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , पंजाब , हरियाणा , बिहार , पं . बंगाल , उड़ीसा , मद्रास व केरल ) में सरकार नहीं बना सकी । ये राज्य भारत के किसी एक भाग में स्थित नहीं थे ।

💠 भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में 1967 के वर्ष को अत्यन्त महत्वपूर्ण पड़ाव क्यों माना जाता है ? 

🔹 सन् 1967 के चौथे आम चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्व रखते हैं । इन चुनावों में पहली बार कांग्रेस को यह अनुभव हुआ कि जनता पर से उसकी पकड़ ढीली हो रही है । इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था । 

🔹 केन्द्र में जहाँ कांग्रेस मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई , वहीं 9 राज्य विधानसभाओं ( बिहार , केरल , मद्रास , ओडीशा , पंजाब , राजस्थान , उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल ) में हार का सामना करना पड़ा । लोकसभा की कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को केवल 283 सीटे ही मिल पाई ।

🔹 अतः जिस कांग्रेस पार्टी ने पहले तीन आम चुनावों में जिन विरोधी दलों को बुरी तरह से हराया , वे दल चौथे लोकसभा चुनाव में बहुत अधिक सीटों पर चुनाव जीत गए । इसी तरह राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति 1967 के आम चुनावों में ठीक नहीं थी । 1967 के आम चुनाव बहुत बड़े उलट – फेर वाले रहे । इससे पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर गैर – कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया ।

💠 1967 के आम चुनाव के समय भारत की आर्थिक व राजनैतिक स्थिति : –

🔹 भारत की राजनैतिक व आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय थी :- 

  • गंभीर खाद्यान्न संकट ।
  • विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी । 
  • औद्योगिक उत्पादन तथा निर्यात में कमी । 
  • सैन्य खर्चों में बढ़ोत्तरी । 
  • देश में बंद तथा हड़ताल की स्थिति । 
  • व्यापक जन – असंतोष ।
  • आर्थिक विकास व नियोजन की कमी ।

💠 1960 दशक को खतरानाक दशक क्यों कहते है ?

🔹 1960 के दशक को खतरनाक दशक भी कहा जाता है क्योंकि इस दौरान भारत ने दो युद्धो ( 1962 भारत चीन तथा 1965 में भारत व पाकिस्तान के मध्य ) का सामना किया तथा देश में मानसून की असफलता से सूखे की स्थिति पैदा हो गई ।

💠 गैर कांग्रेस वाद : –

🔹 जो दल अपने कार्यक्रम व विचारधाराओं के धरातल पर एक दूसरे से अलग थे , एकजुट हुये तथा उन्होंने सीटों के मामले में चुनावी तालमेल करते हुये एक कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया । समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने इस रणनीति को गैर – कांग्रेसवाद का नाम दिया ।

💠 दल बदल : –

🔹जब कोई जन प्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीत जाये व चुनाव जीतने के बाद उस दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाये तो इसे दल – बदल कहते हैं ।

💠 भारतीय राजनीति में ‘ आया राम , गया राम ‘ से क्या तात्पर्य है ?

🔹 कहावत ‘ आयाराम , गयाराम ‘ सांसदों द्वारा अपनी पार्टी को बार – बार बदलना कहलाता है , 1967 के चुनावों के बाद काग्रेस के एक विधायक ( हरियाणा ) गयालाल ने एक पखवाड़े में तीन बार पार्टी बदली , उनके ही नाम पर ‘ आयाराम – गयाराम ‘ का जुमला बना । 

💠 सिंडिकेट : –

🔹 कांग्रेस नेताओं का एक समुह को एक अनौपचारिक रूप से ‘ सिंडिकेट ‘ के नाम से पुकारा जाता था । इस समुह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर अधिकार और पूर्ण नियंत्रण था । 

🔹 ‘ सिंडिकेट ‘ के अगुआ मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और फिर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रह चुके के . कामराज थे । इसमें प्रांतों के ताकतवर नेता जैसे बंबई सिटी ( अब मुबंई ) के एस . के . पाटिल , मैसूर ( अब कर्नाटक ) के एस . निजलिंगप्पा , आंध्र प्रदेश के एन . संजीव रेड्डी और पश्चिम बंगाल के अतुल्य घोष शामिल थे ।

💠 1969 का राष्ट्रपति चुनाव : –

🔹  डा . जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद , सिंडिकेट ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष एन . संजीव रेड्डी को कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया ।

🔹 इंदिरा गांधी ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी . वी . गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद के लिये नामांकन भरवा दिया । इंदिरागांधी ने अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने के लिये कहा , वी . वी . गिरी चुनाव जीत गये ।

🔹 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनावों के बाद कांग्रेस का विभाजन हो गया ।

💠 कांग्रेस का विभाजन : –

🔹 सिंडीकेट व इंदिरा गांधी के मध्य बढ़ते मतभेद व राष्ट्रपति चुनाव ( 1969 ) में इंदिरा गांधी समर्थित उम्मीदवार वी . वी . गिरी की जीत व कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार एन . सजीव रेड्डी की हार से कांग्रेस को 1969 में कांग्रेस को विभाजन की चुनौती झेलनी पड़ी ।

🔹 कांग्रेस ( आर्गेनाइजेशन ) व कांग्रेस ( रिक्विजिनिस्ट ) में विभाजित हो गयी ।

  • Cong ( O ) ( सिंडिकेट समर्थित ग्रुप )
  • Cong ( R ) ( इंदिरा गांधी समर्थित ग्रुप )

💠 कांग्रेस के विभाजन के मुख्य कारण : –

  • 1969 का राष्ट्रपति चुनाव ।
  • बैंको का राष्ट्रीयकरण तथा प्रिवी पर्स जैसे मुद्दो पर तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से मतभेद
  • सिंडीकेट व युवा वर्ग में मतभेद ।
  • इंदिरा गाँधी की समाजवादी नीतियाँ ।
  • इंदिरा गाँधी का कांग्रेस से निष्कासन  
  • इंदिरा गाँधी द्वारा सिंडीकेट को महत्व न देना । 
  • दक्षिण पंथी व वामपंथी विषय पर कलह ।

💠 प्रिवी पर्स क्या है ?

🔹 देशी रियासतों का विलय भारतीय संघ में करने से पहले सरकार ने यह आश्वासन दिया था कि रियासतों के तत्कालिन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार होगा । साथ ही सरकार की तरफ से उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिए जाएँगे । इस व्यवस्था को प्रिवी पर्स कहा गया ।

💠 देसी रियासतों का विलय : –

🔹 देसी रियासतों का विलय भारतीय संघ में करने से पहले सरकार ने रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार दिया तथा सरकार की तरफ से कुछ विशेष भत्ते देने का भी आवश्वासन दिया ।

🔹 यह दोनों ( निजी संपदा व भत्ते ) इस बात को आधार मान कर तय की जायेगी कि उस रियासत का विस्तार , राजस्व व क्षमता कितनी है । इस व्यवस्था को प्रिवी पर्स कहा गया । इंदिरा गांधी ने 1967 के चुनावों की खोई जमीन प्राप्त करने के लिये दस सूत्रीय कार्यक्रम अपनाये इसमें बैंको का राष्ट्रीयकरण , खाद्यान्न का सरकारी वितरण , भूमि सुधार आदि शामिल थे ।

नोट :- 1971 के चुनावों में गैर – साम्यवादी तथा गैर – कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने चुनावी गठबंधन ” ग्रैंड अलायंस ” बनाया ।

🔹 इंदिरा गांधी ने सकारात्मक कार्यक्रम रखा व गरीबी हटाओ का नारा दिया । ग्रैंड अलायंस ने ‘ इंदिरा हटाओ ‘ का नारा दिया । इंदिरा गांधी ने प्रिसी पर्स की समाप्ति पर चुनाव अभियान में जोर दिया ।

💠 कांग्रेस प्रणाली का पुर्नस्थापन : –

🔹 अब कांग्रेस पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर अधारित थी । कांग्रेस अब विभिन्न मतों व हितो को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं थी ।

🔹 यह कुछ सामाजिक वर्गो जैसे गरीब , महिला , दलित , आदिवासी व अल्पसंख्यकों पर निर्भर थी ।

🔹 इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को पुर्नस्थापित तो कर दिया परन्तु कांग्रेस प्रणाली की प्रकृति को बदलकर । पार्टी का सांगठनिक ढाँचा भी अपेक्षाकृत कमजोर था ।

💠 1971 के चुनावों के बाद , कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व की पुनर्स्थापना के लिए उठाए गए कदम : –

  • श्रीमती गाँधी का चमत्कारिक नेतृत्व । 
  • समाजवादी नीतियाँ । 
  • गरीबी हटाओं का नारा । 
  • कांग्रेस दल पर इंदिरा गाँधी की पकड़ । 
  • वोटों का धुव्रीकरण । 
  • कमजोर विपक्षी दल ।

💠 1970 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार के लोकप्रिय होने के कारण : –

  • 1971 के भारत – पाक युद्ध में भारत की विजय 
  • गरीबी हटाओ की राजनीति 
  • प्रिवी पर्स की समाप्ति 
  • गरीबों , भूमिहीन किसानों और वंचितों की रक्षक 
  • भूमि सुधार

💠 गरीबी हटाओ का नारा : –

🔹 ‘ गरीबी हटाओ ‘ का नारा 1971 के पाँचवें लोकसभा चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने दिया । श्रीमती गाँधी ने ‘ गरीबी हटाओ ‘ के नारे के अन्तर्गत गरीबों के निरन्तर विकास की बात कही । ‘ गरीबी हटाओ ‘ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियाँ एवं कार्यक्रम बनाए जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक – से – अधिक धन खर्च किया जाने लगा ।

🔹 इससे मतदाताओं को यह आभास हुआ कि कांग्रेस पार्टी वास्तव में गरीबों की गरीबी दूर करना चाहती है । अतः उन्होंने बाकी सभी दलों को हराते हुए श्रीमती गाँधी एवं उनके दल को विजयी बनाया । परिणाम स्वरूप 1971 के चुनावों में पूर्णबहुमत प्राप्त किया ।

💠 दो दलीय व्यवस्था : –

🔹 जनवरी 1977 में विपक्षी पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया कांग्रेसी नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस फोर डेमोक्रेसी ‘ दल का गठन किया , जो बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गया । 

🔹 जनता पार्टी ने आपातकाल की ज्यादतियों को मुद्दा बनाकर चुनावों को उस पर जनमत संग्रह का रूप दिया । 1977 के चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा में 154 सीटें तथा जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 330 सीटें मिली । 

🔹 आपातकाल का प्रभाव उत्तर भारत में अधिक होने के कारण 1977 के चुनाव में कांग्रेस को उत्तर भारत में ना के बराबर सीटें प्राप्त हुई । जनता पार्टी की सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री तथा चरण सिंह व जगजीवन राम दो उपप्रधानमंत्री बनें । 

🔹 जनता पार्टी के पास किसी दिशा , नेतृत्व व एक साझे कार्यक्रम के अभाव में यह सरकार जल्दी ही गिर गई । 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 353 सीटें हासिल करके विरोधियों को शिकस्त दी ।

💠 गठबंधन : –

🔹 गठबंधन उस स्तिथि को कहते जब दो या दो से ज़्यादा पार्टिया साथ में मिल कर सरकार बनती है । ऐसा इसीलिए किया जाता है क्योकि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला होता , यानि की किसी भी पार्टी को इतनी सीटे नहीं मिली होती की वह अकेले सरकार बना सके ।

💠 गठबंधन सरकारों के उदय के कारण : –

  • राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का कमजोर होने के कारण
  • क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रादुर्भाव व सरकारों के निर्माण में बढ़ती भूमिका
  • जाति व सम्प्रदाय आधारित अवसरवादी राजनीति का उदय

💠 गठबंधन का युग : –

🔹 1989 के चुनावों के बाद गठबंधन का युग आरंभ हुआ । चुनावों के बाद जनता दल और कुछ क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बने राष्ट्रीय मोर्चे ने भाजपा और वाम मोर्चे के समर्थन से गठबंधन सरकार बनायी ।

🔹 1998 से 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में भारतीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार रही । इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी प्रधनमंत्री रहे ।

🔹 2004 से 2009 व 2009 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए । इस दौरान डा . मनमोहन सिंह प्रधनमंत्री रहे । 

🔹 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने इतिहास रचते हुए 30 साल बाद पूर्ण बहुमत प्राप्त किया परन्तु चुनाव पूर्व गठबंधन की प्रतिबद्धता का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनाई ।

💠 पार्टियों के भीतर गठबन्धन तथा पार्टियों के बीच गठबंधन में अन्तर : –

🔹 पार्टी के भीतर गठबन्धन भारत में प्रथम आम चुनावों से ही देखने को मिला । जब कांग्रेस एक सतरंगे सामाजिक व विचारधारात्मक गठबंधन के रूप में दिखी । अलग – अलग गुटो के होने से इसका स्वभाव सहनशील बना । तथा कांग्रेस के भीतर ही संगठन का ढांचा अलग होने पर भी व्यवस्था में सन्तुलन साधने के एक साधन के रूप में काम किया । 

🔹 वर्तमान राजनीति में पार्टियों के बीच गठबन्धन दिखाई देता है जहाँ भारतीय लोकतंत्र हित में अलग – अलग विचार धाराओं को मानने वाले दल आम सहमति के मुद्दो पर मिली जुली सरकार बनाते है परन्तु आपने दल की नीतियाँ नहीं बदलते ।

💠 भारत में राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा को सशक्त बनाने वाले कारण : –

  • संवैधानिक प्रावधान 
  • स्वतंत्र चुनाव आयोग 
  • स्वतंन्त्र प्रेस 
  • स्वतंन्त्र न्यापालिका 
  • बहुदलीय व्यवस्था 
  • दबाव एवम् हित समूह
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