Class 12 Political Science Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत Notes In Hindi

12 Class Political Science दो ध्रुवीयता का अंत Notes In Hindi

TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPolitical Science
ChapterChapter 2
Chapter Nameदो ध्रुवीयता का अंत
CategoryPolitical Science
MediumHindi

Class 12th Political Science Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत Notes in Hindi इस अध्याय मे हम सोवियत संघ का विघटन , एकध्रुवीय विश्व , मध्य एशियाई संकट – अफगानिस्तान , खाड़ी युद्ध , लोकतान्त्रिक राजनीति और लोकतांत्रिकरण – CIS और 21 वीं सदी ( अरब स्प्रिंग ) के बारे में विस्तार से पड़ेगे ।

🍁 अध्याय = 2 🍁
🌺 दो ध्रुवीयता का अंत 🌺

💠 दो ध्रुवीयता का अर्थ : –

🔹वह व्यवस्था जिसमें दो महाशक्तियों का अस्तित्व होता है तथा जिनकी क्षमताएँ प्रायः तुलनात्मक होती हैं , उसे द्वि – ध्रुवीकरण कहते हैं । 

🔹 यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो विरोधी अथवा प्रतिपक्षी राज्य या ब्लॉक होते हैं तथा जिसमें दोनों एक – दूसरे को अपना शत्रु समझते हैं । दोनों ब्लॉक एक – दूसरे को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं । 

🔹 शीतयुद्ध के दौरान ‘ दो ध्रुवीय विश्व ‘ की उत्पत्ति हुई । एक खेमे का नेतृत्व अमेरिका के हाथों में था और दूसरे खेमे का नेता सोवियत संघ था । लेकिन साम्यवादी खेमे के विघटन के साथ ही दो ध्रुवीयता का भी अन्त हो गया ।

💠 बर्निल की दीवार : –

🔹 बर्लिन की दीवार पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी । 1961 में बनी यह दीवार पश्चिमी बर्लिन को पूर्वी बर्लिन से अलग करती थी । 150 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी यह दीवार 28 वर्षों तक खड़ी रही और आखिरकार जनता ने इसे 9 नवंबर , 1989 को तोड़ दिया ।

💠 CIS का अर्थ : –

🔹 Common Wealth of Indepedent States ( स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल ) यह सोवियत संघ के विघटन के बाद 15 गणराज्यों का संघ बना । इसमें रूस एक गणराज्य रहा ।

💠 सोवियत संघ ( U . S . S . R . ) : –

🔹 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति के बाद समाजवादी सोवियत गणराज्य संघ ( U . S . S . R . ) अस्तित्व में आया ।

🔹 सोवियत संघ में कुल मिलाकर 15 गणराज्य थे अर्थात 15 अलग – अलग देशों को मिलाकर सोवियत संघ का निर्माण किया गया था ।

🔹 सोवियत संघ का निर्माण गरीबों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया । इसे समाजवाद और साम्यवादी विचारधारा के अनुसार बनाया गया ।

🔹 सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतन्त्र हुए गणराज्य निम्नलिखित हैं :-

  1. रूसी
  2. कजाकिस्तान
  3. एस्टोनिया
  4. लातविया
  5. लिथुआनिया
  6. बेलारूस
  7. यूक्रेन
  8. माल्दोवा
  9. अर्मेनिया
  10. जॉर्जिया
  11. अजरबैजान
  12. तुर्कमेनिस्तान
  13. उज्बेकिस्तान
  14. ताजिकिस्तान
  15. किर्गिजस्तान

💠 सोवियत संघ को महाशक्ति बनाने वाले कारक : –

🔹 द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनाने में निम्नलिखित कारकों ने योगदान दिया : –

  • संयुक्त राज्य अमेरिका की भाँति सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था भी विश्व के अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक विकसित अवस्था में थी ।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् सोवियत संघ की संचार प्रणाली में भी अनेक परिवर्तन आये । उस समय सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत अधिक उन्नत अवस्था में थी । 
  • सोवियत संघ के पास ऊर्जा संसाधनों के विशाल भंडार थे जिनमें खनिज तेल , लोहा , इस्पात एवं मशीनरी उत्पाद आदि सम्मिलित हैं । इन संसाधनों के बल पर सोवियत संघ ने अपना बहुत अधिक विकास किया और वह एक महाशक्ति के रूप में उभरने लगा ।
  • सोवियत संघ में यातायात के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ । सोवियत संघ के दूर – दराज के इलाके भी आवागमन की सुव्यवस्थित एवं विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे । 
  • सोवियत संघ का घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत अधिक उन्नत अवस्था में था । यहाँ पिन से लेकर कार तक समस्त वस्तुओं का उत्पादन होता था । यद्यपि सोवियत संघ के उपभोक्ता उद्योग में निर्मित होने वाली वस्तुएँ गुणवत्ता के दृष्टिकोण से पश्चिमी देशों के स्तर के समकक्ष नहीं थी ।
  • सोवियत संघ की सरकार ने अपने देश के समस्त नागरिकों को बुनियादी सुविधाएँ प्रदान कर रखी थी , जिनमें शिक्षा स्वास्थ सुविधाएँ , बच्चों की देखभाल एवं यातायात सुविधाएँ आदि प्रमुख थी ।

💠 लेनिन कौन था ?

🔹 व्लादिमीर लेनिन का जन्म सन् 1870 में तथा उसका देहांत सन् 1924 में हुआ । यह बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक थे । अक्टूबर 1917 की सफल रूसी क्रांति के नायक लेनिन सन् 1917-1924 तक सोवियत समाजवादी गणराज्य ( USSR ) के संस्थापक तथा अध्यक्ष रहे । वह मार्क्सवाद के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देने में अत्यन्त सफल रहे । लेनिन पूरी दुनिया में साम्यवाद के प्रेरणा स्रोत बने रहे ।

💠 स्टालिन कौन था ?

🔹 जोसेफ स्टालिन ( सन् – 1879-1953 ) लेनिन के बाद सोवियत संघ का सर्वोच्च नेता एवं राष्ट्राध्यक्ष बना । उसने सोवियत संघ को मजबूत बनाने के दौर में सन् 1924 से 1953 तक नेतृत्व प्रदान किया । उसके काल में सोवियत संघ का तेजी से औद्योगिकरण हुआ । उसने खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण कर दिया । उसे सन् 1930 के दशक से लेकर 1953 तक सोवियत संघ में तानाशाही की स्थापना के लिए जिम्मेदार माना जाता है ।

💠 सोवियत प्रणाली : –

🔹 सोवियत प्रणाली वह व्यवस्था है जिसके द्वारा सोवियत संघ ने अपना विकास किया । सोवियत प्रणाली समाजवादी व्यवस्था पर आधारित थी । यह प्रणाली समतामूलक समाज और समाजवाद के आदर्शों पर आधारित थी । यह निजी संपत्ति की संस्था का विरोध करके समाज को समानता के सिद्धांत पर व्यवस्थित करना चाहती थी ।

🔹 सोवियत प्रणाली के निर्माताओं ने पार्टी की संस्था को सर्वाधिक महत्व दिया इसलिए सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी साम्यवादी पार्टी थी । जिसमें किसी अन्य दल या विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं थी । अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी ।

💠 सोवियत प्रणाली की विशेषता : –

  • सोवियत संघ की राजनीतिक प्रणाली समाजवादी व्यवस्था पर आधारित थी ।
  • सोवियत प्रणाली आदर्शों एवं समतावादी समाज पर बल देती है । 
  • सोवियत प्रणाली पूँजीवादी एवं मुक्त व्यापार के विरुद्ध थी । 
  • सोवियत प्रणाली में कम्युनिस्ट पार्टी को अधिक महत्व दिया जाता था । अर्थात कम्यूनिस्ट पार्टी का दबदबा था । 
  • सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी । इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा नियंत्रण था । 
  • सोवियत आर्थिक प्रणाली योजनाबद्ध एवं राज्य के नियंत्रण में थी । 
  • सोवियत संघ में सम्पत्ति पर राज्य का स्वामित्व एवं नियंत्रण था ।
  • सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी ।
  • न्यूनतम जीवन स्तर की सुविधा थी बेरोजगारी न के बराबर थी ।

💠 सोवियत प्रणाली की खामियाँ : –

  • सोवियत प्रणाली में नागरिकों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं होता था और शासन पर साम्यवादी दल के नेताओं तथा नौकरशाही का नियंत्रण था । 
  • नागरिकों को शासन की कमियों को उजागर करने की स्वतंत्रता नहीं थी । आम नागरिक , शासन और साम्यवादी दल की आलोचना नहीं कर सकते थे ।
  • नागरिकों का जीवन कठिन था , जबकि दल के नेता और सरकारी कर्मचारी अच्छे जीवनयापन करते थे । 
  • साम्यवादी दल तथा शासन संस्था , जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं थी । उत्तरदायी के अभाव के कारण शक्ति का दुरुपयोग होता था ।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न होने के कारण जनता में शासन के विरुद्ध अंदर ही अंदर आक्रोश बढ़ता जा रहा था ।
  • सोवियत संघ अपने नागरिकों की राजनीतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका ।
  • शासन की सारी शक्ति रूस में केन्द्रित थी जबकि वह 15 गणराज्यों में से एक था । इससे अन्य गणराज्य और उनकी जनता उपेक्षित महसूस करती थी ।

💠 दूसरी दुनिया के देश : –

🔹 पूर्वी यूरोप के देशों को समाजवादी प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया था , इन्हें ही समाजवादी खेमे के देश या दूसरी दुनिया कहा गया ।

💠 साम्यवादी सोवियत अर्थव्यवस्था तथा पूँजीवादी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अंतर :-

सोवियत अर्थव्यवस्थाअमेरिका की अर्थव्यवस्था
( i ) राज्य द्वारा पूर्ण रूपेण नियंत्रित( i ) राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप
( ii ) योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था ( ii ) स्वतंत्र आर्थिक प्रतियोगिता पर आधारित
( iii ) व्यक्तिगत पूंजी का अस्तित्व नहीं( iii ) व्यक्तिगत पूंजी की महत्ता ।
( iv ) समाजवादी आदर्शो से प्रेरित( iv ) अधिकतम लाभ के पूंजीवादी सिद्धांत ।
( v ) उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व ।( v ) उत्पादन के साधनों पर बाजार का नियंत्रण ।

💠 मिखाइल गोर्बाचेव कौन था ?

🔹 मिखाइल गोर्बाचेव का जन्म सन् 1931 में हुआ । वह सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति ( 1985 से 1991 ई ) रहे । उसका नाम रूसी इतिहास में सुधारों के लिए जाना जाता है । उन्होंने पेरेस्त्रोइका ( पूनर्रचना ) और ग्लासनोस्त ( खुलेपन ) के आर्थिक और राजनीतिक सुधार शुरू किए । 

💠 मिखाइल गोर्बाचेव की उपलब्धियाँ : –

  • गोर्बाचेव ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हथियारों की होड़ पर रोक लगाई । 
  • उन्होंने अफगानिस्तान और पूर्वी यूरोप से सोवियत सेना वापस बुलाई । 
  • यह अंतर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने की दृष्टि से उनका एक बहुत ही अच्छा कार्य था । 
  • वह जर्मनी के एकीकरण में सहायक बने । 
  • उन्होंने शीतयुद्ध समाप्त किया । 

🔹 उन पर सोवियत संघ के विघटन का आरोप लगाया जाता है । 

💠 सोवियत संघ में सुधारों के लिए गोर्बाचेव को बाध्य करने वाली परिस्थितियाँ : –

🔹 गोर्बाचेव निम्नलिखित कारणों से सोवियत संघ में सुधार के लिए बाध्य हुए : –

  • सोवियत संघ में धीरे – धीरे नौकरशाही का प्रभाव बढ़ता गया तथा पूरी व्यवस्था नौकरशाही के शिकंजे में फँसती चली गई । इससे सोवियत प्रणाली सत्तावादी हो गई तथा लोगों का जीवन कठिन होता चला गया । 
  • सोवियत व्यवस्था में लोकतंत्र एवं विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं पाई जाती थी । अतः इसमें सुधार की आवश्यकता थी ।
  • सोवियत संघ में एक दल , साम्यवादी दल का प्रभुत्व था । यह दल किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं था । यद्यपि सोवियत संघ में 15 गणराज्य शामिल थे , परन्तु प्रत्येक विषय में रूस का प्रभुत्व था तथा वही सब प्रकार के महत्वपूर्ण निर्णय लेता था । इससे बाकी के गणराज्य स्वयं को दमित एवं अपमानित अनुभव करते थे ।
  • सोवियत संघ ने समय – समय पर अत्याधुनिक एवं खतरनाक हथियार बनाकर अमेरिका की बराबरी की , परन्तु धीरे – धीरे उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी । हथियारों पर अत्यधिक खर्चों के कारण सोवियत संघ बुनियादी ढाँचे एवं तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ता गया । 
  • सोवियत संघ राजनीतिक एवं आर्थिक तौर पर अपने नागरिकों के समक्ष पूरी तरह सफल नहीं हो पाया । 
  • सन् 1979 में अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप के कारण सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था और भी कमजोर हो गई । सोवियत संघ में निर्यात कम होता गया तथा आयात बढ़ता गया ।

💠 सोवियत संघ समाप्ति की घोषणा : –

🔹 1991 में बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों ने तथा रूस , यूक्रेन व बेलारूस ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा की ।

💠 सोवियत संघ का विघटन : –

🔹 सोवियत संघ के गणराज्यों में चल रहे संघर्ष ने देश के विघटन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी । गणराज्यों के संघर्ष से सोवियत संघ की केन्द्रीय सत्ता दुर्बल हो गयी । एक के बाद एक करके सोवियत संघ के गणराज्य स्वतंत्र होते गए । 25 दिसंबर , 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया । 

🔹 जिन 15 गणराज्यों को मिलाकर सोवियत संघ एक ‘ बहुराष्ट्रीय राज्य ‘ हुआ करता था , उनमें से 12 राज्यों ने मिलकर ‘ स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल ‘ ( CIS ) की स्थापना की । तीन बाल्टिक गणराज्य ( लातविया , एस्तोनिया और लिथुआनिया ) उसमें शामिल नहीं हुए । 

💠 सोवियत संघ का विघटन : एक दृष्टि में : –

  • मार्च , 1985 : गोर्बाचेव कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए । बोरिस येल्तसिन को रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रमुख बनाया । सोवियत संघ में सुधारों की श्रृंखला शुरू की ।
  • जनवरी , 1987 : ‘ पेरेस्त्रोइका ‘ का अर्थ है- पुनर्रचना । इसके अन्तर्गत आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों पर वल दिया गया ।
  • सितम्बर , 1988 : गोर्बाचेव अब देश के राष्ट्रपति बन गए । लिथुआनिया में आज़ादी के लिए आंदोलन शुरू । एस्टोनिया और लताविया में भी फैला ।
  • अक्टूबर , 1989 : गोर्बाचेव ने पूर्वी यूरोप के देशों से सेनाएँ हटा ली थीं । ‘ वारसा संधि ‘ में शामिल देशों को अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार मिल गया । फलस्वरूप , इन देशों में सोवियत संघ का दबदबा समाप्त हो गया ।
  • नवम्बर , 1989 : बर्लिन की दीवार गिरा दी गई ।
  • फरवरी , 1990 : सोवियत संघ में 72 वर्षों से चला आ रहा कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार समाप्त हो गया । सोवियत चुनावों के लिए ‘ बहुदलीय व्यवस्था ‘ का मार्ग खुल गया ।
  • मार्च , 1990 : लिथुआनिया ने अपनी आजादी की घोषणा कर दी । आजादी की घोषणा करने वाला वह पहला सोवियत गणराज्य था ।
  • जून , 1990 : रूसी संघीय गणराज्य ने सोवियत संघ से अलग हो जाने की घोषणा कर दी । 
  • जून , 1991 : बोरिस येल्तसिन रूस के राष्ट्रपति बने ।
  • अगस्त , 1991 : कम्युनिस्ट कट्टरपंथियों ने गोबांचेव के खिलाफ विद्रोह कर दिया । विद्रोह असफल रहा । 
  • सितम्बर , 1991 :  तीन बाल्टिक गणराज्य ( लातविया , एस्तोनिया और लिथुआनिया ) जो सोवियत संघ से अलग हो गए थे , संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन गए । 
  • दिसम्बर , 1991 : 8 दिसम्बर को तीन गणराज्यों ( रूस , यूक्रेन और बेलारूस ) ने 1922 की उस संधि को रद्द करने का फैसला किया जिससे ‘ सोवियत संघ ‘ का निर्माण हुआ था । उन्होंने स्वतन्त्र राज्यों के राष्ट्रकुल ( Commonwealth of Independent States CIS ) की स्थापना की । बाद में आठ अन्य गणराज्य ‘ राष्ट्रकुल ‘ में शामिल हो गए । इस प्रकार राष्ट्रकुल की सदस्य संख्या 11 हो गई ।
  • 25 दिसम्बर , 1991 : 25 दिसम्बर को गोर्बाचेव ने राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया । इसी के साथ औपचारिक तौर पर सोवियत संघ का अस्तित्व समाप्त हो गया । 1993 में जार्जिया भी राष्ट्रकुल का सदस्य बन गया ।

💠 सोवियत संघ के विघटन के कारण : –

  • नागरिकों की राजनीतिक और आर्थिक आंकाक्षाओं को पूरा न कर पाना । 
  • सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा ।
  • कम्यूनिस्ट पार्टी का अंकुश ।
  • संसाधनों का अधिकतम उपयोग परमाणु हथियारों पर । 
  • प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे में पश्चिम के मुकाबले पीछे रहना ।
  • पार्टी का जनता के प्रति जवाबदेह ना होना । 
  • रूस की प्रमुखता । 
  • गोर्बाचेव द्वारा किए गए सुधारों का विरोध होना । 
  • अर्थव्यवस्था गतिरूद्ध व उपभोक्ता वस्तुओं की कमी । 
  • राष्ट्रवादी भावनाओं और सम्प्रभुता की इच्छा का उभार । 
  • सोवियत प्रणाली का सत्तावादी होना ।

💠 सोवियत संघ के विघटन के परिणाम : –

  • शीतयुद्ध का संघर्ष समाप्त हो गया । दूसरी दुनिया का पतन ।
  • एक ध्रुवीय विश्व अर्थात् अमरीकी वर्चस्व का उदय ।
  • हथियारों की होड़ की समाप्ति ।
  • सोवियत खेमे का अंत और 15 नए देशों का उदय ।
  • विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्था ताकतवर देशो की सलाहकार बन गई ।
  • रूस सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बना ।
  • विश्व राजनीति में शक्ति संबंध परिवर्तित हो गए ।
  • समाजवादी विचारधारा पर प्रश्नचिन्ह या पूँजीवादी उदारवादी व्यवस्था का वर्चस्व ।
  • शॉक थेरेपी को अपनाया गया ।
  • उदारवादी लोकतंत्र का महत्व बढा ।

💠 सोवियत संघ में कम्युनिस्ट शासन की कमियाँ : –

🔹 सोवियत संघ पर कम्युनिस्ट पार्टी ने 70 सालों तक शासन किया और यह पार्टी अब जनता के जवाबदेह नहीं रह गई थी । 

🔹 इसकी निम्नलिखित कमियाँ थी : –

  • कम्युनिस्ट शासन में सोवियत संघ प्रशासनिक और राजनितिक रूप से गतिरुद्ध हो चूका था । 
  • भारी भ्रष्टाचार व्याप्त था और गलतियों को सुधारने में शासन व्यवस्था अक्षम थी ।
  • विशाल देश में केन्द्रीयकृत शासन प्रणाली थी । 
  • सत्ता का जनाधार खिसकता जा रहा था । कम्युनिष्ट पार्टी में कुछ तानाशाह प्रकृति के नेता भी थे जिनकों जनता से कोई सरोकार नहीं था । 
  • ‘ पार्टी के अधिकारीयों को आम नागरिक से ज्यादा विशेषाधिकार मिले हुए थे ।

💠 भारत जैसे विकासशील देशों पर सावियत संघ के विघटन के परिणाम : –

  • विकासशील देशों की घरेलू राजनीति में अमेरिका को हस्तक्षेप का अधिक अवसर मिल गया ।
  • कम्यूनिस्ट विचारधारा को धक्का ।
  • विश्व के महत्वपूर्ण संगठनों पर अमेरिकी प्रभुत्व ( I.M.F. , World Bank )
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत व अन्य विकासशील देशों में अनियंत्रित प्रवेश की सुविधा ।

💠 हथियारों की होड़ की कीमत :-

🔹 सोवियत संघ ने हथियारों की होड़ में अमरीका को कड़ी टक्कर दी परन्तु प्रोद्योगिकी और बुनियादी ढाँचे के मामले में वह पश्चिमी देशों से पिछड़ गया ।

🔹 उत्पादकता और गुणवता के मामले में वह पश्चिम के देशों से बहुत पीछे छूट गया ।

💠 शॉक थेरेपी :-

🔹 शॉक थेरेपी शाब्दिक अर्थ है आघात पहुँचाकर उपचार करना । साम्यवाद के पतन के बाद सोवियत संघ के गणराज्यों को विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर संक्रमण ( परिवर्तन ) के मॉडल को अपनाने को कहा गया । इसे ही शॉक थेरेपी कहते है ।

🔹 शॉक थेरेपी के अंतर्गत राज्य की संपदा के निजीकरण और व्यावसायिक ढाँचे को तुरंत अपनाने की बात की गई , जिसके अंतर्गत ‘ सामूहिक फार्म ‘ को ‘ निजी फार्म ‘ में बदला गया और पूँजीवादी पद्धति से खेती आरंभ की गई ।

💠 शॉक थेरेपी की विशेषताएँ : –

  • मिल्कियत का प्रमुख रूप निजी स्वामित्व । राज्य की संपदा का निजीकरण ।
  • सामूहिक फार्म को निजी फार्म में बदल दिया गया ।
  • पूंजीवादी पद्धति से खेती की जाने लगी ।
  • मुक्त व्यापार व्यवस्था को अपनाना ।
  • मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता ।
  • पश्चिमी देशों की आर्थिक व्यवस्था से जुड़ाव ।
  • पूंजीवाद के अतिरिक्त किसी भी वैकल्पिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया गया ।

💠 शॉक थेरेपी के परिणाम : –

  • पूर्णतया असफल , रूस का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया ।
  • रूसी मुद्रा रूबल में गिरावट ।
  • समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था नष्ट ।
  • सरकारी रियायत खत्म हो गई ज्यादातर लोग गरीब हो गए ।
  • 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कम्पनियों को कम दामों ( औने – पौने ) दामों में बेचा गया जिसे इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल कहा जाता है ।
  • आर्थिक विषमता बढ़ी ।
  • खाद्यान्न संकट हो गया ।
  • माफिया वर्ग का उदय ।
  • अमीर और गरीब के बीच तीखा विभाजन हो गया ।
  • कमजोर संसद व राष्ट्रपति को अधिक शक्तियाँ जिससे सत्तावादी राष्ट्रपति शासन ।

💠 गराज – सेल : –

🔹 शॉक थेरेपी से उन पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई जिनमें पहले साम्यवादी शासन थी ।

🔹 रूस में , पूरा का पूरा राज्य – नियंत्रित औद्योगिक ढाँचा चरमरा उठा । लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कंपनियों को बेचा गया ।

🔹 आर्थिक ढाँचे का यह पुनर्निर्माण चूँकि सरकार द्वारा निर्देशित औद्योगिक नीति के बजाय बाजार की ताकतें कर रही थीं , इसलिए यह कदम सभी उद्योगों को मटियामेट करने वाला साबित हुआ । इसे ‘ इतिहास की सबसे बड़ी गराज – सेल ‘ के नाम से जाना जाता है ।

💠 गराज – सेल जैसी हालात उत्पन्न होने का कारण : –

🔹 महत्त्वपूर्ण उद्योगों की कीमत कम से कम करके आंकी गई और उन्हें औने – पौने दामों में बेच दिया गया ।

🔹 हालाँकि इस महा – बिक्री में भाग लेने के लिए सभी नागरिकों को अधिकार – पत्र दिए गए थे , लेकिन अधिकांश नागरिकों ने अपने अधिकार पत्र कालाबाजारियों के हाथों बेच दिये क्योंकि उन्हें धन की जरुरत थी ।

🔹 रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में नाटकीय ढंग से गिरावट आई । मुद्रास्पफीति इतनी ज्यादा बढ़ी कि लोगों की जमापूँजी जाती रही ।

💠 क्या शॉक थेरेपी साम्यवाद से पूँजीवाद की तरफ संक्रमण का सबसे बेहतर तरीका था ?

🔹 ‘ शॉक थेरेपी ‘ साम्यवाद से पूँजीवाद की तरफ संक्रमण का यह बेहतर तरीका नहीं था । इसके निम्नलिखित परिणाम आए :-

  • पूर्व सोवियत संघ ( रूस ) का राज्य द्वारा नियन्त्रित औद्योगिक ढाँचा चरमरा गया , क्योंकि लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों में या कंपनियों को बेच दिया गया । इसे ‘ इतिहास की सबसे बड़ी गराज – सेल ‘ कहा गया । 
  • महा – बिक्री में भाग लेने के लिए सभी नागरिकों को अधिकार पत्र दिए गए थे , लेकिन अधिकांश नागरिकों ने अपने अधिकार पत्र कालाबाजारियों के हाथों में बेच डाले , क्योंकि उन्हें धन की आवश्यकता थी । 
  • रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में गिरावट से लोगों की जमा पूँजी जाती रही ।
  • सामूहिक खेती प्रणाली समाप्त होने से खाद्यान्न सुरक्षा मौजूद नहीं रही और खाद्यान्न का आयात करना पड़ा । 
  • सन् 1999 का सकल घरेलू उत्पाद सन् 1959 की तुलना में नीचे आ गया । पुराना व्यापारिक ढाँचा टूट गया था , लेकिन व्यापार की कोई नई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो पाई थी । 
  • एक माफिया वर्ग उभर कर आया , जिसने आर्थिक गतिविधयों को अपने नियन्त्रण में ले लिया ।
  • अमीर तथा गरीब लोगों के बीच अंतर बढ़ने लगा , जिससे आर्थिक असमानता आयी । 
  • जल्दबाजी में संविधान तैयार करके राष्ट्रपति को कार्यपालिका प्रमुख बनाकर सभी शक्तियाँ उसे दे दी और संसद कमजोर संस्था बनकर रह गई ।

🔹 इस प्रकार परिणामों को देखकर हम कह सकते हैं कि साम्यवाद से पूँजीवाद की ओर संक्रमण धीरे – धीरे होना चाहिए था ताकि व्यवस्था में परिवर्तन को सहजता से अपनाया जा सके ।

💠  संघर्ष व तनाव के क्षेत्र : –

🔹 पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्ष की आशंका वाले क्षेत्र है । इन देशों में बाहरी ताकतों की दखलंदाजी भी बढ़ी है । रूस के दो गणराज्यों चेचन्या और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आन्दोलन चले । चेकोस्लोवाकिया दो भागों – चेक तथा स्लोवाकिया में बंट गया । 

💠 बाल्कन राज्य : –

🔹 भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो बाल्कन राज्य तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है । इसके पूर्व में काला सागर तथा इसके पश्चिम व दक्षिण में भूमध्य सागर की शाखाएँ हैं । इस कारण बाल्कन राज्यों को ‘ बाल्कन प्रायद्वीप ‘ भी कहा जाता है । 
🔹 इसमें अल्बानिया , बोस्निया , हर्जेगोविना , सर्बिया , तुर्की , यूनान , मेसोडोनिया गणतंत्र प्रमुख रूप से सम्मिलित हैं । कुछ अन्य राज्यों को भी इसमें शामिल किया जाता है ; जैसे – स्लोवेनिया , रोमानिया आदि ।

💠 बाल्कन क्षेत्र : –

🔹 बाल्कन गणराज्य यूगोस्लाविया गृहयुद्ध के कारण कई प्रान्तों में बँट गया । जिसमें शामिल बोस्निया हर्जेगोविना , स्लोवेनिया तथा क्रोएशिया ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया ।

💠 बाल्टिक क्षेत्र : –

🔹 बाल्टिक क्षेत्र के लिथुआनिया ने मार्च 1990 में अपने आप को स्वतंन्त्र घोषित किया । एस्टोनिया , लताविया और लिथुआनिया 1991 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य बने । 2004 में नाटो में शामिल हुए ।

💠 मध्य एशिया : –

🔹मध्य एशिया के तज़ाकिस्तान में 10 वर्षों तक यानी 2001 तक गृहयुद्ध चला । अज़रबैजान , अर्मेनिया , यूक्रेन , किरगिझस्तान , जार्जिया में भी गृहयुद्ध की स्थिति हैं । मध्य एशियाई गणराज्यों में पेट्रोल के विशाल भंडार है । इसी कारण से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कंपनियों की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन गया है ।

💠 पूर्व साम्यवादी देश और भारत : –

  • पूर्व साम्यवादी देशों के साथ भारत के संबंध अच्छे है , रूस के साथ विशेष रूप से प्रगाढ़ है ।
  • दोनों का सपना बहुध्रवीय विश्व का है ।
  • दोनों देश सहअस्तित्व , सामूहिक सुरक्षा , क्षेत्रीय सम्प्रभुता , स्वतन्त्र विदेश नीति , अन्तराष्ट्रीय झगड़ों का वार्ता द्वारा हल , संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुदृढ़ीकरण तथा लोकतंत्र में विश्वास रखते है ।
  • 2001 में भारत और रूस द्वारा 80 द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए ।
  • भारत रूसी हथियारों का खरीददार ।
  • रूस से तेल का आयात । 
  • परमाण्विक योजना तथा अंतरिक्ष योजना में रूसी मदद ।
  • कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ उर्जा आयात बढ़ाने की कोशिश ।
  • गोवा में दिसम्बर 2016 में हुए ब्रिक्स ( BRICS ) सम्मलेन के दौरान रूस – भारत के बीच हुए 17 वें वार्षिक सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतीन के बीच रक्षा , परमाणु उर्जा , अंतरिक्ष अभियान समेत आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने एवं उनके लक्ष्यों की प्राप्ति पर बल दिया गया ।

💠 एक ध्रुवीय व्यवस्था क्या हैं ?

🔹 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध का अंत हो गया तथा संयुक्त राज्य – अमेरिका का विश्व राजनीति में प्रभाव बढ़ गया । वर्तमान समय में कोई ऐसा देश नहीं है जो अमेरिका जैसे महाशक्ति को चुनौती दे सके इस व्यवस्था को एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहते हैं ।

💠 नई विश्व व्यवस्था क्या है ?

🔹 सन् 1990 के अगस्त में इराक ने अपने पड़ोसी देश कुवैत पर हमला किया और बड़ी तेजी से उस पर कब्जा जमा लिया । इराक के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए बल प्रयोग की अनुमति दे दी । अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इसे ‘ नई विश्व व्यवस्था ‘ की संज्ञा दी । 

💠 इराक पर आक्रमण की घटना : –

🔹 अमेरिका इराक के पीछे पड़ा था । इराक के कुवैत पर इराक की गतिविधियों के बाद से ही तानाशाह सद्दाम हुसैन का शासनकाल हत्याओं और यातनाओं के लिए कुख्यात हो चुका था । इसके अलावा अमेरिका ने यह बहाना बनाया कि इराक ने सामुहिक के शास्त्र विकसित कर लिए हैं । अमेरिका की असली नजर , इराक के विशाल तेल भण्डार पर थी और अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना की 19 मार्च 2003 को इराक पर हमला कर दिया । सद्दाम हुसैन की सरकार धरासायी हो गई तथा 2006 में उसे फाँसी दे दी गई ।

💠 प्रथम खाड़ी युद्ध : –

🔹 अमरीका के नेतृत्व में 34 देशों ने मिलकर और 6,60,000 सैनिकों की भारी – भरकम फौज ने इराक के विरुद्ध युद्ध किया और उसे परास्त कर दिया । इसे प्रथम खाड़ी युद्ध कहा जाता है ।

💠 प्रथम खाड़ी युद्ध के कारण : –

  • इराक द्वारा कुवैत पर कब्ज़ा :- प्रथम खाड़ी युद्ध – का सबसे बड़ा कारण इराक द्वारा कुवैत पर कब्ज़ा करना था ।
  • अमेरिका की युद्ध की इच्छा :- प्रथम खाड़ी युद्ध – के लिए अमेरिका की युद्ध की इच्छा भी जिम्मेदार थी । 
  • सोवियत संघ का पतन :- सोवियत संघ के पतन – के पश्चात् अमेरिका पर लगाम कसने वाला कोई न था । संयुक्त राष्ट्र
  • संयुक्त राष्ट्र संघ की असफलता :- प्रथम खाड़ी युद्ध के पहले संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी सही भूमिका नहीं निभा पाया ।

💠 प्रथम खाड़ी युद्ध के परिणाम : –

  • इस युद्ध से विश्व राजनीति में अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हुआ ।
  • खाड़ी युद्ध ने अरब एकता की भ्रांति को समाप्त कर दिया ।
  • इस युद्ध के लिए 20 में से केवल 12 अरब देशों ने अपनी सैनिक टुकड़ी भेजी । 
  • यद्यपि युद्ध फरवरी सन् 1991 में ही समाप्त हो गया था लेकिन इराक के विरुद्ध लगाए गए प्रतिबंध अनेक वर्षों तक जारी रहे । 
  • भीषण बमबारी से इराक व कुवैत में भारी जान-माल की हानि हुई । 
  • इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अमेरिका अन्य देशों की तुलना में काफी समृद्ध है ।
  • सैन्य विशेषज्ञों व पर्यवेक्षकों ने इसे ‘ कम्प्यूटर युद्ध ‘ की संज्ञा दी ।

💠 प्रथम खाड़ी युद्ध ( ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म ) : –

🔹 1990 के अगस्त में इराक ने कुवैत पर हमला किया और बड़ी तेजी से उस पर कब्ज़ा जमा लिया । सभी देशों द्वारा इराक को समझाने की कोशिश की गई की यह गलत है लेकिन इराक नहीं माना तब संयुक्त राष्ट्र संघ ( U.N ) ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए बल – प्रयोग की अनुमति दे दी । संयुक्त राष्ट्रसंघ के इस सैन्य अभियान को ‘ ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म ‘ कहा जाता है ।

🔹 संघ ( U.N ) का यह फैसला नाटकीय फैसला कहलाया क्योंकि ( U.N ) ने शीत युद्ध से अब तक इतना बड़ा फैसला नहीं लिया जॉर्ज बुश ने इस नई विश्व व्यवस्था की संज्ञा दी ।

🔹 एक अमरीकी जनरल नार्मन श्वार्जकॉव इस सैन्य – अभियान के प्रमुख थे और 34 देशों की इस मिली जुली सेना में 75 प्रतिशत सैनिक अमरीका के ही थे । हालाँकि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कहा था कि यह ‘ सौ जंगों की एक जंग ‘ साबित होगी लेकिन इराकी सेना जल्दी ही हार गई और उसे कुवैत से हटने पर मजबूर होना पड़ा ।

💠 कंप्यूटर युद्ध : –

🔹 प्रथम खाड़ी युद्ध के दौरान अमरीका की सैन्य क्षमता अन्य देशो की तुलना में कही अधिक थी । अमरीका ने प्रथम खाड़ी युद्ध में ‘ स्मार्ट बमों का प्रयोग किया । इसके चलते कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे ‘ कंप्यूटर युद्ध ‘ की संज्ञा दी ।

🔹 इस युद्ध की टेलीविज़न पर बहुत ज्यादा कवरेज हुई इस कारण से इसे वीडियो गेम वॉर भी कहा जाता है ।

💠 अमेरिकी दूतावास पर हमला : –

🔹 केन्या (नरोनी) में बने अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ । एव डरे सलाम (तंजानिया) में बने अमेरिकी दूतावास पर भी हमला हुआ ।

🔹 हमले की जिम्मेदारी “अल कायदा” को बताया गया आतंकवादी संगठन को इसका जिम्मेदार बताया गया। 

💠 ऑपरेशन इनफाइनाइट रिच : –

🔹 युद्ध के जवाब में 1998 में बिल क्लिंटन ने “ऑपरेशन इनफाइनाइट रिच” चलाया। 

🔹 ऑपरेशन में उन्होंने सूडान और अफगानिस्तान के आतंकवादी ठिकाने पर “क्रूज मिसाइल” से हमला किया।

💠 11 सितम्बर ( 9/11 ) की घटना : –

🔹 11 सितम्बर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिका के चार व्यवसायिक विमानों को कब्जे में ले लिया । अपहरणकर्ता इन विमानों को अमरीका की महत्त्वपूर्ण इमारतों की सीध में उड़ाकर ले गये । 

🔹 दो विमान न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी और दक्षिणी टावर से टकराए ।

🔹 तीसरा विमान पेंटागन ( रक्षा विभाग का मुख्यालय ) की बिल्डिंग से टकराया ।

🔹 चौथे विमान को अमरीकी कांग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन वह पेन्सिलवेनिया के एक खेत में गिर गया । इस हमले को ‘ 9 / 11’ कहा जाता है ।

💠 9 / 11 की घटना के परिणाम : –

🔹 इस घटना से पूरा विश्व हिल सा गया । अमरीकियों के लिए यह दिल दहला देने वाली घटना थी । 

🔹 इस हमले में लगभग 3 हजार व्यक्ति मारे गये । 

💠 ऑपरेशन एडयूरिंग फ्रीडम : –

🔹 आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज w बुश ने 2001 में ‘ ऑपरेशन एन्डयूरिंग प्रफीडम ‘ चलाया । 

🔹 यह अभियान उन सभी के खिलाफ चला जिन पर 9 / 11 की घटना का शक था । इस अभियान में मुख्य निशाना अलकायदा और अपफगानिस्तान के तालिबान शासन को बनाया गया । 

🔹 ऑपरेशन एन्डयूरिंग प्रफीडम का यह परिणाम निकला कि तालिबान की समाप्ति हो गई और अलकायदा का कमजोर पड़ गया ।

💠 9 / 11 के बाद अमरीका द्वारा बनाए गए बंदी : –

🔹 अमरीकी सेना ने पूरे विश्व में गिरफ्तारियाँ कीं । अक्सर गिरफ्तार में लोगों के बारे में उनकी सरकार को जानकारी नहीं दी गई । 

🔹 गिरफ्तार लोगों को अलग – अलग देशों में भेजा गया और उन्हें खुफिया जेलखानों में रखा गया । क्यूबा के निकट अमरीकी नौसेना का एक ठिकाना ग्वांतानामो बे में है । कुछ बंदियों को वहाँ रखा गया । 

🔹 इस जगह रखे गए बंदियों को न तो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की सुरक्षा प्राप्त है और न ही अपने देश या अमरीका के कानूनों की । संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधियों तक को इन बंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई । 

💠 द्वितीय खाड़ी युद्ध ( ऑप्रेशन इराकी फ्रीडम ) : –

🔹 19 मार्च 2003 में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमति के बिना ही इराक पर हमला कर दिया। जिसे ऑपरेशन इराकी फ्रीडम कहा । दिखावे के लिए अमेरिका ने कहा कि इराक खतरनाक हथियार बना रहा है । लेकिन बाद में पता चला कि इराक में कोई खतरनाक हथियार नहीं है ।

🔹 हमले के पीछे उपदेश = अमेरिका इराक के तेल भंडार पर कब्जा और इराक में अपनी मनपसंद सरकार बनाना चाहता था ।

🔹 इस के बाद सद्दाम हुसैन का अंत हो गया साथ ही बहुत से आम नागरिक भी मरे गए। पूरा विश्व ने इस बात की आलोचना की थी। इस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश थे। ऑप्रेशन इराकी फ्रीडम को सैन्य और राजनीतिक धरातल पर असफल माना गया क्योंकि इसमें 3000 अमेरिकी सैनिक, बड़ी संख्या में इराकी सैनिक तथा 50000 निर्दोष नागरिक मरे गए थे ।

💠ऑपरेशन इराकी फ्रीडम के मुख्य उद्देश्य : –

  • ईराक को सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकना और हथियारों को नष्ट करना ।
  • ईराक के तानाशाही व आतंकवादी गतिविधियों के गढ़ व तानाशाह सद्दाम हुसैन को समाप्त करना अमेरिका के मुख्य उद्देश्य थे । 

💠 ऑपरेशन इराकी फ्रीडम के छिपे हुए उद्देश्य :-

  • अमेरिका का ईराक के तेल- भंडार पर नियंत्रण स्थापित करना ।  
  • ईराक में अमेरिका की मनपंसद सरकार स्थापित करना ।  

💠 ऑपरेशन इराकी फ्रीडम के परिणाम : –

  • विश्व में अमरीकी शक्ति या वर्चस्व में और अधिक विस्तार हो गया । 
  • अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की बात न मानकर विश्व को यह दिखा दिया कि संयुक्त राष्ट्रसंघ भी अमरीका के ही हाथों में हैं । 
  • इसके बाद अमेरिका की शक्ति विश्व में और अधिक बढ़ गयी ।

💠 अरब स्प्रिंग : –

🔹 21 वीं शताब्दी में पश्चिम एशियाई देशों में लोकतंत्र के लिए विरोध प्रदर्शन और जन आंदोलन शुरू हुए । ऐसे ही एक आंदोलन को अरब स्प्रिंग के नाम से जाना जाता है । इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 2010 में मोहम्मद बउज़िज़ी के आत्मदाह के साथ हुई ।

💠 विरोध प्रदर्शन के तरीके : –

  • (i) हड़ताल
  • (ii) धरना
  • (iii) मार्च
  • (iv) रैली

💠 विरोध का कारण : –

  • (i) जनता का असंतोष
  • (ii) गरीबी
  • (iii) तानाशाही
  • (iv) मानव अधिकार उल्लंघन
  • (v) भ्रष्टाचार
  • (vi) बेरोजगारी 

💠 अरब स्प्रिंग ( अरब क्रांति ) : –

🔹 21 वीं शताब्दी में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं तथा पश्चिम एशियाई देशों में लोकतांत्रिकरण के लिए नए विकास का उदय हुआ । इस प्रकार की एक परिघटना को अरब स्प्रिंग के रूप में जाना जाता है जिसका आरंभ 2009 में हुआ ट्यूनीशिया में प्रारंभ हुए अरब स्प्रिंग ने अपनी जड़े जमा ली जहां जनता द्वारा भ्रष्टाचार , बेरोजगारी तथा निर्धनता के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ किया गया यह संघर्ष एक राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया क्योंकि जनता तत्कालीन समस्याओं को निरंकुश तानाशाही का परिणाम मानती थी ।

🔹 टयूनीशिया में उचित लोकतंत्र की मांग पश्चिम एशिया के मुस्लिम बहुल अरब देशों में फैल गई । होस्नी मुबारक , जो 1979 के पश्चात में मिस्त्र में सत्ता में थे , एक बड़े स्तर पर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के परिणाम स्वरूप ध्वस्त हो गए । इसके अतिरिक्त अरब क्रांति का प्रभाव यमन , बहरीन , लीबिया तथा सीरिया जैसे अरब देशों में भी देखा गया जहां जनता द्वारा इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन ने पूरे क्षेत्र में लोकतांत्रिक जागृति को जन्म दिया ।

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